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The News Air - Breaking News - Chhatrapati Shivaji Maharaj: मुगलों को थर्रा देने वाले मराठा शेर की अनसुनी दास्तान

Chhatrapati Shivaji Maharaj: मुगलों को थर्रा देने वाले मराठा शेर की अनसुनी दास्तान

औरंगजेब के दरबार में अपमान सहने से इनकार, अफजल खान का वध, शाइस्ता खान को करारा जवाब और भारत की पहली नौसेना खड़ी करने वाले छत्रपति की पूरी कहानी

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
रविवार, 15 मार्च 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, स्पेशल स्टोरी
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Chhatrapati Shivaji Maharaj
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Chhatrapati Shivaji Maharaj का नाम भारतीय इतिहास में उस चिंगारी की तरह है जिसने 17वीं सदी के सबसे शक्तिशाली मुगल साम्राज्य की नींव हिला दी। तारीख थी 12 मई 1666, जगह थी आगरा का मुगल दरबार। औरंगजेब अपनी पूरी शानो-शौकत के साथ सिंहासन पर बैठा था और दक्कन से आए इस मराठा प्रमुख को तीसरे दर्जे के मनसबदारों के बीच खड़ा कर दिया गया। शिवाजी का खून खौल उठा। उन्होंने गरजकर कहा: “मेरा 7 साल का बेटा और मेरा नौकर तक 5000 का मनसबदार है। बादशाह की इतनी सेवा करने के बावजूद मुझे इस लायक समझा गया?” और जब राम सिंह ने चेतावनी दी कि बादशाह सिर कलम करने का आदेश दे सकते हैं, तो शिवाजी ने जवाब दिया: “सिर कटवाना मंजूर है, लेकिन अपमान सहना मंजूर नहीं।”

पश्चिमी घाट की पहाड़ियों में गूंजी पहली किलकारी

Chhatrapati Shivaji Maharaj की कहानी शुरू होती है 1630 के आसपास पश्चिमी घाट की पहाड़ियों में बसे शिवनेरी किले से, जहां एक बच्चे की किलकारी गूंजी। नाम रखा गया शिवाजी राजे। विद्वान उनकी जन्मतिथि को लेकर एकमत नहीं हैं, हालांकि महाराष्ट्र सरकार 19 फरवरी को शिवाजी राजे जयंती के रूप में मनाती है।

उनके पिता शाहजी भोसले दक्कन की राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी थे, कभी निजामशाही के लिए तो कभी आदिलशाही के लिए लड़ते हुए। लेकिन शिवाजी की असली नींव रखी उनकी मां जीजाबाई ने। जीजाबाई ने सिर्फ कहानियां नहीं सुनाईं, उन्होंने रामायण, महाभारत और लोक कथाओं के जरिए न्याय, धर्म और आत्मसम्मान का असली मतलब समझाया।

तीन इस्लामी सल्तनतों के बीच पला एक विद्रोही बालक

जब शिवाजी राजे का जन्म हुआ तब भारत के पश्चिमी भाग में तीन-तीन इस्लामी सल्तनतें थीं: अहमदनगर की निजामशाही, बीजापुर की आदिलशाही और गोलकुंडा की कुतुबशाही। ये तीनों आपस में लड़ती रहती थीं और ऊपर से मुगल इन सबको निगलने की फिराक में थे।

शिवाजी ने बचपन से ही देखा कि कैसे आदिलशाही के अफसर आकर टैक्स वसूलते हैं, कैसे किसी स्थानीय प्रमुख को हटाकर नया आदमी बैठा दिया जाता है। यही अनुभव उनके दिमाग में गहरे पैठ गया: अगर सत्ता स्थानीय नहीं होगी, तो न्याय भी कभी स्थानीय नहीं हो सकता।

15-16 साल की उम्र में शुरू किया ‘साइलेंट एक्सपेंशन’

करीब 1645 के आसपास जब Chhatrapati Shivaji Maharaj मुश्किल से 15-16 साल के थे, उनके इरादों ने जमीनी शक्ल लेनी शुरू कर दी। उन्होंने आसपास के छोटे किलों जैसे तोरणा और कोंडाना पर नियंत्रण स्थापित करना शुरू किया। यह कोई खुली बगावत नहीं थी, बल्कि एक “साइलेंट एक्सपेंशन” था।

