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The News Air - Breaking News - India Nepal Border Row: ‘भारत और नेपाल दोनों ने एक-दूसरे की जमीन दबाई’, नेपाल के PM बालेन शाह का विवादित बयान

India Nepal Border Row: ‘भारत और नेपाल दोनों ने एक-दूसरे की जमीन दबाई’, नेपाल के PM बालेन शाह का विवादित बयान

संसद में बालेन शाह के बयान से मचा बवाल, विदेश मंत्रालय ने दी सफाई, कहा - मतलब नो मैन्स लैंड से था

Ajay Kumar by Ajay Kumar
सोमवार, 1 जून 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय
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Nepal PM Balen Shah
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India Nepal Border Row: भारत और नेपाल… दो ऐसे देश हैं जिनका रिश्ता सिर्फ नक्शे पर नहीं है बल्कि रोटी-बेटी का माना जाता है। लेकिन इसी बीच नेपाल की संसद से एक ऐसा बयान आया जिसने दोनों देशों के कूटनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में खड़े होकर कह दिया कि न सिर्फ भारत ने नेपाल की जमीन पर कब्जा किया है, बल्कि नेपाल ने भी भारत की जमीन दबा रखी है। जी हां, आपने बिल्कुल सही सुना। इस बयान के आते ही काठमांडू से लेकर नई दिल्ली तक बवाल मच गया।

देखा जाए तो मामला इतना बढ़ा कि नेपाल के विदेश मंत्रालय को आनन-फानन में आकर इस पर सफाई देनी पड़ गई। आखिर क्या है इस क्रॉस बॉर्डर कब्जे का पूरा सच? क्या वाकई दोनों देशों के लोग एक-दूसरे की सरहद में खेती कर रहे हैं?

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संसद में क्या हुआ?

कहानी की शुरुआत होती है 31 मई को नेपाल की संसद से। सांसद सीमा विवाद पर सवाल पूछ रहे थे और प्रधानमंत्री बालेन शाह जवाब देने के लिए खड़े हुए। उन्होंने एक ऐसी बात कह दी जिससे सब हैरान रह गए।

पीएम शाह ने कहा: “प्रधानमंत्री बनने के बाद मुझे एक ऐसी सच्चाई पता चली जो आपको भी चौंका देगी। विवाद सिर्फ एक तरफा नहीं है। अगर कुछ जगहों पर भारत ने हमारी जमीन ली है तो कई जगहों पर नेपाल ने भी भारत की जमीन पर कब्जा किया है।”

समझने वाली बात यह है कि यह बयान बेहद संवेदनशील है और कूटनीति में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर किया जाता है। और बस यहीं से शुरू हुआ पूरा बवाल।

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विदेश मंत्रालय की सफाई

अब जैसे ही यह बयान टीवी पर चला, नेपाल में बवाल कट गया। विपक्ष ने घेरना शुरू किया तो विदेश मंत्रालय को तुरंत सफाई की ढाल आगे करनी पड़ी।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने साफ-साफ शब्दों में कहा कि भैया, प्रधानमंत्री जी का मतलब किसी नए इलाके पर दावा ठोकना नहीं था। उनका मतलब तो नो मैन्स लैंड यानी 10 गजा इलाके में होने वाले अतिक्रमण से था।

दिलचस्प बात यह है कि इस सफाई से भी पूरी तरह आग नहीं बुझी। लोग सवाल उठा रहे हैं कि अगर मामला सिर्फ नो मैन्स लैंड का था तो ऐसी भाषा क्यों इस्तेमाल की गई?

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नो मैन्स लैंड का मामला क्या है?

अब आप सोच रहे होंगे कि यह माजरा आखिर है क्या? बहुत आसान भाषा में आपको समझाते हैं।

भारत और नेपाल के बीच कई जगहों पर सीमा नदियां तय करती हैं। अब नदियां तो अपना रास्ता बदलती रहती हैं। इसी वजह से फिक्स्ड बाउंड्री सिद्धांत के तहत एक टेक्निकल पेच फंस गया है।

हुआ यह कि कूटनीतिक नक्शे के हिसाब से नेपाल के कुछ लोग अनजाने में उस जमीन पर खेती कर रहे हैं या रह रहे हैं जो भारत की तरफ आती है। और ठीक ऐसा ही भारत की तरफ के कुछ लोगों के साथ भी है जो नेपाली हिस्से वाली जमीन का इस्तेमाल कर रहे हैं।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि इसी को पीएम शाह ने ‘क्रॉस बॉर्डर कब्जा’ कह दिया था। लेकिन असल में यह तकनीकी मुद्दा है, न कि जानबूझकर किया गया अतिक्रमण।

कालापानी, लिपुलेख और सुस्ता – असली सिरदर्द

वैसे भारत और नेपाल के बीच असली और पुराना सिरदर्द कुछ खास इलाके हैं, जैसे कि कालापानी, लिपुलेख, लिंपिया, धुरा और सुस्ता। दोनों देश इन पर अपना-अपना दावा करते हैं।

