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The News Air - Breaking News - Twisha Sharma Case: पूर्व जज को उन्हीं कैदियों से खतरा, जिन्हें उसने सुनाई थी सजा

Twisha Sharma Case: पूर्व जज को उन्हीं कैदियों से खतरा, जिन्हें उसने सुनाई थी सजा

दहेज हत्या मामले में जेल भेजी गई पूर्व जिला जज गिरीबाला सिंह ने भोपाल सेंट्रल जेल में मांगी सुरक्षित जगह - जानें पूरा मामला

Ajay Kumar by Ajay Kumar
मंगलवार, 2 जून 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय
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Twisha Sharma Case: मध्य प्रदेश की पूर्व जिला जज गिरीबाला सिंह को आज वो दिन देखना पड़ा जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। मॉडल तविशा शर्मा की दहेज हत्या मामले में आरोपी बनीं इस पूर्व जज को अब उन्हीं कैदियों से खतरा महसूस हो रहा है जिन्हें उन्होंने अपने न्यायिक करियर के दौरान सजा सुनाई थी। मंगलवार को उन्होंने अदालत से भोपाल सेंट्रल जेल में अलग और सुरक्षित जगह की मांग की है।

देखा जाए तो यह भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास का एक अजीबोगरीब और शर्मनाक अध्याय है। जो कभी न्याय के आसन पर बैठकर फैसले सुनाती थीं, आज वही उन अपराधियों के बीच जेल में बंद हैं जिन्हें उन्होंने खुद दंडित किया था। दिलचस्प बात यह है कि यह मामला सिर्फ एक कानूनी मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसने पूरी न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।

अगर गौर करें तो तविशा शर्मा दहेज मृत्यु केस देश के सबसे चर्चित और संवेदनशील मामलों में से एक बन चुका है। जहां एक तरफ पीड़ित परिवार न्याय की गुहार लगा रहा है, वहीं दूसरी ओर आरोपी पूर्व जज और उसके बेटे मीडिया ट्रायल और जेल में असुरक्षा का रोना रो रहे हैं।

🔍 यह भी पढ़ें- Dowry Deaths India: हर दिन 16 बेटियों की मौत, क्या है ये कारोबार?

कौन हैं गिरीबाला सिंह और क्या है मामला?

गिरीबाला सिंह मध्य प्रदेश की पूर्व जिला जज हैं जो कई सालों तक भोपाल में तैनात रहीं। उनके बेटे समरथ सिंह की शादी मॉडल तविशा शर्मा से हुई थी। तविशा की मौत के बाद उसके परिवार ने दहेज उत्पीड़न और हत्या के आरोप लगाए।

CBI ने इस मामले की जांच संभाली और गिरीबाला सिंह तथा उनके बेटे समरथ सिंह को दहेज उत्पीड़न का आरोपी बनाया। मंगलवार को भोपाल की एक अदालत ने CBI रिमांड पूरा होने पर दोनों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। अब वे भोपाल सेंट्रल जेल में बंद हैं।

समझने वाली बात यह है कि जो महिला कभी न्याय का प्रतीक थी, आज खुद न्याय की कठघरे में खड़ी है। और सबसे बड़ा विरोधाभास यह कि उसी जेल में उन अपराधियों के साथ रहने को मजबूर है जिन्हें उसने सजा सुनाई थी।

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अदालत में क्या हुआ? पूरा कोर्टरूम ड्रामा

मंगलवार को जुडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (JMFC) शोभना भलावे की अदालत में गिरीबाला सिंह ने दखल देते हुए अपनी बात रखने की इजाजत मांगी। उन्होंने कई गंभीर आरोप लगाए:

1. जेल में खतरा: गिरीबाला सिंह ने कहा कि वे कई सालों तक भोपाल में तैनात रहीं और उन्होंने ऐसे मामलों में फैसले सुनाए जिनके नतीजे में अभी भोपाल सेंट्रल जेल में बंद कैदियों को सजा हुई थी। उन्होंने अपनी जान को खतरे की आशंका जताई और जेल में अलग सुरक्षित स्थान की मांग की।

2. बेटे के साथ बदसलूकी: उन्होंने आरोप लगाया कि तविशा शर्मा के परिवार का प्रतिनिधित्व कर रहे एक वकील ने जबलपुर जिला अदालत में उनके बेटे समरथ पर हमला किया।