शिवाजी ने सीधे किसी साम्राज्य को चुनौती नहीं दी। उन्होंने पहले संसाधन जुटाए, स्थानीय मराठा सरदारों, किसानों और सैनिकों के साथ भागीदारी का रिश्ता बनाया। उनके लिए लोग सिर्फ सेना नहीं थे, बल्कि राज्य की बुनियाद थे। यही बात उन्हें बाकी सत्ता लोलुपों से अलग खड़ा करती थी।

अफजल खान का अंत: प्रतापगढ़ की वो खूनी भेंट

शिवाजी की बढ़ती ताकत ने बीजापुर के आदिल शाह की नींद उड़ा दी। उसने अपने सबसे भरोसेमंद सेनापति अफजल खान को भेजा। इतिहासकार यदुनाथ सरकार अपनी किताब “शिवाजी एंड हिज टाइम्स” में लिखते हैं कि अफजल खान ने बीजापुर दरबार में दावा किया था: “शिवाजी को जंजीर में बांधकर लाऊंगा, घोड़े से उतरने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी।”

अफजल खान ने रास्ते में जानबूझकर तुलजा भवानी मंदिर और पंढरपुर के विठोबा मंदिर को अपवित्र कर दिया ताकि शिवाजी पर मानसिक दबाव बने। करीब दो महीने का गतिरोध चला। आखिरकार 10 नवंबर 1659 को प्रतापगढ़ किले के बाहर दोनों की निजी भेंट तय हुई।

शिवाजी पूरी तैयारी के साथ पहुंचे। दाहिनी आस्तीन में कटार बिछुआ, बाएं हाथ में बाघनख और कपड़ों के नीचे कवच। जैसे ही अफजल खान ने गले लगाने के बहाने शिवाजी की गर्दन पकड़ी और कटार से पीठ पर वार करने की कोशिश की, शिवाजी ने बिजली की तेजी से बाघनख उसके पेट में घोंप दिया। अफजल खान कटे पेड़ की तरह गिरा और मराठा सेना ने बीजापुरी फौज को प्रतापगढ़ के युद्ध में करारी हार दी। यह वो पल था जब शिवाजी एक स्थानीय विद्रोही से बदलकर एक गंभीर राजनीतिक शक्ति बन गए।

शाइस्ता खान की शर्मनाक हार: लाल महल का रात्रि हमला

अफजल खान की मौत की गूंज सीधी दिल्ली तक पहुंची। औरंगजेब ने अपने मामा शाइस्ता खान को डेढ़ लाख सैनिकों और भारी तोपखाने के साथ दक्कन भेजा। शाइस्ता खान ने पुणे पर कब्जा कर लिया और शिवाजी के बचपन के निवास लाल महल में अपना ठिकाना बनाया। उसे पूरा भरोसा था कि शिवाजी का अध्याय अब बंद होने वाला है।

लेकिन 5 अप्रैल 1663 की आधी रात को जो हुआ, वो मुगल इतिहास के सबसे अपमानजनक क्षणों में गिना जाता है। शिवाजी के सैनिक चुपके से लाल महल में घुसे और सीधे शाइस्ता खान के कमरे तक पहुंच गए। शिवाजी ने तलवार से वार किया, शाइस्ता खान किसी तरह बचा लेकिन उसकी उंगलियां कट गईं और उसका बेटा मारा गया। शिवाजी बिना किसी नुकसान के निकल गए जैसे वहां आए ही न हों।

औरंगजेब के लिए यह सिर्फ हार नहीं, निजी अपमान था। शाइस्ता खान को दक्कन से हटाकर बंगाल भेज दिया गया।

