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The News Air - Breaking News - Mamata Banerjee CM Story: सड़क से सत्ता तक की अद्भुत राजनीतिक यात्रा

Mamata Banerjee CM Story: सड़क से सत्ता तक की अद्भुत राजनीतिक यात्रा

जेपी की कार पर नृत्य करने वाली युवा कांग्रेसी से बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री तक, 34 साल के कम्युनिस्ट राज को कैसे खत्म किया ममता ने

The News Air Team by The News Air Team
बुधवार, 15 अप्रैल 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, पश्चिम बंगाल, सियासत, स्पेशल स्टोरी
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Mamata Banerjee
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Mamata Banerjee Political Journey : सिंगुर की सड़कों से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक—ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। 1975 में जयप्रकाश नारायण की कार के बोनट पर चढ़कर नारे लगाने वाली 21 साल की वह युवा कांग्रेसी आज पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री हैं।

देखा जाए तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, दृढ़ संकल्प और जमीनी राजनीति की ताकत का सबूत है। अगर गौर करें तो ममता ने न केवल कांग्रेस पार्टी से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई, बल्कि 34 साल के वामपंथी राज को भी धूल चटा दी।

1975: आपातकाल के दौर में जेपी का विरोध

साल 1975 में देश में इंदिरा गांधी की सरकार ने आपातकाल की घोषणा कर दी थी और पूरे 21 महीनों तक देश की राजनीति दो धड़ों में बंटी रही। एक धड़ा आपातकाल के साथ खड़ा था और दूसरा इसके खिलाफ। जेपी उर्फ जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी को जड़ से उखाड़ फेंकने का आंदोलन छेड़ रखा था।

25 अगस्त 1975 के दिन जेपी कोलकाता पहुंचे एक जनसभा को संबोधित करने। जैसे ही उनका काफिला शहर में दाखिल हुआ, उनका सामना सैकड़ों कांग्रेसियों की भीड़ से हुआ। दिलचस्प बात यह है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने फैसला लिया था कि जेपी को बंगाल में सफल नहीं होने देंगे।

समझने वाली बात यह है कि जेपी के काफिले के आगे सड़क के बीचोंबीच एक 20-21 साल की युवती सफेद साड़ी पहने खड़ी थी। वह युवती तमतमाई आंखों से जेपी की कार को घूर रही थी। जैसे ही गाड़ी नजदीक आई, उस महिला और उसके समर्थकों ने जोर से गाड़ी के बोनट पर हाथ मारा और गाड़ी रोकने की कोशिश की।

कार के बोनट पर चढ़कर किया विजय नृत्य

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि वह युवा महिला नेता कुछ देर बाद जेपी की कार के आगे सड़क पर लेट गई। जेपी का काफिला थम गया। फिर वह युवा महिला अपनी जगह से उठी और जयप्रकाश नारायण की उस सफेद एंबेसडर कार के बोनट पर चढ़ गई। उसने कार के बोनट से नारे लगाए, भाषण दिए। कहा जाता है कि उस महिला नेता ने विजय नृत्य भी किया।

कुछ दिनों बाद उस महिला नेता की तस्वीरें दिल्ली तक पहुंची। कांग्रेस पार्टी में नाम और कद बढ़ा और फिर भारत के इतिहास में कुछ चीजें हुईं। वह महिला देश की पहली रेल मंत्री बनी। वह पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी। वह बंगाल के वामपंथी राज का ताबूत लेकर आई। हम बात कर रहे हैं तृणमूल कांग्रेस की सर्वेसर्वा और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की।

काली घाट के छोटे से घर से शुरुआत

साल 1955 में वीरभूम में ममता बनर्जी का जन्म हुआ और फिर कोलकाता के काली घाट में लालन-पालन हुआ। आदि गंगा कैनाल के पास मौजूद एक छोटे से घर में। ममता बनर्जी जिस समय बड़ी हो रही थी, उस समय बंगाल कम्युनिस्ट पार्टियों की जद में जा रहा था।

पिता प्रोमलेश्वर बनर्जी खुद कांग्रेसी थे। तो ऐसा कह सकते हैं कि बचपन में ही ममता बनर्जी की राजनीति की दिशा तय हो गई थी। साल 1972 की 5 जनवरी को ममता बनर्जी का 17वां जन्मदिन मनाया गया। लेकिन अगले महीने यानी 9 फरवरी को उनके पिता का निधन हो गया। वजह पेट का अल्सर और प्रॉपर मेडिकल केयर न मिल पाना।

कॉलेज से ही जुड़ गईं राजनीति से

यह वह समय था जब ममता बनर्जी का करियर खराब हो सकता था। लेकिन ममता ने अलग रास्ता चुना। उन्होंने सीधे कोलकाता के जोगमाया देवी कॉलेज में दाखिला लिया। वह सुबह 3:30 बजे उठती, अपने भाइयों, बहन और मां के लिए खाना बनाती और फिर कॉलेज की ओर निकल जाती।

