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The News Air - Breaking News - Maternal Mortality Siddhi: 53 माताओं की मौत, मध्य प्रदेश में मां बनना कितना सुरक्षित?

Maternal Mortality Siddhi: 53 माताओं की मौत, मध्य प्रदेश में मां बनना कितना सुरक्षित?

सीधी जिले में एक साल में 53 महिलाओं की प्रसव के दौरान मौत, Three Delays Theory का जीता जागता सबूत, स्वास्थ्य व्यवस्था की संरचनात्मक विफलता उजागर

Ajay Kumar by Ajay Kumar
शनिवार, 30 मई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय
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Maternal Mortality Siddhi
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Maternal Mortality Rate Siddhi Madhya Pradesh को लेकर एक दिल दहला देने वाली सच्चाई सामने आई है। हम उस भारत में रह रहे हैं जो दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दहलीज पर खड़ा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एक्सप्रेसवे और वैश्विक शक्ति बनने की बातें हो रही हैं। लेकिन इसी चमचमाती GDP वाले भारत के एक कोने में – मध्य प्रदेश के सीधी जिले में – पिछले एक साल में 53 महिलाओं की मौत प्रसव के दौरान या प्रसव के बाद हो गई।

देखा जाए तो यह केवल आंकड़े नहीं हैं। यह 53 परिवार हैं जो बिखर गए। 53 नवजात बच्चे जो जन्म लेते ही अनाथ हो गए। 53 घरों में जहां खुशियां आनी थीं, वहां कफन लपेटे गए। समझने वाली बात यह है कि ये मौतें किसी युद्ध में नहीं हुईं, किसी आतंकी हमले में नहीं हुईं। ये मौतें उन अस्पतालों की सफेद-नीली दीवारों के भीतर हुईं जिन्हें जीवन बचाने के लिए करोड़ों का बजट दिया जाता है।

सभ्यता का असली पैमाना: मातृ मृत्यु दर

किसी देश की सभ्यता का पैमाना इस बात से नहीं तय होता कि उस देश में कितने अरबपति हैं। पैमाना यह है कि उस देश की सबसे गरीब, सबसे लाचार गर्भवती महिला कितनी सुरक्षित है।

यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र (UN) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) मातृ मृत्यु दर (Maternal Mortality Rate – MMR) को विकास का असली थर्मामीटर मानते हैं।

क्योंकि जब एक मां की मौत होती है तो:

  • सिर्फ एक इंसान नहीं मरता
  • पूरा परिवार बिखर जाता है
  • एक नवजात आजीवन अनाथ हो जाता है
  • यह प्रशासनिक विफलता का सबसे विभत्स और अमानवीय रूप है

दिलचस्प बात यह है कि भारत ने सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals – SDG 3) के तहत 2030 तक MMR को 70 प्रति 1 लाख जीवित जन्मों से कम करने का वादा किया है। लेकिन सीधी जैसे जिलों में आंकड़े बताते हैं कि हम उस लक्ष्य से कितनी दूर हैं।

Three Delays Theory: मौत के तीन कारण

स्वास्थ्य विशेषज्ञ मातृ मृत्यु को Three Delays Theory (तीन देरियों का सिद्धांत) से समझाते हैं। और सीधी की 53 मौतें इसी सिद्धांत का जीता जागता सबूत हैं।

पहली देरी: निर्णय लेने में देरी

कारणप्रभाव
कुपोषण और कमजोरीगर्भवती महिला खुद अपनी स्थिति को गंभीर नहीं समझती
जागरूकता की कमीखतरे के संकेत पहचान नहीं पाते
आर्थिक दबावअस्पताल जाने का खर्च डराता है
सामाजिक कलंकमहिला की बात सुनी नहीं जाती
घरेलू प्रसव की परंपरा“घर में ही हो जाएगा” की सोच

गरीब परिवारों में – विशेष रूप से आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में – परिवार को अस्पताल जाने का फैसला लेने में घंटों, कभी-कभी दिनों की देरी हो जाती है। तब तक स्थिति गंभीर हो चुकी होती है।

