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The News Air - Breaking News - Dowry Deaths India: हर दिन 16 बेटियों की मौत, क्या है ये कारोबार?

Dowry Deaths India: हर दिन 16 बेटियों की मौत, क्या है ये कारोबार?

ट्विशा शर्मा केस ने फिर उठाया सवाल - NCRB डेटा बताता है सालाना 6000-7000 मौतें सिर्फ दहेज उत्पीड़न से, आधुनिक समाज में भी क्यों जारी है ये बर्बरता?

Ajay Kumar by Ajay Kumar
मंगलवार, 26 मई 2026
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Dowry Deaths India
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Dowry Deaths India: एक आंकड़ा है – 16। सुनने में बेहद छोटा लगता है, लेकिन इस संख्या के पीछे छिपी हुई चीखें आपकी रूह कंपा देंगी। यह 16 उन बेटियों की संख्या है जो औसतन हर दिन भारत में दहेज की वेदी पर, पारिवारिक प्रताड़ना की वेदी पर बलि चढ़ जाती हैं। NCRB (National Crime Records Bureau) का डेटा कहता है कि भारत में हर साल लगभग 6,000 से 7,000 मौतें सिर्फ दहेज के उत्पीड़न या उससे संबंधित उत्पीड़न की वजह से होती हैं।

और इस आंकड़े को अगर कोई चेहरा देना हो तो आप ट्विशा शर्मा (Twisha Sharma) का नाम ले सकते हैं। अभी हाल ही में ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत के मामले ने पूरे देश को हिला दिया है। परिवार का सीधा आरोप है – बेरहम दहेज प्रताड़ना, मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न। मामले की गंभीरता को देखते हुए SIT (Special Investigation Team) का गठन हो चुका है। कोर्ट कानूनी कार्रवाई कर रहा है। मामला अभी सब-जुडिस है, इसलिए अंतिम सच अदालत तय करेगी।

लेकिन सवाल किसी एक आरोपी या एक परिवार से नहीं है। सवाल पूरे इको-सिस्टम से है। क्यों हर कुछ महीनों में हम सिर्फ पीड़िता का नाम बदल देते हैं? कुछ महीने पहले कोई और नाम हेडलाइन में था, आज ट्विशा का है, कल कोई और होगा। नाम बदलते हैं, तारीखें बदलती हैं, लेकिन भारत की बेटियों की किस्मत और उनके साथ होने वाली बर्बरता की कहानी नहीं बदलती।

🔍 यह भी पढ़ें- Atta Satta Practice Rajasthan High Court: बेटियों की अदला-बदली पर बड़ा फैसला, तलाक को मंजूरी

हर सुबह 16 परिवारों का सूना आंगन

देखा जाए तो यह कोई सामान्य आंकड़ा नहीं है। जब आप सुबह उठकर चाय की चुस्की ले रहे होते हैं, जब आप अपनी गाड़ी स्टार्ट करके ऑफिस के लिए निकल रहे होते हैं, ठीक उसी वक्त देश के किसी कोने में एक बेटी अपनी शादी बचाने के लिए मिन्नतें कर रही होती है। अपने आंसुओं को छुपाकर मां-बाप से फोन पर झूठ बोल रही होती है – “मम्मी मैं ठीक हूं।” और शायद वह अपनी जिंदगी का आखिरी मैसेज टाइप कर रही होती है।

सबसे चिलिंग पार्ट जानते हैं क्या है? यह कोई अनपढ़, दबे-कुचले या पिछड़े समाज की कहानी नहीं है। ट्विशा शर्मा की तरह ही इनमें से कई लड़कियां हाईली एजुकेटेड थीं, फाइनेंशियली इंडिपेंडेंट थीं। कई ने तो अपनी मर्जी से, अपने प्यार से शादी की थी। लेकिन वो भी इस लालच के दलदल से खुद को बचा नहीं पाईं।

🔍 यह भी पढ़ें- क्या Dowry Law का हो रहा गलत इस्तेमाल? SC ने कहा – ‘संसद के पास जाओ’

दहेज 2.0: नई पैकेजिंग में पुरानी बीमारी

कुछ लोग कहते हैं कि समाज बदल गया है, इंडिया प्रोग्रेस कर रहा है। लेट मी करेक्ट यू – समाज बदला नहीं है, समाज ने अपनी लालच को रिब्रांड कर दिया है।

