Pasmanda Movement ने भारतीय मुस्लिम समाज के भीतर एक ऐसी सच्चाई को उजागर किया जो दशकों से दबाई गई थी। अक्टूबर 1998 में पटना, बिहार में जब अली अनवर ने खड़े होकर कहा कि “मुस्लिम भाइयों का यह कहना कि हमारे बीच कोई जाति नहीं है, झूठ है,” तो एक ऐसी बहस शुरू हुई जिसने इस्लामिक समानता के नारे और सामाजिक वास्तविकता के बीच के अंतर को स्पष्ट कर दिया।
Pasmanda – फारसी शब्द जिसका अर्थ है “जो पीछे छूट गए” – यह वे मुस्लिम हैं जो ऊंचे खानदान का दावा नहीं कर सकते। जुलाहा, बुनकर, कसाई, नाई, धोबी, दर्जी, चमार – यह सब मुस्लिम भी हैं, लेकिन इन्हें कभी पूरी कम्युनिटी का चेहरा नहीं माना गया।
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एक नजर में मुस्लिम जाति व्यवस्था
अगर गौर करें, तो इस्लामिक धर्मशास्त्र स्पष्ट रूप से सार्वभौमिक भाईचारे और पूर्ण समानता को अनिवार्य बताता है। लेकिन दक्षिण एशिया में सामाजिक वास्तविकता एक जटिल, बहुस्तरीय पदानुक्रम प्रस्तुत करती है।
| वर्ग | विवरण | सामाजिक स्थिति |
|---|---|---|
| अशरफ (Ashraf) | विदेशी वंश का दावा करने वाले – सैयद, शेख, मुगल, पठान | अभिजात वर्ग/नोबल क्लास |
| अजलाफ (Ajlaf) | हिंदू शिल्पकार/सेवा जातियों से धर्मांतरित – जुलाहा, कसाई, नाई, दर्जी | पिछड़ा वर्ग |
| अरज़ल (Arzal) | दलित-समकक्ष धर्मांतरित – चमार, लालबेगी | गहरी सामाजिक बहिष्कृति |
1998 का वह ऐतिहासिक क्षण
और बस यहीं से शुरू हुई उस चुप्पी को तोड़ने की कहानी… अक्टूबर 1998 में अली अनवर ने Pasmanda Muslim Mahaz की स्थापना की। उनका तर्क सीधा था: अगर मुस्लिम संगठन आरक्षण मांग रहे हैं, तो वह आरक्षण किसे मिलेगा? क्या वह ऊंची जाति के अशरफ मुस्लिमों को मिलेगा? और अगर उन्हें मिला तो फिर क्या फायदा?
1999 में जब मुस्लिम संगठनों ने “Muslim Agenda 1999” जारी किया जिसमें पूरी कम्युनिटी के लिए आरक्षण मांगा गया, तो Pasmanda Muslim Mahaz ने अपना काउंटर दस्तावेज़ जारी किया – “Pasmanda Agenda 1999”। मांग थी: जाति-आधारित आरक्षण, सिर्फ पसमंदा मुस्लिमों के लिए।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इस्लाम की समानता (मसावत) का नारा ही हथियार बन गया था। जब भी कोई मुस्लिम निचली जाति बोलती थी कि हमारे साथ भेदभाव हो रहा है, तो ऊंची जाति के मुस्लिम नेता कहते थे, “भाई, इस्लाम में जाति नहीं होती। तुम कम्युनिटी को तोड़ने की बात ही मत करो।”
समझने वाली बात यह है कि समानता का नारा असमानता छुपाने का जरिया बन गया था।
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तीन-स्तरीय पदानुक्रम: कैसे काम करता है
दिलचस्प बात यह है कि यह हिंदू वर्ण व्यवस्था जैसी बिल्कुल नहीं है, लेकिन काम लगभग वैसे ही करती है।
अशरफ (The Elite):
यह वे लोग हैं जो दावा करते हैं कि उनके पूर्वज बाहर से आए – अरब, फारस (ईरान), या मध्य एशिया से। चार उप-समूह हैं:
- सैयद: खुद को पैगंबर मोहम्मद के वंशज मानते हैं
- शेख: अरब वंश का दावा
- मुगल: मध्य एशियाई वंश
- पठान: अफगान वंश
ये टॉप पर हैं। ऐतिहासिक रूप से शिक्षित, धार्मिक विद्वान, जमींदार – सब यही थे।
अजलाफ (The Backward):
यह वे हैं जो हिंदू शिल्पकार या सेवा जातियों से धर्मांतरित हुए थे:
- बुनकर (जुलाहा/अंसारी)
- नाई (हज्जाम)
- दर्जी
- कसाई (कुरैशी)
तकनीकी रूप से ये मुस्लिमों में दूसरे स्तर पर आते हैं। अशरफ के साथ इनकी शादी लगभग नहीं होती। खाने में अंतर है। सामाजिक प्रतिष्ठा में फर्क है।
अरज़ल (The Excluded):
यह अनिवार्य रूप से मुस्लिम दलित हैं। चमार (जूते बनाने वाले), लालबेगी (सफाई कर्मी)। इनके साथ वस्तुतः अस्पृश्यता जैसा व्यवहार मिलता था, भले ही इस्लाम में आधिकारिक तौर पर अस्पृश्यता का कोई concept नहीं है।
और यही सबसे बड़ा विरोधाभास है।
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व्यावहारिक वास्तविकता: सिद्धांत से परे
सवाल उठता है कि यह केवल सिद्धांत नहीं है। व्यावहारिक रूप से क्या होता है?
