HS Phoolka Joins BJP: 1984 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों की आवाज बनकर तीन दशकों से भी ज्यादा समय तक निशुल्क कानूनी लड़ाई लड़ने वाले सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता हरविंदर सिंह फूलका ने बुधवार को दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सदस्यता ग्रहण कर ली। 70 वर्षीय फूलका, जिन्हें 1984 दंगा पीड़ितों का “मसीहा” कहा जाता है, ने कहा कि वे पंजाब के लिए काम करने के उद्देश्य से राजनीति में लौट रहे हैं। उनका यह कदम 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले पंथिक राजनीति में बड़ी हलचल पैदा कर रहा है।
“BJP ने 40 साल से मेरा साथ दिया”: फूलका का बड़ा बयान
HS Phoolka Joins BJP की खबर आते ही पंजाब की राजनीति में भूचाल आ गया। भाजपा की सदस्यता लेने के बाद फूलका ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “मैं पिछले 40 सालों से 1984 दंगा पीड़ितों के लिए लड़ाई लड़ रहा हूं और बीजेपी ने तब से मेरा साथ दिया है। मैंने यह लड़ाई उनके साथ मिलकर लड़ी है।”
फूलका का यह बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि वे इससे पहले आम आदमी पार्टी (AAP) के टिकट पर विधायक रह चुके हैं और पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद भी संभाल चुके हैं। 2019 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से “संन्यास” ले लिया था और कहा था कि वे अब कोई चुनाव नहीं लड़ेंगे और किसी पार्टी में शामिल नहीं होंगे। लेकिन अब उनकी सक्रिय राजनीति में वापसी ने सबको चौंका दिया है।
बरनाला से दिल्ली तक: HS Phoolka का राजनीतिक सफर
पंजाब के बरनाला जिले के भदौड़ के मूल निवासी फूलका ने 2014 में राजनीति में कदम रखा था, जब उन्होंने उस समय नवगठित आम आदमी पार्टी (AAP) की सदस्यता ली थी। उसी साल उन्होंने लुधियाना से लोकसभा चुनाव लड़ा। हालांकि वे कांग्रेस के रवनीत सिंह बिट्टू (जो अब बीजेपी में हैं) से बेहद कम अंतर से हार गए, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र दाखा में उन्हें सबसे ज्यादा वोट मिले।
2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में AAP ने उन्हें दाखा से मैदान में उतारा। फूलका ने जीत हासिल की, जबकि पंजाब में कांग्रेस सत्ता में आई। AAP मुख्य विपक्षी पार्टी बनी और फूलका को पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) नियुक्त किया गया। यह उनके राजनीतिक करियर का शिखर था।
AAP से इस्तीफा: 1984 केस और बेअदबी मामलों पर टकराव
लेकिन 2018 में HS Phoolka ने पहले नेता प्रतिपक्ष के पद से और फिर दाखा विधायक पद से भी इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे की दो बड़ी वजहें थीं। पहली वजह यह थी कि कांग्रेस नेता सज्जन कुमार का 1984 दंगों से जुड़ा केस दिल्ली हाईकोर्ट में अंतिम सुनवाई के लिए आ रहा था और बार काउंसिल उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा होने की वजह से पेश नहीं होने दे रही थी।
फूलका ने बताया था कि AAP नेतृत्व ने उनसे पार्टी के हित में इस्तीफा न देने को कहा और पूछा कि क्या 1984 के केस ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। फूलका का जवाब था, “हां, ये ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि मैंने अपनी पूरी जिंदगी इनके लिए लड़ाई में लगा दी है। इसलिए मैंने कहा कि मैं राजनीति छोड़ दूंगा।”
