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The News Air - Breaking News - Healthy Aging: 50 की उम्र से शुरू करें तैयारी, बुढ़ापे में भी रहेंगे एक्टिव और हेल्दी

Healthy Aging: 50 की उम्र से शुरू करें तैयारी, बुढ़ापे में भी रहेंगे एक्टिव और हेल्दी

जेरियाट्रिक एक्सपर्ट बताते हैं कैसे एक्सरसाइज, सही खानपान और स्ट्रेस मैनेजमेंट से 100 साल तक जी सकते हैं स्वस्थ जीवन।

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय
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Healthy Aging
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Healthy Aging: बुढ़ापा – एक ऐसा पड़ाव जिससे हर इंसान को गुजरना है, लेकिन क्या यह जरूरी है कि बुढ़ापा बीमारियों और असहायता का पर्याय बने? डॉक्टर प्रसुन चैटर्जी, चीफ जेरियाट्रिक मेडिसिन एंड लॉन्जिविटी साइंस, आर्टेमिस गुरुग्राम, कहते हैं कि 70% हेल्दी एजिंग हमारे हाथ में है। जीन का योगदान सिर्फ 30% है, बाकी 70% लाइफस्टाइल और एनवायरनमेंट पर निर्भर करता है। आज के समय में 40 से 50 साल की उम्र के लोग सबसे ज्यादा नजरअंदाज किए जाते हैं सेहत के मामले में, जबकि यही वह समय है जब आपको अपने बुढ़ापे की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।

भारत में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। जनगणना 2011 के अनुसार, देश में 10.4 करोड़ बुजुर्ग (60+ वर्ष) हैं, जो कुल आबादी का 8.6% हैं। वर्ष 2031 तक यह संख्या 19 करोड़ 34 लाख से भी अधिक हो जाएगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम इसके लिए तैयार हैं? डॉ. चैटर्जी बताते हैं कि हमारी उम्र तो बढ़ रही है, लेकिन उसके अनुरूप तैयारी नहीं हुई है।

भारत में बुढ़ापा इतना मुश्किल क्यों है?

यूरोपीय देशों, खासकर इटली और जापान की तुलना में भारत में बुजुर्गों की सेहत काफी खराब रहती है। डॉ. चैटर्जी बताते हैं कि इसकी मुख्य वजह तैयारी की कमी है। विकसित देशों ने दशकों पहले से बुजुर्गों के लिए एज-फ्रेंडली एनवायरनमेंट, सही खानपान और हेल्थ एक्सेस पर काम शुरू कर दिया था। जापान में सेंटिनेरियन (100 साल या उससे अधिक जीने वाले) सबसे ज्यादा हैं क्योंकि उनकी तैयारी दो दशक से भी ज्यादा समय से चल रही है।

भारत में समस्या यह है कि हम बहुत बिजी हो गए हैं अपने कामकाज और प्रोफेशन में। युवा पीढ़ी अपने माता-पिता और दादा-दादी की सेहत पर ध्यान नहीं दे पाती। साथ ही, बुजुर्गों को खुद भी पता नहीं है कि उम्र के साथ उनके शरीर में क्या बदलाव होने चाहिए और उन्हें कैसे तैयार रहना है।

जीन्स का रोल: 30% बाकी 70% आपके हाथ में

साइंस कहता है कि 30% जीन्स और 70% लाइफस्टाइल व एनवायरनमेंट आपकी हेल्दी एजिंग को निर्धारित करते हैं। अगर आपके माता-पिता, दादा-दादी लंबा और स्वस्थ जीवन जिए हैं, तो आप गिफ्टेड हैं। लेकिन अगर आपके पूर्वजों को बीमारियां घेरे रहीं, तो आपको ज्यादा सावधान रहना होगा। डॉ. चैटर्जी बताते हैं कि उन्होंने 100 साल के ऐसे मरीज देखे हैं जो स्मोकिंग और अल्कोहल लेते हैं, लेकिन उनके पिता भी 96 साल तक जिए थे – यहां जीन काम कर रहे हैं।

हालांकि, जिन लोगों के पास “लॉन्जिविटी जीन” नहीं हैं, उन्हें लाइफस्टाइल और एनवायरनमेंट पर भरोसा करना चाहिए। आप अपने माता-पिता को देखकर अंदाजा लगा सकते हैं कि आपका बुढ़ापा कैसा होगा। लेकिन उनकी गलतियों से सीखकर आप अपना भविष्य बदल सकते हैं।

