Death Penalty India: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। देश में फांसी की सजा को लेकर चली आ रही मौजूदा व्यवस्था को बदलने की मांग करने वाली जनहित याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया। याचिका में मांग की गई थी कि फांसी पर लटकाने की जगह जहरीला इंजेक्शन, गोली मारना, इलेक्ट्रोक्यूशन या गैस चैंबर जैसे ‘कम दर्दनाक’ तरीके अपनाए जाएं।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने साफ किया कि अदालत को ऐसा कोई ठोस आधार नहीं मिला जिससे CrPC की धारा 354(5) या BNSS की धारा 393(5) की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार के लिए मामला बड़े बेंच के पास भेजा जाए। देखा जाए तो यह फैसला मौजूदा कानूनी व्यवस्था को बरकरार रखता है, लेकिन साथ ही भविष्य के लिए दरवाजा खुला भी छोड़ता है।
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2017 में दायर हुई थी याचिका
वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा ने साल 2017 में यह जनहित याचिका दायर की थी। उनका तर्क था कि फांसी की मौजूदा प्रक्रिया में लंबे समय तक दर्द होता है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘सम्मानजनक मौत के अधिकार’ का उल्लंघन करती है। याचिकाकर्ता ने विधि आयोग की 187वीं रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि अमेरिका के 50 में से 49 राज्यों में जहरीले इंजेक्शन (Lethal Injection) का इस्तेमाल किया जाता है।
अगर गौर करें तो यह मामला सिर्फ सजा देने के तरीके तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानवाधिकार और कैदियों की गरिमा से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा है। याचिकाकर्ता का मानना था कि फांसी पर लटकाने में गर्दन टूटने और सांस रुकने की प्रक्रिया कई मिनट तक चल सकती है, जो अत्यधिक क्रूर है।
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केंद्र सरकार ने किया फांसी का बचाव
दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में फांसी की प्रक्रिया का जोरदार बचाव किया। सरकार की दलील थी कि फांसी सबसे सुरक्षित और तेज तरीका है। केंद्र ने तर्क दिया कि अगर जहरीला इंजेक्शन लगाने या गोली मारने की प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी हो जाए, तो वह और भी ज्यादा क्रूर और अमानवीय साबित हो सकती है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि सरकार ने तकनीकी जटिलताओं की ओर इशारा किया। उदाहरण के लिए, लेटल इंजेक्शन में सही दवा की मात्रा और प्रशिक्षित कर्मचारियों की जरूरत होती है। अगर इंजेक्शन सही नस में नहीं लगा या दवा की मात्रा गलत हुई, तो कैदी को असहनीय पीड़ा हो सकती है।
अदालत ने सरकार को दी समीक्षा की आजादी
बेंच ने याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार मौजूदा तरीके की समीक्षा या विश्लेषण करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। अदालत ने सुझाव दिया कि अगर सरकार चाहे तो कानून, फोरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस और अपराध विज्ञान के विशेषज्ञों की कमेटी बनाकर मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा कर सकती है।
दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यह फैसला अंतिम नहीं है। अगर भविष्य में कोई ठोस वैज्ञानिक तथ्य सामने आते हैं, तो इस मुद्दे पर दोबारा विचार किया जा सकता है। इसका मतलब साफ है – अदालत ने मौजूदा व्यवस्था को बरकरार रखते हुए भी सुधार की गुंजाइश छोड़ी है।
कैदियों की गरिमा बनाए रखना जरूरी
बेंच ने अपने फैसले में कहा कि कैदियों की गरिमा को कायम रखते हुए बिना वजह दर्द को कम किया जाना चाहिए। यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाती है कि अदालत मानवीय पक्ष को नजरअंदाज नहीं कर रही है। समझने वाली बात है कि भले ही किसी को फांसी की सजा मिली हो, फिर भी उसके मानवाधिकार खत्म नहीं हो जाते।
वहीं, विधि आयोग की रिपोर्ट में भी इस बात का उल्लेख किया गया था कि दुनिया के कई देशों ने फांसी को खत्म कर अन्य तरीके अपनाए हैं। लेकिन भारतीय संदर्भ में, सरकार और अदालत दोनों ही सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।
क्या है CrPC की धारा 354(5)?
CrPC (दंड प्रक्रिया संहिता) की धारा 354(5) और अब BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 393(5) में फांसी की सजा देने का प्रावधान है। इसके तहत मृत्युदंड पाए दोषी को “गर्दन से लटकाकर मौत” (Death by Hanging) दी जाती है। यह धारा 1898 से चली आ रही है और अब तक इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है।
दुनिया में क्या है स्थिति?
अमेरिका के ज्यादातर राज्यों में लेटल इंजेक्शन का इस्तेमाल होता है, लेकिन वहां भी इस पर विवाद है। कई बार दवाओं की कमी और गलत तरीके से इंजेक्शन लगने के मामले सामने आए हैं। चीन में गोली मारकर फांसी दी जाती है, जबकि कुछ देशों में गैस चैंबर का उपयोग होता है। हालांकि, यूरोप के अधिकतर देशों ने मृत्युदंड को पूरी तरह समाप्त कर दिया है।
भारत में फांसी की सजा सिर्फ “दुर्लभतम मामलों” (Rarest of Rare Cases) में दी जाती है। निर्भया केस, 26/11 मुंबई हमला, और संसद हमला जैसे मामलों में फांसी की सजा दी गई।
मुख्य बातें (Key Points):
- सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा बदलने की जनहित याचिका खारिज की
- CrPC की धारा 354(5) और BNSS की धारा 393(5) की संवैधानिक वैधता बरकरार
- केंद्र सरकार मौजूदा तरीके की स्वतंत्र रूप से समीक्षा कर सकती है
- अदालत ने कहा – भविष्य में वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर पुनर्विचार संभव
- विशेषज्ञ कमेटी बनाकर कैदियों की गरिमा बनाए रखते हुए सुधार हो सकते हैं













