NCERT Textbook Syllabus: वोटर सूचियों की ‘विशेष तीव्र सुधार’ (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया को अब NCERT की 9वीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में शामिल किया गया है। इस नई पुस्तक में ‘SIR’ को एक ऐसी अभ्यास प्रक्रिया के रूप में दर्शाया गया है जिसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश का कोई भी योग्य नागरिक वोटर सूची से वंचित न रहे और किसी भी अयोग्य व्यक्ति का नाम इसमें शामिल न हो सके।
देखा जाए तो यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब SIR प्रक्रिया को लेकर देश में गहरा राजनीतिक विवाद चल रहा है। दिलचस्प बात यह है कि इस प्रक्रिया के तहत अब तक करीब 6 करोड़ नाम वोटर सूची से हटाए जा चुके हैं, जिसके कारण विपक्षी दलों और भारतीय चुनाव आयोग के बीच काफी राजनीतिक तल्खी देखने को मिली है।
🔍 यह भी पढ़ें- NCERT Preparation UPSC: SMART Model से कैसे शुरू करें तैयारी, जानें सही रणनीति
नई पाठ्यपुस्तक में क्या शामिल किया गया?
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की इस नई पाठ्यपुस्तक में फेक न्यूज, गलत जानकारी और डराने-धमकाने जैसी बड़ी चुनौतियों के बावजूद देश में निष्पक्ष और पक्षपात रहित चुनाव करवाने के लिए भारतीय चुनाव आयोग (ECI) की खूब प्रशंसा की गई है।
‘Understanding Society: India and Beyond’ शीर्षक वाली इस पुस्तक के एक हिस्से में लिखा गया है, “चुनाव आयोग विशेष तीव्र सुधार (SIR) भी करवाता है, जिसमें वोटर सूचियों को अपडेट, सत्यापित और संशोधित किया जाता है।”
समझने वाली बात यह है कि पुस्तक में आगे लिखा है, “SIR के माध्यम से यह सुनिश्चित बनाया जाता है कि कोई भी योग्य नागरिक पीछे न छूटे और कोई अयोग्य व्यक्ति वोटर सूची में शामिल न हो। यह प्रक्रिया विशेष रूप से उन नए मतदाताओं के नाम जोड़ने में मदद करती है जो अभी-अभी 18 साल के हुए हैं और जागरूकता की कमी या किसी अन्य कारण से वोटर बनने से रह सकते हैं।”
🔍 यह भी पढ़ें- May 3 History: Lady Gaga के रिकॉर्ड Concert से लेकर जानें इतिहास की 10 बड़ी घटनाएं
किन आधार पर हटाए जाते हैं नाम?
पुस्तक में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस प्रक्रिया के तहत वोटर की मृत्यु, निवास बदलने, दोहरे पंजीकरण (duplicate enrolment) और स्थायी रूप से पता न मिलने के आधार पर ही नाम सूची से काटे जाते हैं।
अगर गौर करें तो आयोग इन पर आपत्ति उठाने का पूरा समय देता है। यानी अचानक से किसी का नाम नहीं काटा जाता।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि पुरानी 9वीं कक्षा की पुस्तक में चुनाव राजनीति के अध्याय में वोटर सूचियों के बारे में सिर्फ इतना ही लिखा था कि “वोटर सूची का संपूर्ण संशोधन हर पांच साल बाद होता है ताकि इसे अपडेट रखा जा सके।”
हैरान करने वाली बात यह है कि नए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचे (NCF) के तहत संशोधित इस नई पाठ्यपुस्तक में भारत की चुनाव प्रक्रिया के विशाल स्तर को उभारा गया है।
💡 यह भी पढ़ें- PM Kisan 23वीं किस्त: खाते में पैसा नहीं आया? तुरंत करें ये काम
SIR अभियान का इतिहास और विवाद
इस विशेष अभियान की शुरुआत पिछले साल 24 जून को बिहार विधानसभा चुनावों से पहले एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में की गई थी। इसके नतीजे के रूप में वोटर सूची में बड़ी छंटनी हुई और करीब 65 लाख नाम सूची से हटा दिए गए थे।
