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The News Air - Breaking News - India State Debt Crisis: 60 लाख करोड़ के कर्ज में डूबे राज्य, कहीं दिवालिया तो नहीं हो जाएंगे?

India State Debt Crisis: 60 लाख करोड़ के कर्ज में डूबे राज्य, कहीं दिवालिया तो नहीं हो जाएंगे?

नीति आयोग की Fiscal Health Index रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे, 18 राज्यों ने FRBM की सीमा तोड़ी, पंजाब और केरल सबसे निचले पायदान पर

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
रविवार, 15 मार्च 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, बिज़नेस
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India State Debt Crisis
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India State Debt Crisis ने देश की चमचमाती आर्थिक तस्वीर के पीछे छिपी एक भयावह सच्चाई को सामने ला दिया है। एक तरफ फिच रेटिंग्स ने वित्त वर्ष 2026 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान बढ़ाकर 7.5 प्रतिशत कर दिया है और भारत “सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था” का तमगा गर्व से पहने हुए है। लेकिन दूसरी तरफ नीति आयोग द्वारा जारी फिस्कल हेल्थ इंडेक्स की रिपोर्ट बताती है कि इसी सुनहरी इमारत के भीतर के स्तंभ यानी राज्य सरकारें भयंकर दरारें दिखा रहे हैं। मार्च 2024 तक भारत के राज्यों का कुल कर्ज 60 लाख 68 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है, जो GDP के 23 प्रतिशत के बराबर है। 18 राज्यों ने FRBM अधिनियम की 3 प्रतिशत राजकोषीय घाटे की सीमा को तोड़ दिया है।

सुनहरी इमारत, खोखली नींव: आंकड़े बता रहे हैं पूरी कहानी

India State Debt Crisis की गंभीरता समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि राज्य सरकारों की वित्तीय सेहत इतनी अहम क्यों है। देश में जितना भी सार्वजनिक खर्च होता है, उसका करीब दो-तिहाई हिस्सा राज्य सरकारें ही खर्च करती हैं। स्कूल, अस्पताल, सड़कें, बिजली, सब कुछ राज्य सरकारों के कंधों पर है।

अगर यही राज्य सरकारें आर्थिक रूप से बीमार हो जाएं तो सीधा असर आम आदमी की जिंदगी पर पड़ता है। भारत जैसे देश में जहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा सरकारी योजनाओं पर निर्भर है, वहां राज्यों की वित्तीय सेहत का बिगड़ना किसी बड़ी आपदा से कम नहीं है।

नीति आयोग की रिपोर्ट: पांच पैमानों पर कसे गए राज्य

नीति आयोग ने यह फिस्कल हेल्थ इंडेक्स 2023-24 के आंकड़ों के आधार पर तैयार किया है। इसमें राज्यों को पांच प्रमुख मानकों पर आंका गया है।

पहला मानक है खर्च की गुणवत्ता (Quality of Expenditure): राज्य विकास पर कितना खर्च कर रहा है, कितने पूंजीगत व्यय कर रहा है और कितनी संपत्तियां बना रहा है। दूसरा मानक है राजस्व जुटाने की क्षमता (Revenue Mobilization): राज्य अपने संसाधनों से कितना पैसा कमा पा रहा है। तीसरा है राजकोषीय विवेक (Fiscal Prudence): सकल राजकोषीय घाटा राज्य सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) के कितने प्रतिशत है और राजस्व घाटा कितना है। चौथा है ऋण सूचकांक (Debt Index): ब्याज भुगतान और राजस्व प्राप्तियों का अनुपात कैसा है। और पांचवां है ऋण स्थिरता (Debt Sustainability): राज्य की विकास दर और ब्याज भुगतान की दर के बीच का अंतर क्या है।

ओडिशा नंबर वन, पंजाब-केरल सबसे पीछे

India State Debt Crisis की इस रिपोर्ट में राज्यों को दो श्रेणियों में बांटा गया है: 18 प्रमुख राज्य और 10 पूर्वोत्तर व हिमालयी राज्य। प्रमुख राज्यों को फिर चार उपश्रेणियों में विभाजित किया गया: अचीवर्स, फ्रंट रनर्स, परफॉर्मर्स और एस्पिरेशनल।

18 प्रमुख राज्यों में ओडिशा ने पहला स्थान हासिल किया है। उसके बाद गोवा और झारखंड का नंबर आता है। वहीं सबसे निचले पायदान पर “एस्पिरेशनल” श्रेणी में पंजाब और केरल जैसे राज्य हैं, जिनकी वित्तीय सेहत सबसे ज्यादा चिंताजनक है।

पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों में अरुणाचल प्रदेश नंबर एक पर है, जबकि नागालैंड, हिमाचल प्रदेश और मणिपुर सबसे नीचे हैं।

