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The News Air - Breaking News - Supreme Court: ‘खराब स्वास्थ्य में हिरासत’ Sonam Wangchuk के डिटेंशन पर सरकार को दिया यह सुझाव

Supreme Court: ‘खराब स्वास्थ्य में हिरासत’ Sonam Wangchuk के डिटेंशन पर सरकार को दिया यह सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा- क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की 5 महीने की NSA हिरासत पर दोबारा सोचें, सेहत खराब होने की रिपोर्ट

The News Air Team by The News Air Team
गुरूवार, 5 फ़रवरी 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय
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Sonam Wangchuk
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Supreme Court Sonam Wangchuk: सुप्रीम कोर्ट ने लद्दाख के क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की सेहत और नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत लंबी हिरासत को लेकर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्या वह 26 सितंबर 2025 के डिटेंशन ऑर्डर के पांच महीने बाद और मेडिकल रिपोर्ट्स में सेहत “अच्छी नहीं” बताए जाने के बीच उनकी प्रिवेंटिव डिटेंशन पर “दोबारा सोच” सकती है। 4 फरवरी 2026 को हुई सुनवाई में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज से कहा कि वे कानूनी तकनीकी बातों से हटकर इस मामले पर सोचें।

यह सुनवाई वांगचुक की पत्नी डॉ. गीतांजलि अंगमो द्वारा दायर हेबियस कॉर्पस याचिका पर हो रही थी। इस याचिका में वांगचुक की प्रिवेंटिव डिटेंशन को चुनौती दी गई है। सरकार ने राहत देने का विरोध किया और वांगचुक के कथित “भड़काऊ” भाषणों को 24 सितंबर 2025 को लेह में हुई हिंसा का कारण बताया, जिसमें चार लोगों की मौत हुई और 150 से ज्यादा लोग घायल हुए।

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज से कहा, “दलीलें, काउंटर दलीलें और कानूनी बिंदुओं से हटकर, कोर्ट के एक ऑफिसर के तौर पर इस पर जरा सोचिए। डिटेंशन ऑर्डर 26 सितंबर 2025 को पास हुआ था। करीब पांच महीने हो चुके हैं। डिटेनी यानी सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य को देखते हुए, जो निश्चित तौर पर अच्छी नहीं है – हमने जो रिपोर्ट पहले देखी थी उससे भी पता चलता है कि उनकी सेहत ठीक नहीं है। उम्र से जुड़ी कुछ समस्याएं हो सकती हैं या कुछ और भी। क्या सरकार के पास इस पर दोबारा सोचने, फिर से मामले को देखने की कोई संभावना है?”

जवाब में एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि वह यह सुझाव अथॉरिटीज के सामने रखेंगे। यह एक महत्वपूर्ण क्षण था जब सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर सरकार से वांगचुक की हिरासत पर पुनर्विचार करने को कहा।

सरकार ने वांगचुक पर क्या आरोप लगाए?

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने दलील दी कि पिछले साल लेह में हुई हिंसा के लिए वांगचुक जिम्मेदार थे। उन्होंने कहा, “इस घटना में चार लोगों की मौत हुई, 161 लोग घायल हुए। आखिरकार उनके भड़काऊ भाषण, उकसावे, बहकाने की वजह से किसी शख्स का खुद सक्रिय रूप से हिस्सा लेना जरूरी नहीं है। अगर कोई शख्स एक ग्रुप को प्रभावित करने का झुकाव रखता है तो यही प्रिवेंटिव डिटेंशन के लिए काफी है।”

सरकार ने आरोप लगाया कि वांगचुक ने अरब स्प्रिंग, जेन जेड विद्रोह और केंद्र के बारे में “हम बनाम वो” जैसी भाषा का इस्तेमाल किया। केंद्र सरकार और लेह एडमिनिस्ट्रेशन ने 2 फरवरी को दावा किया कि सोनम वांगचुक चाहते थे कि यूनियन टेरिटरी लद्दाख में नेपाल और बांग्लादेश जैसे एजिटेशन और हिंसा हो।