इसी कॉलेज में वह वेस्ट बंगाल छात्र परिषद से जुड़ीं। यह कांग्रेस का ही एक स्टूडेंट ग्रुप था जिसमें काम करते हुए ममता और उनके सहयोगियों ने कम्युनिस्ट पार्टी से सीधा लोहा लिया। उनका साथ दिया चार बड़े नेताओं ने—पार्थ रॉय चौधरी, रंजीत घोष, राणा दा और दिलीप मजूमदार।

मोरारजी देसाई को काला झंडा दिखाकर हुईं चर्चित

साल 1977 में जनता पार्टी ने कांग्रेस को हरा दिया। मोरारजी देसाई पीएम बने तो कुछ ही दिनों बाद उन्होंने कोलकाता की यात्रा करने की ठान ली। छात्र परिषद के स्टूडेंट्स ने प्लान बनाया कि मोरारजी को काला झंडा दिखाना है।

दिलचस्प बात यह है कि पुलिस ने सबको चिन्हित कर रखा था। सबको रोक लिया गया। लेकिन पुलिस से एक चूक हो गई। वह ममता बनर्जी का नाम तो जानते थे लेकिन चेहरा अभी तक उनके जेहन में नहीं बैठ पाया था। ममता बनर्जी ने इसका फायदा उठाया। भीड़ के बीच से पुलिस क्वाड्रन से बचते हुए ममता प्रधानमंत्री के काफिले के सामने पहुंच गई और काला झंडा लहरा दिया।

1984: जाधवपुर से पहली बड़ी जीत

साल 1984 में लोकसभा चुनाव का वक्त आया। कांग्रेस को बंगाल में अलग-अलग सीटों पर लोग तो मिल गए थे, लेकिन एक सीट पर पार्टी दिमाग धुन रही थी। यह सीट थी जाधवपुर लोकसभा सीट। इस सीट पर सीपीएम के सोमनाथ चटर्जी दो बार से जीत रहे थे।

प्रणब मुखर्जी ने बंगाल छात्र परिषद के नेता सुब्रत मुखर्जी से बात की। सुब्रत मुखर्जी ने कुछ दिनों तक रिसर्च करने के बाद एक नाम सुझा दिया—ममता बनर्जी। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि ममता की उम्मीदवारी एक सेफ बेट थी। अगर वह जीतीं तो बड़ी बात, हारीं तो भी कोई नुकसान नहीं।

दांव खेला गया और ममता बनर्जी ने घर-घर जाकर वोट मांगना शुरू कर दिया। सफेद साड़ी और रबड़ की चप्पल पहने एक लड़की वोट मांग रही थी तो लोगों ने ध्यान से सुना। चुनाव के बाद नतीजे आए। ममता बनर्जी ने लगभग 20,000 वोटों के अंतर से सोमनाथ चटर्जी को हरा दिया और बन गईं उस समय की सबसे युवा लोकसभा सांसद।

1990: सिर पर रॉड से हमला, खून से लथपथ

16 अगस्त 1990 का दिन ममता बनर्जी के जीवन में एक टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। बस और ट्राम के बढ़े हुए किराए के खिलाफ कांग्रेस ने बंद का ऐलान किया था। ममता बनर्जी के नेतृत्व में कांग्रेस नेताओं ने हजरा जंक्शन में मार्च निकाला।

जैसे ही काफिला आगे बढ़ा, सीपीएम के कार्यकर्ताओं ने उन्हें घेर लिया। समझने वाली बात यह है कि एक कार्यकर्ता ने ममता को मारने के लिए एक रॉड उठाई। निशाना था ममता बनर्जी का सिर। पूरी तेजी के साथ वह रॉड ममता बनर्जी के सिर पर पड़ी। ममता खून से लथपथ हो गईं। उनकी सफेद साड़ी खून से लाल हो रही थी।

फिर एक और कार्यकर्ता ने लोहे की रॉड से दोबारा प्रहार किया। हमला करने वाले का नाम था लालू आलम। ममता को अस्पताल ले जाया गया। वहां पर उन्होंने गुस्से में कहा कि मैं उनको छोडूंगी नहीं। ममता कुछ हफ्तों तक अस्पताल में रहीं। फिर उन्होंने बदला लेना शुरू किया—चुनाव लड़कर।

1998: तृणमूल कांग्रेस की स्थापना

साल 1997 तक आते-आते ममता और कांग्रेस के बीच की खाई बढ़ती जा रही थी। ममता चाहती थीं कि पार्टी की लीडरशिप में बदलाव हो। सोनिया गांधी चाहती थीं कि ममता अपना तल्ख तेवर त्याग दें। लेकिन दोनों में से कोई भी झुकने को तैयार नहीं था।

