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The News Air - Breaking News - Thyroid Disease India: 4.2 करोड़ भारतीयों को थायरॉइड डिसऑर्डर, महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित

Thyroid Disease India: 4.2 करोड़ भारतीयों को थायरॉइड डिसऑर्डर, महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित

भारत में थायरॉइड रोग तेजी से बढ़ रहा है, विशेष रूप से महिलाओं में इसका प्रकोप चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है, जानें क्या हैं कारण।

Ajay Kumar by Ajay Kumar
सोमवार, 13 जुलाई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, हेल्थ
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Thyroid Disease India
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Thyroid Disease Epidemic India: दोस्तों, इन नंबरों को ध्यान से देखिए। अभी इस वक्त लगभग 4 करोड़ 20 लाख भारतीय थायरॉइड डिसऑर्डर के साथ जी रहे हैं। यानी 42 मिलियन इंडियंस। देखा जाए तो एक नया डाटा जो सिर्फ कुछ हफ्ते पहले पब्लिश हुआ है, उसके हिसाब से अप्रैल 2025 से अप्रैल 2026 के बीच जो भी थायरॉइड ब्लड टेस्ट हुए, उनमें से 14 से 22% एबनॉर्मल आए। बॉर्डरलाइन नहीं, एबनॉर्मल।

अब शहरों की बात करें तो अर्बन इंडिया में थायरॉइड प्रेवलेंस जो थायरॉइड डिसऑर्डर की प्रेवलेंस है वो 10.95% है। समझने वाली बात है कि इसमें सबसे ज्यादा अफेक्टेड कौन है? 46 से 54 साल की महिलाएं, भारतीय महिलाएं।

और एक और हॉस्पिटल बेस्ड स्टडी जो झारखंड के कोल माइन एरिया में हुई, वहां तो यह नंबर और भी चौंकाने वाला था – 24%। दिलचस्प बात यह है कि उस स्टडी में जितने भी पेशेंट थायरॉइड डिसऑर्डर के साथ आए, उनमें से महिला और पुरुष का रेशियो था 5.5:1। यानी हर पांच से छह महिलाओं के अगेंस्ट सिर्फ एक पुरुष।

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दिल्ली की चौंकाने वाली स्टडी

एक और दिल्ली के टर्शियरी हॉस्पिटल की स्टडी में जो हाइपोथायरॉइडिज्म के पेशेंट्स पर हुई थी, उनमें से 75% महिलाएं थीं। और इनमें से लगभग 79% में एक स्पेसिफिक एंटीबॉडी पाई गई जिसका नाम है एंटी-TPO जो बताता है कि उनका अपना इम्यून सिस्टम खुद उनकी थायरॉइड ग्लैंड को अटैक कर रहा है।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि सवाल यह है जो आज मैं आप सबसे पूछना चाहता हूं – अगर इतने सालों से इंडिया ने आयोडीन डेफिशिएंसी को कंट्रोल कर लिया है, तो फिर ये नंबर्स इतनी तेजी से क्यों बढ़ रहे हैं? और सबसे महत्वपूर्ण – आखिर ये सिर्फ महिलाओं को ही इतना ज्यादा क्यों टारगेट कर रहा है?

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थायरॉइड ग्लैंड क्या करती है

इस पूरे मिस्ट्री को समझने से पहले हमें पहले यह समझना होगा कि थायरॉइड ग्लैंड करता क्या है? क्योंकि जब तक हमें इसका काम नहीं पता चलेगा, तब तक हमें यह भी समझ नहीं आएगा कि जब यह खराब होती है तो पूरी बॉडी पर इतना ज्यादा असर क्यों पड़ता है।

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थायरॉइड एक छोटी सी बटरफ्लाई शेप की ग्लैंड होती है जो आपकी गर्दन के बिल्कुल सामने एडम्स एप्पल के नीचे होती है। अगर गौर करें तो यह ग्लैंड छोटी होती है लेकिन इसका काम पूरे बॉडी के मेटाबॉलिज्म को कंट्रोल करना है।

मतलब आप कितनी तेजी से एनर्जी यूज करते हैं? आपका वेट कैसे मैनेज होता है? आपकी हार्ट बीट, आपका बॉडी टेम्परेचर, आपके मूड – सब कुछ इस ग्लैंड के थ्रू कंट्रोल होते हैं।

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हाइपोथायरॉइडिज्म सबसे कॉमन

अब जब ये ग्लैंड अपनी जरूरत से कम हॉर्मोन बनाता है तो उस कंडीशन को कहते हैं हाइपोथायरॉइडिज्म। और जब ये जरूरत से ज्यादा हॉर्मोन बना देता है तो उसे कहते हैं हाइपरथायरॉइडिज्म। और इंडिया में सबसे ज्यादा कॉमन प्रॉब्लम है हाइपोथायरॉइडिज्म की, खासतौर पर इंडियन महिलाओं में।