सरकार ने आगे आरोप लगाया कि वांगचुक ने केंद्र सरकार को “देम” यानी “वो” कहा, जिससे अलगाववादी रुझान दिखते हैं। उन्होंने युवाओं को सिविल वॉर में शामिल होने के लिए उकसाया। सरकार ने कोर्ट से कहा, “सोनम वांगचुक केंद्र सरकार को ‘देम’ यानी ‘वो’ कहते हैं। यही ‘अस’ यानी ‘हम’ और ‘देम’ यानी ‘वो’ एनएसए के तहत हिरासत में लिए जाने के लिए काफी है। कोई ‘हम और वो’ नहीं है, हम सब भारतीय हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी सवाल उठाए

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि मौजूदा केस में सिर्फ हिरासत में लिए जाने के आदेश को ही चुनौती दी गई है। उन्होंने बताया कि डिटेंशन आदेश को 3 अक्टूबर 2025 को राज्य सरकार की मंजूरी मिल गई थी और अप्रूवल ऑर्डर या राज्य सरकार के कंफर्मेशन ऑर्डर को चुनौती नहीं दी गई है। उन्होंने यह भी कहा कि एडवाइजरी बोर्ड ने वांगचुक की हिरासत पर अपनी रिपोर्ट दे दी है।

इस पर कोर्ट ने पूछा, “क्या कंफर्मेशन ऑर्डर या एडवाइजरी बोर्ड की रिपोर्ट को चुनौती दिए बिना डिटेंशन को चुनौती नहीं दी जा सकती? मान लेते हैं कि एनएसए कानून के सेक्शन 3, 4 और 12 के आदेशों को चुनौती नहीं दी गई है। लेकिन अगर मूल डिटेंशन ऑर्डर ही कानूनन अभावों से ग्रस्त है तो क्या उसे रद्द नहीं किया जा सकता?”

कोर्ट ने आगे कहा कि डिटेंशन ऑर्डर को चुनौती सही तरह से माइंड लगाए बिना उसे पास करने के आधार पर दी गई है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की दलीलें हिरासत में लिए जाने के आदेश की बुनियाद पर ही सवाल उठा रही हैं।

प्रिवेंटिव डिटेंशन पर बहस

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि एनएसए एक स्पेशल एक्ट है, एक खास कानून और इसके तहत हिरासत में लिए जाने को दंडात्मक कानून नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा, “यह सिर्फ प्रिवेंटिव कानून है। इसका मकसद किसी को पब्लिक ऑर्डर या शासन की सुरक्षा के खिलाफ किसी भी तरह से काम करने से रोकना है। प्रिवेंटिव डिटेंशन प्यूनिटिव डिटेंशन नहीं है। लाजमी तौर पर जो अथॉरिटी इसे पास कर रही है, उसे उसी के विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए। यह पूरी तरह उन्हीं के विवेक पर निर्भर करता है।”

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इससे इंकार करते हुए कहा कि विवेक कानून के पैमानों के अंदर होना चाहिए। बेंच ने कहा, “अगर कोई कहे कि मुझे वह संभावित खतरा लगता है और इसलिए मैं उसे हिरासत में ले लेता हूं, तो सिर्फ इतना काफी नहीं है।”

यह टिप्पणी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इस बात पर सवाल उठाती है कि क्या सिर्फ “संभावित खतरे” की धारणा या पुलिस की सिफारिश को कॉपी-पेस्ट करना ही डिटेंशन को जायज ठहराने के लिए काफी है। कोर्ट ने संकेत दिया कि अगर मूल एनएसए आदेश में ही माइंड का सही इस्तेमाल नहीं हुआ है, तो उसे रद्द किया जा सकता है, भले ही बाद की मंजूरी और एडवाइजरी बोर्ड की पुष्टि को अलग से चुनौती न दी गई हो।

लद्दाख स्टेटहुड की मांग और प्रदर्शन

यह पूरा मामला सितंबर 2025 में हुए प्रोटेस्ट को लेकर है। इसी के बाद वांगचुक को एनएसा के तहत हिरासत में लिया गया था। यह प्रदर्शन यूनियन टेरिटरी लद्दाख के लिए स्टेटहुड यानी पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने और सिक्स्थ शेड्यूल स्टेटस की मांग को लेकर हुए थे।

डिटेंशन के खिलाफ पिछले महीने दलील दी गई थी कि वांगचुक को सरकार की आलोचना करने और विरोध दर्ज कराने का लोकतांत्रिक अधिकार है। ऐसे विचार शासन की सुरक्षा के लिए कोई खतरा नहीं हैं, जिनके आधार पर उन्हें हिरासत में रखा जाए।