भारत का हमेशा से साफ स्टैंड रहा है कि यह इलाके उत्तराखंड का हिस्सा हैं। जब भारत ने लिपुलेख दर्रे से होकर जाने वाले कैलाश मानसरोवर यात्रा रूट का उद्घाटन किया था, तब नेपाल ने इस पर आपत्ति जताई थी।

तब भारत ने कड़े शब्दों में कहा था कि नेपाल का दावा पूरी तरह एकतरफा और बनावटी है जिसका कोई आधार नहीं है। अगर गौर करें तो यह विवाद दशकों पुराना है और अब तक पूरी तरह सुलझा नहीं है।

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विशेषज्ञों की टीम करेगी समाधान

लेकिन अच्छी बात यह है कि इस कड़वाहट के बीच भी दोस्ती का रास्ता ढूंढा जा रहा है। पीएम बालेन शाह ने खुद संसद में भरोसा दिलाया है कि दोनों देश इस पुराने विवाद को सुलझाने के लिए गंभीर हैं।

दिलचस्प बात यह है कि इसके लिए किसी लड़ाई-झगड़े की नहीं बल्कि ज्ञान और विज्ञान की मदद ली जा रही है। दोनों देश इस बात पर सहमत हो गए हैं कि अब टेबल पर राजनीतिज्ञ नहीं बल्कि इतिहासकार, सर्वेक्षक (Surveyors) और एक्सपर्ट्स बैठेंगे।

वे पुराने नक्शों और तथ्यों को खंगालेंगे और नो मैन्स लैंड के इस पेच को हमेशा के लिए सुलझाएंगे। समझने वाली बात यह है कि यही सही तरीका है – तकनीकी समस्या का तकनीकी समाधान।

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1947 से चला आ रहा विवाद

नेपाल ने तो इस मुद्दे पर चीन और ब्रिटेन से भी बातचीत की है क्योंकि यह पूरा विवाद 1947 में अंग्रेजों के भारत छोड़ने के वक्त से ही चला आ रहा है।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि अंग्रेजों ने जाते-जाते कई जगहों पर सीमाएं अस्पष्ट छोड़ दीं, जिनका खामियाजा आज तक भुगतना पड़ रहा है। यही कारण है कि भारत-पाकिस्तान, भारत-चीन और भारत-नेपाल के बीच सीमा विवाद हैं।

रोटी-बेटी का रिश्ता बरकरार

तो बॉटम ऑफ द लाइन यह है कि नेपाल के पीएम ने जिसे ‘कब्जा’ कहा, वह दरअसल सीमा पर रहने वाले आम लोगों की खेतीबाड़ी और नदियों के रास्ता बदलने से उलझा एक तकनीकी मामला था।

लेकिन कूटनीति में एक-एक शब्द की कड़ी कीमत होती है और यही वजह रही है कि बालेन शाह के इस बयान पर इतना बड़ा बवंडर खड़ा हो गया।

अब उम्मीद यही है कि जब दोनों देशों के एक्सपर्ट्स और इतिहासकार एक साथ बैठेंगे तो सदियों पुराने इस नक्शे की उलझन को सुलझा लिया जाएगा। और बस यहीं से शुरू होगी असली दोस्ती – जब दोनों देशों की यह रोटी-बेटी वाली दोस्ती हमेशा बरकरार रहेगी।

भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा (Open Border) है। लाखों लोग दोनों देशों में आते-जाते रहते हैं। इस रिश्ते को किसी सीमा विवाद से खराब नहीं होने देना चाहिए।

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मुख्य बातें (Key Points)

• नेपाल के PM बालेन शाह ने कहा – भारत और नेपाल दोनों ने एक-दूसरे की जमीन दबाई
• विदेश मंत्रालय ने सफाई दी, कहा – मतलब नो मैन्स लैंड से था
• नदियों के रास्ता बदलने से तकनीकी पेच फंसा, आम लोग अनजाने में दूसरे देश की जमीन में खेती कर रहे
• विशेषज्ञों की टीम पुराने नक्शे और तथ्य खंगालकर सुलझाएगी मामला


FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: भारत-नेपाल के बीच मुख्य सीमा विवाद कौन से इलाकों में हैं?

उत्तर: कालापानी, लिपुलेख, लिंपिया, धुरा और सुस्ता मुख्य विवादित इलाके हैं। भारत इन्हें उत्तराखंड का हिस्सा मानता है जबकि नेपाल भी इन पर दावा करता है।

प्रश्न 2: नो मैन्स लैंड क्या है?

उत्तर: नो मैन्स लैंड वह इलाका है जो दो देशों की सीमा के बीच का खाली क्षेत्र होता है। भारत-नेपाल सीमा पर कई जगह नदियों के रास्ता बदलने से ऐसे इलाके बन गए हैं जहां दोनों देशों के लोग रह रहे हैं।

प्रश्न 3: क्या भारत-नेपाल सीमा विवाद सुलझेगा?

उत्तर: दोनों देशों ने इतिहासकारों, सर्वेक्षकों और विशेषज्ञों की टीम बनाने पर सहमति जताई है जो पुराने नक्शे और तथ्यों के आधार पर समाधान निकालेगी। उम्मीद है कि यह मुद्दा शांतिपूर्ण तरीके से सुलझ जाएगा।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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