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Youth Congress Protest: राहुल ने कहा “बब्बर शेरों पर गर्व”, देशभर में आंदोलन का ऐलान

यूथ कांग्रेस को मिली नई ताकत — Compromised PM का नारा, ₹17 लाख करोड़ मोनेटाइजेशन और ट्रेड डील पर राहुल गांधी का सबसे बड़ा हमला

The News Air Team by The News Air Team
मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026
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Rahul Gandhi
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Youth Congress Protest India: राहुल गांधी ने भोपाल की किसान महापंचायत से एक ऐसा राजनीतिक संदेश दिया है जो भारतीय राजनीति की दिशा बदलने की क्षमता रखता है। एआई समिट के दौरान यूथ कांग्रेस के नेताओं ने “Compromised PM” का नारा लगाते हुए जिस तरह का विरोध प्रदर्शन किया, उसे लेकर जब मेनस्ट्रीम मीडिया ने कांग्रेस को घेरने की कोशिश की तो राहुल गांधी न सिर्फ अपने कार्यकर्ताओं के पक्ष में खड़े हुए, बल्कि खुले तौर पर ऐलान कर दिया कि अब विरोध की राजनीति की कमान यूथ कांग्रेस के हाथों में होगी और देशभर में आंदोलन तेज होगा।

“बब्बर शेर किसी से नहीं डरेंगे” — राहुल का यूथ कांग्रेस को खुला समर्थन

भोपाल में किसानों और यूथ कांग्रेस के नेताओं के बीच खड़े राहुल गांधी ने जो शब्द कहे, वे अब तक की कांग्रेस राजनीति से बिल्कुल अलग थे। उन्होंने कहा कि “हमारे यूथ कांग्रेस के बब्बर शेर किसी से नहीं डरेंगे। आप में कांग्रेस पार्टी का खून है, देशभक्ति का खून है।” राहुल ने एक्स (X) पर भी लिखा कि “शांतिपूर्ण विरोध हमारी ऐतिहासिक धरोहर है, यह हमारे खून में है और हर भारतीय को लोकतांत्रिक अधिकार है कि वह विरोध करे।”

यह पहली बार है जब कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने इतने खुले और आक्रामक तरीके से यूथ कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन को न सिर्फ सही ठहराया, बल्कि पूरी पार्टी को उनके पीछे खड़ा करने का ऐलान किया। राहुल ने साफ कहा कि “सत्ता के सच का आईना दिखाना अपराध नहीं, देशभक्ति है।”

5 करोड़ रजिस्टर्ड सदस्य — यूथ कांग्रेस क्यों बन रही है गेम चेंजर?

यूथ कांग्रेस को आमतौर पर कांग्रेस का एक सहायक संगठन भर माना जाता रहा है। लेकिन अब यह समझना जरूरी है कि इस संगठन से देश के 5 करोड़ छात्र रजिस्टर्ड तरीके से जुड़े हुए हैं। अब तक कांग्रेस जब अपने पारंपरिक कैडर के भरोसे कोई विरोध करती थी तो वह उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाता था जहां राहुल गांधी उसे पहुंचाना चाहते थे।

लेकिन एआई समिट के दौरान यूथ कांग्रेस के नेताओं ने गंजी उतारकर “Compromised PM” का नारा लगाया और यह एक नए तरीके के ऑक्सीजन की तरह काम कर गया। एक पॉलिटिकल फॉर्मेट को बदलने की कोशिश हुई। राहुल गांधी की सोच अब यह है कि अगर देश का युवा आने वाली चुनौतियों को समझ जाए तो बात यूथ कांग्रेस से आगे निकलकर उन तमाम युवाओं तक पहुंचेगी जो अभी तक अलग-अलग राजनीतिक दलों के झंडे उठाते हैं — और उनमें सबसे बड़ी तादाद बीजेपी के झंडा उठाने वालों की है।

“Compromised PM” — कांग्रेस को मिल गया नया नारा

एआई समिट के विरोध प्रदर्शन से जो सबसे बड़ी चीज निकलकर आई वह है “Compromised PM” का नारा। यह अब सिर्फ यूथ कांग्रेस का नारा नहीं रहा — कांग्रेस, एनएसयूआई, महिला कांग्रेस, सबके लिए यह एक नए राजनीतिक हथियार में तब्दील हो गया है। इसका मतलब है — अपने आप को पूरी तरह से आत्मसमर्पण करने वाला प्रधानमंत्री जो अमेरिका के सामने नतमस्तक है।

राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर वीडियो बनाकर, एक्स पर लिखकर और अपने भाषणों के जरिए इस नारे को स्थापित करना शुरू कर दिया है। अब “प्रधानमंत्री मोदी” की जगह कांग्रेस हर मंच पर “Compromised PM” कहेगी। यह राजनीतिक भाषा में एक बड़ा बदलाव है।