शादी: एक सैयद अपनी बेटी की शादी जुलाहा को नहीं देता, भले दोनों नमाज पढ़ते हों, भले दोनों लखनऊ में एक ही मोहल्ले में रहते हों। जाति सबसे पहले देखी जाती है।
पेशा: एक कसाई परिवार पीढ़ियों से कसाई का काम कर रही होगी और एक हज्जाम परिवार नाई का काम करती है। यानी पेशा वंशानुगत (Hereditary) है, बिल्कुल जाति की तरह।
बिरादरी/जात: उत्तर भारत और पाकिस्तान में ये समूह खुद को “जात” या “बिरादरी” कहते हैं। आपकी जाति, आपका खानदान, नाम अलग है – काम वही है।
ऐतिहासिक जड़ें: औपनिवेशिक बायस
जब अंग्रेज राज ने भारत को दस्तावेजीकरण करना शुरू किया, जनगणना-सर्वेक्षण किए, जनजाति और जाति खंड बनाए, तो उनकी मुस्लिम जाति की समझ एक बड़े पूर्वाग्रह से आकार ली गई थी।
1832 में दो महत्वपूर्ण पुस्तकें आईं:
- ज़फर शरीफ की “क़ानून-ए-इस्लाम” (हैदराबाद के एक कुलीन द्वारा ब्रिटिशों के लिए लिखी)
- मिसेज मीर हसन अली की पुस्तक (लखनवी शिया कुलीन की अंग्रेज पत्नी)
दोनों ने क्या वर्णन किया? अशरफ मुस्लिमों की दुनिया – सैयद, शेख, मुगल, पठान, उनके रीति-रिवाज, उनका खाना, उनकी पूजा। निचली जाति के मुस्लिमों का मुश्किल से उल्लेख किया। अरज़ल लगभग अदृश्य थे।
यह ऊंचे वर्ग के मुस्लिम समाज की नज़र थी जिसके जरिए ब्रिटिशों ने पूरे मुस्लिम समुदाय को समझा। जैसे आप किसी देश को सिर्फ उनके अमीर लोगों की नज़रों से समझने की कोशिश करें।
औपनिवेशिक विद्वानों ने एक बड़ा स्पष्टीकरण दिया: विजय और मिश्रण (Conquest and Miscegenation)। यह सब हुआ क्यों? क्योंकि मुगल और अफगान आए। उन्होंने स्थानीय हिंदू महिलाओं से शादी की। बच्चे हुए, ऊपर-नीचे की पदानुक्रम बन गई।
चिंता का विषय यह था कि अंग्रेजों के लिए पूरी कहानी थी: एक शुद्ध इस्लाम जो हिंदू प्रभाव से दूषित हो गया। यह एक सुविधाजनक कथा थी – सरल थी, लेकिन गलत थी।
अकादमिक बहस: 1960-1990
जब भारतीय समाजशास्त्र स्वतंत्रता के बाद विकसित हो रहा था (1960 से 1990 तक), एक बड़ा तर्क छिड़ गया। सवाल था: क्या मुसलमानों में जाति होती है?