3. मीडिया ट्रायल: गिरीबाला सिंह ने दावा किया कि केस की शुरुआत से ही उन्हें और उनके बेटे को लगातार मीडिया ट्रायल का सामना करना पड़ रहा है।

4. मीडिया कवरेज बंद हो: उन्होंने मांग की कि CBI द्वारा की जा रही जांच को मीडिया कवरेज नहीं मिलनी चाहिए और जब उन्हें जेल ले जाया जाए तो मीडिया से सुरक्षा दी जानी चाहिए।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि अदालत ने उनकी अर्जी स्वीकार कर ली है और CBI को कुछ निर्देश दिए हैं।

🔍 यह भी पढ़ें- KP Sharma Oli Arrested Nepal: गिरफ्तारी के बाद सड़कों पर उतरे समर्थक, पुलिस ने खदेड़ा

पीड़ित पक्ष के वकील का पलटवार

तविशा शर्मा के परिवार का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील अनुराग श्रीवास्तव ने पत्रकारों से बात करते हुए पूरे मामले की तफसील दी। उन्होंने कहा:

“गिरीबाला सिंह ने इशारा किया कि अपने न्यायिक करियर के दौरान वे कई सालों तक भोपाल में तैनात रहीं और उन्होंने उन केसों में फैसले सुनाए जिनके नतीजे में अभी सेंट्रल जेल में बंद कैदियों को सजा हुई थी। उन्होंने अपनी जान को खतरे की आशंका जताई और जेल में जरूरी सुरक्षा की मांग की।”

श्रीवास्तव ने जबलपुर की अदालत में हुई घटनाओं का भी खुलासा किया:

घटनाविवरण
मीडिया का पीछासमरथ सिंह के पीछे मीडिया थी जब वह सरेंडर करने अदालत में था
वकीलों द्वारा गाली-गलौचकुछ वकीलों ने उन्हें और मीडिया को धमकियां दीं और गालियां दीं
बाहर निकाला गयाअदालत का दरवाजा बंद कर दिया गया और बाहर निकाल दिया
लाइव कवरेजमीडिया ने पूरी घटना लाइव दिखाई

श्रीवास्तव ने जोर देकर कहा: “न तो अंकुर पांडे (पीड़ित परिवार का एक और वकील) और न ही मैं इस केस से पीछे हटने वाले हैं। हम अपनी रक्षा करने में सक्षम हैं।”

जबलपुर कोर्ट में हुआ हंगामा

जब समरथ सिंह और गिरीबाला सिंह केस में सरेंडर करने जबलपुर जिला अदालत पहुंचे तो वहां अराजकता का माहौल था। श्रीवास्तव ने दावा किया:

“मुझे और मीडिया को धमकियां दी गईं, गालियां दी गईं और बाहर कर दिया गया। अदालत का दरवाजा बंद कर दिया गया और मीडिया ने इसे लाइव दिखाया। जिला सेशन कोर्ट, जबलपुर में लगे CCTV की जांच की जानी चाहिए ताकि पता लगे कि अंदर क्या हुआ।”

उन्होंने यह भी दावा किया कि पहले दिन से ही यह यकीनी बनाने की कोशिश की जा रही है कि तविशा के परिवार को वकीलों का समर्थन न मिले।

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मीडिया ट्रायल vs जनता का अधिकार

यह मामला एक बड़ी बहस को जन्म देता है – मीडिया ट्रायल और जनता के जानने के अधिकार के बीच संतुलन। गिरीबाला सिंह का कहना है कि उन्हें और उनके बेटे को शुरुआत से ही मीडिया ट्रायल का शिकार बनाया जा रहा है।

लेकिन दूसरी ओर, पीड़ित पक्ष के वकील कहते हैं कि यह एक हाई-प्रोफाइल केस है और जनता को जानने का अधिकार है। खासकर तब जब आरोपी खुद एक पूर्व जज हैं जिन्हें न्याय व्यवस्था का ज्ञान है।

समझने वाली बात यह है कि भारतीय कानून में मीडिया ट्रायल को लेकर स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि मीडिया को जिम्मेदारी से काम करना चाहिए, लेकिन साथ ही प्रेस की आजादी भी महत्वपूर्ण है।

पूर्व जज का जेल में खतरा: कितना वाजिब?

