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The News Air - Breaking News - Mekedatu Dam पर छिड़ी नई जंग, विजय ने खेला बड़ा दांव

Mekedatu Dam पर छिड़ी नई जंग, विजय ने खेला बड़ा दांव

कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी जल विवाद फिर गरमाया, थलपति विजय ने NGT में दायर की याचिका, 9000 करोड़ की परियोजना पर संकट

Ajay Kumar by Ajay Kumar
मंगलवार, 2 जून 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, सियासत
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Mekedatu Dam
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Mekedatu Dam Controversy एक बार फिर दक्षिण भारत की राजनीति में भूचाल ला रहा है। कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के पानी को लेकर दशकों पुराना विवाद अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। इस बार लड़ाई में कूदे हैं दक्षिण के सुपरस्टार और तमिलगा वेट्री कड़गम (TVK) के संस्थापक थलपति विजय, जिन्होंने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में याचिका दायर कर 9000 करोड़ रुपये की इस विशाल परियोजना को रोकने की मांग की है।

कहने का मतलब साफ है—यह सिर्फ पानी की लड़ाई नहीं रह गई है। अब यह राजनीति, पर्यावरण और दो राज्यों की आजीविका का सवाल बन चुका है। देखा जाए तो 2018 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद यह विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा।

🔍 यह भी पढ़ें- Tungabhadra Dam का अनोखा इतिहास: बिना Cement के बना वो चमत्कार जिसने खत्म किया अकाल!

क्या है Mekedatu Dam परियोजना?

अगर गौर करें तो मेकेदातु शब्द ही कन्नड़ भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है—’मेके’ यानी बकरी और ‘दातु’ यानी छलांग। कर्नाटक के रामनगर जिले में कनकपुरा के पास कावेरी नदी पर एक इतना संकरा और गहरा गॉर्ज बना हुआ है कि कहा जाता है—एक बकरी भी इसे कूदकर पार कर सकती है।

इसी भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाने के लिए कर्नाटक सरकार ने 2013 में एक महत्वाकांक्षी योजना की घोषणा की। यह परियोजना करीब 9000 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली है और इसके तहत:

परियोजना का पहलूविवरण
अनुमानित लागत₹9,000 करोड़
बिजली उत्पादन400 मेगावाट (हाइड्रो पावर)
जल भंडारण क्षमता67 TMC (Thousand Million Cubic feet)
बेंगलुरु के लिए पेयजल4.75 TMC
लाभार्थी आबादीबेंगलुरु के 1.3 करोड़+ निवासी

कर्नाटक का तर्क बिल्कुल सीधा है—बेंगलुरु देश की सिलिकॉन वैली है। यहां की आबादी तेजी से बढ़ रही है और गर्मी के मौसम में पेयजल संकट गहरा जाता है। इसलिए हम सिर्फ पीने का पानी स्टोर कर रहे हैं, कोई नई सिंचाई योजना नहीं ला रहे। जो पानी बहकर समुद्र में बर्बाद हो रहा है, उसे रोककर बिजली भी बना रहे हैं।

🔍 यह भी पढ़ें- Kallanai Dam: 2000 साल पुराना भारत का यह डैम आज भी करता है काम

तमिलनाडु क्यों है इस परियोजना के खिलाफ?

दिलचस्प बात यह है कि तमिलनाडु इस परियोजना का नाम सुनते ही भड़क जाता है। इसके पीछे तीन बड़े कारण हैं।

पहला, पानी के प्रवाह पर नियंत्रण का डर। तमिलनाडु का कहना है कि मेकेदातु की लोकेशन ठीक उस बॉर्डर के पहले है जहां से कावेरी का पानी तमिलनाडु में प्रवेश करता है। अगर वहां 67 TMC का विशाल बांध बन गया, तो पानी की चाबी पूरी तरह कर्नाटक के हाथ में चली जाएगी। यानी कि जब चाहा—पानी रोक दिया, जब चाहा—छोड़ दिया।

दूसरा, 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन। देश की सर्वोच्च अदालत ने साफ तौर पर तय किया था कि सामान्य वर्षों में कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए 177.25 TMC पानी छोड़ना होगा। तमिलनाडु का आरोप है कि अगर कर्नाटक ने ऊपर ही पानी रोक लिया, तो नीचे पानी पहुंचेगा कैसे?