यह मामला इस बात की परीक्षा बन गया है कि “प्रिवेंटिव” कानून कहां तक जा सकते हैं – क्या लद्दाख के लिए स्टेटहुड और सिक्स्थ शेड्यूल स्टेटस की मांग को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना जा सकता है या यह संरक्षित लोकतांत्रिक असहमति है।

डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट की भूमिका पर सवाल

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि उनके सामने रखे गए अलग-अलग मटेरियल्स के आधार पर डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट संतुष्ट हुए और डिटेंशन ऑर्डर पास कर दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से साफ है कि कोर्ट यह जानना चाहता है कि क्या डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट ने स्वतंत्र रूप से अपना दिमाग लगाया या सिर्फ पुलिस की सिफारिश को मंजूर कर दिया।

यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रिवेंटिव डिटेंशन जैसे गंभीर कदम के लिए अथॉरिटी को स्वतंत्र रूप से सोचना और फैसला लेना जरूरी है, न कि सिर्फ किसी और की सिफारिश को कॉपी-पेस्ट करना।

वांगचुक की सेहत पर चिंता

सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश मेडिकल रिपोर्ट में बताया गया कि वांगचुक की सेहत “अच्छी नहीं” है। कोर्ट ने कहा कि उम्र से जुड़ी कुछ समस्याएं हो सकती हैं या कुछ और भी। यह चिंता इसलिए भी गंभीर है क्योंकि वांगचुक पांच महीने से हिरासत में हैं और उनकी सेहत लगातार खराब हो रही है।

कोर्ट ने मानवीय आधार पर सरकार से यह सुझाव दिया कि वह इस मामले पर दोबारा सोचे। यह एक दुर्लभ क्षण था जब सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी तकनीकी बातों से हटकर मानवीय पहलू पर जोर दिया।

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लोकतांत्रिक असहमति बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा

यह मामला एक बड़े सवाल को उठाता है – क्या लोकतांत्रिक असहमति को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना जा सकता है? वांगचुक ने लद्दाख के लिए स्टेटहुड और सिक्स्थ शेड्यूल की मांग की थी, जो एक वैध लोकतांत्रिक मांग है। लेकिन सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताकर उन्हें एनएसए के तहत हिरासत में ले लिया।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से लगता है कि कोर्ट इस बात को लेकर सतर्क है कि प्रिवेंटिव डिटेंशन कानूनों का इस्तेमाल लोकतांत्रिक असहमति को दबाने के लिए न किया जाए। कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ “संभावित खतरे” की धारणा काफी नहीं है, बल्कि ठोस आधार होने चाहिए।

आगे क्या होगा?

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट के सुझाव को अथॉरिटीज के सामने रखेंगे। अब देखना होगा कि सरकार वांगचुक की हिरासत पर दोबारा सोचती है या नहीं। इस मामले में अगली सुनवाई में सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।

यह मामला न केवल सोनम वांगचुक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र में असहमति के अधिकार और प्रिवेंटिव डिटेंशन कानूनों की सीमाओं का भी सवाल है। सुप्रीम कोर्ट की इस मामले में भूमिका यह तय करेगी कि क्या लोकतांत्रिक मांगों को राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे के रूप में ब्रांड किया जा सकता है या नहीं।

मुख्य बातें (Key Points)
  • सुप्रीम कोर्ट ने सोनम वांगचुक की खराब सेहत को देखते हुए केंद्र सरकार से उनकी हिरासत पर दोबारा सोचने को कहा
  • वांगचुक को 26 सितंबर 2025 से एनएसए के तहत हिरासत में रखा गया है, अब पांच महीने हो चुके हैं
  • सरकार ने आरोप लगाया कि वांगचुक के भड़काऊ भाषणों से लेह में हिंसा हुई जिसमें चार लोगों की मौत और 161 लोग घायल हुए
  • सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि क्या सिर्फ “संभावित खतरे” की धारणा डिटेंशन के लिए काफी है
  • कोर्ट ने कहा कि अगर मूल डिटेंशन ऑर्डर में ही माइंड का सही इस्तेमाल नहीं हुआ तो उसे रद्द किया जा सकता है
  • यह मामला लद्दाख के लिए स्टेटहुड और सिक्स्थ शेड्यूल की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन से जुड़ा है
  • एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट का सुझाव अथॉरिटीज के सामने रखेंगे
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