Vande Mataram 6 Stanzas Supreme Court Case: राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के पूरे छह छंदों को गाना अनिवार्य करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण मामला चल रहा है। गृह मंत्रालय की एडवाइजरी और 2026 के पेनल संशोधन को चुनौती देते हुए प्रसिद्ध संगीतकार टी एम कृष्णा ने जनहित याचिका दायर की है।
देखा जाए तो यह मामला सिर्फ गीत गाने भर का नहीं है। यह मामला अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 25 (अंतरात्मा की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 51A (मूल कर्तव्य) के बीच संतुलन का है। अगर कोई व्यक्ति सम्मानपूर्वक खड़ा है लेकिन धार्मिक या व्यक्तिगत कारणों से गीत नहीं गा रहा, तो क्या उस पर आपराधिक मामला बनेगा?
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जस्टिस संजय वशिष्ठ की बेंच ने हाल ही में सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि राज्य राष्ट्रगीत घोषित कर सकता है, लेकिन पेनल एक्शन लेने पर मामला फंसता है। सुप्रीम कोर्ट ने 1986 के बिजॉय इमैनुएल बनाम केरल राज्य के ऐतिहासिक फैसले का हवाला भी दिया है।
मामला कैसे शुरू हुआ?
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक आधिकारिक एडवाइजरी जारी की थी, जिसमें निर्दिष्ट सरकारी और औपचारिक आयोजनों में राष्ट्रगीत वंदे मातरम के पूरे छह छंदों का समवेत गायन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए थे।
यह एडवाइजरी आते ही दिल्ली के प्रशासनिक गलियारों से लेकर राज्यों की विधानसभाओं तक तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई। कर्नाटक में इसका पुरजोर विरोध देखने को मिला, जहां राज्य अपने प्रतीकों, भाषाई अस्मिता और व्यक्तिगत स्वायत्तता पर प्रश्न उठा रहा है।
जम्मू-कश्मीर में यह मुद्दा धार्मिक संवेदनशीलता और संवैधानिक सीमाओं को लेकर बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है। तमिलनाडु में भी विरोध और विवाद बढ़ता दिख रहा है।
एक सामान्य नागरिक के लिए क्या मायने?
अब खुद को एक सामान्य नागरिक की जगह रखकर देखिए। कल्पना कीजिए कि आप किसी औपचारिक सरकारी कार्यक्रम में गए हुए हैं और मंच पर वंदे मातरम के सभी छंद गाए जा रहे हैं।
आप सावधान मुद्रा में पूरे आदर के साथ खड़े हैं। आप सिर नहीं झुकाए हुए हैं। आपके चेहरे पर अनादर का कोई भाव नहीं है। लेकिन आपकी अंतरात्मा या आपका व्यक्तिगत धार्मिक विश्वास आपको सभी छह छंद गाने की इजाजत नहीं देता।
अब आप पूरी गरिमा के साथ चुपचाप खड़े रहते हैं। तो सवाल यह उठता है – क्या गृह मंत्रालय की एडवाइजरी की रोशनी में आपकी चुप्पी एक अपराध बन गई है?
कानून क्या कहता है?
2026 में Prevention of Insults to National Honour Act में जो संशोधन किया गया, उसमें राष्ट्रीय गीत के गायन को लेकर क्या जोड़ा गया है?
कानून कहता है कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगीत के गायन को जानबूझकर रोकता है (intentionally prevents) या गायन में जुटी हुई किसी सभा में व्यवधान डालता है (causes disturbance), तो उसे तीन साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है – दोनों शब्दों पर गौर कीजिए: रोकना (prevent) और बाधा डालना (disturb)।
सरल उदाहरण से समझिए
एक स्थिति समझिए जहां हॉल में राष्ट्रगीत बज रहा है। एक नागरिक ‘A’ अनुशासन के साथ अपनी जगह चुपचाप खड़ा है। दूसरा नागरिक ‘B’ माइक के तार खींच देता है, मंच पर जाकर नारेबाजी करता है या लोगों को गाने से जबरन रोकता है।
तो आप बताइए – कानून की भाषा को ध्यान से देखें तो क्या A और B का आचरण एक जैसा माना जाएगा? बिल्कुल नहीं!
कानून सक्रिय बाधा (active disruption) को दंडनीय बनाता है। चुपचाप खड़े रहना किसी गाने को रोकना नहीं है।
याचिकाकर्ता की आशंका
याचिकाकर्ता की आशंका यह है कि जब जमीनी स्तर पर ऐसी प्रशासनिक एडवाइजरी लागू होती है, तो निचले स्तर का प्रशासन इस फर्क को समझ नहीं पाता। न गाने को भी अपमान मानने लगता है।
दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट में असली लड़ाई इसकी प्रशासनिक व्याख्या की सीमा तय करने में है।
1986 का ऐतिहासिक फैसला
बिजॉय इमैनुएल बनाम केरल राज्य का मामला आज के समय में भारतीय न्यायशास्त्र का मील का पत्थर है। केरल का एक स्कूल था। तीन बच्चे थे – बिजो, बिंदु और लिलियन। ये जेहोवाह विटनेस संप्रदाय से ताल्लुक रखते थे।
सुबह जब स्कूल की प्रार्थना होती थी और जन गण मन बजता था, तो ये तीनों बच्चे सावधान की मुद्रा में खड़े होते थे, लेकिन इसे गाते नहीं थे। क्योंकि उनके धार्मिक विश्वास के अनुसार वे केवल ईश्वर की ही स्तुति गा सकते थे।
स्कूल प्रशासन ने उन्हें अनुशासनहीनता और राष्ट्रगान के अपमान के आरोप में स्कूल से निष्कासित कर दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और जस्टिस ओ चिन्नप्पा रेड्डी की बेंच ने जो शब्द कहे, वो आज भी प्रासंगिक हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा – “यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान के गायन के समय सम्मानपूर्वक खड़ा होता है लेकिन स्वयं नहीं गाता, तो यह किसी भी सूरत में राष्ट्रगान का अनादर या अपराध नहीं बन जाता।”
छह छंदों का विवाद क्यों?