1990 के दशक का दहेज का मैथमेटिक्स बिल्कुल सीधा और कच्चा था। एक लिस्ट हुआ करती थी – फ्रिज चाहिए, बजाज का स्कूटर चाहिए, रंगीन टीवी चाहिए। और आप उसे सीधे तौर पर दहेज कहा करते थे।

लेकिन आज? 2025 में ग्रीड has gone digital and sophisticated। यह दहेज का 2.0 वर्जन है। अब भाषा बदल चुकी है, सोफिस्टिकेशन आ गया है। अब सीधे मुंह कोई मांग नहीं रखी जाती। अब ड्रॉइंग रूम में बैठकर चाय की चुस्की लेते हुए कहा जाता है:

“जी, हमें तो कुछ नहीं चाहिए। लड़का-लड़की खुश रहें बस। हम तो कुछ मांग ही नहीं रहे। लड़की का बाप अपनी खुशी से जो दे दे। आखिर समाज में हमारी भी इज्जत है।”

दिस इज नॉट अ ट्रेडिशन। दिस इज एक्सटॉर्शन रैप्ड इन अ सोफिस्टिकेटेड वोकैबुलरी। यह परंपरा नहीं है, यह शब्दों में लपेटी हुई जबरन वसूली है।

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आधुनिक दहेज: लाइफस्टाइल पैकेज

आज दहेज कैश के लिफाफे में नहीं लिया जाता। आज दहेज लाइफस्टाइल पैकेज बनकर आता है। देखिए क्या-क्या चाहिए आज के दूल्हे को:

पुराना दहेज (1990s)नया दहेज (2025)
रंगीन टीवी75 इंच Smart LED
बजाज स्कूटरFortuner/Audi
फ्रिजDesigner फ्लैट (Posh Area)
गोल्ड सेटइंटरनेशनल हनीमून
कैश ₹50,000Destination Wedding + कैश ₹50 लाख

इस पूरे कमर्शियल ट्रांजैक्शन को नाम दिया जाता है – स्टेटस या रीति-रिवाज का।

लालच की साइकोलॉजी: बेटा बना एसेट

अगर गौर करें तो इस बीमारी का मनोविज्ञान समझना बहुत जरूरी है। आखिर यह लालच पैदा कहां से होता है?

एक मिडिल क्लास या अपर मिडिल क्लास अपने बेटे को IIT भेजता है, IIM भेजता है। लाखों रुपए खर्च करके विदेश से MBA कराता है। और जैसे ही बेटे की शादी की उम्र आती है, परिवार का बिजनेस माइंड एक्टिवेट हो जाता है।

उसके दिमाग के बैकग्राउंड में एक कैलकुलेटर चलने लगता है:

“बेटे की पढ़ाई में ₹40 लाख का इन्वेस्टमेंट किया है। अब Return on Investment (ROI) का टाइम आ गया है।”

और यही इस देश की सबसे घिनौनी और सबसे खतरनाक मानसिकता है। यहां बेटे को एक इंसान नहीं, बल्कि एक फाइनेंशियल एसेट बना दिया जाता है। और शादी को एक इन्वेस्टमेंट रिकवरी मॉडल बना दिया जाता है।

समाजशास्त्र की भाषा में इसे Status Exchange Model कहा जाता है – जहां शादी दो दिलों का मिलन नहीं, बल्कि दो सोशल कैपिटल का कमर्शियल एक्सचेंज बन जाती है। दूल्हा बाजार में बिकने के लिए खड़ा एक प्रोडक्ट बन जाता है, और उसकी कीमत उसकी डिग्री और सैलरी पैकेज से तय होती है।

कानून है, लेकिन सामाजिक स्वीकृति भी है

कुछ लोग जरूर कहेंगे – “सर, कानून है ना! आर्टिकल 498A है, Dowry Prohibition Act 1961 है, Domestic Violence Act है।”

बिल्कुल है। किताबों में कानूनों की कोई कमी नहीं है। कमी कहां है? कमी है हमारे सोशल लेजिटिमेसी में, हमारे समाज के पाखंड में।

समझने वाली बात यह है – अगर समाज में कोई अधिकारी ₹1 लाख की रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता है, तो पूरा समाज उस पर थूथू करता है। “वो भ्रष्ट है!”

लेकिन जब वही अधिकारी अपनी शादी में ₹2 करोड़ की गाड़ी + ₹1 करोड़ दहेज में कैश लेता है, तो पूरा मोहल्ला शाबाशी देता है। “वाह! क्या किस्मत है लड़के की। क्या आलीशान शादी हुई!”

