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The News Air - Breaking News - Political Funding in India: चुनावी चंदे का खेल कैसे शुरू हुआ? जानें पूरी कहानी

Political Funding in India: चुनावी चंदे का खेल कैसे शुरू हुआ? जानें पूरी कहानी

आज़ादी के बाद से ही शुरू हो गया था पॉलिटिकल पार्टियों को डोनेशन देने का सिलसिला, टाटा-बिरला जैसे उद्योगपतियों ने कांग्रेस को दिया था सबसे ज़्यादा चंदा

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
गुरूवार, 19 मार्च 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, सियासत
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Political Funding in India
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Political Funding in India का इतिहास उतना ही पुराना है जितना भारत का लोकतंत्र। 1951 में जब देश में पहली बार आम चुनाव हुए, तभी से पॉलिटिकल पार्टियों को डोनेशन इकट्ठा करने का खेल शुरू हो गया था। उस दौर में इंडियन नेशनल कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी और टाटा, बिरला और ठाकुरदास जैसे बड़े उद्योगपति उसे सबसे ज़्यादा चंदा देते थे। बदले में इन उद्योगपतियों को लाइसेंस और ज़मीन अधिग्रहण में फ़ायदा मिलता था। यह वो दौर था जब भारत में Political Funding in India का बीज बोया गया, जो आज इलेक्टोरल बॉन्ड जैसे विवादों तक जा पहुंचा है।

चुनाव लड़ना क्यों है इतना महंगा?

किसी भी पॉलिटिकल पार्टी को चुनाव लड़ने के लिए बेहिसाब पैसों की ज़रूरत होती है। पूरे देश में रैलियां करनी होती हैं, पोस्टर और बैनर लगाने होते हैं, कार्यकर्ताओं के खाने-पीने का इंतज़ाम करना होता है, पेट्रोल-डीज़ल का खर्च उठाना होता है। अगर कोई नेता बिना शराब, बिरयानी या पैसा बांटे पूरी ईमानदारी से भी चुनाव लड़ना चाहे तो भी करोड़ों रुपये का खर्च आता है।

अब सवाल यह उठता है कि पॉलिटिकल पार्टी तो कोई बिज़नेस नहीं करती। वह कोई प्रोडक्ट बनाकर नहीं बेच रही और न ही उससे कोई मुनाफ़ा कमा रही है। राजनीति को तो समाज सेवा माना जाता है और नेताओं की बायो में “समाजसेवक” लिखा होता है। तो फिर इतना पैसा कहां से आएगा? इस हिसाब से तो सिर्फ अमीर लोग ही चुनाव लड़ सकते हैं और गरीब या पिछड़ा वर्ग चुनावी मैदान से बाहर हो जाएगा।

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Political Funding का कॉन्सेप्ट क्यों बनाया गया?

Political Funding in India के पीछे यही तर्क दिया गया कि लोकतंत्र में समानता होनी चाहिए। अगर कोई ईमानदार व्यक्ति गरीब है लेकिन उसे जनता का समर्थन हासिल है, तो वह भी सत्ता में आ सके। इसीलिए पॉलिटिकल पार्टियों को डोनेशन देने का कॉन्सेप्ट रखा गया ताकि आम लोग, कारोबारी और संस्थाएं उन पार्टियों को आर्थिक मदद दे सकें जिन पर उन्हें भरोसा है।

यह थ्योरी तो बड़ी अच्छी लगती है, लेकिन ग्राउंड रियलिटी कुछ और ही है। ज़मीनी हकीकत यह है कि जिस पार्टी के पास जितना ज़्यादा पैसा, उसके जीतने के चांस उतने ज़्यादा। और इसी सोच ने Political Funding in India को एक ऐसे खेल में बदल दिया जहां पैसा ही असली ताकत बन गया।

1951 का पहला चुनाव: जब शुरू हुआ डोनेशन का खेल

आज़ादी के बाद ईयर 1951 में भारत में पहली बार आम चुनाव हुए। यह देश का पहला वेल-ऑर्गेनाइज़्ड इलेक्शन था और इसी समय “रिप्रेज़ेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट 1951” पास किया गया। इस एक्ट का काम था चुनावी प्रक्रिया को डिफाइन करना, नियम-कायदे तय करना और इलेक्शन कैसे होंगे, इसका पूरा ढांचा खड़ा करना। बाद में जब बीजेपी इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम लेकर आई तो उसने इसी एक्ट में बदलाव किए थे।

उस पहले चुनाव में भी यही हो रहा था कि मैदान में जो पार्टी सबसे ज़्यादा पैसा लेकर उतरती थी, उसे एडवांटेज मिलता था। कांग्रेस उस वक्त सबसे बड़ी पार्टी थी, उसके जीतने के चांस सबसे ज़्यादा थे, इसलिए डोनेशन भी उसी को सबसे ज़्यादा मिलती थी।