सूरत की लूट: मुगलों की आर्थिक नस पर सीधा वार

1664 में Chhatrapati Shivaji Maharaj ने एक और मास्टरस्ट्रोक खेला। उन्होंने मुगल साम्राज्य की आर्थिक नस सूरत पर हमला किया। सूरत सिर्फ एक शहर नहीं, मुगल खजाने का प्रमुख स्रोत और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का केंद्र थी। शिवाजी ने शहर को लूटा, लेकिन उनकी नीति बिल्कुल साफ थी: कोई अंधाधुंध विनाश नहीं हुआ। चर्च, विदेशी व्यापारी और आम जनता को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया। यह हमला संपत्ति के लिए था, आतंक के लिए नहीं।

पुरंदर की संधि: एक मजबूरी जो रणनीति बन गई

शाइस्ता खान की शर्मनाक हार और सूरत की लूट ने औरंगजेब को भीतर तक हिला दिया। उसने राजपूत सेनापति जय सिंह प्रथम को 15000 सैनिकों के साथ भेजा। जय सिंह ने लगातार दबाव बनाए रखा, ग्रामीण इलाकों को तबाह किया और एक-एक करके मराठा किलों पर कब्जा कर लिया। 1665 तक हालात शिवाजी के लिए बेहद कठिन हो गए।

11 जून 1665 को पुरंदर की संधि पर हस्ताक्षर हुए। शिवाजी को 23 किले मुगलों को सौंपने पड़े और सिर्फ 12 किले अपने पास रखने की अनुमति मिली। 4 लाख सोने के सिक्के भी देने पड़े। बाहर से यह हार जैसी लगती थी, लेकिन भीतर ही भीतर यह एक अस्थायी समझौता था। जय सिंह ने शिवाजी को उम्मीद दिलाई थी कि आगरा में औरंगजेब से मुलाकात के बाद उन्हें दक्कन का वायसराय बनाया जा सकता है।

आगरा से महान पलायन: मिठाइयों की टोकरी में छिपकर निकले

आगरा के दरबार में अपमान के बाद शिवाजी और उनके पुत्र संभाजी को नजरबंद कर दिया गया। मुगल दरबार मान रहा था कि शिवाजी अब पूरी तरह कब्जे में हैं। लेकिन एक शानदार योजना के तहत शिवाजी और संभाजी मिठाइयों की टोकरियों में छिपकर आगरा से बाहर निकल गए।

और यहां शिवाजी की रणनीतिक बुद्धि का सबसे बड़ा सबूत मिलता है। उन्होंने सीधा या आसान रास्ता नहीं चुना। दक्षिण-पश्चिम की बजाय बिल्कुल उल्टा रूट लिया: मथुरा, इलाहाबाद, बनारस, पुरी होते हुए गोंडवाना और गोलकुंडा पार करके रायगढ़ पहुंचे। यह सिर्फ पलायन नहीं, एक सोची-समझी गुमनामी थी।

तूफान से पहले की शांति: और फिर किलों की वापसी

1667 से 1670 के बीच शिवाजी पहले से कहीं ज्यादा परिपक्व और केंद्रित होकर लौटे। गोरिल्ला युद्ध कला को उन्होंने एक नए स्तर तक पहुंचा दिया। अचानक किलों पर हमले, मुगल आपूर्ति लाइनों को काटना, सेनापतियों को भ्रमित करना, सब कुछ सर्जिकल सटीकता से होने लगा। सिंहगढ़, पुरंदर, लोहगढ़ और रोहिड़ा जैसे किले एक-एक करके फिर से मराठा नियंत्रण में वापस आ गए। मुगल सेनापति समझ ही नहीं पा रहे थे कि शिवाजी कब, कहां और कैसे हमला करेंगे।

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6 जून 1674: रायगढ़ में गूंजा ‘छत्रपति’ का उद्घोष

जैसे-जैसे मराठा शक्ति बढ़ी, वैधता का सवाल खड़ा हुआ। शिवाजी के पास जमीन थी, सेना थी, जनता का भरोसा था, लेकिन आधिकारिक मान्यता नहीं थी। दरबारी ब्राह्मणों के एक वर्ग ने यह कहकर ताज पहनाने से इनकार कर दिया कि राजा बनने का अधिकार सिर्फ क्षत्रियों को है।

