Supreme Court India vs America — बंद कमरों में एक फुसफुसाहट रेंग रही है, लेकिन इसे खुले आसमान तले कहने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा। वह फुसफुसाहट यह है कि अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को — जिन्हें पूरी दुनिया रोक नहीं पा रही थी — उन्हीं जजों ने रोक दिया जिनकी नियुक्ति खुद ट्रंप ने की थी। लेकिन भारत के सुप्रीम कोर्ट में, जहां जजों की नियुक्ति प्रधानमंत्री नहीं करते, वहां आज तक कोई फैसला सत्ता की नींव हिला नहीं पाया। यह तुलना सिर्फ दो देशों की अदालतों की नहीं है — यह लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तंभ की साख का सवाल है।
‘अमेरिका में ट्रंप के ही जजों ने ट्रंप को रोका — भारत में ऐसा क्यों नहीं?’
अमेरिका का सुप्रीम कोर्ट और भारत का सुप्रीम कोर्ट — दोनों लोकतंत्र के सबसे शक्तिशाली स्तंभ माने जाते हैं। लेकिन इन दोनों के बीच एक ऐसा फर्क उभरकर सामने आया है जो पूरी दुनिया को सोचने पर मजबूर कर रहा है। अमेरिका में जिन जजों की नियुक्ति ट्रंप के कार्यकाल में हुई, उन्हीं जजों ने ट्रंप के टैरिफ फैसलों को अवैध करार दे दिया। ट्रंप को शायद एहसास भी नहीं था कि उनके अपने नियुक्त किए गए जज उनके ही खिलाफ खड़े हो जाएंगे।
दूसरी तरफ भारत में जजों की नियुक्ति कॉलेजियम सिस्टम से होती है — प्रधानमंत्री इस प्रक्रिया में सीधे शामिल नहीं हैं। 2014-15 में सरकार ने प्रयास किया था कि एक ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट कमेटी बने जिसमें सरकार की भागीदारी हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया था। कॉलेजियम व्यवस्था इसीलिए बनाई गई थी ताकि सत्ता की मौजूदगी जजों की नियुक्ति में न हो। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब जजों की नियुक्ति में सरकार की कोई भूमिका नहीं है, तो फिर क्यों भारत के सुप्रीम कोर्ट का कोई भी बड़ा फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ता के खिलाफ नहीं गया?
‘महाराष्ट्र — सब कुछ गैरकानूनी, फिर भी सरकार चलती रहेगी’
इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए पिछले कुछ वर्षों के फैसलों पर नजर डालना जरूरी है। महाराष्ट्र में शिवसेना दो फाड़ हो गई। राज्यपाल की भूमिका को असंवैधानिक करार दे दिया गया। जिस तरीके से सरकार बनी, उसे पूरी तरह गैरकानूनी माना गया। लेकिन तमाम फैसले देने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा — “जो सरकार चल रही है, वो चलती रहेगी।” यानी सब कुछ असंवैधानिक, सब कुछ गैरकानूनी — लेकिन सत्ता पर कोई आंच नहीं आई।
यही कहानी इलेक्ट्रोरल बॉन्ड की भी है। सुप्रीम कोर्ट ने खुद कहा कि कॉर्पोरेट और सरकार का यह पूरा नेक्सस गैरकानूनी है। हजारों करोड़ की पॉलिटिकल फंडिंग हुई — कॉर्पोरेट को डराया गया, धमकाया गया, या फिर उन्होंने पैसा दिया और बदले में सरकार से काम करवाया। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी। लेकिन वो लगभग 16,000 करोड़ रुपये जो इस गैरकानूनी प्रक्रिया से राजनीतिक दलों तक पहुंचे — उनकी वापसी का कोई आदेश नहीं दिया गया। अगर वो फंडिंग गैरकानूनी थी, तो वो पैसा ब्लैक मनी है। और यही सरकार 2014 से ब्लैक मनी के खिलाफ अभियान चला रही है — पहली कैबिनेट बैठक में ही SIT बनाई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा — “पैसा वापस नहीं ले सकते।” यानी जो हो गया सो हो गया।
‘हिडनबर्ग से लेकर राफेल तक — हर बार सत्ता सुरक्षित’
शेयर बाजार में हिडनबर्ग रिपोर्ट के बाद अडानी के शेयरों को लेकर जो तूफान आया, उसमें एक दिन में 12 लाख करोड़ का हेरफेर हुआ। नियामक संस्था सेबी पर सीधे उंगली उठी। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने इंटरप्रिटेशन में सेबी की भूमिका पर सवाल खड़े किए। लेकिन अंत में फैसला क्या आया? सुप्रीम कोर्ट ने कहा — “सेबी को दरकिनार नहीं कर सकते। सेबी ही जांच करेगी।” वही सेबी जिसकी वजह से जांच बिगड़ी, उसी को फिर जांच सौंप दी गई।
राफेल डील के मामले में जब कीमतों को लेकर शोर मचा तो सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा — “कीमत तो बता दीजिए।” सरकार ने कहा — “यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला है। अगर कीमत बताई तो दुनिया को पता चल जाएगा कि राफेल में कौन-कौन से हथियार लगे हैं।” नेशनल सिक्योरिटी का कार्ड खेला गया और सुप्रीम कोर्ट ने कहा — “ठीक है, खामोशी बरतिए।”