गौस अंसारी (1960):
पहली गंभीर एकल-लेख “Muslim Caste in Uttar Pradesh” लिखी। उनका तर्क था कि मुस्लिमों में भी ठीक हिंदुओं की तरह एक पूरा जाति तंत्र है। उन्होंने अशरफों को ऐसे माना जैसे ब्राह्मण ऊपर होते हैं। मुगल और पठान नीचे जैसे क्षत्रिय। फिर आते हैं अजलाफ जैसे शिल्पकार जातियां। फिर आते हैं अरज़ल जैसे दलित।
लेकिन अंसारी की एक बड़ी सीमा थी – वे औपनिवेशिक स्रोतों पर बहुत अधिक निर्भर थे और विभाजन के बाद जो सामाजिक परिवर्तन हुए, उन्हें लगभग नजरअंदाज किया।
इम्तियाज अहमद (1970s):
चार खंड संपादित किए “Caste and Social Stratification among Muslims”। उनका मुद्दा था कि मुस्लिम और हिंदू एक ही समाज का हिस्सा हैं। और अगर हिंदू जाति व्यवस्था है तो मुस्लिम के अंदर भी वही structural features दिखेंगे।
इम्तियाज अहमद बहुत महत्वपूर्ण इसलिए भी थे क्योंकि उन्होंने हिंदू दक्षिणपंथ को भी चुनौती दी जो मुस्लिमों को विदेशी आक्रमणकारी कहते थे और धार्मिक विद्वानों को भी जो कहते थे कि इस्लाम में समानता है और जाति नहीं है।
लुई डुमॉ की काउंटर:
फ्रांसीसी मानवविज्ञानी लुई डुमॉ ने 1966 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Homo Hierarchicus” में तर्क दिया कि जाति का सार क्या है? कर्मकांडीय शुद्धता और प्रदूषण (Ritual Purity and Pollution) और ब्राह्मण की आकृति जो इस पदानुक्रम के शीर्ष पर है।
उनके हिसाब से जाति सिर्फ हिंदू धर्म में होती है। दूसरी जगह जो होता है वह “truncated caste” है। मुस्लिमों में ब्राह्मण नहीं है, कर्मकांडीय शुद्धता का वही concept नहीं है, तो वह ठीक से जाति नहीं है।
राहत की बात तो यह होनी चाहिए थी कि बहस सुलझ जाए, लेकिन हकीकत यह है कि यह बहस आज भी पूरी तरह से resolved नहीं है।
राजनीतिक आयाम: आरक्षण का सवाल
अब आते हैं सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दे पर। अगस्त 1950 में भारत में संविधान बन रहा था, आरक्षण की व्यवस्था बनी। एक राष्ट्रपति आदेश निकला जिसमें लिखा था:
“कोई भी व्यक्ति जो हिंदू धर्म के अलावा कोई और धर्म मानता है, वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।”
मतलब SC आरक्षण सिर्फ हिंदुओं के लिए। बाद में यह सिखों, बौद्धों के लिए विस्तारित हुआ। लेकिन मुस्लिम और ईसाई कभी नहीं included हुए।
वही सामाजिक कलंक। वही भेदभाव। वही गरीबी। लेकिन वह अनुसूचित जाति नहीं है क्योंकि वह मुस्लिम है। उसे आरक्षण नहीं मिलेगा। उसे कॉलेज में सीट नहीं मिलेगी। उसे सरकारी नौकरी में कोटा नहीं मिलेगा।
यह एक राज्य-प्रायोजित अदृश्यता (State-Sponsored Invisibility) थी पसमंदा मुस्लिमों की।
धीरे-धीरे बदलाव:
- 1980: मंडल आयोग ने माना कि जाति व्यवस्था हिंदू समाज के लिए विशिष्ट नहीं है, बल्कि गैर-हिंदू समुदायों में भी व्याप्त है। OBC आरक्षण की सिफारिश की जिसमें कुछ मुस्लिमों को भी शामिल किया।
- 1992: इंदिरा साहनी मामला – सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ वो मुस्लिम जातियां OBC सूची में आ सकती हैं जिनके समकक्ष हिंदू जातियां पहले से OBC में हैं।
- 2006: सच्चर समिति रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से पुष्टि हुई कि मुस्लिमों में वंश-आधारित पदानुक्रम, अंतर्विवाह, वंशानुगत पेशा – सभी चीजें मौजूद हैं।
- 2009: रंगनाथ मिश्रा आयोग ने मुस्लिम OBCs के लिए 10% कोटा और 1950 के राष्ट्रपति आदेश को हटाने की बात की। लेकिन यह सिफारिशें अभी भी पूरी नहीं हुई हैं।
धार्मिक औचित्य: Kafa/Kufu का सिद्धांत
