Types of Soil in India: मिट्टी सिर्फ एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि हमारी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जहां 60 फीसदी से ज्यादा आबादी खेती पर निर्भर है, वहां मिट्टी की समझ होना बेहद जरूरी हो जाता है। देखा जाए तो भारत के विशाल भौगोलिक और जलवायु विविधता के कारण यहां आठ अलग-अलग प्रकार की मिट्टियां पाई जाती हैं। और हर मिट्टी की अपनी खासियत है, अपना स्वभाव है।
पहली बारिश के बाद मिट्टी से आने वाली सौंधी खुशबू हो या फिर अलग-अलग रंगों की मिट्टी का सौंदर्य – ये सब हमारे चेहरे पर अनायास मुस्कान ला देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि किस मिट्टी में कौन सी फसल सबसे बेहतर होती है? क्यों काली मिट्टी को कपास की खेती के लिए आदर्श माना जाता है? और क्यों गंगा के मैदानों में धान की खेती इतनी सफल है?
आज हम आपको भारत की मिट्टी की पूरी कहानी बताएंगे। जहां आप समझेंगे मिट्टी का निर्माण कैसे होता है, इसके कितने प्रकार हैं, और किस मिट्टी में कौन से पोषक तत्व पाए जाते हैं।
मिट्टी क्या है और कैसे बनती है?
साधारण शब्दों में कहें तो मिट्टी छोटे चट्टानों के कणों और ह्यूमस जैसे जैविक पदार्थों का मिश्रण है। विज्ञान की भाषा में समझें तो जब हवा, पानी या किसी अन्य जलवायु क्रिया के कारण चट्टानें टूटती हैं, तो मिट्टी का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया को अपक्षय (Weathering) कहते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि अगर आप जमीन में गड्ढा खोदकर मिट्टी को देखें, तो आपको तीन अलग-अलग परतें नजर आएंगी। हर परत का रंग, गहराई और रासायनिक संरचना अलग होती है। इन्हें Soil Horizons कहा जाता है।
सबसे ऊपरी परत यानी Horizon A सबसे महत्वपूर्ण होती है। यही वो परत है जहां पौधे उगते हैं। इसमें ह्यूमस और खनिजों की भरपूर मात्रा होती है, इसलिए इसका रंग गहरा होता है। यह परत नरम और छिद्रयुक्त होती है, जिससे पानी को सोखने की क्षमता ज्यादा होती है। केंचुए, कृंतक और कीड़े-मकोड़े इसी परत में रहते हैं।
इसके नीचे Horizon B आती है, जिसमें ह्यूमस कम लेकिन खनिज ज्यादा होते हैं। यह परत ज्यादा सख्त और संकुचित होती है। सबसे नीचे Horizon C होती है जो चट्टानों के छोटे टुकड़ों से बनी होती है। यह मिट्टी निर्माण की पहली अवस्था है।
मिट्टी के वर्गीकरण का इतिहास
अगर गौर करें तो मिट्टी का वर्गीकरण हजारों साल से किया जा रहा है। प्राचीन काल में मिट्टी को दो मुख्य समूहों में बांटा जाता था – उर्वरा (उपजाऊ मिट्टी) और ऊसर (बंजर मिट्टी)।
16वीं सदी में अकबर के शासनकाल में मिट्टी को उसकी बनावट, रंग, जमीन का ढलान और नमी के आधार पर वर्गीकृत किया जाता था। आजादी के बाद 1956 में Soil Survey of India का गठन हुआ, जिसने दामोदर घाटी में भारतीय मिट्टी का व्यापक अध्ययन किया।
समझने वाली बात है कि आज भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत National Bureau of Soil Survey and Land Use Planning लगातार भारतीय मिट्टी पर शोध कर रही है।
कणों के आकार के आधार पर मिट्टी के प्रकार
मिट्टी में मौजूद कणों के आकार के आधार पर तीन मुख्य प्रकार होते हैं:
1. रेतीली मिट्टी (Sandy Soil): इसमें बड़े कण होते हैं जो आपस में कसकर नहीं जुड़ पाते। इनके बीच बड़े-बड़े छिद्र रह जाते हैं। पानी इन छिद्रों से जल्दी निकल जाता है, इसलिए यह मिट्टी हल्की और सूखी रहती है।
2. चिकनी मिट्टी (Clay Soil): इसमें बहुत छोटे कण होते हैं जो कसकर जुड़े रहते हैं। इनके बीच के छोटे-छोटे छिद्र पानी को सोखकर रख लेते हैं। यह मिट्टी भारी होती है और इसकी जल धारण क्षमता सबसे ज्यादा होती है।
3. दोमट मिट्टी (Loamy Soil): यह रेत, चिकनी मिट्टी और सिल्ट का मिश्रण होती है। यह पौधों की वृद्धि के लिए सबसे उपयुक्त मिट्टी है। इसमें ह्यूमस भी पाया जाता है और इसकी जल धारण क्षमता संतुलित होती है।
भारत में पाई जाने वाली आठ मुख्य मिट्टियां
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु, भूगोल और वनस्पति के आधार पर आठ प्रकार की मिट्टियां पाई जाती हैं। आइए एक-एक करके इन्हें समझते हैं।
जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) – कृषि की रीढ़
जलोढ़ मिट्टी उत्तरी मैदानों और नदी घाटियों में पाई जाती है। देश के कुल क्षेत्रफल का लगभग 40% हिस्सा इसी मिट्टी से ढका है। यह निक्षेपणीय मिट्टी है जो नदियों और धाराओं द्वारा लाई गई और यहां जमा होती गई।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि यह मिट्टी राजस्थान के एक संकरे गलियारे से होते हुए गुजरात के मैदानों तक फैली है। साथ ही प्रायद्वीपीय क्षेत्र में नदी घाटियों और पूर्वी तट के डेल्टाओं में भी पाई जाती है।
जलोढ़ मिट्टी का स्वभाव बदलता रहता है – यह रेतीली, दोमट या चिकनी हो सकती है। आमतौर पर यह पोटाश से समृद्ध होती है, लेकिन फास्फोरस में कमी होती है।
खादर और भांगर का अंतर:
ऊपरी और मध्य गंगा के मैदान में दो अलग तरह की जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है:
| मिट्टी का प्रकार | विशेषता | निर्माण |
|---|---|---|
| खादर | नई जलोढ़ मिट्टी, बारीक गाद से बनी | हर साल बाढ़ से जमा होती है |
| भांगर | पुरानी जलोढ़ मिट्टी | बाढ़ के मैदान से दूर जमा |
दोनों में कंकड़ (Calcareous Concretions) पाए जाते हैं। निचले और मध्य गंगा के मैदान तथा ब्रह्मपुत्र घाटी में जलोढ़ मिट्टी ज्यादा दोमट और चिकनी होती है।
इस मिट्टी का रंग हल्के धूसर से लेकर राख के रंग तक होता है। असल में रंग निक्षेपण की गहराई, बनावट और परिपक्वता के समय पर निर्भर करता है।
फसलें: धान, गेहूं, गन्ना, तंबाकू, कपास, बाजरा, ज्वार, मटर, अरहर, चना, काला चना, हरा चना, सोयाबीन, मूंगफली, सरसों, अलसी, तिल, जूट, मक्का, सब्जियां और उचित सिंचाई के साथ फल।
काली मिट्टी (Black Soil) – कपास का राजा
काली मिट्टी दक्कन के पठार के अधिकांश हिस्से को कवर करती है। इसमें महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के कुछ हिस्से शामिल हैं। गोदावरी और कृष्णा नदी के उद्गम स्थलों के पास और दक्कन पठार के उत्तर-पश्चिमी भाग में काफी गहराई तक काली मिट्टी मौजूद है।
देखा जाए तो यह मिट्टी कपास की खेती के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इसीलिए इसे रेगुर मिट्टी या ब्लैक कॉटन सॉइल भी कहा जाता है।