दूसरी देरी: अस्पताल पहुंचने में देरी

  • टूटी सड़कें: सीधी जैसे जिलों में बारिश में सड़कें नदी बन जाती हैं
  • परिवहन साधनों की कमी: एंबुलेंस घंटों तक नहीं आती
  • दूरी: निकटतम अस्पताल 40-50 किमी दूर
  • जाम और बाधाएं: कई बार गर्भवती महिलाओं को खटिया पर उठाकर नदी पार करनी पड़ती है

यहां ध्यान देने वाली बात है कि यह देरी अक्सर जीवन और मौत के बीच का फैसला कर देती है। जब तक गाड़ी आती है, जब तक अस्पताल पहुंचते हैं – कीमती समय निकल चुका होता है।

तीसरी देरी: इलाज मिलने में देरी (सबसे क्रूर)

अगर गौर करें तो यह सबसे दर्दनाक देरी है:

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  • बेड नहीं मिलते: अस्पताल में जगह नहीं
  • डॉक्टर की कमी: विशेषज्ञ प्रसूति रोग विशेषज्ञ (Obstetrician) उपलब्ध नहीं
  • रेफरल का खेल: एक अस्पताल से दूसरे में भटकाया जाता है
  • वेंटिलेटर/ICU नहीं: जरूरी उपकरण नहीं हैं
  • खून नहीं मिलता: ब्लड बैंक खाली या मैच नहीं होता
  • दवाइयों की कमी: जरूरी इंजेक्शन/दवाएं स्टॉक में नहीं

सोचिए: एक गरीब आदिवासी गर्भवती महिला, शरीर में पहले से एनीमिया (खून की कमी), दूरी का कठिन सफर तय करके अस्पताल पहुंचती है। और वहां पता चलता है कि विशेषज्ञ डॉक्टर छुट्टी पर हैं या गायब हैं।

हैरान करने वाली बात यह है कि यह केवल एक मेडिकल इमरजेंसी नहीं है – यह संरचनात्मक हत्या (Structural Murder) है।

WHO की चेतावनी: मातृ मृत्यु केवल स्वास्थ्य मुद्दा नहीं

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) चिल्ला-चिल्लाकर कहता रहा है कि Maternal Mortality Rate केवल एक स्वास्थ्य मुद्दा नहीं है। यह:

  • विकास संकट (Development Crisis) है
  • सामाजिक न्याय का सवाल है
  • लैंगिक समानता का मुद्दा है
  • मानवाधिकार का मामला है

जब राज्य सरकार के पास रिपोर्ट जाती हैं, कलेक्टर बैठकों में फाइलें पलटते हैं, समीक्षा बैठकें होती हैं – लेकिन सवाल यह है:

जब सिस्टम को पता था कि साल भर से लगातार मौतें हो रही हैं, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

यह पॉलिसी पैरालिसिस (नीतिगत पक्षाघात) क्यों है? किसे जवाबदेह ठहराया गया?

दो भारत: असमानता की खाई

समझने वाली बात यह है कि हमारे देश में दो समानांतर भारत जी रहे हैं:

पहला भारत (शहरी/अमीर)दूसरा भारत (ग्रामीण/गरीब)
कॉर्पोरेट अस्पतालसरकारी PHC जहां डॉक्टर नहीं
रोबोटिक सर्जरीबुनियादी सुविधाएं तक नहीं
एयर एंबुलेंसखटिया पर उफती नदी पार
पलक झपकते इलाजघंटों इंतजार, कोई नहीं सुनता
प्राइवेट बीमा कवरेजआयुष्मान भारत भी काम नहीं आया

आपने देखा होगा वह वायरल फोटो – जहां एक पिता अपनी बेटी की लाश को कंधे पर उठाकर ले जा रहा था क्योंकि अस्पताल से एंबुलेंस नहीं मिली। या वह वीडियो जहां एक भाई अपनी बहन की लाश को ले जा रहा था।

ये व्यवस्थागत समस्याएं हैं। GDP बढ़ना और नागरिकों की Quality of Life बढ़ना – दो अलग बातें हैं।

संविधान का वादा: स्वास्थ्य का अधिकार

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) में जीवन के अधिकार (Right to Life) की गारंटी है। और सुप्रीम कोर्ट ने कई बार यह कहा है कि इसमें स्वास्थ्य का अधिकार (Right to Health) भी शामिल है।

लेकिन जब 53 माताएं अस्पतालों में मर जाती हैं, तो क्या यह संवैधानिक वादे की सबसे बड़ी विफलता नहीं है?