ओडिशा ने कैसे मारी बाजी: एक सफलता की कहानी

ओडिशा की सफलता के पीछे कई ठोस कारण हैं। सबसे पहले उसने अपने कर्ज और GSDP के अनुपात को 2019-20 से लेकर 2023-24 तक काफी कम किया है। उसने राजकोषीय घाटे के स्तर को भी घटाया है, जो राजकोषीय विवेक का सबूत है।

राजस्व जुटाने के मामले में ओडिशा को खनन रॉयल्टी से बड़ा फायदा मिला है। राज्य में जितने भी खनन अभियान चल रहे हैं, उनसे मिलने वाली रॉयल्टी की बदौलत राज्य का अपना कर हिस्सा उसकी कुल आय के 60 प्रतिशत से ज्यादा है। इसका मतलब है कि ओडिशा केंद्र सरकार पर कम निर्भर है और खुद का पैसा खुद कमा रहा है।

सबसे अहम बात यह है कि ओडिशा सिर्फ पुराने बिल चुकाने में पैसा नहीं खर्च कर रहा, बल्कि बड़े पैमाने पर पूंजीगत व्यय भी कर रहा है। यानी सड़कें, पुल, अस्पताल, स्कूल जैसी संपत्तियां बन रही हैं जो भविष्य में आय का जरिया बनेंगी।

पंजाब का हाल: 90 प्रतिशत सब्सिडी का बोझ सिर्फ बिजली पर

India State Debt Crisis में सबसे चिंताजनक तस्वीर पंजाब की है। पंजाब के कर्ज का स्तर लगातार बढ़ रहा है और उसके प्रतिबद्ध खर्च यानी वेतन, पेंशन और सब्सिडी का बोझ उसके कुल खर्च में लगातार बढ़ता जा रहा है।

सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि पंजाब सरकार जो भी सब्सिडी देती है, उसका 90 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ बिजली सब्सिडी में चला जाता है। इसका सीधा मतलब है कि पंजाब सरकार जो भी पैसा खर्च कर रही है, उससे कोई भविष्य की संपत्ति नहीं बन रही। न कोई कारखाना लग रहा है, न कोई बुनियादी ढांचा बन रहा है। सारा पैसा बस पुरानी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में खप रहा है।

केरल भी उसी राह पर: ब्याज और पेंशन खा रहे हैं खजाना

केरल की स्थिति भी पंजाब जैसी ही है। पुरानी उधारियों पर ब्याज का बोझ बेहद भारी है। वेतन और पेंशन की प्रतिबद्धताएं खजाने का बड़ा हिस्सा निगल रही हैं। और सबसे बड़ी समस्या यह है कि केरल में इतने उद्योग-धंधे हैं ही नहीं जिनसे राज्य खुद का राजस्व बड़ी मात्रा में जुटा सके।

जब राज्य खुद पैसा नहीं कमा पाता तो उसे केंद्र सरकार पर निर्भर रहना पड़ता है। और जब केंद्र से मिलने वाला पैसा भी पुराने कर्ज चुकाने और वेतन-पेंशन देने में खर्च हो जाता है, तो विकास के लिए कुछ बचता ही नहीं। यह एक दुष्चक्र है जिसमें केरल फंसता जा रहा है।

हिमाचल प्रदेश: कर्मचारियों की तनख्वाह देने में भी मशक्कत

हिमाचल प्रदेश की हालत और भी बुरी है। प्रतिबद्ध खर्चों का बोझ इतना बढ़ चुका है कि कई बार राज्य सरकार के कर्मचारियों की तनख्वाह देने के लिए भी इंतजार करना पड़ रहा है। पुरानी पेंशन योजना (OPS) को फिर से लागू करने के बाद से यह बोझ और बढ़ गया है।

केंद्र और राज्य में अलग-अलग पार्टियों की सरकार होने की वजह से फंड जारी करने को लेकर भी तनातनी चलती रहती है। लेकिन असली समस्या यह है कि राज्य के पास अपनी आर्थिक नीतियां विकसित करने और खुद से राजस्व जुटाने की क्षमता बेहद सीमित है।

पांच बड़ी दरारें जो राज्यों को दिवालिया बना सकती हैं

India State Debt Crisis की जड़ में पांच बड़ी संरचनात्मक समस्याएं हैं जिन पर तुरंत काम करने की जरूरत है।

पहली दरार है प्रतिबद्ध खर्चों का बढ़ता बोझ। कई राज्यों में वेतन, पेंशन और सब्सिडी पर इतना पैसा खर्च हो रहा है कि विकास कार्यों के लिए कुछ बचता ही नहीं। पुरानी पेंशन योजना को फिर से लागू करने ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।

