Delimitation Bill Cancelled: संसद के मौनसून सत्र के आखिरी दिन एक चौंकाने वाला फैसला सामने आया है। सरकार ने विवादास्पद हद्दबंदी (Delimitation) और महिला आरक्षण से जुड़े एजेंडे को इस सत्र में पेश करने का इरादा छोड़ दिया है। दिलचस्प बात यह है कि केंद्रीय कैबिनेट की बैठक, जो 13 अगस्त यानी गुरुवार के लिए तय थी, अब रद्द कर दी गई है।
देखा जाए तो यह फैसला कई मायनों में अहम है। सरकार की ओर से मौनसून सत्र के आखिरी दिन कैबिनेट मीटिंग का ऐलान किए जाने के बाद अटकलें लगने लगी थीं कि संविधान संशोधन बिलों को कैबिनेट की मंजूरी मिल सकती है और आखिरी समय पर संसद में दोबारा पेश किया जा सकता है। यह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अचानक बड़े फैसले लेने के अंदाज से मेल खाता था।
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अमित शाह की कार्यशैली और पिछले बड़े फैसले
अगर गौर करें तो गृह मंत्री अमित शाह अपनी रणनीतिक टाइमिंग के लिए जाने जाते हैं। अपराधिक कानूनों में संशोधन (आईपीसी और सीआरपीसी), के साथ-साथ जम्मू और कश्मीर में धारा 370 को खत्म करने का कदम, दोनों ही अमित शाह द्वारा संबंधित संसद सत्रों के आखिरी चरण पर आगे बढ़ाए गए थे।
समझने वाली बात यह है कि वह अक्सर ऐसे बड़े फैसले विपक्ष को चौंकाते हुए लेते रहे हैं। उनका यह अंदाज राजनीतिक हलकों में खासा चर्चित है। लेकिन इस बार कहानी अलग है।
हालांकि इस बार सरकार हितधारकों (Stakeholders) के साथ सलाह-मशविरे को ज्यादा महत्व देती दिखाई दे रही है। और बस यहीं से शुरू हुआ असली मोड़।
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दो-तिहाई बहुमत तैयार, फिर भी क्यों रुकी सरकार?
सूत्रों का संकेत है कि सरकार ने हद्दबंदी बिल को पास करने के लिए लोड़ींदी दो-तिहाई बहुमत पहले ही तैयार कर लिया था, जो महिला आरक्षण के मुद्दे से जुड़ा हुआ था। लेकिन इस मामले को और समय देने का फैसला किया गया है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि संवैधानिक संशोधनों के लिए हाजिर और वोट डालने वाले संसद सदस्यों के दो-तिहाई हिस्से के विशेष बहुमत की जरूरत होती है। इस बिल का पिछला रूप अप्रैल 2026 में विरोधी पक्ष द्वारा हरा दिया गया था।
सरकार के पास संख्या बल था, फिर भी रुकना पड़ा। कारण था – विरोधी पक्ष का आक्रामक रुख।
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विरोधी पक्ष की अड़चनें और संसद का गतिरोध
इस बार एक अड़ियल विरोधी पक्ष ने संसद को सुचारू ढंग से काम नहीं करने दिया। सदन में लगातार हंगामा होता रहा, जिस कारण सरकार को छात्र विरोध प्रदर्शन के मुद्दे पर अमित शाह द्वारा बयान देने की विरोधी पक्ष की मांग को मानने के लिए मजबूर होना पड़ा।
विरोधी पक्ष ने FCRA (विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम) संशोधनों पर भी पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है, जिन्हें अब सरकार संसद की संयुक्त समिति के पास भेज सकती है।
राहत की बात यह है कि सरकार ने सदन के गतिरोध को तोड़ने के लिए विरोधी पक्ष को शांत करने की कोशिश की है, पर अब तक असफल रही है। संविधान संशोधन बिल को पास करने के लिए एक शांत सदन पहली शर्त है।
विरोधी पक्ष, शायद इस बात से जानकार है कि सुचारू ढंग से काम करने वाला सदन सरकार को हद्दबंदी को आगे बढ़ाने की इजाजत दे सकता है, ने लोक सभा को आम तौर पर काम नहीं करने दिया। यहां तक कि संसदीय मामलों के मंत्री द्वारा यह कहने के बावजूद भी कि अमित शाह छात्र मुद्दे पर बहस में हिस्सा लेने और इसका जवाब देने के लिए तैयार हैं।
आगे की रणनीति: विशेष सत्र की संभावना
संविधान संशोधन के नए तैयार किए बिल को संसद में पेश करने के लिए, हितधारकों के अनुकूल ताजा संशोधनों को पहले कैबिनेट द्वारा मंजूरी मिलनी चाहिए। गुरुवार को मौनसून सत्र खत्म होने के साथ कोई भी कैबिनेट मीटिंग तय ना होने के कारण, संकेत यह हैं कि हद्दबंदी के एजेंडे को बाद में, संभवतः किसी विशेष सत्र में लाया जाएगा।
चिंता का विषय यह है कि विपक्ष अब सरकार की हर चाल को भांप रहा है। इससे साफ होता है कि सरकार को अब ज्यादा सावधानी से आगे बढ़ना होगा।
क्या सत्र स्थगित या मुलतवी?
यह भी चर्चा है कि सरकार गुरुवार को मौनसून सत्र के समाप्त होने पर इसे मुलतवी (Prorogue) नहीं कर सकती। यह एक ऐसा कदम होगा जो इसे जब भी चाहे सत्र को वापस बुलाने की अनुमति देगा।
इसका मतलब है कि सरकार सत्र को तकनीकी रूप से जारी रख सकती है और जरूरत पड़ने पर दोबारा बुला सकती है। यह रणनीति विरोधी पक्ष को चौंका सकती है।
यह दर्शाता है कि सरकार ने अभी अपने विकल्प खुले रखे हैं। हद्दबंदी का मुद्दा अभी खत्म नहीं हुआ है, बस टाला गया है।
क्या है महिला आरक्षण और हद्दबंदी का कनेक्शन?
हैरान करने वाली बात यह है कि महिला आरक्षण बिल को हद्दबंदी से जोड़ा गया है। सरकार का तर्क है कि हद्दबंदी के बाद ही महिला आरक्षण को सही तरीके से लागू किया जा सकता है।
विपक्षी दलों का कहना है कि यह सिर्फ बहाना है और सरकार दोनों को एक साथ पास करवाना चाहती है। उन्हें डर है कि हद्दबंदी में उत्तर भारतीय राज्यों को ज्यादा सीटें मिल सकती हैं जबकि दक्षिण भारतीय राज्यों की सीटें कम हो सकती हैं।
यह मुद्दा राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है और इसीलिए सरकार सावधानी बरत रही है।
मुख्य बातें (Key Points)
- केंद्र सरकार ने मौनसून सत्र में Delimitation और Women Reservation Bill पेश करने का इरादा छोड़ा
- 13 अगस्त के लिए तय कैबिनेट बैठक रद्द कर दी गई
- विरोधी पक्ष के आक्रामक रुख और संसद के गतिरोध के कारण सरकार को पीछे हटना पड़ा
- सरकार के पास दो-तिहाई बहुमत तैयार था फिर भी बिल नहीं लाया गया
- विशेष सत्र में इस मुद्दे को उठाए जाने की संभावना










