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The News Air - Breaking News - Punjab Birth Certificate मामला: ‘लड़का-लड़की’ लिखा, नाम गायब – छात्र बर्बाद!

Punjab Birth Certificate मामला: ‘लड़का-लड़की’ लिखा, नाम गायब – छात्र बर्बाद!

पंजाब में हजारों छात्रों के जन्म प्रमाणपत्र में नाम नहीं, 14 साल बाद पोर्टल बंद, दाखले रुके, परिवार परेशान।

Ajay Kumar by Ajay Kumar
शनिवार, 18 जुलाई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, पंजाब
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Punjab Birth Certificate
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Punjab Birth Certificate: पंजाब के हजारों विद्यार्थियों का शैक्षिक भविष्य इन दिनों एक सरकारी पोर्टल के भरोसे अटका पड़ा है। उनके डिजिटल जन्म प्रमाणपत्र में नाम की जगह सिर्फ ‘लड़का’ या ‘लड़की’ दर्ज है। अब जब स्कूल-कॉलेज में दाखले का वक्त आया है, तो स्वास्थ्य विभाग का जवाब है – 14 साल के बाद नाम दर्ज नहीं हो सकता।

देखा जाए तो यह महज एक तकनीकी गड़बड़ी नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों के सपनों पर पानी फेरने वाला बड़ा संकट बन चुका है। और इसकी शुरुआत हुई थी बरसों पहले अस्पतालों की एक लापरवाही से।

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अस्पताल की पुरानी लापरवाही, आज छात्रों का संकट

Punjab में इन दिनों आठवीं से लेकर बारहवीं पास करने वाले छात्रों को अगली कक्षा या कॉलेज में दाखिला लेने के लिए एक अनोखी मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है। पंजाब सरकार ने हाल ही में यह नियम लागू किया है कि दाखले के लिए Digital Birth Certificate अनिवार्य है। उद्देश्य अच्छा था – पारदर्शिता और फर्जीवाड़े पर रोक।

लेकिन समस्या यहां से शुरू होती है।

हजारों बच्चों के जन्म के समय अस्पताल के स्टाफ ने रजिस्ट्रेशन में बच्चे का नाम दर्ज करने की जगह सिर्फ ‘लड़का’ (Male) या ‘लड़की’ (Female) लिख दिया था। उस समय शायद किसी ने यह नहीं सोचा था कि 14-15 साल बाद यही छोटी सी लापरवाही इन मासूमों की पढ़ाई के रास्ते में दीवार बन जाएगी।

अगर गौर करें तो यह किसी एक-दो शहर या जिले की बात नहीं है। पूरे पंजाब में ऐसे हजारों मामले सामने आ रहे हैं जहां माता-पिता स्कूलों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। लेकिन बिना नाम वाले जन्म प्रमाणपत्र की वजह से उनके बच्चों का दाखला नहीं हो पा रहा।

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जगजीत सिंह की कहानी: एक छात्र का अधूरा सपना

जगजीत सिंह का जन्म 28 अक्टूबर 2010 को हुआ था। आज वह दसवीं कक्षा में दाखिला लेने की उम्र में है। पढ़ाई में होनहार है, सपने आंखों में हैं। लेकिन उसके रास्ते में खड़ी है एक डिजिटल दीवार।

उसके Digital Birth Certificate में उसका नाम दर्ज नहीं है। जब उसके माता-पिता ने स्वास्थ्य विभाग के सिस्टम में नाम जोड़ने की कोशिश की, तो सदमा लगा। पता चला कि 14 साल की उम्र पूरी होने के बाद नाम दर्ज करने वाला पोर्टल ही बंद कर दिया गया है।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि जगजीत सिंह अकेला नहीं है। नंदनी और सैकड़ों अन्य छात्र भी इसी दलदल में फंसे हुए हैं। इन बच्चों की मेहनत, उनके माता-पिता के सपने – सब कुछ अब एक बंद सरकारी पोर्टल के भरोसे अटका पड़ा है।

दिलचस्प बात यह है कि इन बच्चों का कोई कसूर नहीं। न तो उन्होंने अपना नाम छुपाया, न ही कोई गलत काम किया। बस, जन्म के समय अस्पताल के कर्मचारी ने फॉर्म भरते वक्त आलस्य दिखाया और नाम लिखने की जगह सिर्फ लिंग (Gender) भर दिया।

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14 साल का कानूनी जाल, छात्र फंसे