गिरीबाला सिंह की चिंता वाजिब लग सकती है। सोचिए, जिस व्यक्ति ने सालों तक न्यायाधीश के रूप में अपराधियों को सजा सुनाई, आज वह उन्हीं अपराधियों के बीच जेल में बंद है। यह स्थिति किसी फिल्म के प्लॉट जैसी लगती है, लेकिन यह कड़वी हकीकत है।

जेल प्रशासन के सामने अब एक बड़ी जिम्मेदारी है:

चुनौतीसमाधान की जरूरत
पूर्व जज की पहचानअलग सेल या सुरक्षित बैरक
कैदियों से खतराविशेष सुरक्षा व्यवस्था
अन्य कैदियों की प्रतिक्रियासंवेदनशील हैंडलिंग
मीडिया का दबावगोपनीयता और सुरक्षा का संतुलन

अदालत ने उनकी अर्जी स्वीकार कर ली है, जिसका मतलब है कि जेल प्रशासन को विशेष व्यवस्था करनी होगी।

CBI की जांच: क्या है आगे की राह?

CBI इस मामले की जांच कर रही है। अब तक की जांच में गिरीबाला सिंह और समरथ सिंह को मुख्य आरोपी बनाया गया है। CBI रिमांड पूरा होने के बाद अब वे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में हैं।

CBI की जांच में कई पहलुओं को देखा जा रहा है:

  • तविशा की मौत की परिस्थितियां
  • दहेज की मांग के साक्ष्य
  • उत्पीड़न के सबूत
  • फोरेंसिक साक्ष्य
  • गवाहों के बयान

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि CBI ने अब तक अपनी जांच के विवरण सार्वजनिक नहीं किए हैं। आरोपियों की ओर से मांग की जा रही है कि जांच को मीडिया कवरेज न मिले, लेकिन पीड़ित पक्ष इसे पारदर्शिता में बाधा मानता है।

न्यायिक व्यवस्था पर सवाल

यह मामला भारतीय न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर कई सवाल खड़े करता है:

1. जज भी अपराधी हो सकते हैं: यह केस साबित करता है कि न्यायिक पद पर बैठे लोग भी कानून से ऊपर नहीं हैं। अगर आरोप सही साबित होते हैं तो यह न्याय व्यवस्था के लिए शर्मनाक होगा।

2. सुरक्षा का सवाल: एक पूर्व जज को जेल में सुरक्षा की जरूरत पड़ रही है – यह दिखाता है कि जेल प्रणाली में कैदियों की सुरक्षा के मानक क्या हैं।

3. मीडिया की भूमिका: क्या मीडिया न्याय प्रक्रिया में बाधा डाल रही है या जनता के जानने के अधिकार की रक्षा कर रही है?

4. दहेज कानून का दुरुपयोग बनाम न्याय: आरोपी पक्ष मीडिया ट्रायल का आरोप लगा रहा है, लेकिन पीड़ित पक्ष कहता है कि यह न्याय की लड़ाई है।

दहेज प्रथा: समाज का कलंक

इस मामले के केंद्र में दहेज उत्पीड़न का आरोप है। भारत में दहेज निषेध अधिनियम 1961 से लागू है, फिर भी यह सामाजिक बुराई जारी है। IPC की धारा 304B (दहेज मृत्यु) और धारा 498A (पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता) जैसे कड़े कानून हैं, लेकिन अभी भी हर साल हजारों महिलाएं दहेज उत्पीड़न की शिकार होती हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार:

वर्षदहेज मृत्यु के मामलेधारा 498A के मामले
20227,000+1,45,000+
20237,200+ (अनुमानित)1,50,000+ (अनुमानित)

तविशा शर्मा केस इस बात का उदाहरण है कि दहेज प्रथा किसी भी वर्ग, किसी भी शिक्षित परिवार में हो सकती है – यहां तक कि एक जज के परिवार में भी।

वकीलों के बीच तनाव

जबलपुर और भोपाल में वकीलों के बीच तनाव भी इस मामले का एक पहलू है। अनुराग श्रीवास्तव ने आरोप लगाया कि जबलपुर में कुछ वकीलों ने उन्हें और तविशा के परिवार को सपोर्ट करने वाले अन्य वकीलों को धमकाया और गालियां दीं।

यह घटना कानूनी बिरादरी के भीतर विभाजन को दर्शाती है। कुछ वकील पीड़ित पक्ष का समर्थन कर रहे हैं तो कुछ आरोपी पक्ष का। यह स्वाभाविक है, लेकिन जब यह हिंसा और धमकियों में बदल जाए तो चिंताजनक हो जाता है।

आगे क्या होगा?

