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The News Air - Breaking News - Sarthak PDS: 25,000 करोड़ से राशन क्रांति, 80 करोड़ लोगों की जिंदगी बदलेगी

Sarthak PDS: 25,000 करोड़ से राशन क्रांति, 80 करोड़ लोगों की जिंदगी बदलेगी

AI और डेटा एनालिटिक्स से सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बड़ा बदलाव, कैबिनेट ने दी मंजूरी, फर्जी राशन कार्ड की होगी छुट्टी, जानें पूरा खाका

Ajay Kumar by Ajay Kumar
शनिवार, 30 मई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, काम की बातें, बिज़नेस
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Sarthak PDS
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Sarthak PDS Cabinet Approval ने भारत की कल्याणकारी व्यवस्था में एक नए युग की शुरुआत का संकेत दिया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹25,000 करोड़ की लागत से एक महत्वाकांक्षी परियोजना को मंजूरी दी है जिसका नाम है ‘सार्थक PDS’ (Systematic, Adaptive, Real-time, Technology-enabled, Holistic and Kisan-centric Public Distribution System)।

यह केवल राशन बांटने के तरीके में बदलाव नहीं है। देखा जाए तो यह भारत के वेलफेयर आर्किटेक्चर का एक संरचनात्मक सुधार है जो 80 करोड़ लोगों के जीवन को सीधे प्रभावित करेगा। दिलचस्प बात यह है कि यह परियोजना आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा एनालिटिक्स और रियल-टाइम मॉनिटरिंग के माध्यम से दशकों पुरानी समस्याओं – चोरी, भ्रष्टाचार, फर्जी लाभार्थी और सप्लाई चेन लीकेज – का समाधान करने का दावा करती है।

🔍 यह भी पढ़ें- Fortified Rice Ban Bihar: राशन कार्ड धारकों को अब नहीं मिलेगा फोर्टिफाइड चावल

PDS क्या है? दुनिया का सबसे बड़ा फूड सिक्योरिटी नेटवर्क

पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (PDS) या सार्वजनिक वितरण प्रणाली केवल एक सरकारी योजना नहीं है। यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (National Food Security Act) के तहत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य सुरक्षा नेटवर्क है।

कितने लोग निर्भर हैं?

  • भारत की 65-70% आबादी (लगभग 80 करोड़ लोग)
  • देश भर में लगभग 5 लाख राशन की दुकानें
  • हर महीने करोड़ों टन अनाज का वितरण

अगर गौर करें तो यह सामाजिक स्थिरता का एक बीमा है। अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो PDS गरीबी, कुपोषण और सामाजिक अशांति के खिलाफ भारत की पहली रक्षा पंक्ति है।

समझने वाली बात यह है कि अगर इस सिस्टम में छोटी सी भी खामी आती है तो इसका सीधा असर लाखों गरीब परिवारों की थाली पर पड़ता है।

🔍 यह भी पढ़ें- Ration Card Cancelled 2026: Income Tax भरने वालों के राशन कार्ड रद्द, बड़ी कार्रवाई शुरू

मौजूदा PDS की पांच गंभीर बीमारियां

जब सब कुछ चल ही रहा था तो अचानक ₹25,000 करोड़ का नया सिस्टम क्यों? क्योंकि मौजूदा व्यवस्था पांच पुरानी बीमारियों से जूझ रही है:

1. इंफ्रास्ट्रक्चरल लीकेज (चोरी):
अनाज गोदाम से निकलता है लेकिन राशन की दुकान पर पहुंचने से पहले गायब हो जाता है। बिचौलियों का नेटवर्क, भ्रष्ट अधिकारी और कमजोर निगरानी के कारण अरबों रुपए का नुकसान।

2. घोस्ट बेनिफिशरीज (कागजी लोग):
लाखों फर्जी राशन कार्ड चल रहे हैं। मृत व्यक्तियों, प्रवासी मजदूरों या काल्पनिक नामों पर अनाज उठाया जा रहा है जो सीधे खुले बाजार में बिक जाता है।

3. असली हकदारों का छूट जाना:
जो सचमुच गरीब हैं, जिनके पास दस्तावेज नहीं हैं या जो माइग्रेंट लेबर हैं, वे सिस्टम से बाहर रह जाते हैं। यह सबसे बड़ा अन्याय है।

4. शिकायत निवारण का अभाव:
अगर किसी गरीब को कोटेदार ने डांटकर भगा दिया तो वह जाए किसके पास? रियल-टाइम शिकायत समाधान की कोई व्यवस्था नहीं।

5. पुरानी लॉजिस्टिक्स व्यवस्था:
जब देश का लॉजिस्टिक्स सेक्टर आधुनिक हो रहा है, तब भी राशन व्यवस्था पुराने खातों और मैनुअल सेटलमेंट पर चल रही है।

सार्थक PDS: ₹25,000 करोड़ से क्या होगा?

