Punjab Water Dispute अमृतसर के ऐतिहासिक श्री अकाल तख्त साहिब (Sri Akal Takht Sahib) से शुक्रवार को पंजाब के जल संसाधनों की रक्षा के लिए एक नए संघर्ष का शंखनाद हुआ। पंजाब की प्रमुख किसान जत्थेबंदियों ने, जिनमें बलबीर सिंह राजेवाल (Balbir Singh Rajewal) और हरजिंदर सिंह लखोवाल जैसे दिग्गज नेता शामिल थे, गुरु चरणों में अरदास कर राज्य के पानी को बचाने की शपथ ली। किसान नेताओं ने साफ कर दिया है कि अब पंजाब अपने पानी की एक भी बूंद मुफ्त में किसी अन्य राज्य को नहीं देगा और पुराने समझौतों के तहत बकाया रॉयल्टी की मांग को लेकर गांव-गांव जाकर आंदोलन को तेज किया जाएगा।
‘रिपेरियन सिद्धांतों की अनदेखी और राजनीतिक स्वार्थ’
किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल ने केंद्र सरकारों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि 1948 से लेकर अब तक पंजाब के हितों को राजनीतिक स्वार्थ की वेदी पर चढ़ाया गया है। उन्होंने तर्क दिया कि अंतरराष्ट्रीय रिपेरियन कानून (Riparian Law) के अनुसार, पानी पर पहला हक उसी राज्य का होता है जहां से नदी बहती है। राजेवाल ने 1955 के समझौते का हवाला देते हुए कहा कि राजस्थान जैसे राज्यों को, जो रिपेरियन स्टेट की श्रेणी में भी नहीं आते, पंजाब का पानी दबाव में दिया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि इन समझौतों को कभी भी पंजाब विधानसभा की मंजूरी नहीं मिली, फिर भी पंजाब का हक छीना गया।
‘राजस्थान को मुफ्त पानी और 16 लाख करोड़ की रॉयल्टी’
किसान संगठनों ने चौंकाने वाला दावा किया है कि अब तक राजस्थान को लगभग 16.5 लाख करोड़ रुपये मूल्य का पानी मुफ्त दिया जा चुका है। किसानों का कहना है कि राजस्थान इस पानी का उपयोग न केवल खेती के लिए कर रहा है, बल्कि इसे बड़ी-बड़ी रिफाइनरियों और औद्योगिक इकाइयों को बेचकर मुनाफा भी कमा रहा है। नेताओं ने मांग की कि जब अन्य संसाधनों पर रॉयल्टी दी जाती है, तो पंजाब के पानी पर रॉयल्टी क्यों नहीं मिल रही? उन्होंने चेतावनी दी कि यदि पंजाब को उसके पानी की कीमत नहीं मिली, तो किसान पानी की सप्लाई रोकने जैसे कड़े कदम उठाने पर मजबूर होंगे।
‘जहरीला होता भूजल और कैंसर का बढ़ता खतरा’
पानी के बंटवारे के साथ-साथ किसान संगठनों ने पंजाब के गिरते जल स्तर और बढ़ते प्रदूषण पर भी गहरी चिंता जताई है। औद्योगिक इकाइयों द्वारा जमीन के नीचे छोड़े जा रहे जहरीले रसायनों के कारण पंजाब का भूजल पीने लायक नहीं रहा है। किसान नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि वर्तमान स्थिति नहीं बदली, तो अगले चार वर्षों में पंजाब का हर घर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी की चपेट में होगा। जमीन बंजर हो रही है और हवा-पानी जहरीला हो चुका है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ा संकट है।
‘जागो पंजाब अभियान और मार्च में महा रैली’
संघर्ष की रूपरेखा साझा करते हुए किसान जत्थेबंदियों ने ‘जागो पंजाब’ अभियान की घोषणा की। इसके तहत किसान नेता पंजाब के हर गांव में जाकर लोगों को जल संकट और उनके संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक करेंगे। इस जन-आंदोलन को निर्णायक मोड़ देने के लिए मार्च के अंत में एक विशाल राज्य स्तरीय रैली आयोजित की जाएगी। किसानों का संदेश स्पष्ट है कि पंजाब का पानी राज्य की जीवनरेखा है और इसके मालिकाना हक के लिए अब किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
‘पंजाब के अस्तित्व का सवाल’
एक अनुभवी पत्रकार के नजरिए से देखें तो पंजाब के पानी का मुद्दा केवल एक राजनीतिक नारेबाजी नहीं, बल्कि राज्य के अस्तित्व का सवाल है। खेती पर आधारित अर्थव्यवस्था वाले राज्य के लिए पानी का खत्म होना या उसका प्रदूषित होना भविष्य की तबाही का संकेत है। रॉयल्टी की मांग और पुराने समझौतों को चुनौती देना यह दर्शाता है कि अब पंजाब का किसान केवल फसलों के दाम तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उन बुनियादी प्राकृतिक संसाधनों पर अपना हक चाहता है जो सदियों से पंजाब की पहचान रहे हैं। यह आंदोलन आने वाले समय में केंद्र और राज्य के बीच एक बड़े संवैधानिक टकराव का कारण बन सकता है।
‘मुख्य बातें (Key Points)’
अकाल तख्त साहिब में अरदास के बाद पंजाब के जल संसाधनों को बचाने के लिए संघर्ष का बिगुल फूंका गया।
किसान नेताओं ने राजस्थान को दिए जा रहे पानी के बदले 16.5 लाख करोड़ रुपये की रॉयल्टी मांगी।
1955 के समझौते को गैर-संवैधानिक बताते हुए पंजाब विधानसभा की मंजूरी न होने का दावा किया गया।
प्रदूषण के कारण पंजाब में कैंसर के बढ़ते मामलों पर चिंता जताते हुए औद्योगिक इकाइयों को जिम्मेदार ठहराया।
‘जागो पंजाब’ अभियान के तहत गांव-गांव जाकर जागरूकता फैलाई जाएगी और मार्च में बड़ी रैली होगी।