अब अदालत ने गिरीबाला सिंह और समरथ सिंह को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। इस दौरान:

1. CBI जांच जारी रहेगी: और साक्ष्य जुटाए जाएंगे।

2. जेल में सुरक्षा व्यवस्था: अदालत के निर्देश के अनुसार विशेष प्रबंध किए जाएंगे।

3. अगली सुनवाई: 14 दिन बाद अदालत फिर से मामले की सुनवाई करेगी और तय करेगी कि आगे क्या होगा।

4. मीडिया कवरेज: अदालत के निर्देशों के अनुसार, जब आरोपियों को जेल ले जाया जाए तो उन्हें मीडिया से सुरक्षा दी जाएगी।

5. पीड़ित परिवार की लड़ाई: अनुराग श्रीवास्तव और अंकुर पांडे ने स्पष्ट कर दिया है कि वे इस केस से पीछे नहीं हटेंगे।

समाज के लिए सबक

यह मामला कई सबक देता है:

पहला: कोई भी कानून से ऊपर नहीं है। चाहे वह जज हो या आम नागरिक, अगर अपराध किया है तो सजा मिलेगी।

दूसरा: दहेज प्रथा हमारे समाज का कलंक है और इसे जड़ से मिटाना होगा।

तीसरा: न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता जरूरी है, लेकिन मीडिया ट्रायल से बचना भी उतना ही जरूरी है।

चौथा: जेल सुधार की जरूरत है ताकि हर कैदी को सुरक्षा मिले, चाहे वह पूर्व जज हो या आम अपराधी।

जानें पूरा मामला: टाइमलाइन

यह मामला लंबे समय से चल रहा है। तविशा शर्मा की मौत के बाद उसके परिवार ने दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया। शुरुआत में राज्य पुलिस जांच कर रही थी, लेकिन बाद में केस CBI को ट्रांसफर कर दिया गया।

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CBI ने अपनी जांच में गिरीबाला सिंह और समरथ सिंह को आरोपी पाया। दोनों को गिरफ्तार किया गया और CBI रिमांड पर लिया गया। अब न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।

इस पूरे मामले में पीड़ित परिवार न्याय की मांग कर रहा है तो आरोपी पक्ष मीडिया ट्रायल और असुरक्षा का रोना रो रहा है। सच क्या है, यह तो जांच और अदालत ही तय करेगी।

लेकिन एक बात तय है – यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था, दहेज प्रथा और मीडिया की भूमिका पर लंबे समय तक बहस का विषय बना रहेगा।


मुख्य बातें (Key Points)

• पूर्व जिला जज गिरीबाला सिंह और उनके बेटे समरथ सिंह को तविशा शर्मा दहेज मृत्यु मामले में 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भोपाल सेंट्रल जेल भेजा गया

• गिरीबाला सिंह ने अदालत से जेल में अलग सुरक्षित जगह की मांग की क्योंकि उसी जेल में वे कैदी भी हैं जिन्हें उन्होंने अपने न्यायिक करियर में सजा सुनाई थी

• पीड़ित पक्ष के वकील अनुराग श्रीवास्तव ने आरोप लगाया कि जबलपुर कोर्ट में कुछ वकीलों ने उन्हें धमकाया और गालियां दीं, अदालत से बाहर निकाला

• आरोपी पक्ष ने मीडिया ट्रायल का आरोप लगाया और मांग की कि CBI जांच को मीडिया कवरेज न मिले

• अदालत ने आरोपियों की अर्जी स्वीकार कर CBI को निर्देश दिए कि जेल ले जाते समय उन्हें मीडिया से सुरक्षा दी जाए

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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