दूसरी दरार है FRBM की सीमा का लगातार उल्लंघन। 18 राज्य राजकोषीय घाटे की 3 प्रतिशत की सीमा को लगातार तोड़ रहे हैं, जो राजकोषीय अनुशासनहीनता का सबूत है।

तीसरी दरार है मुफ्तखोरी की राजनीति। हर चुनाव से पहले नई-नई मुफ्त योजनाओं की घोषणा कर दी जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस “फ्रीबी कल्चर” की कड़ी आलोचना की है। हाल ही में तमिलनाडु के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की और बिहार में भी चुनाव से पहले मुफ्त योजनाओं की बाढ़ देखी गई। आर्थिक सर्वेक्षण ने भी कहा है कि फ्रीबी कल्चर को छोड़कर शर्तों के साथ नकद हस्तांतरण (Conditional Cash Transfers) की ओर बढ़ना चाहिए, जैसा ब्राजील ने अपने यहां किया है।

चौथी दरार है राजस्व स्वायत्तता का सिकुड़ना। जीएसटी लागू होने के बाद अप्रत्यक्ष कर संग्रह की शक्तियां और ज्यादा केंद्र सरकार के पास चली गई हैं। राज्यों की केंद्रीय हस्तांतरण पर निर्भरता 2000 के दौर के 20-24 प्रतिशत से बढ़कर अब 23-30 प्रतिशत तक पहुंच गई है। राज्यों का अपना गैर-कर राजस्व लगातार घट रहा है।

पांचवीं दरार है केंद्र से मिलने वाले 50 साल के ब्याज मुक्त ऋणों का सही इस्तेमाल न होना। कई राज्य इन ऋणों को पूंजीगत व्यय में नहीं लगा रहे, जिसकी वजह से पूंजीगत संपत्तियों का निर्माण नहीं हो पा रहा।

अचीवर और एस्पिरेशनल राज्यों में क्या फर्क है

इस रिपोर्ट में अचीवर और एस्पिरेशनल राज्यों के बीच का अंतर बेहद साफ है। अगर कोई राज्य अपने कुल राजस्व का 60 प्रतिशत खुद कमा रहा है तो वह अचीवर है। अगर केंद्र पर भारी निर्भरता है तो एस्पिरेशनल श्रेणी में आएगा।

पूंजीगत व्यय अगर GSDP का 4 से 5 प्रतिशत है तो अच्छी बात है, लेकिन अगर न्यूनतम है तो इसका मतलब है कि सारा पैसा सिर्फ पुरानी प्रतिबद्धताओं में खप रहा है। राजकोषीय घाटा 3 प्रतिशत से कम है तो स्वस्थ स्थिति है, अगर सीमा तोड़ रहे हैं तो खतरे की घंटी है। ब्याज भुगतान अगर राजस्व का 15 से 20 प्रतिशत खा रहा है तो यह गंभीर चिंता का विषय है।

दो अलग-अलग रैंकिंग क्यों बनाई गई

नीति आयोग ने 18 प्रमुख राज्यों और 10 पूर्वोत्तर व हिमालयी राज्यों की अलग-अलग रैंकिंग इसलिए बनाई क्योंकि दोनों की परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं। पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों में विकास पर खर्च स्वाभाविक रूप से ज्यादा होता है क्योंकि वहां बुनियादी ढांचा खड़ा करना ही बड़ी चुनौती है। इन राज्यों का अपना राजस्व जुटाना भी मुश्किल है, इसलिए वे केंद्रीय अनुदान पर भारी निर्भर हैं। दोनों श्रेणियों को एक ही रैंकिंग में रखना अन्यायपूर्ण होता।

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पांच सूत्री जीवनरक्षक योजना: राज्यों को क्या करना होगा

India State Debt Crisis से बाहर निकलने के लिए राज्यों को एक पांच सूत्री रणनीति अपनानी होगी। सबसे पहले अपने राजस्व स्रोतों को मजबूत करना होगा। बिक्री कर, भूमि राजस्व और स्टांप शुल्क जैसे अपने कर स्रोतों में वृद्धि करनी होगी।

दूसरा, प्रतिबद्ध खर्चों पर नियंत्रण करना होगा। वेतन, पेंशन और सब्सिडी के बोझ को तर्कसंगत बनाना होगा। तीसरा, मुफ्त योजनाओं को तर्कसंगत बनाना होगा। जो लोग भुगतान करने में सक्षम हैं उन्हें मुफ्त सुविधाएं देने का कोई तुक नहीं है।

