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The News Air - Breaking News - Stock Market Crash: 72 घंटों में ₹15 लाख करोड़ डूबे, सरकार खामोश!

Stock Market Crash: 72 घंटों में ₹15 लाख करोड़ डूबे, सरकार खामोश!

रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर पर, SBI को भी लिक्विडिटी संकट, आखिर क्या हो रहा है भारत की Economy में?

The News Air Team by The News Air Team
बुधवार, 21 जनवरी 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, बिज़नेस, स्पेशल स्टोरी
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Stock Market Crash
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India Stock Market Crash 2025 : भारत के शेयर बाजार में पिछले 72 घंटों में ऐसा तूफान आया कि निवेशकों की नींद उड़ गई। सोमवार से लेकर बुधवार तक बाजार लगातार गिरता रहा और इस गिरावट में तकरीबन ₹15 लाख करोड़ का पैसा स्वाहा हो गया। यह पैसा उन 13.7 करोड़ छोटे-बड़े निवेशकों का है जो यूपी, बिहार, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से शेयर बाजार में अपना भविष्य देखते हैं।

इतना ही नहीं, डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया भी धड़ाम से गिरकर 91.73 पैसे पर आ गया। यह अब तक का सबसे निचला स्तर है। पूरे एशिया में किसी भी देश की करेंसी इतनी बुरी हालत में नहीं है जितनी भारत की। एक दिन में ही रुपया 76 पैसे नीचे गिर गया जिसका सीधा मतलब है कि जो लोग विदेश में पैसा भेजते हैं, बच्चों को पढ़ाई के लिए भेजते हैं या कोई भी इंटरनेशनल लेनदेन करते हैं उनकी जेब पर अब और भारी बोझ पड़ेगा।

सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि देश का सबसे बड़ा और भरोसेमंद बैंक State Bank of India (SBI) भी इस वक्त मुश्किल में है। बैंक के पास पर्याप्त नकदी नहीं बची है इसलिए उसे बाजार से ₹6000 करोड़ उठाने पड़ रहे हैं। जब देश का सबसे बड़ा बैंक ही संकट में हो तो आम आदमी के मन में यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर उसका पैसा कितना सुरक्षित है।

इन सारी उथलपुथल के बीच सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि सरकार की तरफ से पूर्ण खामोशी है। न प्रधानमंत्री कुछ बोले, न वित्त मंत्री कुछ बोलीं और न ही कॉमर्स मिनिस्टर। जिस देश के प्रधानमंत्री ने कभी गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए रुपये की गिरावट पर आग बबूला होकर सवाल पूछे थे, आज वही प्रधानमंत्री चुप हैं जबकि हालात उस वक्त से कहीं ज्यादा खराब हैं।


शेयर बाजार में भूचाल कैसे आया?

बीएमसी चुनाव के नतीजे आए और BJP (भारतीय जनता पार्टी) जीत गई। शनिवार और रविवार को बाजार बंद रहा। लेकिन जैसे ही सोमवार को बाजार खुला, सेंसेक्स और निफ्टी दोनों लाल निशान में खुले और फिर लगातार गिरते ही चले गए।

पहले दिन गिरावट आई तो लोगों ने सोचा शायद सुधर जाएगा। दूसरे दिन और गिरा तो चिंता बढ़ी। तीसरे दिन भी गिरावट जारी रही तो हाहाकार मच गया।

इन 72 घंटों में जो पैसा डूबा वह कोई छोटी मोटी रकम नहीं है। ₹15 लाख करोड़ का मतलब समझिए। यह रकम इतनी बड़ी है कि इससे कई छोटे देशों का पूरा साल का बजट चल सकता है।


2024 के चुनाव वाला खेल याद है?