दूसरी बड़ी वजह पंजाब में बेअदबी के मामलों में तत्कालीन कैप्टन अमरिंदर सिंह की कांग्रेस सरकार की निष्क्रियता थी। फूलका ने बताया था कि 28 अगस्त 2018 को कांग्रेस सरकार ने विधानसभा में जस्टिस (सेवानिवृत्त) रणजीत सिंह की बेअदबी मामलों की जांच रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई करने से इनकार कर दिया, तब उन्होंने इस अन्याय के विरोध में विधायक पद से इस्तीफे की घोषणा की।
“धोखेबाज” कहने वालों को फूलका का करारा जवाब
AAP के कई साथियों ने फूलका को बीच कार्यकाल में इस्तीफा देने के लिए “धोखेबाज” करार दिया था। लेकिन फूलका ने इसका मुंहतोड़ जवाब देते हुए कहा था, “मैंने दाखा के लोगों को धोखा नहीं दिया। बल्कि मैंने एक बड़े उद्देश्य के लिए अपने विधायक पद की बलि दी। मेरा इस्तीफा कांग्रेस सरकार की बेअदबी मामलों में निष्क्रियता के खिलाफ विरोध था।”
दिसंबर 2018 में जब सज्जन कुमार को एक ऐतिहासिक फैसले में दोषी ठहराया गया, तब फूलका ने AAP और राजनीति दोनों से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा था कि वे नहीं चाहते कि 1984 दंगा पीड़ितों की इस ऐतिहासिक जीत का इस्तेमाल किसी भी पार्टी, यहां तक कि AAP द्वारा भी राजनीतिक फायदे के लिए किया जाए।
अटल बिहारी वाजपेयी से गहरा जुड़ाव: फूलका ने बताई अनसुनी कहानी
HS Phoolka Joins BJP के पीछे एक बड़ी वजह भाजपा और खासकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से उनका पुराना जुड़ाव है। 2018 में जब फूलका अभी दाखा से विधायक थे, तब उन्होंने वाजपेयी की तारीफ करते हुए कहा था कि बीजेपी की अगुवाई वाली सरकारों ने “1984 पीड़ितों के लिए न्याय की उनकी लड़ाई का हमेशा साथ दिया।”
फूलका ने वाजपेयी के निधन के बाद बताया था कि नवंबर 1984 में कांग्रेस सरकार ने संसद में दावा किया था कि दिल्ली में दंगों में सिर्फ 600 सिख मारे गए। लेकिन तत्कालीन दिल्ली सांसद अटल बिहारी वाजपेयी ने दंगों में मारे गए सिखों की असली संख्या जारी की। कांग्रेस ने तब वाजपेयी को “देशद्रोही” कहा था, लेकिन उन्होंने जवाब दिया, “मुझे परवाह नहीं कि वे मुझे क्या कहते हैं।”
फूलका ने बताया कि दंगों में मारे गए 2,700 सिखों की वह सूची बीजेपी नेता मदन लाल खुराना ने राहत शिविरों और दंगा प्रभावित इलाकों में जाकर तैयार की थी और वाजपेयी ने 16 नवंबर 1984 को इसे जारी किया था। बाद में अहुजा समिति की रिपोर्ट में भी 2,700 सिखों के मारे जाने की पुष्टि हुई।
वाजपेयी सरकार ने बनवाया था नानावती आयोग
फूलका के मुताबिक जब 1999 में वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने फूलका से पूछा कि पीड़ितों और उनके परिवारों को न्याय दिलाने के लिए सबसे अच्छा क्या किया जा सकता है। तब तक कांग्रेस ने अपने उन नेताओं के खिलाफ ज्यादातर मामले दफन कर दिए थे जिन्होंने सिखों को मारने के लिए भीड़ का नेतृत्व किया था।
फूलका ने वाजपेयी से कहा कि दोबारा जांच के लिए एक आयोग नियुक्त करें और कार्रवाई करें। इसके बाद वाजपेयी ने 2000 में जस्टिस जी.टी. नानावती आयोग का गठन किया, जिसने सभी मामलों को गहन जांच के लिए दोबारा खोला। यह 1984 दंगा पीड़ितों के लिए न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित हुआ।
2019 में भी बीजेपी के समर्थन की बात कही थी फूलका ने
2019 में AAP छोड़ने के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में फूलका ने साफ कहा था कि बीजेपी ने “हमेशा 1984 पीड़ितों के लिए न्याय की लड़ाई में हमारा साथ दिया है।” उन्होंने बताया था, “मैं तत्कालीन कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद और गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मिला और उन्होंने मेरा पूरा समर्थन किया। वाजपेयी सरकार ने भी मेरी लड़ाई का साथ दिया था। बीजेपी से मेरी निकटता तब भी थी जब मैं AAP में था।”