चौथा, उधार का “सुनहरा नियम” अपनाना होगा: कर्ज लेना है तो नई संपत्ति बनाने के लिए लेना है, पुराने बिल चुकाने के लिए नहीं। यह नियम घरों पर भी लागू होता है और सरकारों पर भी। पांचवां, मध्यम अवधि की योजना बनानी होगी। चुनावी फायदे की शॉर्ट टर्म सोच को छोड़कर 5-10 साल की राजकोषीय योजना पर काम करना होगा।

साथ ही स्वतंत्र राजकोषीय परिषदों (Independent Fiscal Councils) का गठन भी जरूरी है, जिसकी सिफारिश एन.के. सिंह समिति सहित कई विशेषज्ञ समितियां पहले भी कर चुकी हैं, लेकिन यह सिफारिश अभी तक कागजों पर ही तैर रही है।

विकसित भारत का सपना तभी पूरा होगा जब हर राज्य स्वस्थ होगा

यह रिपोर्ट राज्य सरकारों के लिए एक बड़ा वेक-अप कॉल है। अगर अभी इन समस्याओं पर काम नहीं किया गया तो लंबी अवधि में चिंताएं और बढ़ती जाएंगी। विकसित भारत का लक्ष्य सिर्फ कुछ राज्यों के दम पर पूरा नहीं हो सकता। पूर्ण विकास हर राज्य से आना चाहिए और वो तभी संभव है जब हर राज्य की अपनी वित्तीय सेहत दुरुस्त हो। आम नागरिकों को भी जागरूक होना होगा और अपनी राज्य सरकारों से जवाबदेही मांगनी होगी कि आखिर उनके राज्य की वित्तीय सेहत क्यों नहीं सुधर रही।


मुख्य बातें (Key Points)
  • मार्च 2024 तक भारत के राज्यों का कुल कर्ज 60 लाख 68 हजार करोड़ रुपये पहुंच गया है जो GDP का 23% है, और 18 राज्यों ने FRBM की 3% राजकोषीय घाटे की सीमा तोड़ दी है।
  • नीति आयोग की फिस्कल हेल्थ इंडेक्स में ओडिशा पहले स्थान पर है, जबकि पंजाब और केरल सबसे निचले “एस्पिरेशनल” श्रेणी में हैं, पंजाब की 90% सब्सिडी का बोझ सिर्फ बिजली सब्सिडी से है।
  • मुफ्तखोरी की राजनीति (Freebie Culture) सबसे बड़ा खतरा है, सुप्रीम कोर्ट और आर्थिक सर्वेक्षण दोनों ने इसकी कड़ी आलोचना की है, शर्तों वाले नकद हस्तांतरण (ब्राजील मॉडल) की सिफारिश की गई है।
  • राज्यों की केंद्रीय हस्तांतरण पर निर्भरता 20-24% से बढ़कर 23-30% हो गई है, जीएसटी के बाद राज्यों की राजस्व स्वायत्तता और सिकुड़ गई है।

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सवाल 1: नीति आयोग की फिस्कल हेल्थ इंडेक्स में कौन सा राज्य पहले नंबर पर है और क्यों?

ओडिशा पहले नंबर पर है। इसकी मुख्य वजहें हैं: कर्ज-GSDP अनुपात में कमी, खनन रॉयल्टी से मजबूत अपना राजस्व (60% से ज्यादा), राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण और पूंजीगत व्यय यानी बुनियादी ढांचे पर अच्छा खर्च। ओडिशा सिर्फ पुराने बिल चुकाने में नहीं बल्कि भविष्य की संपत्तियां बनाने में भी पैसा लगा रहा है।

सवाल 2: भारत के राज्यों पर कुल कितना कर्ज है और यह कितना खतरनाक है?

मार्च 2024 तक भारत के राज्यों का कुल कर्ज 60 लाख 68 हजार करोड़ रुपये है, जो GDP का 23% है। 18 राज्य FRBM की 3% राजकोषीय घाटे की सीमा तोड़ चुके हैं। कई राज्यों में ब्याज भुगतान ही राजस्व का 15-20% खा रहा है, जिससे विकास कार्यों के लिए पैसा नहीं बचता।

सवाल 3: फ्रीबी कल्चर (मुफ्तखोरी की राजनीति) राज्यों की आर्थिक सेहत को कैसे बिगाड़ रही है?

चुनाव से पहले मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, बिना शर्त नकद वितरण जैसी योजनाएं राज्यों के खजाने पर भारी बोझ डाल रही हैं। इन पर खर्च किया गया पैसा कोई संपत्ति या रोजगार पैदा नहीं करता। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसकी आलोचना की है और आर्थिक सर्वेक्षण ने ब्राजील जैसे “शर्तों वाले नकद हस्तांतरण” मॉडल अपनाने की सलाह दी है।

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अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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