Political Cash Donation: सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई 31 अगस्त को – सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक पार्टियों को ₹2,000 से कम का नकद चंदा हासिल करने की इजाजत देने वाली आयकर कानून की व्यवस्था की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर 31 अगस्त को सुनवाई करेगा। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच इस मामले की सुनवाई करेगी।
देखा जाए तो यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक पारदर्शिता और चुनावी सुधारों से भी जुड़ा है। अगर कोर्ट इस व्यवस्था को गैर-संवैधानिक करार देता है, तो यह भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है।
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क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता खेम सिंह भाटी ने आयकर अधिनियम-1961 की धारा 13A की उप-धारा (D) को गैर-संवैधानिक करार देते हुए रद्द करने की मांग की है।
याचिका में कहा गया है कि नकद चंदे की इजाजत से चुनाव प्रक्रिया प्रभावित होती है और मतदाताओं को दान देने वालों तथा फंड के स्रोत के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी नहीं मिल पाती। यह लोकतांत्रिक पारदर्शिता के खिलाफ है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि वर्तमान कानून के तहत राजनीतिक दल ₹2,000 से कम की राशि नकद में ले सकते हैं, और इसकी कोई रिपोर्टिंग जरूरी नहीं है। इससे काले धन और बेनामी चंदे को बढ़ावा मिलता है।
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याचिका में क्या मांगें की गई हैं?
याचिका में चुनाव आयोग को यह निर्देश देने की भी मांग की गई है कि वह सियासी पार्टियों की रजिस्ट्रेशन और चुनाव निशान की अलॉटमेंट के दौरान यह शर्त लगाए कि राजनीतिक दल किसी भी तरह का नकद चंदा स्वीकार नहीं कर सकतीं।
याचिका में यह भी मांग की गई है कि सियासी पार्टियां चंदा देने वाले का नाम और अन्य जानकारी सार्वजनिक करें और कोई भी राशि नकद में न ली जाए ताकि सियासी फंडिंग की पारदर्शिता कायम रहे।
समझने वाली बात यह भी है कि यह मांग चुनावी बॉन्ड योजना को रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आई है।
इलेक्टोरल बॉन्ड फैसले का संदर्भ
याचिका में 2024 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी हवाला दिया गया है, जिसके जरिए चुनावी बॉन्ड योजना को रद्द कर दिया गया था। उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता होनी चाहिए और मतदाताओं को यह जानने का अधिकार है कि राजनीतिक दलों को किससे और कितना चंदा मिल रहा है।
अगर गौर करें तो इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर भी यही आपत्ति थी कि यह गुमनाम चंदे को बढ़ावा देता है। अब नकद चंदे पर भी यही सवाल उठाया जा रहा है।
कब हुई थी पहली सुनवाई?
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 24 नवंबर को याचिका पर केंद्र सरकार और अन्य पक्षों से जवाब मांगा था। अब 31 अगस्त को इस मामले की अगली सुनवाई होनी है।
दिलचस्प बात यह है कि इस याचिका पर अभी तक केंद्र सरकार का पूरा जवाब सामने नहीं आया है। सरकार का रुख क्या होगा, यह देखना अहम होगा।
क्यों अहम है यह मुद्दा?
राजनीतिक फंडिंग की पारदर्शिता लोकतंत्र की मजबूती के लिए बेहद जरूरी है। अगर राजनीतिक दल बड़ी मात्रा में नकद चंदा लेते रहेंगे और उसकी कोई जवाबदेही नहीं होगी, तो यह भ्रष्टाचार और काले धन को बढ़ावा देगा।
यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि छोटे-छोटे चंदे के नाम पर बड़ी रकम इकट्ठा की जा सकती है। उदाहरण के लिए, अगर कोई पार्टी 10 लाख लोगों से ₹2,000-₹2,000 का नकद चंदा लेती है, तो यह ₹200 करोड़ हो जाता है, और इसकी कोई रिपोर्टिंग नहीं होती।
दुनिया के अन्य देशों में क्या व्यवस्था है?
अगर हम दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों की बात करें, तो अधिकांश देशों में राजनीतिक चंदे की पूरी जानकारी सार्वजनिक करना अनिवार्य है। कई देशों में नकद चंदे पर पूर्ण प्रतिबंध है और सभी लेनदेन डिजिटल या चेक के जरिए होने चाहिए।
भारत में भी अब समय आ गया है कि राजनीतिक फंडिंग को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए।
मुख्य बातें (Key Points)
- सुप्रीम कोर्ट 31 अगस्त को नकद चंदे पर सुनवाई करेगा
- आयकर कानून की धारा 13A(D) को चुनौती दी गई है
- याचिकाकर्ता का कहना है कि नकद चंदा पारदर्शिता के खिलाफ है
- चुनाव आयोग को नकद चंदे पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश देने की मांग
- इलेक्टोरल बॉन्ड रद्द करने के फैसले का हवाला दिया गया
- जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच करेगी सुनवाई