काली मिट्टी आमतौर पर चिकनी, गहरी और अभेद्य (Impermeable) होती है। जब यह गीली होती है तो फूलकर चिपचिपी हो जाती है। वहीं सूखने पर सिकुड़ जाती है, जिससे सूखे मौसम में इसमें चौड़ी दरारें पड़ जाती हैं।
दिलचस्प बात यह है कि इन दरारों के कारण इस मिट्टी में एक तरह से स्व-जुताई (Self-ploughing) हो जाती है। चूंकि इस मिट्टी में अवशोषण और नमी का नुकसान दोनों धीरे होते हैं, इसलिए यह लंबे समय तक नमी बनाए रखती है।
रासायनिक संरचना: चूना, लोहा, मैग्नीशिया और एल्युमिना से समृद्ध। इसमें पोटाश भी होता है। लेकिन फास्फोरस, नाइट्रोजन और जैविक पदार्थ की कमी होती है।
मिट्टी का रंग गहरे काले से लेकर धूसर तक हो सकता है।
फसलें: कपास, धान, गन्ना, गेहूं, ज्वार, सूरजमुखी, खट्टे फल, सब्जियां, मूंगफली और सभी तेलहन।
लाल और पीली मिट्टी (Red and Yellow Soil)
दक्कन पठार के पूर्वी और दक्षिणी हिस्से में कम वर्षा वाले क्षेत्रों में क्रिस्टलीय आग्नेय चट्टानों पर लाल मिट्टी पाई जाती है। पश्चिमी घाट की तलहटी में एक लंबा क्षेत्र लाल दोमट मिट्टी से भरा है। उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और मध्य गंगा के मैदान के दक्षिणी हिस्सों में पीली और लाल मिट्टी पाई जाती है।
क्रिस्टलीय और कायांतरित चट्टानों में लोहे के विस्तृत प्रसार के कारण मिट्टी में लाल रंग विकसित हो जाता है। वहीं जब यह लोहा हाइड्रेटेड रूप में होता है तो मिट्टी का रंग पीला दिखने लगता है।
लाल और पीली मिट्टी जब बारीक होती है तो आमतौर पर उपजाऊ होती है। हालांकि शुष्क ऊंचे इलाकों में पाई जाने वाली मोटे दाने की मिट्टी की उर्वरता काफी कम होती है। ये मिट्टियां आमतौर पर नाइट्रोजन, फास्फोरस और ह्यूमस में कमजोर होती हैं।
फसलें: गन्ना, धान, गेहूं, मूंगफली, रागी, आलू, दलहन और आम व संतरे जैसे फल।
लैटेराइट मिट्टी (Laterite Soil) – ईंट जैसी मिट्टी
लैटेराइट शब्द लैटिन के ‘Later’ से आया है, जिसका मतलब है ईंट। यह मिट्टी उच्च तापमान और उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित होती है। यह उष्णकटिबंधीय वर्षा के कारण होने वाली तीव्र निक्षालन (Leaching) का परिणाम है।
बारिश होने पर मिट्टी से चूना और सिलिका की निक्षालन हो जाती है और आयरन ऑक्साइड तथा एल्युमिनियम यौगिक बच जाते हैं। फिर उच्च तापमान में पनपने वाले बैक्टीरिया मिट्टी के ह्यूमस को तेजी से हटा देते हैं।
यह मिट्टी जैविक पदार्थ, नाइट्रोजन, फॉस्फेट और कैल्शियम में कमजोर होती है, जबकि आयरन ऑक्साइड और पोटाश की अधिकता होती है। इसलिए लैटेराइट मिट्टी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती और इसे उपजाऊ बनाने के लिए खाद और उर्वरकों की जरूरत पड़ती है।
तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल में पाई जाने वाली लाल लैटेराइट मिट्टी काजू जैसी पेड़ की फसलों के लिए उपयुक्त होती है। घर बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ईंटें बनाने के लिए इस मिट्टी का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