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित मूल वंदे मातरम में कुल छह छंद हैं। 1950 में संविधान सभा ने इसे राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया। लेकिन आमतौर पर पहले दो छंदों को ही औपचारिक तौर पर अपनाया गया, क्योंकि उनमें मातृभूमि और प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन है।
याचिकाकर्ता और विरोध करने वालों का तर्क यह है कि बाद के चार छंदों में विशिष्ट धार्मिक प्रतीकों और देवी-देवताओं का उल्लेख होता है। ऐसे में किसी भी नागरिक को – चाहे वो अल्पसंख्यक समुदाय का हो या किसी अन्य आस्था का – उन छंदों को गाने के लिए विवश करना उसकी अंतरात्मा पर दबाव डालता है।
दो अलग आयाम
यहां हमें दो अलग-अलग आयामों को स्पष्टता से समझना होगा:
पहला – प्रशासनिक प्रोटोकॉल: राज्य/सरकार यह तय कर सकती है कि आधिकारिक मंचों पर गीत के कितने छंद गाए जाएंगे।
दूसरा – व्यक्तिगत आपराधिक दायित्व: क्या कार्यक्रम में खड़े हर नागरिक की व्यक्तिगत आवाज को अनिवार्य किया जा सकता है?
कार्यक्रम में राष्ट्रगीत का पूरा गायन तय करना सरकार का अधिकार हो सकता है। लेकिन हर नागरिक के मुंह से शब्द निकलवाना सीधे तौर पर मौलिक अधिकार के दायरे में दखल देना है।
संवैधानिक संतुलन
संवैधानिक विधि के विद्यार्थी के रूप में आपको तीन अनुच्छेदों का संतुलन देखना होगा:
आर्टिकल 51A(a): नागरिकों का मूल कर्तव्य है कि वे संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करेंगे। (अभी राष्ट्रगीत यहां ऐड नहीं किया गया है)
आर्टिकल 19(1)(a): वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि बोलने का अधिकार कानूनी रूप से मौन रहने का अधिकार भी शामिल करता है।
आर्टिकल 25(1): अंतरात्मा की स्वतंत्रता की गारंटी।
हमारा संविधान भली-भांति यह समझता है कि सच्चा राष्ट्रवाद दिल से आता है, वह किसी प्रशासनिक परिपत्र या दंड के भय से जबरन पैदा नहीं किया जा सकता।
हालिया सुनवाई में क्या हुआ?
हालिया सुनवाई में जस्टिस जयमाला बांख्सी की बेंच ने बिजॉय इमैनुएल के फैसले का हवाला देते हुए बहुत अहम मौखिक टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अंतरात्मा के आधार पर यदि कोई व्यक्ति सभी छंद नहीं गाता है, तो महज इतने भर से उस पर आपराधिक मुकदमा चलाना उचित नहीं है।
लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह है – यह अदालत की मौखिक टिप्पणी है, कोई अंतिम फैसला नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने 2026 के संशोधन को असंवैधानिक अभी तक घोषित नहीं किया है। कोर्ट ने गृह मंत्रालय की एडवाइजरी पर कोई रोक भी नहीं लगाई है। सरकार से जवाब मांगा गया है और अंतिम सुनवाई अभी बाकी है।
सॉलिसिटर जनरल का बयान
सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल ने जो स्टेटमेंट दिया, वो बड़ा महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि “हम कानून नक्सल के लिए नहीं बना रहे हैं। हम कानून नक्सल के हिसाब से नहीं बनाएंगे।”
यानी सरकार का पक्ष यह है कि कानून उन लोगों के लिए है जो सक्रिय रूप से बाधा डालते हैं, न कि उन लोगों के लिए जो शांतिपूर्वक खड़े हैं।
मुख्य बातें (Key Points)
• टी एम कृष्णा ने गृह मंत्रालय की एडवाइजरी और 2026 के संशोधन को चुनौती दी है
• कानून सक्रिय बाधा डालने को दंडनीय बनाता है, चुपचाप खड़े रहने को नहीं
• 1986 के बिजॉय इमैनुएल केस में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि सम्मानपूर्वक खड़े रहना काफी है
• मामला अभी विचाराधीन है, कोई अंतिम फैसला नहीं आया है