पिछले साल लोकसभा चुनाव के वक्त भी कुछ ऐसा ही हुआ था। एग्जिट पोल में बीजेपी को भारी बहुमत मिलने की भविष्यवाणी हुई तो शेयर बाजार उछल गया। लेकिन जब असली नतीजे आए और बीजेपी को उम्मीद से कम सीटें मिलीं तो बाजार धड़ाम से गिर गया।

सिर्फ दो दिनों के अंदर ₹12 से ₹15 लाख करोड़ का खेल हो गया। कोई कमा गया, कोई डूब गया। जो बड़े खिलाड़ी हैं उन्हें पहले से पता होता है कि बाजार कब गिरेगा और कब उठेगा। मार तो उस आम निवेशक को पड़ती है जो अपनी मेहनत की कमाई लगाकर बैठा होता है।


रुपये की ऐसी दुर्गति पहले कभी नहीं हुई

भारतीय रुपया आज डॉलर के मुकाबले जहां खड़ा है वहां पहले कभी नहीं था। 91.73 पैसे का मतलब है कि अगर आप आज एक डॉलर खरीदने जाएंगे तो आपको लगभग 92-93 रुपये देने होंगे।

सोचिए जब प्रधानमंत्री मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब रुपया 58-59 पर था और उन्होंने गुस्से में कहा था कि यह कैसे हो सकता है कि हिंदुस्तान का रुपया इतना पतला हो जाए। उन्होंने सवाल किया था कि नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका की करेंसी नहीं गिरती तो भारत की क्यों गिर रही है।

आज वही रुपया 91.73 पर है। लगभग 35 रुपये और गिर गया। लेकिन अब कोई सवाल नहीं पूछ रहा। जो गुस्सा तब था वह अब खामोशी में बदल गया है।


विदेशी निवेशक क्यों भाग रहे हैं?

शेयर बाजार में एक सीधा फंडा है। जब रुपया कमजोर होता है तो विदेशी निवेशकों को डॉलर में जो मुनाफा मिलता है वह कम हो जाता है। इसलिए वे पैसा निकालना शुरू कर देते हैं।

नवंबर के महीने में विदेशी निवेशकों ने ₹17,500 करोड़ के शेयर बेच दिए। दिसंबर में यह रकम दोगुनी होकर ₹34,350 करोड़ हो गई। जनवरी अभी खत्म भी नहीं हुआ और पहले ही ₹31,000 करोड़ से ज्यादा निकल चुके हैं।

दूसरी तरफ घरेलू निवेशक पैसा लगा रहे हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि खरीदार कम हैं और बेचने वाले ज्यादा। बाजार में भरोसा ही नहीं बचा है।


SBI की हालत देखकर डर लग रहा है

देश का सबसे बड़ा बैंक जब मुश्किल में हो तो आम आदमी को डर लगना स्वाभाविक है। SBI को लिक्विडिटी यानी नकदी की कमी हो गई है। इसलिए बैंक ने सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट के जरिए बाजार से ₹6000 करोड़ उठाने का फैसला किया है। इसके लिए बैंक 6% ब्याज दे रहा है।

इसका सीधा मतलब है कि जनता का पैसा जो बैंक में जमा है उसके बदले बैंक को बाहर से और पैसा लेना पड़ रहा है।

इसी बीच एक और खबर आई है जो सोचने पर मजबूर करती है। SBI की म्यूचुअल फंड यूनिट ने Adani Power के ₹7511 करोड़ के बॉन्ड खरीदने का फैसला किया है। यानी जनता का पैसा जो SBI में जमा है वह म्यूचुअल फंड के रास्ते अडानी समूह की कंपनियों में जा रहा है।


विदेश से पैसा आना बंद हो गया

भारत में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश यानी FDI की हालत तो और भी खराब है। 2020 में जब पूरी दुनिया कोविड से जूझ रही थी तब भी भारत में 44 बिलियन डॉलर का FDI आया था।

लेकिन 2024 में यह घटकर सिर्फ 10 बिलियन डॉलर रह गया। और 2025 में तो हद ही हो गई। अब यह मात्र 1 बिलियन डॉलर पर आ गया है। 44 बिलियन से 1 बिलियन यानी 44 गुना गिरावट।

जबकि इसी दौरान चीन, वियतनाम और मेक्सिको में रिकॉर्ड स्तर पर FDI जा रहा है। दुनिया के निवेशक वहां जा रहे हैं जहां प्रोडक्शन है और भारत से दूर भाग रहे हैं।


व्यापार में भी भारी घाटा

भारत जितना माल विदेश भेज रहा है उससे कहीं ज्यादा बाहर से मंगा रहा है। इस अंतर को व्यापार घाटा कहते हैं और यह अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है।

सिर्फ चीन के साथ व्यापार घाटा अरबों डॉलर का है। पूरी दुनिया को जोड़ें तो यह आंकड़ा 500 बिलियन डॉलर के करीब पहुंच रहा है।

इसका असर यह है कि एक्सपोर्ट न होने से रोजगार खत्म हो रहे हैं। अमेरिका के साथ टैरिफ का विवाद चल रहा है जिसके कारण तकरीबन 80 लाख लोगों की नौकरियां खतरे में हैं।


RBI गवर्नर क्या कह रहे हैं?