ये मिट्टियां मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय पठार के ऊंचे क्षेत्रों में विकसित हुई हैं। लैटेराइट मिट्टी आमतौर पर कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, उड़ीसा और असम के पहाड़ी इलाकों में पाई जाती है।
फसलें: चाय, कॉफी, रबर, नारियल और काजू।
शुष्क मिट्टी (Arid Soil) – रेगिस्तान की मिट्टी
शुष्क मिट्टी का रंग लाल से लेकर भूरे तक हो सकता है। मिट्टी की संरचना आमतौर पर रेतीली और प्रकृति में खारी होती है। कुछ क्षेत्रों में इस मिट्टी में नमक की मात्रा इतनी ज्यादा होती है कि खारे पानी को वाष्पीकृत करके हमें सामान्य नमक भी मिल जाता है।
शुष्क जलवायु, उच्च तापमान और तेज वाष्पीकरण के कारण इन मिट्टियों में नमी और ह्यूमस की कमी होती है। शुष्क मिट्टी में नाइट्रोजन अपर्याप्त होता है। नीचे की ओर जाने पर कैल्शियम की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे मिट्टी की निचली परतों में कंकर की परत पाई जाती है।
समझने वाली बात है कि मिट्टी की निचली परत में कंकर का यह निर्माण पानी के नीचे की ओर रिसाव को रोकता है। इसलिए जब यहां सिंचाई की जाती है तो पौधों की वृद्धि के लिए मिट्टी की नमी आसानी से उपलब्ध हो जाती है।
शुष्क मिट्टी पश्चिमी राजस्थान में विकसित हुई है। इन मिट्टियों में ह्यूमस और जैविक पदार्थ की कम उपस्थिति होती है।
फसलें: कोई भी सूखा सहिष्णु और नमक सहिष्णु फसलें जैसे बाजरा और मक्का।
लवणीय मिट्टी (Saline Soil) – ऊसर भूमि
लवणीय मिट्टी को ऊसर मिट्टी भी कहा जाता है। इसमें सोडियम, पोटैशियम और मैग्नीशियम की मात्रा ज्यादा होती है, इसलिए यह बंजर होती है और किसी भी प्रकार की वनस्पति वृद्धि को समर्थन नहीं करती।
इन मिट्टियों में नमक की मात्रा ज्यादा होने के मुख्य कारण हैं शुष्क जलवायु और खराब जल निकासी। यह मिट्टी शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में जलभराव और दलदली क्षेत्रों में पाई जाती है। इनकी संरचना रेतीली से लेकर दोमट तक होती है। इनमें नाइट्रोजन और कैल्शियम की कमी होती है।
लवणीय मिट्टी पश्चिमी गुजरात, पूर्वी तट के डेल्टाओं और पश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पाई जाती है।
जैसे कि कच्छ के रण में दक्षिण-पश्चिम मानसून मिट्टी के कण लेकर आता है और वहां परत की तरह जमा कर देता है। डेल्टा क्षेत्रों में समुद्री जल की घुसपैठ लवणीय मिट्टी के निर्माण को बढ़ावा देती है।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि जिन क्षेत्रों में सिंचाई के अत्यधिक उपयोग से गहन खेती की गई, विशेष रूप से हरित क्रांति वाले क्षेत्रों में, वहां की उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी लवणीय हो रही है।
साथ ही शुष्क जलवायु परिस्थितियों में अत्यधिक सिंचाई करने से एक प्रकार की केशिका क्रिया (Capillary Action) देखने को मिलती है, जिससे मिट्टी की ऊपरी परत में नमक जमा होने लगता है। इसका उदाहरण है पंजाब और हरियाणा।
ऐसे क्षेत्रों में किसानों को मिट्टी में जिप्सम डालने की सलाह दी जाती है, जिससे मिट्टी की लवणता की समस्या को हल किया जा सके।
पीटी मिट्टी (Peaty Soil) – जैविक पदार्थों से भरपूर
