Railway Compensation Rules को लेकर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया कि रेल हादसे के पीड़ितों को इलाज और पुनर्वास के खर्च की अदायगी सिर्फ इसलिए रोकी नहीं जा सकती, क्योंकि उन्हें कानूनी नियमों के तहत तय अधिकतम मुआवज़ा पहले ही मिल चुका है। यानी मुआवज़ा और इलाज का खर्च, दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं।
राहत की बात यह है कि इस फैसले से उन हजारों पीड़ितों को उम्मीद की किरण मिली है, जो हादसे के बाद महंगे इलाज के बोझ तले दब जाते हैं।
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दोनों पैर गंवाने वाले युवक की अपील पर फैसला
यह फैसला जस्टिस पंकज जैन की बेंच ने एक ऐसे नौजवान यात्री की अपील पर सुनाया, जिसने रेल हादसे में अपने दोनों पैर गंवा दिए थे। हादसे के समय वह ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहा था और एक जायज़ (बोनाफाइड) यात्री के तौर पर सफर कर रहा था।
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कोर्ट ने दिए अलग से पैसे देने के आदेश
अदालत ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल की ओर से पहले दिए गए मुआवज़े के अलावा पीड़ित को अतिरिक्त राशि देने का हुक्म सुनाया। यह राशि कुछ इस तरह तय हुई:
| खर्च का प्रकार | राशि |
|---|---|
| इलाज का असल खर्च (मेडिकल बिल आधारित) | 1.2 लाख रुपये |
| नकली पैर (आर्टिफिशियल लिंब) लगवाने के लिए | 2 लाख रुपये |
अदालत ने स्पष्ट किया कि 1990 के नियमों के नियम 4 के तहत मुआवज़े की अधिकतम सीमा में घायल यात्री के मेडिकल खर्च शामिल नहीं होते।
‘कई घायल यात्रियों की जिंदगी मुश्किल हो जाती है’
मौजूदा मुआवज़ा प्रणाली की कमी पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस जैन ने जो कहा, वह दिल को छू लेने वाला था। उन्होंने कहा, “कई घायल यात्रियों के लिए जिंदगी बहुत मुश्किल हो जाती है। मिलने वाला मुआवज़ा मेडिकल खर्चों के मुकाबले बहुत कम होता है और अपाहिजता का दर्द बिना मुआवज़े के ही रह जाता है।”
समझने वाली बात यह है कि ये नियम 1990 के स्केल पर चल रहे हैं। 2016 में संशोधन ज़रूर हुआ, फिर भी तय रकम महंगे इलाज के खर्च को पूरा नहीं कर पाती।
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‘सख्त देनदारी’ का सिद्धांत
रेलवे एक्ट के अध्याय XIII का अध्ययन करने के बाद अदालत ने कहा कि विधानपालिका का असल मकसद हादसे में घायल यात्रियों या जान गंवाने वालों के परिवारों को राहत देना है। रेलवे प्रशासन की यह जिम्मेदारी ‘सख्त देनदारी’ (स्ट्रिक्ट लायबिलिटी) के सिद्धांत पर आधारित है।
अगर गौर करें, तो इसका मतलब साफ है: रेलवे अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता।
आम आदमी पर असर
यह फैसला हर रेल यात्री के लिए राहत भरा है। अब हादसे का शिकार होने वाले लोग सिर्फ तय मुआवज़े तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि अपने असल मेडिकल बिल और भविष्य के इलाज का खर्च भी अलग से मांग सकेंगे। यह फैसला आने वाले ऐसे कई मामलों के लिए एक मिसाल बनेगा।
जानें पूरा मामला
पीड़ित युवक रेल हादसे में गंभीर रूप से घायल हुआ था और उसकी दोनों लांगें कटनी पड़ीं। उसके वकील ने अस्पताल का रिकॉर्ड पेश करते हुए बताया कि इलाज पर 1,19,650 रुपये खर्च हुए। दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने दलील दी कि ट्रिब्यूनल का मुआवज़ा हादसे की तारीख के कानून के मुताबिक सही था। दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने पीड़ित के हक में फैसला दिया।
मुख्य बातें (Key Points)
- हाईकोर्ट ने कहा, मुआवज़ा मिलने के बावजूद मेडिकल खर्च अलग से देना होगा।
- दोनों पैर गंवाने वाले यात्री को 1.2 लाख इलाज और 2 लाख नकली पैर के लिए मिले।
- जस्टिस पंकज जैन ने 1990 के पुराने मुआवज़ा स्केल पर सवाल उठाया।
- फैसला ‘सख्त देनदारी’ के सिद्धांत पर आधारित बताया गया।