टाटा, बिरला और ठाकुरदास: कांग्रेस के सबसे बड़े चंदादाता

Political Funding in India के शुरुआती दौर में देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों ने खुलकर कांग्रेस को डोनेशन दी। उस समय कुल डोनेशन का लगभग 34% हिस्सा अकेले टाटा, बिरला और ठाकुरदास जैसे इंडस्ट्रियलिस्ट्स देते थे। ये सभी कांग्रेस के फ़ेवर में रहते थे क्योंकि कांग्रेस सत्ता में थी और इन उद्योगपतियों को लाइसेंस, ज़मीन अधिग्रहण और बिज़नेस में फ़ायदा मिलता था।

दूसरी तरफ आरएसएस से जुड़ी भारतीय जनसंघ (जो आगे चलकर बीजेपी बनी), अखिल भारतीय सीपीआई जैसी पार्टियां उस दौर में छोटी थीं। इनके पास बजट कम रहता था और इनके जीतने के चांस भी कम होते थे, इसलिए कोई बड़ा उद्योगपति इन्हें फंडिंग नहीं देता था।

उस दौर में जनसंघ को सिर्फ एक बड़ा डोनर मिला था: बॉम्बे डाइंग के नुसली वाडिया, जो मोहम्मद अली जिन्ना के ग्रैंडसन थे। बस यही एक व्यक्ति था जो जनसंघ को डोनेट करता था, बाकी सारा पैसा कांग्रेस की झोली में जाता था।

आज़ादी से पहले भी होती थी फंडिंग पर बहस

Political Funding in India का मसला आज़ादी से पहले से ही विवादों में रहा है। 1943 में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने एक बार सार्वजनिक रूप से कहा था कि अपनी सुप्रीमेसी बनाए रखने के लिए मोहम्मद अली जिन्ना और महात्मा गांधी बड़े बिज़नेसमैन और मनी मैग्नेट से मदद ले रहे हैं। डॉ. अंबेडकर की यह टिप्पणी बताती है कि राजनीति और पैसे का गठजोड़ कोई नई बात नहीं है बल्कि यह आज़ादी की लड़ाई के दौर से ही चला आ रहा है।

1957: टाटा का ऐतिहासिक केस जिसने पर्दा उठाया

Political Funding in India का पहला बड़ा मामला 1957 में कोर्ट में दर्ज हुआ और इसने पूरे देश की आंखें खोल दीं। यह केस टाटा आयरन एंड स्टील लिमिटेड के ऊपर था। हुआ यह कि टाटा का एक शेयरहोल्डर था जयंतीलाल रणछोड़ दास कोटीचा। जब इन्होंने कंपनी की फाइनेंशियल रिपोर्ट देखी तो पता चला कि टाटा कांग्रेस को पैसा डोनेट कर रही है।

जयंतीलाल ने तुरंत कोर्ट में केस दायर कर दिया और तर्क दिया कि यह शेयरहोल्डर्स का पैसा है, बिना उनसे पूछे इसे किसी पॉलिटिकल पार्टी को डोनेट नहीं किया जा सकता। इस केस में जो सबसे चौंकाने वाली बात सामने आई वह यह थी कि टाटा की तरफ से वकीलों ने कोर्ट में ऑन रिकॉर्ड स्वीकार किया कि “हम कांग्रेस को इसलिए पैसा दे रहे हैं ताकि कांग्रेस सत्ता में बनी रहे क्योंकि उससे हमारी कंपनी को फ़ायदा है।”

यह बयान किसी बम से कम नहीं था। इसने साफ़ कर दिया कि Political Funding in India में उद्योगपति बिना किसी स्वार्थ के नहीं बल्कि अपने बिज़नेस इंटरेस्ट के लिए पार्टियों को पैसा दे रहे हैं। इस केस के बाद पूरे देश में पॉलिटिकल डोनेशन को लेकर ज़बरदस्त बहस शुरू हो गई।

1961: इनकम टैक्स एक्ट और पॉलिटिकल डोनेशन पर टैक्स छूट

टाटा केस के बाद Political Funding in India को लेकर बहस तेज़ हो गई। 1961 में 800 पेजेस का इनकम टैक्स ड्राफ्ट आया जिसमें पूरे देश के इनकम टैक्स को रेगुलेट करने की बात की गई। इसी दौरान कई नेताओं ने पुश करना शुरू किया कि जो कंपनियां पॉलिटिकल पार्टियों को डोनेशन देती हैं उन्हें टैक्स में छूट मिलनी चाहिए क्योंकि यह भी एक तरह का पब्लिक वेलफेयर का काम है।

शुरू में तो यह बात नहीं बनी, लेकिन बाद में इनकम टैक्स एक्ट 1961 में सेक्शन 13A(GGG-B) और 13A(GGG-C) जोड़े गए। इन प्रावधानों के तहत अगर आप किसी पॉलिटिकल पार्टी को डोनेट करते हैं तो आपको 100% टैक्स छूट मिलती है।