तीसरा और सबसे भावनात्मक मुद्दा है—कावेरी डेल्टा की तबाही का खतरा। तमिलनाडु का तंजावुर, तिरुचिरापल्ली और नागपट्टनम का इलाका कावेरी डेल्टा कहलाता है। इसे तमिलनाडु का ‘धान का कटोरा’ भी कहा जाता है। यहां के लाखों किसान पूरी तरह कावेरी नदी पर निर्भर हैं। धान की खेती के लिए भारी मात्रा में पानी चाहिए। अगर पानी में देरी हुई या कम मिला, तो किसानों की फसलें तबाह हो जाएंगी।

ब्रिटिश काल से चला आ रहा है यह विवाद

समझने वाली बात यह है कि यह झगड़ा आज का नहीं है। इसकी जड़ें ब्रिटिश काल तक जाती हैं। 1892 में पहली बार मैसूर रियासत और मद्रास प्रेसिडेंसी के बीच जल बंटवारे का समझौता हुआ था। फिर 1924 में 50 वर्षीय समझौता हुआ, जिसमें कृष्णराज सागर बांध को मंजूरी दी गई।

1974 में जब यह समझौता खत्म हुआ, तो आधुनिक विवाद की शुरुआत हो गई। कर्नाटक ने नए बांध बनाने शुरू किए। 1990 में केंद्र सरकार ने कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया। और अंततः 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

कोर्ट ने कावेरी नदी को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया। कर्नाटक का कोटा बढ़ाया गया (क्योंकि बेंगलुरु की बढ़ती जरूरतें थीं)। तमिलनाडु का कोटा घटाकर 177.25 TMC कर दिया गया। साथ ही कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण का भी गठन किया गया।

🔍 यह भी पढ़ें- Tehri Dam India: भागीरथी पर बना भारत का सबसे ऊंचा डैम, जानें पूरी कहानी

फिर विवाद क्यों उठा?

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि जब मानसून अच्छा होता है, तब तो कोई दिक्कत नहीं होती। पानी एक्सेस में रहता है। लेकिन संकट के वर्षों में—जब सूखा पड़ता है, जब बारिश कम होती है—तब दोनों राज्य आपस में भिड़ जाते हैं। हर कोई कहता है, “हमें कम पानी मिला।”

मेकेदातु बांध बनने के बाद तमिलनाडु को यह डर सता रहा है कि सूखे के सालों में कर्नाटक उसे पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसा देगा। और यही है इस पूरे विवाद की जड़।

पर्यावरण का सवाल और विजय की राजनीतिक चाल

अब इस कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट है—पर्यावरण का। जिस जगह मेकेदातु बांध बनना है, वह कावेरी वन्यजीव अभयारण्य के बेहद करीब और बफर जोन में आता है।

पर्यावरणविदों के मुताबिक:

  • लगभग 5000 हेक्टेयर से अधिक जंगल जलमग्न हो जाएगा
  • यहां हाथियों का प्रमुख कॉरिडोर है, जो बंद हो जाएगा
  • इससे मानव-पशु संघर्ष बढ़ेगा
  • कई दुर्लभ प्रजातियां हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी

और ठीक यहीं पर एंट्री हुई थलपति विजय की। उन्होंने अपनी नई राजनीतिक पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (TVK) के माध्यम से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में याचिका दायर की है। इससे पहले उन्होंने प्रधानमंत्री से भी मुलाकात की थी।

विजय की यह चाल एक तीर से दो निशाने मारने वाली है। पहला—वे खुद को पर्यावरण और किसानों का मसीहा साबित कर रहे हैं। दूसरा—तमिलनाडु की जनता को संदेश दे रहे हैं कि वे राज्य के हितों के लिए किसी भी हद तक जाएंगे।

तमिलनाडु की राजनीति में कावेरी केवल एक नदी नहीं है। यह एक भावनात्मक और संवेदनशील मुद्दा है। सत्ता की चाबी अक्सर इसी से तय होती है कि कौन सी पार्टी केंद्र या कर्नाटक के सामने तमिलनाडु के किसानों के हक के लिए कितनी मजबूती से खड़ी होती है।

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असली समस्या कहां है?