40 से 50 साल की उम्र: सबसे नजरअंदाज समूह

डॉ. चैटर्जी के सर्वे के अनुसार, 40 से 50 साल की उम्र के लोग सेहत के मामले में सबसे ज्यादा नजरअंदाज किए जाते हैं। इस समय में लोग बच्चों की देखभाल करते हैं, माता-पिता का ख्याल रखते हैं, लेकिन अपनी सेहत पर कोई ध्यान नहीं देते। यही वजह है कि कोविड के बाद 40 से 50 साल की उम्र के लोगों में हार्ट अटैक, स्ट्रोक और सडन डेथ के मामले तेजी से बढ़े हैं।

यह वही समय है जब शरीर में बड़े बदलाव शुरू होते हैं। 40 साल के बाद दिमाग का हिप्पोकैंपस (जो मेमोरी का लाइब्रेरी है) छोटा होना शुरू होता है। मसल्स हर साल 1% करके कम होती जाती हैं अगर आप रेजिस्टिव एक्सरसाइज नहीं करते। 40 से 80 साल की उम्र के बीच लगभग 40% मसल लॉस हो जाती है।

हेल्थ इन्वेस्टमेंट प्लान: SIP की तरह

डॉ. चैटर्जी एक दिलचस्प उदाहरण देते हैं – जैसे फाइनेंस में SIP (सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) होता है, वैसे ही हेल्थ में भी। अगर आप महीने में ₹500 जमा करते हैं 30-40 साल तक, तो 5-10 करोड़ हो जाता है। ठीक वैसे ही, अगर आज आप रोज 10 कदम चलते हैं, हेल्दी खाना खाते हैं, तो 80 साल में जाकर आपको इतना बड़ा डिविडेंड मिलेगा जो नाइंथ वंडर ऑफ द वर्ल्ड होगा।

कंसिस्टेंसी बहुत जरूरी है। डॉ. चैटर्जी के 95 साल के एक मरीज हैं जो कोविड काल में भी अपने 10 फीट के बेडरूम में ही 10,000 कदम चलते थे रोज। यह है डिसिप्लिन।

दवाइयों का ओवरलोड: पॉलीफार्मेसी की समस्या

दुनियाभर में जितने भी सेंटिनेरियन का स्टडी हुआ है, उसमें देखा गया कि उनकी दवाई बहुत कम होती है। वे पिल के भरोसे नहीं, बल्कि हेल्दी प्रैक्टिस के कारण लंबा जीते हैं। डॉ. चैटर्जी बताते हैं कि भारत में बुजुर्ग अलग-अलग स्पेशलिस्ट के पास जाते हैं – घुटने के दर्द के लिए ऑर्थोपेडिक, सिरदर्द के लिए न्यूरोलॉजिस्ट, हार्ट के लिए कार्डियोलॉजिस्ट। हर डॉक्टर अपने एंगल से देखता है और 2-2 दवाइयां लिख देता है। इस तरह वे 20-20 गोलियां लेकर आते हैं।

यह पॉलीफार्मेसी एक बड़ी बीमारी है। दवाई एक फॉरेन बॉडी है शरीर के लिए। सीनियर सिटीजन में किडनी और लीवर वीक हो जाते हैं। मैक्सिमम दवाई लीवर और किडनी के थ्रू बाहर जाती है। अगर ये ऑर्गन्स कमजोर हैं और उस पर 20 गोलियों का प्रेशर है, तो वे और खराब होते हैं।

डॉ. चैटर्जी कहते हैं कि अगर कोई भी सीनियर सिटीजन पांच से ज्यादा दवाई ले रहा है, तो यह एक बीमारी है। किसी भी हेल्दी सीनियर सिटीजन को पांच से ज्यादा दवाई की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

जॉइंट फैमिली का टूटना और टेक्नोलॉजी का रोल

पहले जॉइंट फैमिली में बुजुर्गों का ध्यान आसानी से हो जाता था। लेकिन अब यह कॉन्सेप्ट धीरे-धीरे खत्म हो रहा है, खासकर शहरों में। लोग नौकरियों के लिए दूसरे शहरों में रहते हैं। माता-पिता अकेले रह जाते हैं। रूरल इंडिया में अभी भी जॉइंट फैमिली है, लेकिन वहां हेल्थ एक्सेस की कमी है। पूरे भारत में सिर्फ 200 से कम स्किल्ड जेरियाट्रिशियन हैं।