Reserve Bank of India (RBI) के गवर्नर ने एक बयान दिया जो सुनने में अजीब लगता है। उन्होंने कहा कि करेंसी के एक्सचेंज रेट से देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती नहीं आंकनी चाहिए।

उनका कहना है कि भारत में ग्रोथ अच्छी है, महंगाई कम है, वित्तीय स्थिरता है और निवेश भी स्वस्थ है।

लेकिन सवाल यह है कि अगर सब कुछ इतना अच्छा है तो रुपया क्यों धड़ाम से गिर रहा है। शेयर बाजार क्यों डूब रहा है। FDI क्यों भाग रहा है। बैंकों में लिक्विडिटी क्यों नहीं है।


रूस से सस्ता तेल लिया तो फायदा किसे मिला?

भारत ने रूस से बाजार भाव से 30% सस्ते में कच्चा तेल खरीदना शुरू किया। जब दुनिया में तेल $100 प्रति बैरल था तब भी भारत को $60-65 में मिल रहा था।

आज भी कच्चा तेल $64 प्रति बैरल है जो पहले की तुलना में काफी सस्ता है। लेकिन इसका फायदा भारत की जनता को नहीं मिला। पेट्रोल और डीजल के दाम जस के तस हैं। तो यह सस्ता तेल का फायदा गया कहां? यह सवाल कोई नहीं पूछ रहा।

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सोना और चांदी आसमान पर

जब बाजार में अनिश्चितता होती है तो लोग सोने और चांदी में पैसा लगाते हैं। यही हो रहा है। सोना अब 10 ग्राम का ₹1.5 लाख पार कर गया है। चांदी प्रति किलो ₹3 लाख से ऊपर निकल गई है।

रियल्टी सेक्टर, IT सेक्टर, बैंकिंग सेक्टर, ऑटो सेक्टर, मीडिया के शेयर सब नीचे जा रहे हैं। कोई भी रिस्क लेने को तैयार नहीं है।


15,000 से ज्यादा छोटे उद्योग बंद हो गए

इस देश में पिछले साल 15,000 से ज्यादा MSME यानी छोटे और मझोले उद्योग बंद हो गए। IT कंपनियां नौकरियां दे नहीं रहीं बल्कि छंटनी कर रहीं। जो नौकरी है वह जा रही है और नई नौकरी मिल नहीं रही। हाथ में डिग्री है लेकिन काम नहीं है। यह हाल है इस देश के नौजवानों का।


टैक्स देने वाले का पैसा कहां जा रहा है?

एक अर्थशास्त्री ने बड़ी सच्ची बात कही है। उन्होंने बताया कि इस देश का हर टैक्सपेयर कम से कम 100 से 1000 लोगों को खिला रहा है। सरकार की सारी लाभार्थी योजनाएं टैक्सपेयर के पैसे से चलती हैं। लाभार्थी को पैसा मिलता है, वह वोट देता है, सरकार बनती है और फिर कॉर्पोरेट को फायदा पहुंचाया जाता है।

लेकिन टैक्सपेयर को क्या मिल रहा है? शुद्ध पानी नहीं, साफ हवा नहीं, अच्छी शिक्षा नहीं, अच्छी स्वास्थ्य सेवा नहीं। सब कुछ बदहाल है।


चुनाव जीतो तो भी बाजार गिरता है

एक अजीब पैटर्न देखने को मिल रहा है। पहले ऐसा होता था कि बीजेपी जीतती थी तो शेयर बाजार खुश होकर ऊपर जाता था। अब उल्टा हो रहा है।

2024 के लोकसभा चुनाव में 8 लाख करोड़ डूबे। महाराष्ट्र में बीजेपी जीती तो ढाई लाख करोड़ डूबे। बिहार, हरियाणा और दिल्ली के चुनावों में भी बाजार डूबा। अब BMC चुनाव के बाद 15 लाख करोड़ डूबे। बाजार का यह व्यवहार बहुत कुछ बयां करता है।


बजट आने वाला है, क्या होगा?