दिलचस्प बात यह है कि Pasmanda बुद्धिजीवियों ने एक महत्वपूर्ण चीज उजागर की: इस्लाम में एक अवधारणा है Kafa या Kufu – विवाह में संगतता (Compatibility in Marriage)।
उलेमा (इस्लामी विद्वान) कहते थे कि शादी में Kafa देखना जरूरी है। यह Kafa व्यावहारिक रूप से क्या है? जाति, खानदान, वंश।
मतलब धर्म के अंदर ही अंतर्विवाह (Endogamy) के लिए एक धार्मिक औचित्य बन गई थी। और यह मध्यकालीन ग्रंथों में थी, औपनिवेशिक भारत से पहले ही।
मसूद आलम फलाही, जमात-ए-इस्लामी से जुड़े इस्लामी विद्वान हैं। उन्होंने यह सब खोजा। उन्होंने दिखाया कि मुस्लिम जाति की जड़ें इस्लाम के आंतरिक विमर्श में भी हैं। यह सिर्फ हिंदू contamination नहीं है।
पाकिस्तान में Biraadari व्यवस्था
पाकिस्तान में यह सब और अधिक वर्जित (Taboo) है। वहां कहना कि मुस्लिम समाज में जाति है, यह लगभग इस्लाम का अपमान माना जाता है।
लेकिन ground reality क्या है? पंजाब (पाकिस्तान का सबसे बड़ा शक्तिशाली राज्य) में:
- Biraadari networks चुनाव तय करते हैं
- शादी बिरादरी में होती है
- जमीन बिरादरी के जरिए मिलती है
- राजनीतिक वफादारी बिरादरी के साथ होती है
फ्रांसीसी मानवविज्ञानी Jacqueline Aglietta ने 1960s में एक पंजाबी गांव में रहकर यह सब observe किया। उन्होंने Seb system का वर्णन किया जहां जमींदार परिवार शिल्पकार परिवार को अनाज देती है और बदले में शिल्पकार परिवार उनके लिए काम करती है।
नाई शादी में रसोइया बनता है, matchmaker बनता है, circumcision करता है। यह बिल्कुल वैसा ही था जो हिंदू जजमानी व्यवस्था जैसा है। अलग नाम, लेकिन संरचना काफी समान।
दक्षिण भारत की चुनौती
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह जो Ashraf-Ajlaf-Arzal framework है, वह पूरे भारत में फिट नहीं होता।
तमिलनाडु में मुस्लिम विद्वानों ने कहा कि यह मॉडल हम पर फिट नहीं होता। तमिल मुस्लिम इस मॉडल में कहीं नहीं आते।
Frank Fanselow ने तर्क दिया कि तमिल मुस्लिम धर्मांतरितों ने जाति को सक्रिय रूप से de-invent कर दिया है। मालाबार तट (केरल) में, मालदीव में अलग पैटर्न हैं।
मतलब मुस्लिम जाति एक एकरूप (Monolithic) चीज नहीं है। क्षेत्र से क्षेत्र बदलती रहती है। उत्तर भारत का मॉडल पूरे भारत पर नहीं लगाया जा सकता।
जानें पूरा मामला
Pasmanda Movement का यह पूरा मामला केवल एक अकादमिक बहस का नहीं है। यह सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और समानता का मामला है।
जब तक दलित मुस्लिम को वही अधिकार नहीं मिलेंगे जो एक हिंदू दलित को मिलते हैं, तब तक यह बहस सिर्फ शैक्षणिक नहीं रहेगी। यह इंसाफ का सवाल है।
उम्मीद की किरण यह है कि Pasmanda Movement ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस में ला दिया है। लेकिन अभी लंबा रास्ता तय करना है।
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मुख्य बातें (Key Points)
- Pasmanda Movement (1998) ने मुस्लिम समाज में तीन-स्तरीय पदानुक्रम उजागर की: Ashraf (अभिजात), Ajlaf (पिछड़ा), Arzal (दलित-समकक्ष)।
- इस्लामिक समानता का नारा ऊंची जाति के प्रभुत्व को छुपाने का हथियार बन गया था, शादी, पेशा और सामाजिक प्रतिष्ठा में भेदभाव जारी है।
- 1950 का राष्ट्रपति आदेश मुस्लिमों को SC आरक्षण से बाहर करता है, सच्चर समिति (2006) ने जाति-आधारित भेदभाव की पुष्टि की।
- अकादमिक बहस जारी है कि क्या मुस्लिम जाति “असली” जाति है, लेकिन सामाजिक वास्तविकता स्पष्ट है – वंशानुगत पेशा, अंतर्विवाह और पदानुक्रम मौजूद है।