शहरों में सीनियर लिविंग स्पेस आ रहे हैं, जहां बुजुर्ग अपने पीयर ग्रुप के साथ रह सकते हैं। लेकिन ये बहुत महंगे हैं और हर किसी के लिए संभव नहीं। ओल्ड एज होम भी एक विकल्प नहीं है क्योंकि वहां माता-पिता को डंप कर दिया जाता है।

टेक्नोलॉजी यहां बड़ा रोल प्ले कर सकती है। रिमोट मॉनिटरिंग, वेयरेबल डिवाइसेस, टेलीहेल्थ और टेलीमेडिसिन के जरिए दूर बैठे बच्चे अपने माता-पिता की सेहत पर नजर रख सकते हैं। डॉक्टर भी मॉनिटर कर सकते हैं। साथ ही, Healthy Aging India जैसी NGO इंटरजेनरेशनल बॉन्डिंग पर काम कर रही हैं, जहां रिटायर्ड बुजुर्गों को स्कूल के बच्चों के साथ एंगेज किया जाता है।

हेल्दी एजिंग का फॉर्मूला: क्या करें?

1. एक्सरसाइज: यह सबसे बड़ा एंटी-एजिंग ट्रीटमेंट है। डेली वॉकिंग और हफ्ते में दो दिन रेजिस्टिव ट्रेनिंग जरूरी है। मसल्स की भूख एक्सरसाइज है। 90 साल में भी अगर आप बाइसेप्स एक्सरसाइज करेंगे, तो मसल बनेगी।

2. कम खाना: कैलोरी रिस्ट्रिक्शन से आप लंबा जिओगे। 6 AM से 6 PM के बीच खाना खाने से आप हेल्दी रहोगे। 6 बजे के बाद खाने से स्ट्रेस हॉर्मोन कोर्टिसोल बढ़ता है, जो प्रेशर और हार्ट प्रॉब्लम का कारण बनता है।

3. प्रोटीन: मसल का खाना प्रोटीन है। अगर कोई 60 किलो वजन का सीनियर सिटीजन है, तो उसे 60 ग्राम डेली प्रोटीन चाहिए। 1 ग्राम पर किलो बॉडी वेट प्रोटीन लेना जरूरी है (किडनी प्रॉब्लम होने पर डॉक्टर से सलाह लें)।

4. स्ट्रेस कम करना: 40-50 की उम्र के लोग सबसे ज्यादा स्ट्रेस में रहते हैं – बच्चे नहीं पढ़ रहे, बॉस का प्रेशर, माता-पिता की देखभाल। स्ट्रेस मैनेजमेंट बहुत जरूरी है।

5. 7-8 घंटे की नींद: यह कंपल्सरी है। इसके बिना कोई हेल्दी 80 साल नहीं बनेंगे, 100 साल तो भूल ही जाइए।

6. ब्रेन को एक्टिव रखना: नया स्किल सीखना, रीडिंग की आदत, मैथमेटिकल कैलकुलेशन, अपने पैशन को पर्सू करना – ये सब ब्रेन को फर्टाइल बनाते हैं।

7. मोबाइल और सोशल मीडिया से दूरी: रील एडिक्शन से अटेंशन कम होता है और मेमोरी लॉस होती है।

एंटी-एजिंग ट्रीटमेंट: क्या काम करता है?

हाल ही में एक्ट्रेस शेफाली जरीवाला की मौत एंटी-एजिंग ट्रीटमेंट के दौरान हुई थी। डॉ. चैटर्जी बताते हैं कि जितने भी एंटी-एजिंग मेडिकेशन और सप्लीमेंट चल रहे हैं, वे ज्यादातर माइस मॉडल, मंकी मॉडल में ही वैलिडेटेड हैं। ह्यूमन में प्रॉपर क्लीनिकल ट्रायल नहीं हुए हैं।

किसी भी मेडिसिन को रेकमेंडेशन स्टेज में लाने से पहले मल्टीसेंट्रिक ट्रायल होने चाहिए। सिर्फ 2-3 बिलियनेयर या सेलिब्रिटी ने प्रैक्टिस किया तो मैं भी कर लूं – यह सही नहीं है। जो टाइम-टेस्टेड है, जो हजारों साल से हम करते आ रहे हैं – जैसे कम खाना, ज्यादा चलना, यह सब हमें अपनाना चाहिए।

सबसे बड़ा एंटी-एजिंग ट्रीटमेंट है – एक्सरसाइज और खुश रहना। हम क्लॉक को बंद नहीं कर सकते, लेकिन स्लो कर सकते हैं।

50 के बाद कौन से टेस्ट करवाएं?