तो अब इस टॉपिक को पूरी तरह से समझने के लिए एक बहुत इंपॉर्टेंट चीज समझाना जरूरी है। देखिए, इंडिया एक जमाने में आयोडीन डेफिशिएंसी का बहुत बड़ा शिकार था। आयोडीन थायरॉइड हॉर्मोन बनाने के लिए सबसे जरूरी इंग्रेडिएंट होता है।

आयोडीन से आयरनी तक

इसलिए 1983 में भारत सरकार ने एक यूनिवर्सल साल्ट आयोडाइजेशन प्रोग्राम शुरू किया जिसमें पूरे देश में आयोडाइज्ड साल्ट मैंडेटरी कर दिया गया। और इस प्रोग्राम ने काफी हद तक काम किया। गॉइटर जो आयोडीन की डेफिशिएंसी की वजह से होता है, उसके केसेस में बहुत कमी आई।

लेकिन दोस्तों, यहां एक बहुत इंटरेस्टिंग और एक बहुत आयरनिक ट्विस्ट आया। दिलचस्प बात यह है कि जैसे-जैसे इंडिया आयोडीन डेफिशिएंसी से आयोडीन सफिशिएंसी की तरफ गया, वैसे-वैसे एक नया प्रॉब्लम सामने आने लगा।

डॉक्टर्स और रिसर्चर्स ने नोटिस किया कि जब बॉडी में आयोडीन की मात्रा सफिशिएंट से ज्यादा हो जाती है, तो यह थायरॉइड ग्लैंड को और ज्यादा ससेप्टिबल बना देती है एक ऑटोइम्यून अटैक के लिए। मतलब खुद का इम्यून सिस्टम अपने ही थायरॉइड ग्लैंड को दुश्मन समझकर उसे अटैक करना शुरू कर देता है।

NFHS डाटा में इजाफा

यही वजह है कि जो NFHS यानी नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे डाटा है, उसमें सेल्फ रिपोर्टेड थायरॉइड डिसऑर्डर 2015-16 में 2.2% था। लेकिन 2019 से 21 का जो सर्वे था, उसमें 2.9% हो गया। यह सिर्फ परसेंटेज में छोटा सा इनक्रीज लग सकता है, लेकिन ये करोड़ों लोगों की पॉपुलेशन में लाखों नए केसेस रिप्रेजेंट करता है।

महिलाएं क्यों ज्यादा प्रभावित

अब मैं आपको इस पूरे मिस्ट्री का सबसे इंपॉर्टेंट हिस्सा समझाता हूं कि आखिर ये महिलाओं को ही इतना ज्यादा क्यों अफेक्ट करता है? इसके बहुत रीजन हैं।

पहला रीजन: जेनेटिक्स और हॉर्मोन का कॉम्बिनेशन। महिलाओं के बॉडी में एस्ट्रोजन जैसे हॉर्मोन थायरॉइड ग्लैंड के साथ बहुत क्लोज रिलेशनशिप रखते हैं। जब एस्ट्रोजन लेवल लाइफ में बदलते हैं – जैसे प्यूबर्टी, प्रेगनेंसी या मेनोपॉज के दौरान – तो थायरॉइड ग्लैंड की एक्टिविटी भी उसके साथ-साथ ही फ्लक्चुएट होती है।

दूसरा और सबसे बड़ा रीजन: ऑटोइम्यून वनरेबिलिटी। मेडिकल साइंस में ये एक वेल एस्टैब्लिश्ड फैक्ट है कि महिलाएं पुरुषों के कंपैरिजन में ऑटोइम्यून डिजीजेस के लिए ज्यादा ससेप्टिबल होती हैं।

प्रेगनेंसी और स्ट्रेस

तीसरा रीजन: प्रेगनेंसी और रिप्रोडक्टिव हेल्थ। प्रेगनेंसी के दौरान थायरॉइड डिस्फंक्शन की प्रेवलेंस 10.4% तक देखी गई है एक इंडियन स्टडी में। प्रेगनेंसी के दौरान अगर थायरॉइड फंक्शन ठीक से मैनेज नहीं किया जाए तो इसका असर सिर्फ मां पर नहीं, बल्कि होने वाले बच्चे के ब्रेन डेवलपमेंट पर भी पड़ सकता है।

चौथा और एक बहुत मॉडर्न रीजन: क्रॉनिक स्ट्रेस। यहां ध्यान देने वाली बात है कि यह सिर्फ बज वर्ड नहीं है दोस्तों। जब बॉडी लंबे समय तक हाई स्ट्रेस में रहती है तो कॉर्टिसोल जो स्ट्रेस हॉर्मोन है, वो थायरॉइड फंक्शन को डायरेक्टली डिसरप्ट करता है।

और आज की अर्बन इंडियन महिलाएं जो करियर, घर और फैमिली सब कुछ एक साथ बैलेंस कर रही हैं, उनके लिए क्रॉनिक स्ट्रेस एक डेली रियलिटी बन चुका है।