‘पेगासस से लेकर बुलडोजर तक — सुओ मोटो लिया, फिर दबा दिया’
पेगासस जासूसी कांड में तो स्थिति और भी गंभीर थी। जासूसी किसकी हो रही थी? सुप्रीम कोर्ट के अपने जजों की, विपक्ष के नेताओं की, पत्रकारों की, सोशल एक्टिविस्ट्स की, यहां तक कि मंत्रियों की भी। जब सवाल उठा तो कमेटी बनाई गई। कमेटी ने बताया कि इस इक्विपमेंट का इस्तेमाल हो रहा है और सरकार की नीयत सही नहीं लगती। लेकिन एक बार फिर सरकार ने कहा — “इक्विपमेंट के बारे में बताने से नेशनल सिक्योरिटी का खतरा है।” और सुप्रीम कोर्ट ने मामला दबा दिया।
NEET परीक्षा लीक मामले में छात्रों का गुस्सा सड़कों पर उतरा तो सुप्रीम कोर्ट ने सुओ मोटो लिया। हर किसी ने सोचा अब न्याय मिलेगा। लेकिन झटके में सारी जांच ठंडे बस्ते में चली गई। बंगाल में एक डॉक्टर के साथ हुई घटना पर जब राजनीतिक उथल-पुथल मची, तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा — “हम सुओ मोटो लेंगे।” आंदोलन थम गए और फैसला काफूर हो गया।
बुलडोजर न्याय को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने खुले तौर पर कहा कि कोई भी सरकार अपने तौर पर बुलडोजर जस्टिस नहीं चला सकती। लेकिन इस फैसले के 25वें दिन ही बुलडोजर फिर चल पड़े — और आज तक नहीं रुके। सुप्रीम कोर्ट का फैसला हवाहवाई हो गया।
‘अरावली से लेकर CAA तक — चीफ जस्टिस बदले, फैसला पलट गया’
अरावली की पहाड़ियों को लेकर पूर्व चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ से पहले चीफ जस्टिस एस.आर. गवाई ने जाते-जाते जो फैसला दिया, उसने माइनिंग लॉबी की ताकत को उजागर कर दिया। पहाड़ की ऊंचाई कितनी होनी चाहिए, खनन कहां तक होना चाहिए — यह सब लिखा गया। लेकिन जब इस फैसले से राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भद्द पिटने लगी और पर्यावरण मंत्री भी कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं रहे, तो अगले चीफ जस्टिस ने वही फाइल खोलकर कहा — “वो फैसला सही नहीं था।” सुप्रीम कोर्ट पलट गया, लेकिन सरकार पर कोई आंच नहीं आई।
CAA (नागरिकता संशोधन कानून) को लेकर भी मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। जिसे राजनीतिक लाभ हो रहा था — यानी सत्ताधारी पक्ष — उसके अनुकूल फैसला आ गया। UGC के सीजों और आरक्षण के मुद्दे पर भी सुप्रीम कोर्ट ने बिना वक्त गंवाए झटके में फैसला दे दिया — वो भी सत्ता के अनुकूल।
‘चुनाव आयोग, ईडी, CAG — संस्थाएं कुंद, निगरानी गायब’
चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का मामला भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सवाल सीधा था — अगर प्रधानमंत्री ही चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करेंगे, तो वो सरकार से सवाल कैसे करेगा? एक नौकरशाह की फाइल 24 घंटे के भीतर पास हो गई — जबकि पहले ऐसी नियुक्तियों में छह-छह महीने लग जाते थे। सुप्रीम कोर्ट ने सब देखा, लेकिन कहा — “सरकार का फैसला सही है।”
ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) के डायरेक्टर को भारत के इतिहास में पहली बार तीन बार एक्सटेंशन दिया गया। यह मामला भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने खुद कहा — “ऐसा लगता है जैसे ईडी पॉलिटिकल मोटिवेशन से काम कर रही है। सजा की दर 1% से भी कम है।” लेकिन कहने के बावजूद — न ईडी पर कोई कार्रवाई हुई, न सरकार पर कोई आंच आई।
CAG (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की रिपोर्टें जो नियमित रूप से संसद में पेश होती थीं, वो अब क्यों गायब हो गईं? CVC (केंद्रीय सतर्कता आयोग) जो नौकरशाही पर निगरानी रखता था, उसकी भूमिका क्या रह गई है? ये सवाल भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे, लेकिन जवाब नहीं मिला।
‘EVM, SIR और वोटर लिस्ट — चुनावी प्रक्रिया पर सवाल’
ईवीएम को लेकर विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट में सबूत रखे और कहा कि चुनाव आयोग को दिशा-निर्देश दिए जाएं। भारत में लोकतंत्र का मतलब चुनाव ही है — और अगर चुनाव प्रक्रिया में ही गड़बड़ी हो रही हो तो सुप्रीम कोर्ट को कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन कोर्ट ने कहा — “चुनाव आयोग एक स्वायत्त संस्था है, हम उस पर रोक कैसे लगा सकते हैं?”