पीटी मिट्टी भारी वर्षा और उच्च आर्द्रता वाले क्षेत्रों में पाई जाती है। ऐसी परिस्थितियों के कारण इन क्षेत्रों में वनस्पति की वृद्धि अच्छी होती है। इस वजह से मृत जैविक पदार्थ की बड़ी मात्रा जमा हो जाती है और फिर इनसे मिट्टी को ह्यूमस और जैविक पदार्थ प्रचुर मात्रा में मिल जाता है।
इस मिट्टी में जैविक पदार्थ की मात्रा 40 से 50% तक देखी जा सकती है। यह मिट्टी आमतौर पर भारी होती है और इसका रंग काला होता है। कई जगहों पर यह मिट्टी क्षारीय होती है।
पीटी मिट्टी बिहार के उत्तरी हिस्से में, उत्तराखंड के दक्षिणी हिस्से में और पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में पाई जाती है।
वन मिट्टी (Forest Soil) – पहाड़ी इलाकों की मिट्टी
जैसा कि नाम से पता चलता है, वन मिट्टी वन क्षेत्रों में बनती है जहां पर्याप्त वर्षा उपलब्ध होती है। यह मिट्टी संरचना और बनावट में भिन्न होती है। यह भिन्नता इस बात पर निर्भर करती है कि किस प्रकार के पर्वतीय वातावरण में यह विकसित हुई है।
घाटियों में यह दोमट और गादयुक्त होती है और ऊपरी ढलानों पर मोटे दाने की होती है। साथ ही जब हिमालय के बर्फीले इलाकों में इनका अपरदन हो जाता है तो वहां यह मिट्टी अम्लीय हो जाती है और इनका ह्यूमस भी कम हो जाता है।
वहीं निचली घाटियों में पाई जाने वाली मिट्टी उपजाऊ होती है। यह मिट्टी चाय की खेती, मसाले, गेहूं, मक्का, जौ, कॉफी, उष्णकटिबंधीय फल और समशीतोष्ण फलों के लिए अच्छी होती है।
मिट्टी का क्षरण: चिंता का विषय
दोस्तों, मिट्टी अपने आप में एक जीवित प्रणाली है। जहां किसी दूसरे जीव की तरह यह भी विकसित होती है, इसका भी क्षय और क्षरण होता है। और समय रहते अगर सही उपचार मिल जाए तो कुछ मामलों में इसे फिर से फसल योग्य बनाया जा सकता है।
हालांकि आज मिट्टी का क्षरण हमारे समय की एक गंभीर समस्या बन गई है। व्यापक अर्थ में मिट्टी के क्षरण का मतलब है मिट्टी के कटाव या दुरुपयोग के कारण मिट्टी की उर्वरता में कमी आना या खत्म हो जाना।
वैसे तो यह एक सामान्य प्राकृतिक घटना है, लेकिन आज गहन कृषि प्रथाओं जैसे वनों की कटाई, खराब चराई, गहन खेती, जंगल की आग और निर्माण कार्य के कारण मिट्टी का क्षरण तेज हुआ है।
यही कारण है कि आज सरकार से लेकर विशेषज्ञों के विभिन्न समूह मिट्टी संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों की मांग कर रहे हैं। उम्मीद है कि मिट्टी संरक्षण को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के प्रयास मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, मिट्टी के कटाव को रोकने और मिट्टी की क्षरित स्थिति में सुधार करने में कामयाब रहेंगे।
मुख्य बातें (Key Points)
- भारत में मुख्य रूप से आठ प्रकार की मिट्टियां पाई जाती हैं – जलोढ़, काली, लाल व पीली, लैटेराइट, शुष्क, लवणीय, पीटी और वन मिट्टी
- जलोढ़ मिट्टी देश के 40% क्षेत्र को कवर करती है और सबसे उपजाऊ मानी जाती है
- काली मिट्टी कपास की खेती के लिए आदर्श है और इसे रेगुर या ब्लैक कॉटन सॉइल कहते हैं
- मिट्टी का निर्माण चट्टानों के अपक्षय से होता है और इसमें तीन मुख्य परतें होती हैं – Horizon A, B और C
- मिट्टी का क्षरण आज की एक गंभीर समस्या है जिसके लिए संरक्षण जरूरी है