रजिस्ट्रेशन ऑफ बर्थ एंड डेथ एक्ट की धारा 14 के अनुसार, जन्म के बाद 14 साल तक बच्चे का नाम बिना किसी देरी शुल्क या मामूली शुल्क के प्रमाणपत्र में दर्ज कराया जा सकता है। यह नियम सही भी है, क्योंकि इससे माता-पिता को समय मिलता है कि वे बच्चे का नाम सोच-समझकर तय करें।

लेकिन जैसे ही बच्चा 14 साल की उम्र पार करता है, डिजिटल सिस्टम में नाम दर्ज करने वाला लिंक या एप्लीकेशन स्वास्थ्य विभाग पंजाब द्वारा पूरी तरह बंद कर दिया जाता है।

इसका मतलब साफ है: अगर आपके बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र में नाम नहीं है और वह 14 साल से ऊपर का हो गया है, तो अब सिस्टम आपके लिए पूरी तरह बंद है। न कोई ऑनलाइन विकल्प, न कोई आसान रास्ता।

समझने वाली बात यह है कि यह कानून तब बनाया गया होगा जब डिजिटल जन्म प्रमाणपत्र अनिवार्य नहीं था। लेकिन अब जब दाखले के लिए यह जरूरी हो गया है, तो इस नियम ने हजारों छात्रों को मुसीबत में डाल दिया है।

सेवा केंद्रों ने भी हाथ खड़े किए

परेशान माता-पिता जब अपने बच्चों का नाम दर्ज कराने के लिए सेवा केंद्रों में जाते हैं, तो वहां का अनुभव और भी निराशाजनक होता है। सेवा केंद्र का सिस्टम 14 साल से अधिक उम्र के बच्चों की अर्जी स्वीकार ही नहीं करता।

स्टाफ बेबसी जताते हुए कहता है, “पोर्टल बंद है, हम कुछ नहीं कर सकते।”

यहां सवाल उठता है: जब सरकार जानती थी कि डिजिटल सर्टिफिकेट अनिवार्य किया जा रहा है, तो क्या पहले से मौजूद इन समस्याओं का आकलन नहीं किया जाना चाहिए था? क्या यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह पुरानी गड़बड़ियों को सुधारने का कोई तंत्र पहले बनाए?

दिलचस्प बात यह है कि डिजिटलीकरण का मकसद था प्रक्रिया को आसान बनाना, लेकिन यहां तो यह उल्टा हो गया। एक तकनीकी व्यवस्था ने हजारों छात्रों का रास्ता रोक दिया है।

स्कूल-कॉलेज भी लाचार, दाखला पूरी तरह ठप

आठवीं, दसवीं, बारहवीं पास करने के बाद अगली कक्षा या कॉलेज में दाखिला लेने वाले अधिकतर विद्यार्थियों की उम्र स्वाभाविक रूप से 14 साल से ऊपर होती है। और यहीं से शुरू होती है असली परेशानी।

स्कूल और कॉलेज प्रशासन अब सरकारी नियमों के तहत सिर्फ ऑनलाइन/डिजिटल जन्म प्रमाणपत्र मांग रहे हैं, जिस पर विद्यार्थी का सही नाम स्पष्ट रूप से दर्ज हो। पुराने हाथ से लिखे या साधारण प्रमाणपत्र अब मान्य नहीं हैं।

चूंकि हजारों छात्रों के डिजिटल प्रमाणपत्र में नाम नहीं है, इसलिए उनका दाखला पूरी तरह अटक गया है। स्कूल प्रशासन भी कहता है कि बिना सही दस्तावेज के वे दाखिला नहीं दे सकते।

और इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा पीड़ित हैं वे माता-पिता, जिन्होंने अपने बच्चों को मेहनत से पढ़ाया, गरीबी और मुश्किलों से लड़ते हुए उन्हें यहां तक लाए। लेकिन अब एक सरकारी सिस्टम की खामी उनके सभी सपनों पर पानी फेर रही है।

माता-पिता की गुहार: तुरंत समाधान चाहिए

प्रभावित परिवारों ने पंजाब सरकार और मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान से गुहार लगाई है। उनकी मुख्य मांगें हैं:

1. पोर्टल तुरंत दोबारा खोला जाए: स्वास्थ्य विभाग के पोर्टल पर 14 साल से ऊपर के बच्चों के नाम दर्ज करने वाली सुविधा तत्काल प्रभाव से शुरू की जाए।

2. प्रक्रिया सरल बनाई जाए: स्कूली रिकॉर्ड, आधार कार्ड और अन्य पहचान दस्तावेजों को आधार मानकर जन्म प्रमाणपत्र में नाम दर्ज करने की सरल व्यवस्था बनाई जाए।