जब समाज इस अपराध को स्टेटस सिंबल मानता रहेगा, तब तक कोई भी कानून इस देश की बेटियों को जलने से नहीं बचा सकता।

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स्लो पॉइजन: धीमी मौत की क्रोनोलॉजी

यहां समझिए – कोई भी बेटी रातोंरात खुदकुशी नहीं करती। इसकी एक क्रोनोलॉजी होती है, एक ऑर्डर होता है। यह एक स्लो पॉइजन होता है जो रोज उसकी आत्मा को दिया जाता है:

चरण 1 – रसोई में ताने:
“तुम्हारी मां ने तो खाना बनाना नहीं सिखाया क्या? विदाई में तो बड़े-बड़े दावे कर रहे थे।”

चरण 2 – तुलना का खेल:
“शर्मा जी की बहू को देखा? बेटे की शादी में Creta गाड़ी लेकर आई थी।”

चरण 3 – अलगाव और मानसिक उत्पीड़न:
पति भी धीरे-धीरे दूर होने लगता है। सास-ससुर का व्यवहार कठोर होता जाता है।

चरण 4 – शारीरिक हिंसा:
और अंत में मार-पीट, जलाना, या “दुर्घटनावश” मौत।

क्यों नहीं बोलतीं बेटियां?

सबसे दुखद बात जानते हैं क्या? भारतीय बेटियां आखिरी सांस तक इस सिस्टम को झेलती हैं। वे अपने मां-बाप को फोन करके हर बार नहीं बताती हैं। क्यों?

  • उन्हें सिखाया जाता है: “डोली उठ गई है, वहां से तुम्हारी अर्थी उठेगी।”
  • डर होता है कि बूढ़े पिता परेशान हो जाएंगे।
  • “समाज क्या बोलेगा?” का डर।
  • अलग होने के बाद उठाए जाने वाले प्रश्नों का डर।

और इसी “थोड़ा और एडजस्ट कर लेती हूं” के चक्कर में एक दिन उनका वो मैसेज आखिरी बन जाता है।

NCRB डेटा: भूगोल का कड़वा सच

अगर हम ज्योग्राफिकल डेटा देखें तो NCRB की रिपोर्ट इस कड़वे सच को पूरी तरह उजागर करती है:

राज्यदहेज मौतों की संख्या (वार्षिक)प्रति लाख महिला आबादी
उत्तर प्रदेश2,0387.2
बिहार1,0785.8
मध्य प्रदेश4504.1
राजस्थान3803.9
पश्चिम बंगाल3202.8
तेलंगाना1442.3
कर्नाटक1121.7

क्राइम रेट: उत्तराखंड सबसे ज्यादा – 9.8 प्रति लाख महिला आबादी।

राजधानी की शर्म: दिल्ली यूनियन टेरिटरीज में टॉप पर है जहां महिलाओं के खिलाफ अपराध और दहेज प्रताड़ना सर्वाधिक है।

दिलचस्प बात यह है कि मेट्रो सिटीज, तथाकथित आधुनिक शहरों में इसके केसेस और भी ज्यादा विभत्स हैं। और याद रखिए – यह वो आंकड़े हैं जो पुलिस स्टेशन तक पहुंच गए। वास्तविकता इससे कहीं ज्यादा डरावनी है।

क्योंकि हर चीख FIR में तब्दील नहीं होती। हर FIR चार्जशीट तक नहीं पहुंचती। और हर चार्जशीट कोर्ट में न्याय तक नहीं पहुंच पाती। रास्ते में ही पैसे और रसूख के दम पर सच का गला घोंट दिया जाता है।

कटघरे में पूरा समाज

तो कटघरे में सिर्फ लड़के वाले और उनका परिवार नहीं है। आज कटघरे में पूरा समाज खड़ा है:

  • जब आप शादी में जाकर कहते हैं, “लड़के वालों की खातिरदारी में कमी रह गई” – तो आप इस अपराध के भागीदार बन जाते हैं।
  • जब माता-पिता कहते हैं, “लड़का सरकारी नौकरी में है, थोड़ा-बहुत तो देना पड़ेगा” – तब आप अपनी बेटी का सौदा कर रहे होते हैं।
  • जब आप शादियों को डेकोरेशन और बाहर खड़ी गाड़ियों के प्राइस टैग से जज करते हैं – तब आप इस बीमारी को बढ़ावा देते हैं।
ट्विशा शर्मा केस: एक और नाम, वही कहानी