दरअसल यह विवाद सिर्फ दो राज्यों की लड़ाई भर नहीं है। इसके पीछे तीन गहरे सवाल छिपे हैं।

पहला, अनियोजित शहरीकरण। बेंगलुरु कंक्रीट का जंगल बनता जा रहा है। भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे गिर चुका है। आज हम बेंगलुरु की प्यास बुझाने के लिए कावेरी को दांव पर लगा रहे हैं। कल किसी और शहर के लिए किसी और नदी को दांव पर लगाएंगे। क्या शहरों के पास रेनवाटर हार्वेस्टिंग और वाटर रिसाइक्लिंग का कोई ठोस मॉडल नहीं होना चाहिए?

दूसरा, जलवायु परिवर्तन। मानसून का पैटर्न पूरी तरह बदल चुका है। कभी बेहद तेज बारिश (फ्लैश फ्लड्स), तो कई महीनों तक सूखा। पुराने जमाने के जल बंटवारे के फॉर्मूले अब काम नहीं करेंगे।

तीसरा, जल संघवाद (Water Federalism)। भारतीय संविधान में पानी राज्य सूची का विषय है, लेकिन अंतरराज्यीय नदियां केंद्र सरकार का विषय हैं। जब तक राज्य नदियों को अधिकार और वर्चस्व की लड़ाई के नजरिए से देखना बंद नहीं करेंगे, तब तक इन्हें साझा संसाधन के रूप में विकसित नहीं किया जा सकेगा।

आगे का रास्ता क्या हो?

विशेषज्ञों का मानना है कि समाधान कोर्ट की कचहरियों में नहीं, बल्कि दोनों राज्यों की आपसी बातचीत में है। एक डेटा-ड्रिवन और साइंटिफिक डिस्ट्रेस शेयरिंग फॉर्मूला बनाना होगा। जब खराब मानसून हो, तब पानी का बंटवारा राजनीति के आधार पर नहीं, बल्कि जरूरत और इंसानियत के आधार पर हो।

साथ ही पर्यावरणीय प्रभाव का गंभीरता से आकलन करना होगा। क्या विकास के नाम पर हम अपनी जैव विविधता, अपने जंगल और वन्यजीवों का बलिदान दे सकते हैं? यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

मुख्य बातें (Key Points)
  • Mekedatu Dam परियोजना 9000 करोड़ रुपये की है, जिसमें 67 TMC जल भंडारण और 400 मेगावाट बिजली उत्पादन की योजना है
  • कर्नाटक का दावा है कि यह बेंगलुरु के 1.3 करोड़ लोगों को पेयजल उपलब्ध कराएगा
  • तमिलनाडु का विरोध तीन आधारों पर है: पानी पर नियंत्रण का डर, सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले का उल्लंघन, और कावेरी डेल्टा के किसानों की तबाही
  • थलपति विजय ने NGT में याचिका दायर कर पर्यावरणीय चिंताओं को उठाया है
  • लगभग 5000 हेक्टेयर जंगल डूबने और हाथी कॉरिडोर के नष्ट होने का खतरा है
  • यह विवाद ब्रिटिश काल (1892) से चला आ रहा है और सूखे के वर्षों में गहरा जाता है

 

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: Mekedatu Dam परियोजना क्या है और इसकी लागत कितनी है?

मेकेदातु बांध परियोजना कर्नाटक के रामनगर जिले में कावेरी नदी पर बनने वाली 9000 करोड़ रुपये की योजना है। इसमें 67 TMC जल भंडारण, 400 मेगावाट बिजली उत्पादन और बेंगलुरु के लिए 4.75 TMC पेयजल की व्यवस्था है।

प्रश्न 2: तमिलनाडु Mekedatu Dam का विरोध क्यों कर रहा है?

तमिलनाडु का कहना है कि यह बांध उनके पानी के प्रवाह पर कर्नाटक का नियंत्रण बढ़ा देगा, 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन है, और सूखे के वर्षों में कावेरी डेल्टा के किसानों की फसलें तबाह हो जाएंगी।

प्रश्न 3: थलपति विजय ने इस मामले में क्या भूमिका निभाई है?

थलपति विजय ने अपनी पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (TVK) के माध्यम से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में याचिका दायर की है। उनका आरोप है कि यह परियोजना पर्यावरण के लिए घातक है और 5000 हेक्टेयर जंगल डूब जाएगा।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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