सरकार का दावा है कि तकनीक को टूल की तरह इस्तेमाल करके पूरे इकोसिस्टम को री-इंजीनियर किया जाएगा। इसके चार प्रमुख स्तंभ (Pillars) हैं:

पहला स्तंभ: AI-Driven Identity Management

क्या होगा?

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Taiwan Stock Market

Taiwan Stock Market: ताइवान ने भारत को पछाड़ा, बना दुनिया का 5वां सबसे बड़ा स्टॉक मार्केट

शनिवार, 30 मई 2026
  • डायनेमिक बेनिफिशरी रजिस्ट्री बनाई जाएगी जो रियल-टाइम डेटा अपडेट करेगी
  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस फर्जी राशन कार्ड को ऑटोमेटिक डिटेक्ट करके ब्लॉक करेगी
  • पटवारी या क्लर्क की जगह AI सिस्टम काम करेगा

सबसे बड़ा सवाल: डेटा प्राइवेसी और सुरक्षा

यहीं से गंभीर प्रश्न उठते हैं:

  • क्या गरीब नागरिक का डेटा पूरी तरह सुरक्षित रहेगा?
  • AI सिस्टम में कोडिंग एरर हुआ तो किसकी जिम्मेदारी?
  • डेटा का दुरुपयोग रोकने के क्या उपाय हैं?

हैरान करने वाली बात यह है कि सरकार ने अभी तक डेटा गवर्नेंस फ्रेमवर्क की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।

🔍 यह भी पढ़ें- Fortified Rice Ban Bihar: राशन कार्ड धारकों को अब नहीं मिलेगा फोर्टिफाइड चावल

दूसरा स्तंभ: Smart Supply Chain Analytics

क्या होगा?

  • अनाज के ट्रकों पर, गोदामों पर और डिलीवरी पॉइंट्स पर AI-enabled मॉनिटरिंग
  • GPS ट्रैकिंग और रूट वेरिफिकेशन – अगर रूट डायवर्ट हुआ तो तुरंत अलर्ट
  • रियल-टाइम इन्वेंटरी ट्रैकिंग – कितना अनाज कहां है, यह हर पल पता रहेगा

प्रभाव:

  • “पीछे से माल नहीं आया” का बहाना नहीं चलेगा
  • बिचौलियों का नेटवर्क टूटेगा
  • ब्लैक मार्केटिंग पर सीधी चोट

यह दिखाता है कि सरकार तकनीक से पारदर्शिता लाने की कोशिश कर रही है।

तीसरा स्तंभ: Command and Control Centers

क्या होगा?

  • राज्यों में डिजिटल कमांड सेंटर बनाए जाएंगे (जैसे मिलिट्री वॉर रूम)
  • हर एक ट्रांजैक्शन को लाइव ट्रैक किया जाएगा
  • मशीनें और अधिकारी मिलकर रियल-टाइम निगरानी करेंगे

महत्व:
यह डेटा-ड्रिवन गवर्नेंस का उदाहरण है। शासन अब अनुमानों के आधार पर नहीं, बल्कि सटीक आंकड़ों के आधार पर चलेगा।

अगर गौर करें तो यह भारत की डिजिटल इंडिया परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

चौथा स्तंभ: समावेशी शिकायत निवारण (Inclusive Grievance Redressal)

क्या होगा?