राष्ट्र की असली ताकत:

  • शेयर बाजार के इंडेक्स से नहीं मापी जाती
  • दलाल स्ट्रीट से नहीं मापी जाती
  • माताओं की सुरक्षा से मापी जाती है
राष्ट्रीय परिदृश्य: भारत में MMR की स्थिति

भारत में मातृ मृत्यु दर की राष्ट्रीय स्थिति:

वर्षMMR (प्रति 1 लाख जीवित जन्म)टिप्पणी
2016-18113–
2018-2097सुधार
2020-22103COVID का प्रभाव, बढ़ोतरी
SDG लक्ष्य (2030)70अभी भी दूर

राज्यवार असमानता:

  • केरल: ~30 (बेहतरीन)
  • महाराष्ट्र: ~33
  • तमिलनाडु: ~54
  • राष्ट्रीय औसत: ~103
  • उत्तर प्रदेश: ~167
  • मध्य प्रदेश: ~141 (बहुत खराब)
  • असम: ~195 (सबसे खराब)

सीधी जैसे जिलों में यह आंकड़ा राज्य औसत से भी अधिक खराब है।

समस्या की जड़ें: क्यों हो रही हैं मौतें?

स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे की कमी:

  • PHC (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र) में बिजली नहीं
  • CHC (सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र) में प्रसव कक्ष (Labour Room) नहीं
  • जिला अस्पतालों में ICU नहीं
  • ब्लड बैंक नहीं या खाली

मानव संसाधन संकट:

  • स्वीकृत पदों पर डॉक्टर नहीं
  • विशेषज्ञों की भारी कमी
  • नर्सिंग स्टाफ अपर्याप्त
  • ANM/आशा कार्यकर्ताओं को वेतन देरी से

कुपोषण और एनीमिया:

  • 50% से अधिक गर्भवती महिलाओं में खून की कमी
  • कुपोषित माताएं, कमजोर बच्चे
  • मध्याह्न भोजन और पोषण योजनाएं फेल

जागरूकता की कमी:

  • ANC (प्रसव पूर्व जांच) नहीं होती
  • खतरे के संकेत नहीं पहचाने जाते
  • अंधविश्वास और घरेलू प्रसव की जिद
सरकारी योजनाएं: कागजों में ही सीमित

सरकार ने कई योजनाएं चलाई हैं:

  • जननी सुरक्षा योजना (JSY): प्रसव के लिए नकद प्रोत्साहन
  • प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA)
  • LaQshya Programme: प्रसव कक्षों की गुणवत्ता सुधार
  • आयुष्मान भारत

लेकिन जमीनी हकीकत:

  • पैसा नहीं मिलता या देरी से मिलता है
  • योजनाओं की जानकारी नहीं
  • कागजी लाभार्थी, असली जरूरतमंद छूट जाते हैं
क्या है समाधान? रोडमैप

तत्काल कदम:

  1. सभी PHC/CHC में 24×7 प्रसव सुविधा अनिवार्य
  2. विशेषज्ञों की तैनाती में बॉन्ड/अनिवार्य ग्रामीण सेवा
  3. एंबुलेंस नेटवर्क मजबूत (108/102)
  4. ब्लड बैंक हर जिले में
  5. जवाबदेही तय करें – CMO, CMHO, District Health Officer

दीर्घकालिक सुधार:

  • स्वास्थ्य बजट बढ़ाएं (GDP का कम से कम 2.5-3%)
  • Medical colleges में सीटें बढ़ाएं
  • नर्सिंग स्टाफ का सम्मान और वेतन बढ़ाएं
  • ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को सशक्त करें
  • डेटा-ड्रिवन निगरानी – हर मौत की जांच

सामाजिक बदलाव:

  • कुपोषण मुक्त भारत
  • लड़कियों की शिक्षा
  • महिला सशक्तिकरण
  • जागरूकता अभियान
यह सिर्फ सीधी का मुद्दा नहीं

यह घटना सिर्फ सीधी जिले की नहीं है। यह पूरे भारत की अंतरात्मा के लिए वेक-अप कॉल है।

हर साल देश में लगभग 35,000-40,000 माताओं की मौत होती है। यानी हर घंटे 4-5 माताएं मर जाती हैं।

यह सिर्फ कुछ डॉक्टरों या अधिकारियों की लापरवाही नहीं है। यह सबूत है कि हमारे विकास की प्राथमिकताओं में सबसे गरीब तबका सबसे पीछे छूट गया है।


मुख्य बातें (Key Points)
  • मध्य प्रदेश के सीधी जिले में पिछले 1 साल में 53 महिलाओं की प्रसव में मौत
  • Three Delays Theory: निर्णय लेने में देरी, अस्पताल पहुंचने में देरी, इलाज मिलने में देरी
  • भारत का MMR ~103 प्रति 1 लाख, जबकि SDG लक्ष्य 70 है
  • मध्य प्रदेश में MMR ~141, असम में ~195 (सबसे खराब)
  • स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे की कमी, डॉक्टरों की कमी, कुपोषण मुख्य कारण
  • सरकारी योजनाएं कागजों में सीमित, जमीनी स्तर पर असर नहीं
  • संविधान के अनुच्छेद 21 में स्वास्थ्य का अधिकार शामिल
  • यह विकास की विफलता का सबसे दर्दनाक रूप है
  • हर घंटे भारत में 4-5 माताओं की मौत होती है

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: Three Delays Theory क्या है और मातृ मृत्यु में इसकी क्या भूमिका है?

उत्तर: Three Delays Theory मातृ मृत्यु के तीन मुख्य कारणों को बताती है: (1) निर्णय लेने में देरी – परिवार को अस्पताल जाने का फैसला लेने में देरी (कुपोषण, जागरूकता की कमी, आर्थिक दबाव), (2) अस्पताल पहुंचने में देरी – टूटी सड़कें, एंबुलेंस की कमी, दूरी, (3) इलाज मिलने में देरी – डॉक्टर की कमी, बेड नहीं, उपकरण नहीं। ये तीनों देरियां मिलकर मौत का कारण बनती हैं।

प्रश्न 2: भारत की मातृ मृत्यु दर (MMR) अन्य देशों की तुलना में कैसी है?

उत्तर: भारत का MMR लगभग 103 प्रति 1 लाख जीवित जन्म है, जो विकसित देशों से बहुत अधिक है। केरल (~30) और तमिलनाडु (~54) बेहतर हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश (~167), मध्य प्रदेश (~141) और असम (~195) बहुत खराब स्थिति में हैं। WHO का SDG लक्ष्य 2030 तक 70 तक पहुंचना है, जो अभी दूर है।

प्रश्न 3: मातृ मृत्यु दर कम करने के लिए क्या किया जा सकता है?

उत्तर: समाधान बहुआयामी है: (1) तत्काल – सभी PHC/CHC में 24×7 प्रसव सुविधा, विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती, मजबूत एंबुलेंस नेटवर्क, ब्लड बैंक, (2) दीर्घकालिक – स्वास्थ्य बजट बढ़ाना (GDP का 2.5-3%), अधिक मेडिकल कॉलेज, बेहतर नर्सिंग स्टाफ, (3) सामाजिक – कुपोषण मुक्ति, लड़कियों की शिक्षा, जागरूकता अभियान। हर मातृ मृत्यु की जांच और जवाबदेही तय करना भी जरूरी है।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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