9 अगस्त 1997 को ममता बनर्जी ने कोलकाता के ब्रिगेड ग्राउंड में रैली आयोजित की। उन्होंने खुले मंच से कांग्रेस से दूरी जाहिर कर दी। फिर 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने दिल्ली में अजीत पांजा के घर पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। घोषणा कर डाली कि हमारी नई पार्टी होगी जिसका नाम होगा तृणमूल कांग्रेस। उस दिन ममता को कांग्रेस से निष्कासित भी कर दिया गया।

2006-2008: सिंगुर आंदोलन ने बदली तस्वीर

साल 2006 में बंगाल सरकार ने कोलकाता से 40-50 किलोमीटर दूर सिंगुर में लगभग 997 एकड़ जमीन को टाटा मोटर्स के नाम आवंटित कर दिया। टाटा समूह इस जमीन पर टाटा नैनो (लख टकिया कार) का प्लांट लगाना चाहता था। लेकिन किसानों को हटाकर जमीन को सपाट करना था।

25 सितंबर 2006 को ममता सिंगुर पहुंचीं। उन्होंने किसानों के समर्थन में प्रदर्शन शुरू किया। फिर 4 दिसंबर 2006 को ममता ने कोलकाता में आमरण अनशन शुरू किया। यह अनशन कुल 26 दिनों तक चला। राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के फोन और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चिट्ठी के बाद 29 दिसंबर को कहीं जाकर ममता बनर्जी ने अपनी भूख हड़ताल तोड़ी।

साल 2008 के अक्टूबर में रतन टाटा के फोन पर एक एसएमएस आया। मैसेज में लिखा था—स्वागतम। रतन टाटा और उनका नैनो प्लांट दोनों गुजरात के सनंद चले गए। ममता बनर्जी ने बड़ी लड़ाई जीत ली थी।

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2011: 34 साल के लेफ्ट राज का अंत

13 मई 2011 की रात 8:00 बजे कोलकाता के हर टीवी स्क्रीन पर एक ही खबर थी—टीएमसी 184 सीटें, कांग्रेस 42 सीटें, कुल अलायंस 227 सीटें। लेफ्ट फ्रंट को 62 सीटें और सीपीएम के पास महज 40 सीटें। 34 साल में उन्होंने सात चुनाव जीते थे। 34 साल में वह अजेय लगते थे।

उस रात इनकंबेंट चीफ मिनिस्टर बुद्धदेव भट्टाचार्य खुद अपनी जाधवपुर सीट से चुनाव हार गए। सबसे लंबे समय तक चली डेमोक्रेटिकली इलेक्टेड कम्युनिस्ट गवर्नमेंट एक ही रात में खत्म हो गई।

20 मई 2011 को ममता बनर्जी ने काली घाट के मंदिर में माथा टेका। राजभवन में शपथ ली। राइटर्स बिल्डिंग तक पैदल गईं। सीएम बनने के बाद पहली कैबिनेट मीटिंग में ममता ने सिंगुर के किसानों को 400 एकड़ जमीन वापस देने का फैसला लिया। यह थी ममता बनर्जी की शुरुआत।


मुख्य बातें (Key Points):

• 1975 में जेपी की कार पर चढ़कर विरोध करने वाली युवा कांग्रेसी से CM बनीं ममता
• 1984 में जाधवपुर से सोमनाथ चटर्जी को हराकर सबसे युवा सांसद बनीं
• 1998 में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना, कांग्रेस से अलग हुईं
• 2006-08 में सिंगुर आंदोलन ने राजनीतिक पासा पलटा, टाटा नैनो गुजरात चला गया
• 2011 में 34 साल के लेफ्ट राज को खत्म कर बंगाल की पहली महिला CM बनीं


 

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: ममता बनर्जी कब मुख्यमंत्री बनीं?

उत्तर: ममता बनर्जी 20 मई 2011 को पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। उन्होंने 34 साल के वामपंथी शासन को समाप्त करते हुए 227 सीटों के साथ जीत हासिल की।

प्रश्न 2: तृणमूल कांग्रेस की स्थापना कब हुई?

उत्तर: तृणमूल कांग्रेस की स्थापना 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी द्वारा की गई थी। उन्होंने कांग्रेस पार्टी से अलग होकर यह पार्टी बनाई और उसी दिन कांग्रेस से निष्कासित हो गईं।

प्रश्न 3: सिंगुर आंदोलन क्या था?

उत्तर: सिंगुर आंदोलन 2006-08 में ममता बनर्जी द्वारा किसानों की जमीन बचाने के लिए चलाया गया था। टाटा मोटर्स को नैनो प्लांट के लिए 997 एकड़ जमीन दी गई थी। ममता के 26 दिन के अनशन और आंदोलन के बाद टाटा नैनो गुजरात चला गया।

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