शिवाजी ने टकराव की बजाय समाधान का रास्ता चुना। वाराणसी से विद्वान गागाभट्ट को बुलाया गया जिन्होंने शास्त्रों के आधार पर घोषित किया कि शिवाजी सिसोदिया वंश से जुड़े हैं और वैध क्षत्रिय हैं। 6 जून 1674 को रायगढ़ किले में भव्य समारोह के साथ Chhatrapati Shivaji Maharaj का राज्याभिषेक हुआ। उन्हें “छत्रपति”, “शककर्ता”, “हिंदवी धर्मोद्धारक” और “क्षत्रिय कुलवंत” जैसी उपाधियां दी गईं।

जवाहरलाल नेहरू ने “डिस्कवरी ऑफ इंडिया” में लिखा: “शिवाजी राजे हिंदू राष्ट्र के पुनरुत्थान के प्रतीक थे।”

मुसलमानों के विरोधी नहीं थे शिवाजी: इतिहास का सच

यहां एक सवाल अपने आप खड़ा होता है: क्या शिवाजी मुसलमानों के विरोधी थे? इतिहास को बिना भावनाओं के देखें तो इसका साफ जवाब है: नहीं। शिवाजी का हिंदवी स्वराज किसी एक धर्म के लिए नहीं था। उनके लिए वफादारी और योग्यता मजहब से कहीं ज्यादा अहम थी।

उनकी सेना में बड़ी संख्या में मुसलमान सैनिक थे। मराठा नौसेना के दो बड़े अधिकारी दरिया सारंग और दौलत खान मुसलमान थे। सीनियर मिलिट्री ऑफिसर नूर बेग भी मुसलमान थे। इतिहासकार सुरेंद्रनाथ सेन लिखते हैं कि शिवाजी ने कई सलाहकारों के विरोध के बावजूद 700 पठानों को अपनी सेना में शामिल किया।

सबसे ध्यान देने वाली बात यह है कि शिवाजी के आलोचक रहे मुगल इतिहासकार खफी खान ने भी स्वीकार किया कि शिवाजी ने सैनिकों को साफ आदेश दिए थे कि “जहां भी कुरान मिले, उसका पूरा सम्मान किया जाना चाहिए।” दुश्मन पक्ष के इतिहासकार की यह बात अपने आप में बहुत कुछ कह जाती है।

भारतीय नौसेना के जनक: शिवाजी की सबसे बड़ी दूरदर्शिता

Chhatrapati Shivaji Maharaj की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद वो है जिसके बारे में सबसे कम बात होती है: भारत की पहली संगठित नौसेना का निर्माण। 17वीं सदी के भारत में जब मुगल साम्राज्य जैसी विशाल ताकत भी अपनी नौसेना को नजरअंदाज किए हुए थी, एक पहाड़ी साम्राज्य के शासक ने समुद्र की रणनीतिक अहमियत को समझ लिया।

यदुनाथ सरकार ने खुद कहा: “अगर शिवाजी की लीडरशिप क्वालिटी को समझना हो तो उनकी नौसेना नीति को देखना होगा।”

उस समय पश्चिमी भारत का तटीय क्षेत्र पुर्तगालियों के नियंत्रण में था। जंजीरा के सिद्दी अफ्रीकी मूल के शक्तिशाली समुद्री योद्धा थे। शिवाजी ने 1654 में कल्याण के पास पहले मराठा नौसैनिक पोत का निर्माण शुरू किया।

उन्होंने कोंकण तट पर विजयदुर्ग, सिंधुदुर्ग और कुलाबा जैसे नौसैनिक अड्डे विकसित किए। दो अलग-अलग बेड़े बनवाए: एक मैनक भंडारी के नेतृत्व में और दूसरा दौलत खान के अधीन। स्थानीय कोंकणी समुद्री समुदाय पर भरोसा किया, साथ ही पुर्तगाली नौसैनिक अधिकारी रुई लेटाओ विएगास को बेड़ा कमांडर बनाया। उनकी सोच साफ थी: दुश्मन से सीखना कमजोरी नहीं, ताकत है।

