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The News Air - Breaking News - फांसी की सजा बदलने की मांग पर Supreme Court का बड़ा फैसला

फांसी की सजा बदलने की मांग पर Supreme Court का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने फांसी को जहरीला टीका, गोली या गैस चैंबर से बदलने की जनहित याचिका खारिज की, सरकार को समीक्षा की छूट दी

Ajay Kumar by Ajay Kumar
मंगलवार, 18 अगस्त 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय
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Supreme Court
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Death Penalty India: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। देश में फांसी की सजा को लेकर चली आ रही मौजूदा व्यवस्था को बदलने की मांग करने वाली जनहित याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया। याचिका में मांग की गई थी कि फांसी पर लटकाने की जगह जहरीला इंजेक्शन, गोली मारना, इलेक्ट्रोक्यूशन या गैस चैंबर जैसे ‘कम दर्दनाक’ तरीके अपनाए जाएं।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने साफ किया कि अदालत को ऐसा कोई ठोस आधार नहीं मिला जिससे CrPC की धारा 354(5) या BNSS की धारा 393(5) की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार के लिए मामला बड़े बेंच के पास भेजा जाए। देखा जाए तो यह फैसला मौजूदा कानूनी व्यवस्था को बरकरार रखता है, लेकिन साथ ही भविष्य के लिए दरवाजा खुला भी छोड़ता है।

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2017 में दायर हुई थी याचिका

वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा ने साल 2017 में यह जनहित याचिका दायर की थी। उनका तर्क था कि फांसी की मौजूदा प्रक्रिया में लंबे समय तक दर्द होता है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘सम्मानजनक मौत के अधिकार’ का उल्लंघन करती है। याचिकाकर्ता ने विधि आयोग की 187वीं रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि अमेरिका के 50 में से 49 राज्यों में जहरीले इंजेक्शन (Lethal Injection) का इस्तेमाल किया जाता है।

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अगर गौर करें तो यह मामला सिर्फ सजा देने के तरीके तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानवाधिकार और कैदियों की गरिमा से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा है। याचिकाकर्ता का मानना था कि फांसी पर लटकाने में गर्दन टूटने और सांस रुकने की प्रक्रिया कई मिनट तक चल सकती है, जो अत्यधिक क्रूर है।

🔍 यह भी पढ़ें- Supreme Court CJP Protest: ‘समय बर्बाद न करो’, पुलिस कार्रवाई पर पिटीशन खारिज

केंद्र सरकार ने किया फांसी का बचाव

दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में फांसी की प्रक्रिया का जोरदार बचाव किया। सरकार की दलील थी कि फांसी सबसे सुरक्षित और तेज तरीका है। केंद्र ने तर्क दिया कि अगर जहरीला इंजेक्शन लगाने या गोली मारने की प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी हो जाए, तो वह और भी ज्यादा क्रूर और अमानवीय साबित हो सकती है।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि सरकार ने तकनीकी जटिलताओं की ओर इशारा किया। उदाहरण के लिए, लेटल इंजेक्शन में सही दवा की मात्रा और प्रशिक्षित कर्मचारियों की जरूरत होती है। अगर इंजेक्शन सही नस में नहीं लगा या दवा की मात्रा गलत हुई, तो कैदी को असहनीय पीड़ा हो सकती है।

अदालत ने सरकार को दी समीक्षा की आजादी

बेंच ने याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार मौजूदा तरीके की समीक्षा या विश्लेषण करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। अदालत ने सुझाव दिया कि अगर सरकार चाहे तो कानून, फोरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस और अपराध विज्ञान के विशेषज्ञों की कमेटी बनाकर मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा कर सकती है।

दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यह फैसला अंतिम नहीं है। अगर भविष्य में कोई ठोस वैज्ञानिक तथ्य सामने आते हैं, तो इस मुद्दे पर दोबारा विचार किया जा सकता है। इसका मतलब साफ है – अदालत ने मौजूदा व्यवस्था को बरकरार रखते हुए भी सुधार की गुंजाइश छोड़ी है।

कैदियों की गरिमा बनाए रखना जरूरी

बेंच ने अपने फैसले में कहा कि कैदियों की गरिमा को कायम रखते हुए बिना वजह दर्द को कम किया जाना चाहिए। यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाती है कि अदालत मानवीय पक्ष को नजरअंदाज नहीं कर रही है। समझने वाली बात है कि भले ही किसी को फांसी की सजा मिली हो, फिर भी उसके मानवाधिकार खत्म नहीं हो जाते।

वहीं, विधि आयोग की रिपोर्ट में भी इस बात का उल्लेख किया गया था कि दुनिया के कई देशों ने फांसी को खत्म कर अन्य तरीके अपनाए हैं। लेकिन भारतीय संदर्भ में, सरकार और अदालत दोनों ही सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।

क्या है CrPC की धारा 354(5)?

CrPC (दंड प्रक्रिया संहिता) की धारा 354(5) और अब BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 393(5) में फांसी की सजा देने का प्रावधान है। इसके तहत मृत्युदंड पाए दोषी को “गर्दन से लटकाकर मौत” (Death by Hanging) दी जाती है। यह धारा 1898 से चली आ रही है और अब तक इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है।

दुनिया में क्या है स्थिति?

अमेरिका के ज्यादातर राज्यों में लेटल इंजेक्शन का इस्तेमाल होता है, लेकिन वहां भी इस पर विवाद है। कई बार दवाओं की कमी और गलत तरीके से इंजेक्शन लगने के मामले सामने आए हैं। चीन में गोली मारकर फांसी दी जाती है, जबकि कुछ देशों में गैस चैंबर का उपयोग होता है। हालांकि, यूरोप के अधिकतर देशों ने मृत्युदंड को पूरी तरह समाप्त कर दिया है।

भारत में फांसी की सजा सिर्फ “दुर्लभतम मामलों” (Rarest of Rare Cases) में दी जाती है। निर्भया केस, 26/11 मुंबई हमला, और संसद हमला जैसे मामलों में फांसी की सजा दी गई।


मुख्य बातें (Key Points):

  • सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा बदलने की जनहित याचिका खारिज की
  • CrPC की धारा 354(5) और BNSS की धारा 393(5) की संवैधानिक वैधता बरकरार
  • केंद्र सरकार मौजूदा तरीके की स्वतंत्र रूप से समीक्षा कर सकती है
  • अदालत ने कहा – भविष्य में वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर पुनर्विचार संभव
  • विशेषज्ञ कमेटी बनाकर कैदियों की गरिमा बनाए रखते हुए सुधार हो सकते हैं

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: भारत में फांसी की सजा कब दी जाती है?

भारत में फांसी की सजा सिर्फ “दुर्लभतम मामलों” (Rarest of Rare Cases) में दी जाती है, जैसे कि बेहद क्रूर हत्या, आतंकवाद या राष्ट्रद्रोह के गंभीर मामलों में।

प्रश्न 2: फांसी के अलावा कौन-कौन से तरीके हैं मृत्युदंड के?

दुनिया में लेटल इंजेक्शन, गोली मारना, इलेक्ट्रोक्यूशन (बिजली का झटका), और गैस चैंबर जैसे तरीके अपनाए जाते हैं। भारत में सिर्फ फांसी की व्यवस्था है।

प्रश्न 3: क्या भारत में फांसी की सजा खत्म हो सकती है?

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा व्यवस्था बरकरार रखी है। हालांकि, अदालत ने कहा है कि भविष्य में ठोस वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर इस पर दोबारा विचार हो सकता है।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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