3. विद्यार्थियों की पढ़ाई न रुके: जब तक स्थायी समाधान नहीं आता, तब तक अस्थायी प्रमाणपत्र या वैकल्पिक व्यवस्था से छात्रों का दाखिला सुनिश्चित किया जाए।

4. जिम्मेदारी तय की जाए: अस्पतालों की जिस लापरवाही से यह समस्या पैदा हुई, उसकी जांच हो और भविष्य में ऐसा न हो, इसके लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।

सरकारी तंत्र बनाम आम आदमी का दर्द

यह पूरा मामला एक बड़ा सवाल खड़ा करता है: जब सरकार कोई नई डिजिटल व्यवस्था लागू करती है, तो क्या उसकी जिम्मेदारी नहीं बनती कि पहले से मौजूद समस्याओं का आकलन और समाधान भी साथ-साथ किया जाए?

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Digital Birth Certificate की व्यवस्था निश्चित रूप से एक सकारात्मक कदम है। इससे पारदर्शिता बढ़ती है, धोखाधड़ी रुकती है। लेकिन जब यह व्यवस्था मासूम बच्चों के शैक्षिक भविष्य में रुकावट बन जाए, तो कहीं न कहीं सिस्टम में खामी है।

हजारों बच्चे, जिनका कोई कसूर नहीं, सिर्फ अस्पताल के स्टाफ की लापरवाही के शिकार बन गए हैं। वे आज अपने शैक्षिक सपनों को टूटते देख रहे हैं। और बस यहीं से शुरू होती है असली कहानी – एक ऐसे सिस्टम की, जो डिजिटल तो हो गया, लेकिन इंसानी संवेदनाओं और जमीनी हकीकत से कटा हुआ है।

अब देखना यह है कि पंजाब सरकार इस संकट को कितनी तेजी और संवेदनशीलता से सुलझाती है। क्योंकि समय बीत रहा है, और हर गुजरते दिन के साथ हजारों छात्रों का भविष्य और अंधकारमय होता जा रहा है।


मुख्य बातें (Key Points)
  • पंजाब में दाखले के लिए Digital Birth Certificate अनिवार्य, लेकिन हजारों छात्रों के प्रमाणपत्र में नाम नहीं
  • जन्म के समय अस्पतालों ने सिर्फ ‘लड़का’ या ‘लड़की’ लिखा, नाम दर्ज नहीं किया
  • रजिस्ट्रेशन ऑफ बर्थ एंड डेथ एक्ट की धारा 14 के तहत 14 साल बाद नाम दर्ज करने वाला पोर्टल बंद
  • सेवा केंद्र और स्वास्थ्य विभाग 14 साल से ऊपर के बच्चों की अर्जी स्वीकार नहीं कर रहे
  • स्कूल-कॉलेज बिना नाम वाले प्रमाणपत्र पर दाखिला देने से इनकार, हजारों छात्रों का भविष्य अटका

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: पंजाब में जन्म प्रमाणपत्र में नाम दर्ज करने की अंतिम उम्र सीमा क्या है?

उत्तर: रजिस्ट्रेशन ऑफ बर्थ एंड डेथ एक्ट की धारा 14 के अनुसार, जन्म के 14 साल तक बच्चे का नाम बिना देरी शुल्क या मामूली शुल्क के प्रमाणपत्र में दर्ज कराया जा सकता है। 14 साल की उम्र पूरी होने के बाद स्वास्थ्य विभाग का डिजिटल पोर्टल बंद हो जाता है।

प्रश्न 2: अगर जन्म प्रमाणपत्र में नाम नहीं है और 14 साल से अधिक उम्र हो गई है, तो क्या करें?

उत्तर: फिलहाल कोई ऑनलाइन विकल्प उपलब्ध नहीं है। प्रभावित परिवारों को जिला सामाजिक सुरक्षा अधिकारी या उपमंडल मजिस्ट्रेट (SDM) के पास शिकायत दर्ज करानी होगी। साथ ही, स्कूली रिकॉर्ड और आधार कार्ड जैसे दस्तावेजों के साथ स्वास्थ्य विभाग से विशेष अनुमति मांगनी होगी।

प्रश्न 3: क्या पंजाब में Digital Birth Certificate के बिना स्कूल या कॉलेज में दाखिला संभव है?

उत्तर: नहीं, पंजाब सरकार ने आठवीं कक्षा से लेकर उच्च शिक्षा (कॉलेज और यूनिवर्सिटी) में दाखले के लिए Digital Birth Certificate अनिवार्य कर दिया है। बिना इसके स्कूल और कॉलेज प्रशासन दाखिला नहीं दे रहे हैं।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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