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The News Air - Breaking News - Railway Compensation Rules पर बड़ा फैसला, पीड़ितों को राहत

Railway Compensation Rules पर बड़ा फैसला, पीड़ितों को राहत

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, रेल हादसे के पीड़ितों को मेडिकल खर्च देने से नहीं बच सकता रेलवे

Ajay Kumar by Ajay Kumar
बुधवार, 24 जून 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, काम की बातें, राष्ट्रीय
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Railway Compensation Rules
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Railway Compensation Rules को लेकर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया कि रेल हादसे के पीड़ितों को इलाज और पुनर्वास के खर्च की अदायगी सिर्फ इसलिए रोकी नहीं जा सकती, क्योंकि उन्हें कानूनी नियमों के तहत तय अधिकतम मुआवज़ा पहले ही मिल चुका है। यानी मुआवज़ा और इलाज का खर्च, दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं।

राहत की बात यह है कि इस फैसले से उन हजारों पीड़ितों को उम्मीद की किरण मिली है, जो हादसे के बाद महंगे इलाज के बोझ तले दब जाते हैं।

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दोनों पैर गंवाने वाले युवक की अपील पर फैसला

यह फैसला जस्टिस पंकज जैन की बेंच ने एक ऐसे नौजवान यात्री की अपील पर सुनाया, जिसने रेल हादसे में अपने दोनों पैर गंवा दिए थे। हादसे के समय वह ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहा था और एक जायज़ (बोनाफाइड) यात्री के तौर पर सफर कर रहा था।

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कोर्ट ने दिए अलग से पैसे देने के आदेश

अदालत ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल की ओर से पहले दिए गए मुआवज़े के अलावा पीड़ित को अतिरिक्त राशि देने का हुक्म सुनाया। यह राशि कुछ इस तरह तय हुई:

खर्च का प्रकारराशि
इलाज का असल खर्च (मेडिकल बिल आधारित)1.2 लाख रुपये
नकली पैर (आर्टिफिशियल लिंब) लगवाने के लिए2 लाख रुपये

अदालत ने स्पष्ट किया कि 1990 के नियमों के नियम 4 के तहत मुआवज़े की अधिकतम सीमा में घायल यात्री के मेडिकल खर्च शामिल नहीं होते।

‘कई घायल यात्रियों की जिंदगी मुश्किल हो जाती है’

मौजूदा मुआवज़ा प्रणाली की कमी पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस जैन ने जो कहा, वह दिल को छू लेने वाला था। उन्होंने कहा, “कई घायल यात्रियों के लिए जिंदगी बहुत मुश्किल हो जाती है। मिलने वाला मुआवज़ा मेडिकल खर्चों के मुकाबले बहुत कम होता है और अपाहिजता का दर्द बिना मुआवज़े के ही रह जाता है।”

समझने वाली बात यह है कि ये नियम 1990 के स्केल पर चल रहे हैं। 2016 में संशोधन ज़रूर हुआ, फिर भी तय रकम महंगे इलाज के खर्च को पूरा नहीं कर पाती।

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‘सख्त देनदारी’ का सिद्धांत

रेलवे एक्ट के अध्याय XIII का अध्ययन करने के बाद अदालत ने कहा कि विधानपालिका का असल मकसद हादसे में घायल यात्रियों या जान गंवाने वालों के परिवारों को राहत देना है। रेलवे प्रशासन की यह जिम्मेदारी ‘सख्त देनदारी’ (स्ट्रिक्ट लायबिलिटी) के सिद्धांत पर आधारित है।

अगर गौर करें, तो इसका मतलब साफ है: रेलवे अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता।

आम आदमी पर असर

यह फैसला हर रेल यात्री के लिए राहत भरा है। अब हादसे का शिकार होने वाले लोग सिर्फ तय मुआवज़े तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि अपने असल मेडिकल बिल और भविष्य के इलाज का खर्च भी अलग से मांग सकेंगे। यह फैसला आने वाले ऐसे कई मामलों के लिए एक मिसाल बनेगा।

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जानें पूरा मामला

पीड़ित युवक रेल हादसे में गंभीर रूप से घायल हुआ था और उसकी दोनों लांगें कटनी पड़ीं। उसके वकील ने अस्पताल का रिकॉर्ड पेश करते हुए बताया कि इलाज पर 1,19,650 रुपये खर्च हुए। दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने दलील दी कि ट्रिब्यूनल का मुआवज़ा हादसे की तारीख के कानून के मुताबिक सही था। दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने पीड़ित के हक में फैसला दिया।

मुख्य बातें (Key Points)
  • हाईकोर्ट ने कहा, मुआवज़ा मिलने के बावजूद मेडिकल खर्च अलग से देना होगा।
  • दोनों पैर गंवाने वाले यात्री को 1.2 लाख इलाज और 2 लाख नकली पैर के लिए मिले।
  • जस्टिस पंकज जैन ने 1990 के पुराने मुआवज़ा स्केल पर सवाल उठाया।
  • फैसला ‘सख्त देनदारी’ के सिद्धांत पर आधारित बताया गया।
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. हाईकोर्ट ने रेलवे मुआवज़े पर क्या फैसला दिया?

कोर्ट ने कहा कि तय मुआवज़ा मिलने के बावजूद पीड़ित को असल मेडिकल खर्च और भविष्य के इलाज की राशि अलग से दी जानी चाहिए।

2. पीड़ित को कुल कितनी अतिरिक्त राशि मिली?

पीड़ित को इलाज के 1.2 लाख रुपये और नकली पैर लगवाने के लिए 2 लाख रुपये अतिरिक्त देने का आदेश दिया गया।

3. क्या 1990 के मुआवज़ा नियमों में मेडिकल खर्च शामिल है?

नहीं, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1990 के नियमों के नियम 4 की मुआवज़ा सीमा में घायल यात्री के मेडिकल खर्च शामिल नहीं होते।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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