  • मल्टी-लिंग्वल (बहुभाषी) AI वॉइस बॉट्स – हिंदी, बंगाली, तमिल, तेलुगु आदि सभी भाषाओं में
  • अनपढ़ या कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी स्थानीय भाषा में शिकायत दर्ज करा सकेगा
  • दफ्तरों के चक्कर काटने की जरूरत नहीं
  • 24 घंटे के भीतर समाधान का लक्ष्य

यह क्रांतिकारी कदम है। पहली बार तकनीक को गरीब की भाषा में लाया जा रहा है।

सिर्फ सॉफ्टवेयर नहीं, जमीनी सुधार भी

यह समझना जरूरी है कि सार्थक PDS केवल एक सॉफ्टवेयर प्रोजेक्ट नहीं है। ₹25,000 करोड़ में निम्नलिखित भी शामिल हैं:

क्षेत्रसुधार
राशन दुकानेंआधुनिकीकरण, डिजिटल उपकरण
मटेरियल हैंडलिंगबेहतर स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट
डीलर्सप्रॉफिट मार्जिन सुधार, प्रोत्साहन
डिजिटल इंफ्रानेटवर्क, सर्वर, डेटा सेंटर
लास्ट माइलगांवों तक कनेक्टिविटी

समझने वाली बात यह है कि यह केवल दिल्ली में बैठकर सॉफ्टवेयर बनाने की योजना नहीं है। जमीनी स्तर पर वास्तविक सुधार का प्रयास है।

राजनीतिक महत्व: 80 करोड़ वोटर्स का मामला

भारत जैसे लोकतंत्र में जब मामला 80 करोड़ वोटर्स का हो तो यह केवल प्रशासनिक सुधार नहीं रह जाता। यह गवर्नेंस और पॉलिटिक्स का संवेदनशील मिश्रण बन जाता है।

ऐतिहासिक संदर्भ:

  • उज्जवला योजना (मुफ्त रसोई गैस)
  • PM आवास योजना (मुफ्त घर)
  • आयुष्मान भारत (मुफ्त स्वास्थ्य बीमा)

ये योजनाएं केवल कल्याण नहीं, बल्कि सीधे जनता और सरकार के बीच सामाजिक अनुबंध (Social Contract) बनाती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि जो सरकार इस सिस्टम को पारदर्शी और मजबूत बनाएगी, उसका जनता पर विश्वास गहरा होगा। और 2029 के चुनावों में यह बड़ा फैक्टर बन सकता है।

तीन बड़े जोखिम जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

तकनीक जितनी खूबसूरत दिखती है, उतनी ही निर्मम भी हो सकती है। तीन बड़े खतरे:

1. डेटा की चूक का खतरा (Data Error Risk)

अगर AI एल्गोरिदम में कोडिंग एरर हुआ और किसी गरीब का डेटा मिसमैच हो गया, तो डिजिटल सिस्टम बिना किसी दया के उसे कैंसिल कर देगा।

वह इंसान नहीं है – वह एक मशीन है जो “रिजेक्टेड डेटा” की तरह ट्रीट करेगी। क्या उस गरीब को तुरंत अपील का मौका मिलेगा? क्या मानवीय हस्तक्षेप की व्यवस्था है?

2. डिजिटल डिवाइड (Digital Divide)

मेट्रो शहरों में 5G इस्तेमाल करना आसान है। लेकिन:

  • छत्तीसगढ़ के बस्तर में
  • ओडिशा के कालाहांडी में
  • उत्तर प्रदेश और बिहार के सुदूर गांवों में

आज भी नेटवर्क की स्थिति बेहद खराब है। अगर वहां बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण फेल हुआ तो क्या तकनीकी भुखमरी का कारण नहीं बनेगी?

3. अत्यधिक केंद्रीकरण (Over-Centralization)

जब पूरा सिस्टम सेंट्रलाइज्ड डेटा पर चलेगा तो:

  • स्थानीय स्तर पर लचीलापन खत्म हो जाएगा
  • संकट के समय कोटेदार द्वारा उधार देने जैसी मानवीय मदद असंभव हो जाएगी
  • राज्यों की प्रशासनिक स्वायत्तता प्रभावित होगी

हैरान करने वाली बात यह है कि अत्यधिक केंद्रीकरण ने दुनिया भर में कई प्रणालियों को कठोर और असंवेदनशील बना दिया है।

सफलता का असली पैमाना क्या होगा?

₹25,000 करोड़ खर्च करने के बाद क्या यह योजना सफल होगी?

जवाब: हां, लेकिन सिर्फ फाइलों में AI और बड़े शब्द लिख देने से नहीं।

असली सफलता इन सवालों के जवाब में होगी:

✓ क्या कतार में खड़े आखिरी व्यक्ति को उसका हक बिना अपमान के मिल रहा है?