मीडिया के परसेप्शन से मुक्ति — कांग्रेस की नई रणनीति

अब तक का पैटर्न यह था कि जब भी कांग्रेस कोई विरोध करती थी, मीडिया एक दबाव बनाता था, सत्ता के साथ खड़े लोगों का साथ मिलता था और एक परसेप्शन बन जाता था कि कांग्रेस गलत है। इसके बाद कांग्रेस के नेता या तो खामोश हो जाते थे या कहीं छुप जाते थे।

लेकिन इस बार कहानी बिल्कुल उलट है। मीडिया लगातार कह रहा था कि अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में विरोध नहीं करना चाहिए, इससे मैसेज खराब जाएगा। लेकिन राहुल गांधी ने दो टूक जवाब दिया — “देश बेचना और विरोध करना, इन दोनों में कोई अंतर किसी को नजर आता है या नहीं? देश बेचते-बेचते अपनी छवि बचाने लग जाएं और अगर यूथ कांग्रेस का नेता अपनी गंजी उतारे तो उसमें शर्म आती है — या देश बेचने की प्रक्रिया में शर्म आनी चाहिए?”

पहली बार कांग्रेस ने मेनस्ट्रीम मीडिया के परसेप्शन को खुले तौर पर दरकिनार कर दिया। राहुल का संदेश साफ है — अब बहस या तो “Compromised PM” के साथ “गोदी मीडिया” की होगी, या फिर यह सामने आएगा कि मीडिया द्वारा उठाए गए सवाल “Compromised PM” के लिए ढाल बनकर काम कर रहे हैं।

₹17 लाख करोड़ का मोनेटाइजेशन — सरकारी संपत्ति निजी हाथों में?

राहुल गांधी का हमला सिर्फ ट्रेड डील तक सीमित नहीं है। उन्होंने एक और बड़ा मोर्चा खोला है — सरकार की मोनेटाइजेशन नीति। केंद्र सरकार का टारगेट है कि 2026 से 2030 तक विभिन्न मंत्रालयों से ₹17 लाख करोड़ का मोनेटाइजेशन किया जाएगा, जबकि पिछले पांच वर्षों में यह आंकड़ा सिर्फ ₹6 लाख करोड़ था।

इस मोनेटाइजेशन का सेक्टरवार ब्रेकअप देखें तो तस्वीर और साफ हो जाती है। हाईवे, मल्टी मॉडल लॉजिस्टिक पार्क और रोपवेज में ₹4,42,000 करोड़ का मोनेटाइजेशन होगा। पावर सेक्टर में ₹2,77,000 करोड़ का। देश के जो सरकारी पोर्ट्स अभी तक बचे हुए हैं — जो अदाणी ग्रुप के पास अभी तक नहीं गए — उनका ₹2,64,000 करोड़ का मोनेटाइजेशन टारगेट है। रेलवे में ₹2,62,000 करोड़, कोल सेक्टर में ₹2,16,000 करोड़ और माइनिंग में ₹1,16,000 करोड़ का मोनेटाइजेशन होगा।

सरकार इसे निजीकरण नहीं कहती, मोनेटाइजेशन कहती है। लेकिन मोनेटाइजेशन का मतलब सरकारी कंपनियों को ठेका देना नहीं होता — यह सीधे तौर पर प्राइवेट हाथों में काम सौंपना है। इसका सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ेगा — चाहे वो पोर्ट हो, सड़क हो, पावर हो, रेलवे हो या कोल — हर चीज और महंगी होगी।

शेयर बाजार में ₹5 लाख करोड़ डूबे — ट्रेड डील पर रोक का असर

जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रेड डील पर रोक लगाई तो उसके तुरंत बाद भारतीय शेयर बाजार में भूचाल आ गया। एक ही झटके में निवेशकों के ₹5 लाख करोड़ डूब गए। विदेशी निवेशकों (FII) ने अपना पैसा निकालना शुरू कर दिया। इंडेक्स 1000 पॉइंट से ज्यादा नीचे आ गया और निफ्टी उस स्तर पर पहुंच गई जहां 2021-22 में कोविड के तुरंत बाद थी।

अब तक माना जा रहा था कि ट्रेड डील के बाद विदेशी पूंजी भारत से नहीं निकलेगी। लेकिन परिस्थिति पूरी तरह पलट गई। इसी नई परिस्थिति में सरकार ₹17 लाख करोड़ मोनेटाइजेशन से उगाना चाहती है — जो बताता है कि सरकार की आर्थिक स्थिति कितनी दबाव में है।