50 साल का मैजिक नंबर है। अगर इसके बाद भी आप नहीं सुधरते, तो 70-80 साल बिस्तर में ही जिओगे। 50 के बाद यह करें:

  • कैंसर स्क्रीनिंग: हर साल स्टूल का ऑकल्ट ब्लड टेस्ट। हर 10 साल में एक बार कोलोनोस्कोपी।
  • क्रॉनिक नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज: प्रेशर, शुगर, हार्ट प्रॉब्लम, वैस्कुलर डिजीज, ओबेसिटी की स्क्रीनिंग।
  • बायोलॉजिकल एज असेसमेंट: यह आपकी सेल की एज बताता है, जो कैलेंडर एज से अलग हो सकती है। यह हेल्थ कुंडली की तरह है जो बताती है कि अगले 5 साल कैसे जाने वाले हैं।
  • फैमिली हिस्ट्री: अगर माता-पिता या रिश्तेदारों को प्रेशर, हार्ट प्रॉब्लम, स्ट्रोक, कैंसर या डिमेंशिया हुआ है, तो 50 में ही असेस करें।
डिमेंशिया: भूलने की बीमारी का इलाज है

डिमेंशिया को लोग उम्र की निशानी मानते हैं और नजरअंदाज करते हैं। लेकिन डॉ. चैटर्जी बताते हैं कि डिमेंशिया का हर स्टेज में इलाज है। सिर्फ दवाई नहीं, बल्कि नॉन-ड्रग थेरेपी भी – कंप्यूटर बेस्ड ट्रेनिंग, फोटोबायोमोडुलेशन, कीटो डाइट। AIIMS में स्मार्ट डिमेंशिया क्लीनिक शुरू हो चुका है।

डिमेंशिया से बचने का तरीका 40 साल से शुरू होता है – ब्रेन को एक्टिव रखें, स्ट्रेस कम करें, अच्छा खानपान, एक्सरसाइज, नया स्किल सीखें।

मसल लॉस और मेंटल हेल्थ

बुढ़ापे में शरीर कमजोर होने की मुख्य वजह मसल लॉस है। इसे रोकने के लिए प्रोटीन, एक्सरसाइज और रेजिस्टिव ट्रेनिंग जरूरी है। भारत में वेल्लोर के एक अध्ययन में पाया गया कि लगभग 40% बुजुर्ग सार्कोपीनिया (मसल लॉस) से पीड़ित थे।

मेंटल हेल्थ भी बहुत जरूरी है। ओल्ड एज में इंसान अकेला महसूस करता है, खासकर जब पार्टनर की मृत्यु हो जाती है। 80 साल के बाद लाइफ का पर्पस खत्म हो जाता है, जीने की इच्छा कम हो जाती है। डिप्रेशन बहुत कॉमन है, लेकिन परिवार को समझ नहीं आता।

डॉ. चैटर्जी कहते हैं – पर्पस बहुत जरूरी है। 80 प्लस अमिताभ बच्चन और एक आम आदमी में अंतर यह है कि बच्चन साहब के पास पर्पस है – नई फिल्म करनी है, अवार्ड मिलना है। उनके 70 साल के एक मरीज ने पार्किंसोनिज्म होते हुए भी पेंटिंग सीखी और 75 साल में दूसरों को सिखाना शुरू किया। आज वे 85 साल की हैं और उनकी बीमारी आगे नहीं बढ़ी।

सरकार को क्या करना चाहिए?

सरकार ने नेशनल प्रोग्राम फॉर हेल्थ केयर ऑफ एल्डरली शुरू किया है। एम्स में डिपार्टमेंट और नेशनल सेंटर बने हैं। लेकिन डॉ. चैटर्जी कहते हैं कि हमें बहुत तेजी से काम करना होगा। जागरूकता बढ़ानी होगी, हेल्थ प्रोफेशनल्स की संख्या बढ़ानी होगी, कम्युनिटी लीडर्स को ट्रेनिंग देनी होगी। एज-फ्रेंडली हॉस्पिटल्स बनाने होंगे। टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना होगा – वेयरेबल डिवाइसेस से मॉनिटरिंग, वॉर रूम जैसे सेटअप जहां सुपर कंप्यूटर अलार्म साइन ढूंढे।

70% बुजुर्ग रूरल इंडिया में रहते हैं। उनके लिए टेलीहेल्थ और टेलीमेडिसिन बड़ा रोल प्ले कर सकती है। गांवों में अभी भी मोबाइल और इंटरनेट है, इसका इस्तेमाल होना चाहिए।

ब्लू जोन से क्या सीखें?