अंडर डायग्नोसिस का मसला

अब एक बहुत इंपॉर्टेंट और बहुत ही वॉर्निंग चीज समझते हैं जो इस पूरे इशू को और भी ज्यादा अर्जेंट बना देती है। और वो है अंडर डायग्नोसिस का मसला।

देखो, थायरॉइड डिसऑर्डर के सिम्टम्स क्या होते हैं? फटीग, वेट गेन या वेट लॉस, हेयर थिनिंग, मूड स्विंग्स, इर्रेगुलर पीरियड्स, स्किन ड्राई होना। इन सब सिम्टम्स को एक आम इंडियन महिला अक्सर “स्ट्रेस है” या “काम का प्रेशर है” या “ये तो नॉर्मल है” बोलकर इग्नोर कर देती हैं।

अगर गौर करें तो डॉक्टर्स भी कई बार इन सिम्टम्स को किसी और चीज से जोड़ देते हैं जब तक एक स्पेसिफिक ब्लड टेस्ट TSH यानी थायरॉइड स्टिमुलेटिंग हॉर्मोन टेस्ट ना कराया जाए।

गवर्नेंस गैप

यही वजह है कि अमेरिकन थायरॉइड एसोसिएशन ने रेकमेंड किया है कि 35 साल या 35 साल की उम्र के बाद हर 5 साल में एक रूटीन TSH स्क्रीनिंग होनी चाहिए। लेकिन दोस्तों, ये एक बहुत इंपॉर्टेंट गवर्नेंस गैप है जो मैं आपको बताना चाहता हूं।

इंडिया में अभी भी इस तरह की कोई नेशनल लेवल मैंडेटरी स्क्रीनिंग गाइडलाइन नहीं है। मतलब जहां अमेरिकन थायरॉइड एसोसिएशन अपने देश के लोगों के लिए एक क्लियर प्रोटोकॉल देता है, वहां इंडिया में ये पूरी तरह इंडिविजुअल डॉक्टर के डिस्क्रीशन पर छोड़ा गया है।

प्रैक्टिकल स्टेप्स

अब मैं कुछ प्रैक्टिकल और बहुत जरूरी स्टेप्स आपके साथ शेयर करना चाहता हूं क्योंकि सिर्फ प्रॉब्लम बताना काफी नहीं है।

पहला: अगर आप या आपके घर में कोई भी 35 साल की उम्र पार कर चुकी है, तो साल में एक बार एक सिंपल TSH ब्लड टेस्ट जरूर करवाएं।

दूसरा: अगर आपको लगातार थकान, अनएक्सप्लेन्ड वेट चेंजेस या इर्रेगुलर पीरियड्स महसूस हो रहे हैं, तो उन्हें नॉर्मल स्ट्रेस बोलकर इग्नोर मत करिए।

तीसरा: प्रेगनेंसी प्लान करते वक्त या प्रेगनेंसी के दौरान थायरॉइड फंक्शन को जरूर मॉनिटर करवाएं।

चौथा: अपनी डाइट में सेलेनियम और जिंक जैसे थायरॉइड सपोर्टिव न्यूट्रिएंट शामिल करिए – जैसे नट्स, सीड्स और एग्स।

पांचवां: स्ट्रेस मैनेजमेंट जैसे प्राणायाम, मेडिटेशन इन सबको अपने डेली रूटीन का एक जरूरी हिस्सा बनाइए।


मुख्य बातें (Key Points)

  • भारत में 4.2 करोड़ लोग थायरॉइड डिसऑर्डर से पीड़ित
  • 46-54 साल की महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित
  • महिला:पुरुष अनुपात 5.5:1
  • 79% मामलों में ऑटोइम्यून अटैक पाया गया
  • आयोडीन सफिशिएंसी भी ऑटोइम्यून को ट्रिगर करती है
  • भारत में नेशनल स्क्रीनिंग गाइडलाइन नहीं

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: थायरॉइड टेस्ट कब करवाना चाहिए?

35 साल की उम्र के बाद हर 5 साल में TSH ब्लड टेस्ट जरूर करवाएं। प्रेगनेंसी प्लान करते समय या लगातार थकान महसूस होने पर भी टेस्ट करवाएं।

प्रश्न 2: महिलाओं को ज्यादा क्यों होता है?

हॉर्मोनल फ्लक्चुएशन, ऑटोइम्यून वनरेबिलिटी, प्रेगनेंसी और क्रॉनिक स्ट्रेस – ये सभी कारक महिलाओं को ज्यादा प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 3: क्या आयोडाइज्ड नमक से थायरॉइड हो सकता है?

आयोडीन की अधिकता भी थायरॉइड को ऑटोइम्यून अटैक के प्रति संवेदनशील बना सकती है। संतुलित मात्रा जरूरी है।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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