1679 में खंडेरी द्वीप पर कब्जा उनकी नौसेना की ताकत का सबसे बड़ा सबूत था। यह द्वीप मुंबई के प्रवेश द्वार से महज 11 मील दूर था। अंग्रेजों और सिद्दियों ने मिलकर कई बार इसे वापस लेने की कोशिश की लेकिन मराठों को वहां से हटा नहीं पाए। राज्याभिषेक के समय तक मराठा नौसेना के पास 500 नौसैनिक और 57 युद्धपोत थे, और गोवा के पुर्तगालियों ने इसे औपचारिक रूप से मान्यता देकर मैत्री संधि भी की।

औरंगजेब को 25 साल दक्कन में रोके रखा: शिवाजी की असली जीत

Chhatrapati Shivaji Maharaj की असली महानता इस तथ्य में छिपी है कि जिस औरंगजेब का सपना पूरे हिंदुस्तान पर बेरोकटोक राज करना था, वो अपनी जिंदगी के आखिरी 25 साल दक्कन में ही उलझकर रह गया। दिल्ली उसका तख्त था लेकिन दिमाग और फौज सब दक्कन में फंसे रहे।

शिवाजी ने औरंगजेब को सिर्फ युद्ध में नहीं रोका, बल्कि रणनीति में बांध दिया। मुगल साम्राज्य को बार-बार पूरी सेना, पैसा और समय दक्कन में झोंकना पड़ा। शिवाजी ने ऐसा दबाव बनाया जिसने मुगल साम्राज्य की नींव को भीतर से लगातार खोखला किया। यही छत्रपति शिवाजी महाराज की असली जीत थी। वे सिर्फ एक राजा या योद्धा नहीं थे, वो इतिहास का वो टर्निंग पॉइंट थे जिसने पूरी दिशा बदल दी।


मुख्य बातें (Key Points)
  • छत्रपति शिवाजी महाराज ने 15-16 साल की उम्र में ही किलों पर कब्जा शुरू कर दिया था, 1659 में प्रतापगढ़ में अफजल खान का वध किया और 1663 में शाइस्ता खान को रात्रि हमले में करारी हार दी।
  • 6 जून 1674 को रायगढ़ किले में उनका राज्याभिषेक हुआ, उन्हें “छत्रपति”, “शककर्ता” और “हिंदवी धर्मोद्धारक” की उपाधियां दी गईं, उनका हिंदवी स्वराज हिंदू और मुसलमान दोनों के लिए था।
  • शिवाजी ने भारत की पहली संगठित नौसेना खड़ी की, 57 युद्धपोत और 500 नौसैनिक तैयार किए, विजयदुर्ग और सिंधुदुर्ग जैसे नौसैनिक अड्डे बनाए और पुर्तगालियों को मैत्री संधि करने पर मजबूर किया।
  • औरंगजेब जैसे शक्तिशाली मुगल बादशाह को अपनी जिंदगी के आखिरी 25 साल दक्कन में उलझाए रखना शिवाजी की सबसे बड़ी रणनीतिक जीत थी, जिसने मुगल साम्राज्य की नींव भीतर से खोखली कर दी।

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सवाल 1: छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म कब और कहां हुआ था?

शिवाजी महाराज का जन्म 1630 के आसपास पश्चिमी घाट की पहाड़ियों में स्थित शिवनेरी किले में हुआ था। उनकी जन्मतिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद है, हालांकि महाराष्ट्र सरकार 19 फरवरी को शिवाजी राजे जयंती के रूप में मनाती है।

सवाल 2: शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक कब और कहां हुआ था?

6 जून 1674 को रायगढ़ किले में भव्य समारोह के साथ शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ। वाराणसी के विद्वान गागाभट्ट ने वैदिक विधि से यह संस्कार कराया और शिवाजी को “छत्रपति”, “शककर्ता” और “हिंदवी धर्मोद्धारक” की उपाधियां दी गईं।

सवाल 3: क्या शिवाजी महाराज मुसलमानों के विरोधी थे?

नहीं। इतिहास के अनुसार शिवाजी का हिंदवी स्वराज सभी के लिए था। उनकी सेना में बड़ी संख्या में मुसलमान अधिकारी और सैनिक थे। मुगल इतिहासकार खफी खान ने भी माना कि शिवाजी ने कुरान के सम्मान के स्पष्ट आदेश दिए थे।

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अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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