ट्रेड डील का असली चेहरा — टैरिफ 2-3% से बढ़कर 18% हुआ

राहुल गांधी ने ट्रेड डील की शर्तों का एक ऐसा पहलू सामने रखा जिसे सरकार ने कभी स्पष्ट नहीं किया। अमेरिकी सामान भारत में 0% टैरिफ पर आएगा, जबकि भारत जो टैरिफ अमेरिका को देता था वह 2024 तक सिर्फ 2 से 3% एवरेज था — अब वह बढ़कर 18% हो गया है।

सरकार अमेरिकी तर्ज पर यह कहती रही कि “देखिए, 50% से 25% हुआ और 25% से 18% हुआ” — लेकिन यह किसी ने नहीं कहा कि असल में 2024 तक 2 से 3% ही टैरिफ दिया जाता था। भारत इस डील में अकेला देश है जहां अमेरिकी सामान 0% टैरिफ पर आएगा, जबकि भारत को पहले से कहीं ज्यादा टैरिफ देना होगा।

इस डील से भारतीय किसान — खासतौर से कपास उगाने वाले — सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। टेक्सटाइल इंडस्ट्री खत्म होने की कगार पर आ जाएगी। MSME ध्वस्त होंगे। एक्सपोर्ट करने वालों को पहले जैसा लाभ नहीं होगा।

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रूस का तेल छोड़ा, ईरान का चाबहार छोड़ा — अमेरिकी दबाव में सब कुछ?

राहुल गांधी ने भारत की विदेश नीति पर भी गंभीर सवाल उठाए। रूस से ऐतिहासिक संबंध निभाते हुए भारत हथियारों को लेकर रूस के साथ खड़ा था। रूस ने भी पुराने संबंधों को समझते हुए भारत को लगभग 30% छूट पर कच्चा तेल देना शुरू किया। लेकिन अमेरिका की एक धमकी आई और भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया। रूस के साथ डिफेंस डील नहीं करने का संदेश भी दिया गया।

इसी तरह ईरान के साथ चाबहार पोर्ट पर भारत ने बड़ी पूंजी लगाई थी। लेकिन अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाए और कहा कि ईरान के साथ व्यापार करने वालों पर टैक्स लगेगा — और भारत एक क्षण में चाबहार पोर्ट से बाहर आने से नहीं कतरा रहा। दूसरी तरफ चीन पर बढ़ती निर्भरता — 110 बिलियन डॉलर से ज्यादा का आयात — और अचानक इजराइल के साथ डिफेंस डील जो भारत के पूरे डिफेंस सिस्टम को इजराइल पर निर्भर कर देगी।

सवाल यह है कि विदेश मंत्री जयशंकर, प्रधानमंत्री मोदी और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल — तीनों हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर कहते रहे कि “भारत पहले अपने नागरिकों का हित साधता है, उसके बाद ही किसी डील की दिशा में बढ़ता है” — तो फिर यह सब क्यों बदल गया?

ट्रंप की धमकी — “बद से बदतर होगी स्थिति”

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर खुलेआम चेतावनी दी कि दुनिया के वे देश यह न समझें कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद वे अमेरिका के साथ कोई खेल कर सकते हैं — उनकी स्थिति “बद से बदतर” होगी।

दुनियाभर में सवाल उठा कि ट्रंप ने किसे चेताया? एशिया के कई देश हैं — भारत, इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम — सबके साथ समझौते हुए हैं। लेकिन भारत इस पूरी प्रक्रिया में अकेला ऐसा देश है जहां अमेरिकी सामान 0% टैरिफ पर आएगा और भारत का अपना टैरिफ कई गुना बढ़ गया है।

“मोदी बच नहीं सकते, कोई शक्ति नहीं बचा सकती” — राहुल की सबसे सीधी चुनौती

राहुल गांधी ने भोपाल में अपनी सबसे आक्रामक भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने सीधे नरेंद्र मोदी को चैलेंज करते हुए कहा — “मैं चैलेंज करता हूं नरेंद्र मोदी को कि आप अमेरिका-भारत की डील रद्द करके दिखा दीजिए, दम है तो करके दिखा दीजिए।” और फिर खुद ही जवाब दिया — “यह नहीं कर सकते हैं, क्योंकि इन पर अमेरिका का दबाव है, एप्सटीन की धमकी है और अदाणी का जो क्रिमिनल केस है वो इनके सिर के ऊपर लटका हुआ है।”

उन्होंने बीजेपी के कार्यकर्ताओं से भी सीधे कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ट्रेड डील वापस नहीं ले सकते क्योंकि उनकी अपनी राजनीति फंस चुकी है, उनकी छवि फंस चुकी है, और जो गर्दन फंसी है उसके पीछे सिर्फ ट्रेड और टैक्स नहीं बल्कि अदाणी का मामला, एप्सटीन की फाइल और भारत की इकोनॉमी को प्राइवेट हाथों में सौंपने का प्रयोग — सब कुछ है।