उस समय विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तीखे सवाल उठाते हुए आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग सत्ताधारी भाजपा के इशारे पर काम कर रहा है और जरूरी दस्तावेजों की कमी का बहाना बनाकर नागरिकों को वोट के अधिकार से वंचित कर रहा है।
चिंता का विषय यह है कि यह अभियान अब तक अपना एक साल पूरा कर चुका है और देश के 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लगातार जारी है। इस दौरान करीब 6 करोड़ नाम वोटर सूची से हटाए गए हैं।
देखा जाए तो यह संख्या बेहद बड़ी है। कुछ राज्यों में तो 10-15% तक मतदाताओं के नाम हटा दिए गए।
भारत की चुनाव प्रक्रिया का वर्णन
नई पाठ्यपुस्तक में भारत के चुनाव अभ्यास को विश्व में बेमिसाल बताया गया है। पुस्तक के अनुसार, 96.8 करोड़ से अधिक योग्य मतदाताओं के साथ भारत का चुनाव अभ्यास पूरी दुनिया में बेमिसाल और विलक्षण है।
‘मुफ्त और निष्पक्ष चुनावों के सामने चुनौतियां’ शीर्षक के तहत बताया गया है कि विभिन्न क्षेत्रों और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में फैले हजारों पोलिंग स्टेशनों और सैकड़ों राजनीतिक दलों के साथ चुनाव करवाना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है।
समझने वाली बात यह है कि पुस्तक में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता की प्रशंसा की गई है, जबकि हकीकत में इसी SIR प्रक्रिया को लेकर आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
विपक्ष के आरोप क्या हैं?
विपक्षी दलों का आरोप है कि SIR के नाम पर व्यवस्थित तरीके से खास समुदायों और इलाकों के मतदाताओं को सूची से बाहर किया जा रहा है। कांग्रेस, आप और अन्य विपक्षी दलों ने कई बार इस मुद्दे को उठाया है।
उनका कहना है कि:
- बिना पर्याप्त नोटिस दिए नाम हटाए जा रहे हैं
- आपत्ति दर्ज करने का उचित समय और तरीका नहीं दिया जा रहा
- खास इलाकों को निशाना बनाया जा रहा है
- दस्तावेजों की मांग अनुचित और जटिल है
हैरान करने वाली बात यह है कि इन सभी विवादों के बीच ही इस प्रक्रिया को NCERT की पाठ्यपुस्तक में सकारात्मक रूप से पेश किया गया है।
शिक्षा का राजनीतिकरण?
कुछ शिक्षाविदों और विश्लेषकों का मानना है कि विवादित मुद्दों को पाठ्यपुस्तकों में इस तरह से शामिल करना शिक्षा के राजनीतिकरण का उदाहरण है।
उनका तर्क है कि जब कोई मुद्दा अभी भी विवाद में है और उस पर राजनीतिक बहस जारी है, तो उसे स्कूली पाठ्यक्रम में तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं है।
दूसरी ओर, सरकार और NCERT का पक्ष है कि छात्रों को भारत की चुनावी प्रक्रिया के बारे में विस्तृत और अपडेटेड जानकारी देना जरूरी है।
राहत की बात यह है कि पुस्तक में यह भी बताया गया है कि किन आधारों पर नाम हटाए जाते हैं और आपत्ति का अधिकार भी है।
NCF के तहत अन्य बदलाव
नए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचे (NCF) के तहत NCERT की कई पुस्तकों में बड़े बदलाव किए गए हैं। कुछ ऐतिहासिक घटनाओं की व्याख्या बदली गई है, कुछ नए विषय जोड़े गए हैं और कुछ पुराने हटाए गए हैं।
यह SIR प्रक्रिया का समावेश भी उसी सिलसिले का हिस्सा है।
मुख्य बातें (Key Points)
- NCERT की 9वीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान पुस्तक में वोटर सूची की SIR प्रक्रिया शामिल की गई
- पुस्तक में चुनाव आयोग की प्रशंसा की गई है, फेक न्यूज जैसी चुनौतियों के बावजूद
- SIR के तहत अब तक 6 करोड़ नाम वोटर सूची से हटाए गए, विपक्ष ने लगाए पक्षपात के आरोप
- पुरानी पुस्तक में वोटर सूची पर सिर्फ एक लाइन थी, नई में विस्तृत जानकारी दी गई
- मृत्यु, निवास बदलने और दोहरे पंजीकरण के आधार पर नाम हटाने की प्रक्रिया बताई गई