दुनिया में कुछ ऐसी जगहें हैं जिन्हें ब्लू जोन कहते हैं – ओकिनावा (जापान), सार्डिनिया (इटली), निकोया (कोस्टा रिका), इकारा (ग्रीस), लोमा लिंडा (कैलिफोर्निया)। यहां लोग बहुत लंबा और स्वस्थ जीते हैं। इनकी खासियत – वेज खाना, बहुत चलना, मोबाइल नहीं देखना, कम्युनिटी के साथ बातचीत, कम खाना, सीनियर्स को रेस्पेक्ट, स्ट्रेस जीरो। यहां कैंसर, डायबिटीज, हाइपरटेंशन, डिप्रेशन, डिमेंशिया नहीं होती।

भारत में भी कुछ ट्राइबल कम्युनिटी और हिमाचल-उत्तराखंड के हिली एरिया में 100 साल के लोग हैं। यह सब लाइफस्टाइल की बात है, जगह की नहीं।


मुख्य बातें (Key Points)
  • 70% हेल्दी एजिंग लाइफस्टाइल और एनवायरनमेंट पर निर्भर करती है, सिर्फ 30% जीन्स पर
  • 40 से 50 साल की उम्र सबसे ज्यादा नजरअंदाज की जाती है, जबकि यही समय बुढ़ापे की तैयारी का है
  • डेली एक्सरसाइज, कम खाना (6 AM से 6 PM), 60 ग्राम प्रोटीन और 7-8 घंटे की नींद जरूरी है
  • पांच से ज्यादा दवाई लेना पॉलीफार्मेसी है और यह खुद एक बीमारी है
  • डिमेंशिया और डिप्रेशन का इलाज है, बुजुर्गों को पर्पसफुल जीवन जीने की जरूरत है

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: बुढ़ापे में हेल्दी रहने के लिए सबसे जरूरी क्या है?

उत्तर: डेली एक्सरसाइज (वॉकिंग और रेजिस्टिव ट्रेनिंग), कैलोरी रिस्ट्रिक्शन (6 AM से 6 PM के बीच खाना), प्रोटीन (1 ग्राम/किलो बॉडी वेट), स्ट्रेस मैनेजमेंट, 7-8 घंटे की नींद और ब्रेन को एक्टिव रखना सबसे जरूरी है।

प्रश्न 2: 50 साल के बाद कौन से टेस्ट करवाने चाहिए?

उत्तर: कैंसर स्क्रीनिंग (स्टूल ऑकल्ट ब्लड, कोलोनोस्कोपी), क्रॉनिक डिजीज स्क्रीनिंग (प्रेशर, शुगर, हार्ट), बायोलॉजिकल एज असेसमेंट, और फैमिली हिस्ट्री के आधार पर डिमेंशिया और कैंसर का असेसमेंट जरूरी है।

प्रश्न 3: क्या एंटी-एजिंग ट्रीटमेंट काम करते हैं?

उत्तर: ज्यादातर एंटी-एजिंग मेडिकेशन सिर्फ एनिमल मॉडल में टेस्ट हुए हैं, ह्यूमन में प्रॉपर क्लीनिकल ट्रायल नहीं हुए। सबसे बड़ा एंटी-एजिंग ट्रीटमेंट है एक्सरसाइज और खुश रहना। सेलिब्रिटी करते हैं इसलिए करना सही नहीं है।

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प्रश्न 4: डिमेंशिया से कैसे बचें?

उत्तर: 40 साल से शुरू करें – ब्रेन को एक्टिव रखें, नया स्किल सीखें, रीडिंग करें, मैथमेटिकल कैलकुलेशन करें, स्ट्रेस कम करें, एक्सरसाइज करें, मोबाइल और सोशल मीडिया से दूर रहें। डिमेंशिया का हर स्टेज में इलाज है।

प्रश्न 5: मसल लॉस से कैसे बचें?

उत्तर: 40 के बाद हर साल 1% मसल कम होती है अगर एक्सरसाइज नहीं करते। डेली वॉकिंग और हफ्ते में दो दिन रेजिस्टिव ट्रेनिंग करें। प्रोटीन 1 ग्राम/किलो बॉडी वेट लें। किडनी प्रॉब्लम हो तो डॉक्टर से सलाह लें।

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