राहुल ने कहा — “नरेंद्र मोदी बच नहीं सकते हैं, उनको कोई शक्ति नहीं बचा सकती है।” और युवाओं से कहा — “सोचना आप ही को है, परिवर्तन की दिशा में कदम आप ही के बढ़ेंगे।”

कांग्रेस का पॉलिटिकल ट्रांसफॉर्मेशन — पार्टी की सबसे बड़ी रणनीतिक शिफ्ट

जो बदलाव अब कांग्रेस के भीतर दिख रहा है, वह पार्टी के इतिहास में अभूतपूर्व है। अब तक यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई को कॉलेज और युवाओं के बीच की राजनीति के रूप में देखा जाता था। पार्टी के बड़े नेता मानते थे कि असली राजनीति वे करेंगे। लेकिन राहुल गांधी ने पूरे संघर्ष की कमान यूथ कांग्रेस के हाथों में सौंपते हुए पूरी कांग्रेस को उसके पीछे खड़ा करने का फैसला कर लिया है।

यह राजनीतिक तौर पर सीधे बीजेपी के यूथ विंग और छात्र विंग से टकराएगा। कांग्रेस अब तीन चीजों से डरना बंद कर रही है — मीडिया का परसेप्शन, सरकार का दबाव और अंतरराष्ट्रीय इवेंट्स में विरोध करने की “शर्म।”

राहुल ने किसानों और युवाओं से कहा — “आपने हरित क्रांति लाई, देश को अनाज दिया — वही काम नरेंद्र मोदी ने खत्म किया। आपने इंडस्ट्री बनाई — वही काम मोदी ने खत्म किया। आप 21वीं सदी में आईटी रेवोल्यूशन लाए — डेटा देकर वही काम मोदी ने खत्म किया। आपको डरने की जरूरत नहीं है।”

तीन बड़े सवाल — भारतीय राजनीति में पहली बार इस तरह उभरे

भोपाल के इस भाषण और यूथ कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन ने मिलकर भारतीय राजनीति में तीन बिल्कुल नए सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी की सत्ता अमेरिकी रहमोकरम पर निर्भर है? यह संकेत कोई और नहीं बल्कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी दे रहे हैं और वे लिखकर देने को तैयार हैं कि दबाव और धमकी के बिना मोदी यह डील कभी नहीं करते।

दूसरा सवाल यह है कि भारत की आर्थिक स्थिति इतनी खराब क्यों है कि सरकार को हाईवे, पोर्ट, रेलवे, पावर, कोल और माइंस — सब कुछ प्राइवेट हाथों में सौंपना पड़ रहा है? कोर सेक्टर में नेगेटिविटी, बढ़ती बेरोजगारी, डूबते MSME, स्टार्टअप्स के पास कैश की कमी — ये सब बताते हैं कि भारत अपने पांव पर तभी खड़ा हो सकता है जब विदेशी पूंजी आए और उसकी एवज में सब कुछ देने को तैयार बैठा है।

तीसरा सवाल यह है कि 21वीं सदी डेटा की सदी है और वही डेटा अमेरिका फ्री ऑफ कॉस्ट चाहता है क्योंकि अमेरिका चीन से मुकाबला तभी कर सकता है जब भारत का डेटा उसके पास हो। राहुल का आरोप है कि प्रधानमंत्री मोदी ने डेटा फ्री ऑफ कॉस्ट बेचते हुए भारत को ही बेच दिया।

मुख्य बातें (Key Points)
  • राहुल गांधी ने पहली बार यूथ कांग्रेस को “बब्बर शेर” कहते हुए पूरी कांग्रेस को उनके पीछे खड़ा करने का ऐलान किया — “Compromised PM” कांग्रेस का नया राजनीतिक नारा बन गया है जो हर मंच पर इस्तेमाल होगा।
  • सरकार 2026 से 2030 तक ₹17 लाख करोड़ का मोनेटाइजेशन करेगी — हाईवे, पावर, पोर्ट, रेलवे, कोल और माइंस सब प्राइवेट हाथों में जाएंगे, जिसका सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ेगा।
  • शेयर बाजार में ₹5 लाख करोड़ डूबे, निफ्टी कोविड के बाद के स्तर पर पहुंची — अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद विदेशी निवेशकों ने पैसा निकालना शुरू किया, इंडेक्स 1000 पॉइंट से ज्यादा गिरा।
  • कांग्रेस ने मेनस्ट्रीम मीडिया के परसेप्शन को खुले तौर पर खारिज किया — राहुल ने कहा कि देश बेचने में शर्म आनी चाहिए, विरोध करने में नहीं; अब पार्टी मीडिया के दबाव से मुक्त होकर काम करेगी।
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