मंदिर से भी ऊपर रखा पॉलिटिकल पार्टियों को

Political Funding in India से जुड़ा सबसे दिलचस्प और विवादास्पद पहलू यह है कि टैक्स छूट के मामले में पॉलिटिकल पार्टियों को मंदिर और धार्मिक संस्थाओं से भी ऊपर रखा गया। अगर कोई व्यक्ति मंदिर में दान करता है तो उसे टैक्स में सिर्फ 50% छूट मिलती है, लेकिन अगर वही व्यक्ति किसी पॉलिटिकल पार्टी को डोनेशन देता है तो उसे पूरे 100% की टैक्स छूट मिलती है।

इसका सीधा मतलब यह है कि सरकार की नज़र में पॉलिटिकल पार्टियों को पैसा देना मंदिर में दान करने से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है। यह प्रावधान बताता है कि राजनीतिक दलों ने अपने फंडिंग के रास्ते खुद ही बनाए और उन्हें ऐसा ढांचा दिया कि पैसा उनकी तरफ आता रहे।

चुनावी चंदे ने कैसे बदला भारतीय लोकतंत्र का चेहरा

आज़ादी के बाद से लेकर आज तक Political Funding in India ने भारतीय लोकतंत्र के चेहरे को पूरी तरह बदल दिया है। जो सिस्टम समानता लाने के लिए बनाया गया था, वही सिस्टम आज उद्योगपतियों और सत्ता के बीच एक ऐसे गठजोड़ का ज़रिया बन गया है जहां पैसा देने वाला नीतियों पर प्रभाव डालता है और पैसा लेने वाला सत्ता में बना रहता है।

1951 में टाटा और बिरला कांग्रेस को चंदा देते थे ताकि उन्हें लाइसेंस और ज़मीन में फ़ायदा मिले। आज भी यही सिलसिला जारी है, बस चेहरे और पार्टियां बदल गई हैं। इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम इसी का सबसे नया और सबसे विवादास्पद रूप था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया।

आम आदमी के लिए इसका मतलब यह है कि जब तक चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता नहीं आती, तब तक यह तय करना मुश्किल रहेगा कि सरकारें जनता के लिए काम कर रही हैं या उन उद्योगपतियों के लिए जिन्होंने उन्हें चुनाव जिताने के लिए पैसा दिया है।

मुख्य बातें (Key Points)
  • 1951 के पहले चुनाव से ही पॉलिटिकल पार्टियों को डोनेशन देने का सिलसिला शुरू हुआ, कुल डोनेशन का 34% टाटा, बिरला और ठाकुरदास जैसे उद्योगपति देते थे
  • 1957 में टाटा आयरन एंड स्टील का केस कोर्ट में आया जिसमें टाटा ने माना कि वे कांग्रेस को इसलिए पैसा देते हैं ताकि कांग्रेस सत्ता में रहे और कंपनी को फ़ायदा मिले
  • इनकम टैक्स एक्ट 1961 में प्रावधान जोड़ा गया कि पॉलिटिकल पार्टी को डोनेशन देने पर 100% टैक्स छूट मिलेगी, जबकि मंदिर में दान पर सिर्फ 50% छूट मिलती है
  • डॉ. अंबेडकर ने 1943 में ही कहा था कि गांधी और जिन्ना बड़े बिज़नेसमैन से मदद ले रहे हैं, यानी राजनीति और पैसे का गठजोड़ आज़ादी से पहले से चला आ रहा है

FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: भारत में पॉलिटिकल फंडिंग कब शुरू हुई?

भारत में Political Funding in India का सिलसिला 1951 के पहले आम चुनाव से शुरू हुआ। उस दौर में टाटा, बिरला और ठाकुरदास जैसे उद्योगपति कांग्रेस को सबसे ज़्यादा डोनेशन देते थे। हालांकि, आज़ादी से पहले 1943 में ही डॉ. अंबेडकर ने राजनीतिक दलों और बिज़नेसमैन के गठजोड़ पर सवाल उठाए थे।

प्रश्न 2: पॉलिटिकल पार्टी को डोनेशन देने पर कितनी टैक्स छूट मिलती है?

इनकम टैक्स एक्ट 1961 के प्रावधानों के अनुसार, पॉलिटिकल पार्टी को डोनेशन देने पर 100% टैक्स छूट मिलती है, जबकि मंदिर या धार्मिक संस्थाओं में दान करने पर सिर्फ 50% टैक्स छूट का प्रावधान है।

प्रश्न 3: टाटा का पॉलिटिकल फंडिंग केस क्या था?

1957 में टाटा आयरन एंड स्टील के शेयरहोल्डर जयंतीलाल रणछोड़ दास कोटीचा ने कोर्ट में केस किया कि कंपनी बिना शेयरहोल्डर्स से पूछे कांग्रेस को पैसा डोनेट कर रही है। इस केस में टाटा के वकीलों ने कोर्ट में स्वीकार किया कि वे कांग्रेस को इसलिए फंड करते हैं ताकि कांग्रेस सत्ता में बनी रहे और कंपनी को बिज़नेस में फ़ायदा मिले।

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अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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