ट्विशा शर्मा का केस अभी सब-जुडिस है। SIT जांच कर रही है। कोर्ट फैसला सुनाएगा। लेकिन चाहे जो भी फैसला आए, एक सच तो यह है कि एक और बेटी चली गई। एक और परिवार बर्बाद हो गया। एक और सपना टूट गया।

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और सबसे बड़ा सवाल – अगली ट्विशा कौन होगी? कब होगी? कहां होगी? यह हम नहीं जानते। लेकिन इतना तय है कि अगर समाज नहीं बदला, तो अगली ट्विशा जरूर होगी।

समाधान: सामाजिक क्रांति की जरूरत

कानून काफी हैं। जरूरत है सामाजिक क्रांति की:

1. शादियों का मूल्यांकन बदलें:
शादी की सफलता को गाड़ियों, गहनों और होटलों से नहीं, बल्कि रिश्ते की गरिमा से मापें।

2. बेटों की परवरिश बदलें:
बेटों को सिखाएं कि वे प्रोडक्ट नहीं, इंसान हैं। उनका मूल्य डिग्री में नहीं, चरित्र में है।

3. बेटियों को आवाज दें:
“डोली-अर्थी” वाली सोच को जड़ से खत्म करें। बेटियों को सिखाएं कि शादी एक रिश्ता है, जेल नहीं।

4. सामाजिक बहिष्कार:
जो परिवार दहेज लेते-देते हैं, उनका सामाजिक बहिष्कार करें।

हैरान करने वाली बात यह है कि बाजार में प्रोडक्ट की कीमत होती है, गरिमा नहीं। वैल्यू नहीं। जिस दिन आपने शादी को बाजार बना दिया, उस दिन इंसान सिर्फ एक प्रोडक्ट बनकर रह जाता है।


मुख्य बातें (Key Points)

✓ Dowry Deaths India: भारत में हर दिन औसतन 16 बेटियां दहेज प्रताड़ना के कारण मारी जाती हैं – सालाना 6,000-7,000 मौतें।

✓ उत्तर प्रदेश सबसे आगे: NCRB डेटा के अनुसार UP में 2,038, बिहार में 1,078 और MP में 450 दहेज मौतें दर्ज हुईं।

✓ दहेज 2.0: आधुनिक दहेज कैश नहीं, बल्कि Fortuner, विदेश हनीमून, फ्लैट और लाइफस्टाइल पैकेज के रूप में लिया जाता है।

✓ ट्विशा शर्मा केस: हालिया संदिग्ध मौत में SIT जांच चल रही है, परिवार का आरोप – दहेज प्रताड़ना और मानसिक उत्पीड़न।

✓ कानून काफी नहीं: Article 498A और Dowry Prohibition Act होने के बावजूद सामाजिक स्वीकृति ही असली समस्या है।


FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: ट्विशा शर्मा केस में अब तक क्या हुआ है?

ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत के मामले में परिवार ने दहेज प्रताड़ना और मानसिक-शारीरिक उत्पीड़न का आरोप लगाया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए SIT (Special Investigation Team) का गठन किया गया है। केस अभी सब-जुडिस है, इसलिए अंतिम सच अदालत तय करेगी। परिवार न्याय की मांग कर रहा है।

प्रश्न 2: भारत में दहेज के खिलाफ कौन-कौन से कानून हैं?

भारत में दहेज के खिलाफ मुख्य कानून हैं: (1) Dowry Prohibition Act, 1961 – दहेज लेना-देना अपराध है, (2) IPC Section 498A – दहेज के लिए क्रूरता करना संज्ञेय अपराध है, (3) Domestic Violence Act, 2005 – घरेलू हिंसा से सुरक्षा, (4) IPC Section 304B – दहेज मृत्यु के लिए सजा। इन कानूनों के तहत सजा और जुर्माना दोनों हो सकते हैं।

प्रश्न 3: कौन से राज्यों में दहेज मौतें सबसे ज्यादा हैं?

NCRB के अनुसार उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा दहेज मौतें होती हैं (2,038 वार्षिक), उसके बाद बिहार (1,078) और मध्य प्रदेश (450) का नंबर आता है। क्राइम रेट के हिसाब से उत्तराखंड सबसे ऊपर है – 9.8 प्रति लाख महिला आबादी। मेट्रो शहरों में भी यह समस्या गंभीर है, दिल्ली यूनियन टेरिटरीज में टॉप पर है।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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