1 फरवरी को केंद्रीय बजट पेश होने वाला है। इस बार का बजट 50-55 लाख करोड़ का होने का अनुमान है। इसमें से 45 लाख करोड़ से ज्यादा टैक्सपेयर का पैसा होगा। देखना यह है कि यह पैसा कहां खर्च होगा। जनता को राहत मिलेगी या फिर वही पुराना खेल चलता रहेगा।


क्या है पूरा मामला?

भारत का शेयर बाजार एक तरह से इस देश की राजनीति का थर्मामीटर है। यह बताता है कि सत्ता की बाजार पर कितनी पकड़ है और बाजार से जुड़े बड़े खिलाड़ी सत्ता पर कितने निर्भर हैं।

जब एग्जिट पोल और चुनाव परिणाम के बीच ₹12-15 लाख करोड़ का खेल हो जाता है तो समझ लीजिए कि कहीं कुछ गड़बड़ है। SEBI (Securities and Exchange Board of India) जैसी संस्थाओं पर भी सवाल उठ रहे हैं।

आज जब RBI गवर्नर कह रहे हैं कि करेंसी से इकॉनमी मत आंकिए तो वित्त मंत्री, कॉमर्स मिनिस्टर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सब खामोश हैं। यह खामोशी बहुत कुछ बयां करती है।


मुख्य बातें (Key Points)
  • बाजार में भूचाल: 72 घंटों में शेयर बाजार से ₹15 लाख करोड़ डूबे और रुपया 91.73 पैसे के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया।
  • SBI भी मुश्किल में: देश के सबसे बड़े बैंक को लिक्विडिटी संकट है और ₹6000 करोड़ बाहर से उठाने पड़ रहे हैं।
  • विदेशी पैसा गायब: FDI 44 बिलियन डॉलर से घटकर मात्र 1 बिलियन डॉलर रह गया है और 15,000 से ज्यादा छोटे उद्योग बंद हो गए।
  • सरकार खामोश: जो प्रधानमंत्री कभी रुपये की गिरावट पर गुस्सा होते थे आज पूर्ण चुप्पी साधे हुए हैं।

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सवाल: शेयर बाजार 2025 में क्यों गिर रहा है?

जवाब: विदेशी निवेशक भारी मात्रा में पैसा निकाल रहे हैं। रुपये में गिरावट, वैश्विक अनिश्चितता और अमेरिका की टैरिफ नीतियों के कारण बाजार में बिकवाली का दबाव है।

सवाल: डॉलर के मुकाबले रुपया कितना गिर गया है?

जवाब: रुपया डॉलर के मुकाबले 91.73 पैसे के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया है। बैंक से एक्सचेंज करते समय यह 93 रुपये तक जा सकता है।

सवाल: SBI में लिक्विडिटी संकट का क्या मतलब है?

जवाब: इसका मतलब है कि देश के सबसे बड़े बैंक के पास पर्याप्त नकदी नहीं बची है। इसलिए बैंक को बाजार से ₹6000 करोड़ उधार लेने पड़ रहे हैं।

सवाल: भारत में FDI क्यों घट रहा है?

जवाब: 2020 में FDI 44 बिलियन डॉलर थी जो 2025 में घटकर 1 बिलियन डॉलर रह गई। निवेशकों का भरोसा कम होना, प्रोडक्शन की लागत बढ़ना और कोर सेक्टर में गिरावट इसके मुख्य कारण हैं।

सवाल: क्या सरकार इस संकट पर कोई कदम उठा रही है?

जवाब: अभी तक प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और कॉमर्स मिनिस्टर ने इस मुद्दे पर कोई बयान नहीं दिया है। सिर्फ RBI गवर्नर ने कहा है कि करेंसी से इकॉनमी नहीं आंकनी चाहिए।

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