अब SIR (सिस्टमैटिक इलेक्टोरल रोल रिवीजन) और वोटर लिस्ट का मुद्दा सामने है। पूरे देश में नई वोटर लिस्ट तैयार हो रही है। इस नई व्यवस्था के तहत पहला चुनाव बिहार में हुआ — और परिणाम विपक्ष के लिए सबसे बुरा रहा जो आज तक कभी नहीं हुआ था। जिसकी लंबे अरसे से सत्ता थी, उसने सबसे ज्यादा सीटें हासिल कीं — यह भी इतिहास में पहली बार हुआ। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यहां भी आंखें नहीं खोलीं।
‘दर्जन भर से ज्यादा फैसले — सत्ता पर कभी आंच नहीं आई’
अगर एक साथ देखें तो तस्वीर साफ हो जाती है। महाराष्ट्र सरकार गठन, इलेक्ट्रोरल बॉन्ड, हिडनबर्ग-अडानी-सेबी, राफेल डील, पेगासस जासूसी, NEET लीक, बंगाल डॉक्टर केस, अरावली माइनिंग, बुलडोजर जस्टिस, CAA, UGC-आरक्षण, चुनाव आयुक्त नियुक्ति, ईडी एक्सटेंशन, EVM-SIR विवाद — दर्जन भर से ज्यादा मामलों की पूरी फहरिस्त है। सुप्रीम कोर्ट ने हर मामले में टिप्पणी की, कुछ को गैरकानूनी भी कहा, लेकिन कभी भी सत्ता और सरकार पर कोई असली आंच नहीं आने दी।
अमेरिका में ट्रंप द्वारा नियुक्त जजों ने कहा — “हम इस देश को खत्म नहीं होने देंगे। डेमोक्रेटिक वैल्यूज को खत्म होने नहीं देंगे। आप अकेले ऐसे अधिकारों से कभी लैस थे ही नहीं। संविधान आपको इजाजत देता ही नहीं।” भारत में जजों की नियुक्ति प्रधानमंत्री ने नहीं की — फिर भी किसी जज का कोई फैसला सत्ता की नींव हिला नहीं पाया। यही वो फुसफुसाहट है जो बंद कमरों में हो रही है।
‘लोकतंत्र के चारों स्तंभ — कौन बचा है खड़ा?’
भारत की संसदीय लोकतंत्र व्यवस्था में चार स्तंभ हैं — विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया। संवैधानिक चेक एंड बैलेंस की जो व्यवस्था है, उसमें निगरानी रखने वाला चौथा स्तंभ — मीडिया — लगभग गायब हो चुका है। नौकरशाही कुंद पड़ गई है। न्यायपालिका की भूमिका सत्तानुकूल दिखने लगी है। और सत्ता की ताकत इसी लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था की दुहाई देकर इतनी मजबूत हो चुकी है कि उसे रोक पाना — चाहे संसद के भीतर हो या बाहर, सुप्रीम कोर्ट के भीतर हो या बाहर — किसी के बूते की बात नहीं रह गई है।
संपादकों की जी-हजूरी, मीडिया मालिकों का खुद को मुनाफे में बदलने का खेल, नौकरशाहों की कतार — यह सब खुले तौर पर रेंग रहा है। BJP जो 2024 में 240 सीटों पर सिमट गई थी — जहां से 50 सीटें और कम होने की बात उठती है — वहां एकमात्र सुप्रीम कोर्ट ही है जो सत्ता और जनता के बीच खड़ा है। सवाल यह है कि क्या वो खड़ा रहेगा या झुक जाएगा।
मुख्य बातें (Key Points)
- अमेरिका में ट्रंप द्वारा नियुक्त जजों ने ही उनके टैरिफ को अवैध ठहराया — भारत में कॉलेजियम से नियुक्त जजों का कोई बड़ा फैसला सत्ता के खिलाफ नहीं गया।
- महाराष्ट्र, इलेक्ट्रोरल बॉन्ड, राफेल, पेगासस, NEET, बुलडोजर जस्टिस समेत दर्जन भर से ज्यादा मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सत्ता पर कभी आंच नहीं आने दी।
- ईडी को तीन बार एक्सटेंशन, चुनाव आयुक्त की 24 घंटे में नियुक्ति, CAG रिपोर्टों का गायब होना — संस्थाएं कुंद पड़ती जा रही हैं।
- लोकतंत्र के चारों स्तंभ — मीडिया गायब, नौकरशाही कुंद, न्यायपालिका सत्तानुकूल — यह फुसफुसाहट अब बंद कमरों से बाहर आने लगी है।