✓ क्या भ्रष्टाचार वाकई खत्म हो रहा है या सिर्फ डिजिटल हो गया है?

✓ क्या शिकायत का समाधान 24 घंटे के अंदर हो रहा है?

✓ क्या तकनीकी खामी के कारण कोई भूखा तो नहीं सो रहा?

✓ क्या सिस्टम मानवीय संवेदनशीलता के साथ काम कर रहा है?

समझने वाली बात यह है कि टेक्नोलॉजी साधन होनी चाहिए, साध्य नहीं। लक्ष्य है – हर गरीब को उसका हक पहुंचाना, न कि डेटा रिपोर्ट बनाना।

भारत: वेलफेयर स्टेट से डिजिटल वेलफेयर स्टेट की ओर

भारत एक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) से डिजिटल कल्याणकारी राज्य (Digital Welfare State) की ओर बढ़ रहा है। और सार्थक PDS उसका एक बड़ा लिटमस टेस्ट है।

अगर यह सफल रहा तो:

  • अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए मॉडल बनेगा
  • दुनिया के अन्य विकासशील देश इससे सीखेंगे
  • भारत की डिजिटल गवर्नेंस की साख बढ़ेगी

अगर असफल रहा तो:

  • करोड़ों गरीबों का भरोसा टूटेगा
  • ₹25,000 करोड़ बर्बाद होंगे
  • डिजिटल डिवाइड और बढ़ेगा

मुख्य बातें (Key Points)
  • कैबिनेट ने सार्थक PDS को ₹25,000 करोड़ की मंजूरी दी
  • 80 करोड़ लोगों (65-70% आबादी) को प्रभावित करने वाली योजना
  • चार प्रमुख स्तंभ: AI-driven identity, smart supply chain, command centers, grievance redressal
  • फर्जी राशन कार्ड को AI ऑटोमेटिक डिटेक्ट करके ब्लॉक करेगी
  • अनाज की GPS ट्रैकिंग, रूट वेरिफिकेशन से लीकेज रोकी जाएगी
  • बहुभाषी AI वॉइस बॉट्स से अनपढ़ भी शिकायत दर्ज करा सकेंगे
  • तीन बड़े जोखिम: डेटा एरर, डिजिटल डिवाइड, अत्यधिक केंद्रीकरण
  • राशन दुकानों का आधुनिकीकरण और डीलर्स के मार्जिन में सुधार
  • 80 करोड़ वोटर्स का मामला – राजनीतिक महत्व भी बहुत बड़ा

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: सार्थक PDS क्या है और यह मौजूदा राशन व्यवस्था से कैसे अलग है?

उत्तर: सार्थक PDS (Systematic, Adaptive, Real-time, Technology-enabled, Holistic and Kisan-centric Public Distribution System) एक ₹25,000 करोड़ की परियोजना है जो AI, डेटा एनालिटिक्स और रियल-टाइम मॉनिटरिंग के माध्यम से राशन वितरण को पारदर्शी बनाएगी। यह फर्जी राशन कार्ड, सप्लाई चेन लीकेज और भ्रष्टाचार को खत्म करने का दावा करती है।

प्रश्न 2: इस योजना से गरीबों को क्या फायदा होगा?

उत्तर: गरीबों को चार मुख्य फायदे होंगे: (1) फर्जी कार्डधारकों के हटने से असली जरूरतमंदों को अधिक मिलेगा, (2) कोटेदार की मनमानी खत्म होगी क्योंकि सब कुछ डिजिटल ट्रैक होगा, (3) अपनी भाषा में शिकायत दर्ज करा सकेंगे, (4) राशन समय पर और पूरी मात्रा में मिलेगा।

प्रश्न 3: तकनीक पर निर्भरता के क्या जोखिम हैं?

उत्तर: तीन मुख्य जोखिम हैं: (1) AI में कोडिंग एरर से किसी गरीब का डेटा गलत हो सकता है और उसका राशन कट सकता है, (2) सुदूर गांवों में नेटवर्क की कमी से बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन फेल हो सकता है, (3) अत्यधिक केंद्रीकरण से स्थानीय स्तर की लचीलापन और मानवीय संवेदनशीलता खत्म हो सकती है। सफलता के लिए तकनीक के साथ मानवीय पहलू भी जरूरी है।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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