उबर, ओला को कोर्ट की फटकार, लाइसेंस नहीं लेने पर महाराष्ट्र में बंद करनी होगी सर्विस

ऐप के जरिए कैब सर्विसेज देने वाली ओला और उबर को बॉम्बे हाई कोर्ट ने लाइसेंस के बिना सर्विस देने के कारण कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि यह कानून का बिल्कुल पालन नहीं करने का मामला है। कोर्ट ने ऐसे सभी कैब एग्रीगेटर्स को सर्विस जारी रखने के लिए 16 मार्च तक लाइसेंस के लिए आवेदन करने का निर्देश दिया है।

हालांकि, ऐसी कैब्स को चलाने पर हाई कोर्ट ने रोक नहीं लगाई है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे कदम से यात्रियों को मुश्किल होगी। चीफ जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा, “हमें पता है कि लाइसेंस नहीं रखने वाले एग्रीगेटर्स पर रोक लगाने से ऐसी सर्विसेज का इस्तेमाल करने वाले यात्रियों को परेशानी होगी।” हाई कोर्ट की बेंच ने एडवोकेट सवीना क्रेस्टो की ओर से दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। याचिका में देश में उबर के ऐप का इस्तेमाल करने वाले कस्टमर्स की शिकायतों के समाधान की व्यवस्था नहीं होने की समस्या उठाई है। क्रेस्टो ने इसमें एक घटना का हवाला दिया जिसमें उन्होंने उबर की राइड बुक की थी और उन्हें बीच रास्ते में एक सुनसान जगह पर उतार दिया गया था। क्रेस्टो को पता चला कि उबर के ऐप में शिकायत दर्ज कराने का कोई प्रभावी विकल्प नहीं है।

पिछली सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया था कि महाराष्ट्र सरकार ने लाइसेंस जारी करने और ऐसे कैप एग्रीगेटर्स को रेगुलेट करने के लिए विशेष गाइडलाइंस को स्वीकृति नहीं दी है। हालांकि, केंद्र सरकार ने ऐसी कैब्स को रेगुलेट करने के लिए मोटर व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइंस जारी की हैं। महाराष्ट्र में ये कैब्स महाराष्ट्र सिटी टैक्सी रूल्स के तहत जारी परमिट के आधार पर चल रही हैं।

जस्टिस दत्ता ने कहा कि महाराष्ट्र में इस व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया जा सकता और यह कानून का उल्लंघन है। उनका कहना था, “आप (महाराष्ट्र सरकार) क्या कर रहे हैं? यह पूरी तरह गैर कानूनी है। आप कानून का पालन नहीं कर रहे। कानून पूरी तरह स्पष्ट है तो जब तक राज्य सरकार के कानून नहीं हैं तो एग्रीगेटर्स को केंद्र सरकार की गाइडलाइंस का पालन करना होगा।” उबर की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट जनक द्वारकादास ने कोर्ट को बताया कि कंपनी का कानून का पालन नहीं करने का कोई इरादा नहीं है और ऐप पर शिकायत के समाधान की व्यवस्था है। हालांकि, हाई कोर्ट ने कहा कि केवल ऐसी व्यवस्था होना पर्याप्त नहीं है।

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