अब जब HS Phoolka Joins BJP की खबर आई है, तो उनके इन पुराने बयानों का संदर्भ और भी स्पष्ट हो गया है। यह साफ है कि फूलका का बीजेपी से जुड़ाव कोई नया नहीं, बल्कि दशकों पुराना है।
SAD में जाने की इच्छा से BJP तक: कैसे बदली राह
दिलचस्प बात यह है कि दिसंबर 2024 में फूलका ने शिरोमणि अकाली दल (SAD) में शामिल होने की इच्छा जताई थी। उन्होंने कहा था कि वे “एक मजबूत क्षेत्रीय पार्टी को ताकत देने” के लिए SAD में एक “सेवादार” के रूप में शामिल होना चाहते हैं और किसी पद या चुनाव लड़ने की इच्छा नहीं है।
लेकिन अंततः उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का रास्ता चुना। 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले फूलका जैसे प्रमुख सिख चेहरे का बीजेपी में आना पंथिक राजनीति में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। इससे पंजाब में बीजेपी की स्थिति मजबूत होने की उम्मीद है।
1984 दंगों के सर्वाइवर: जब हिंदू मकान मालिक ने बचाई थी जान
HS Phoolka खुद 1984 के दंगों के सर्वाइवर हैं और उनकी व्यक्तिगत कहानी बेहद मार्मिक है। 2017 में उन्होंने बताया था कि “हिंदुओं ने सिखों को नहीं मारा, बल्कि 1984 का दंगा तत्कालीन सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी की अगुवाई में सिखों के खिलाफ एक सुनियोजित सामूहिक हत्याकांड था। इसीलिए यह दंगा एक नरसंहार था।”
फूलका ने बताया कि जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में दंगे भड़के, तब वे दक्षिण एक्सटेंशन इलाके में किराए पर रहते थे और उनकी पत्नी चार महीने की गर्भवती थीं। भीड़ ने उनके किराए के घर पर हमला किया, लेकिन उनके हिंदू मकान मालिक ने उन्हें अपने स्टोर रूम में छिपा लिया।
“भीड़ आई और उनके पूरे घर की तलाशी ली, लेकिन हमारे मकान मालिक ढाल बनकर खड़े रहे,” फूलका ने बताया। बाद में 5 नवंबर को एक दोस्त की मदद से उन्हें एयर इंडिया की फ्लाइट से सुरक्षित पंजाब भेज दिया गया। उनकी बेटी प्रभ सहाय फूलका का जन्म अप्रैल 1985 में हुआ।
फूलका ने स्पष्ट किया, “यह कैसे कहा जा सकता है कि वे दंगे हिंदू बनाम सिख थे? नहीं, वे नहीं थे। हिंदुओं ने कई सिख परिवारों को बचाया। यह कांग्रेस बनाम सिख था।”
2019 में मिला था पद्मश्री सम्मान
HS Phoolka को उनकी सामाजिक सेवा और 1984 दंगा पीड़ितों के लिए दशकों तक चली कानूनी लड़ाई के सम्मान में 2019 में भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान से नवाजा था। अब HS Phoolka Joins BJP के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि पंजाब की राजनीति में किस तरह के बदलाव आते हैं और 2027 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की रणनीति में फूलका क्या भूमिका निभाते हैं।
मुख्य बातें (Key Points)
- 1984 सिख दंगा पीड़ितों के “मसीहा” और पद्मश्री HS Phoolka ने 2027 पंजाब चुनावों से पहले BJP की सदस्यता ली।
- फूलका ने कहा कि BJP ने पिछले 40 साल से 1984 पीड़ितों के लिए उनकी लड़ाई का साथ दिया है।
- 2014 में AAP से शुरू हुआ राजनीतिक सफर, 2017 में दाखा से विधायक बने, 2018 में इस्तीफा दिया और 2019 में AAP छोड़ दी थी।
- फूलका खुद 1984 दंगों के सर्वाइवर हैं, उनके हिंदू मकान मालिक ने उनकी जान बचाई थी।













