Kohinoor Diamond Return India की मांग आज़ादी के दिन से लेकर आज तक गूंजती रही है, लेकिन हर बार ब्रिटेन ने भारत की इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया। 1947 में जब अंग्रेज़ भारत छोड़कर जा रहे थे, तब भारत सरकार ने पहली बार औपचारिक रूप से कोहिनूर हीरे को वापस करने की रिक्वेस्ट दी थी। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने साफ मना कर दिया। तब से लेकर आज तक यह हीरा भारत और ब्रिटेन के बीच सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है। पाकिस्तान, तालिबान, ईरान और अफगानिस्तान भी इस हीरे पर अपना दावा जता चुके हैं, लेकिन ब्रिटेन ने सबको एक ही जवाब दिया: कोहिनूर कानूनी रूप से हमारा है।
1947 से 1953 तक: आज़ादी के साथ शुरू हुई कोहिनूर वापसी की मांग
Kohinoor Diamond Return India की कहानी भारत की आज़ादी के साथ ही शुरू हो जाती है। 1947 में जब ब्रिटिश शासन खत्म हुआ और अंग्रेज़ भारत छोड़कर जाने लगे, तो नई भारत सरकार ने एक औपचारिक अनुरोध (फॉर्मल रिक्वेस्ट) किया कि कोहिनूर हीरा भारत को वापस कर दिया जाए। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने इस मांग को पूरी तरह खारिज कर दिया।
इसके बाद काफी लंबे समय तक कोहिनूर को लेकर कोई बड़ी चर्चा नहीं हुई। फिर 1953 में जब क्वीन एलिज़ाबेथ द्वितीय का राज्याभिषेक (कोरोनेशन) हुआ, तो भारत ने एक बार फिर कोहिनूर वापस लेने की अपील की। लेकिन दोबारा यह रिक्वेस्ट भी रिजेक्ट कर दी गई। उस दौर तक भारत औपचारिक पत्रों और राजनयिक बातचीत के जरिए ही यह मांग उठा रहा था, कोई कोर्ट केस दायर नहीं किया गया था।
पाकिस्तान, तालिबान और ईरान भी कूदे कोहिनूर की दौड़ में
Kohinoor Diamond Return India के विवाद में भारत अकेला नहीं रहा। 1976 में पाकिस्तान भी इस दौड़ में शामिल हो गया। पाकिस्तान का तर्क था कि कोहिनूर लाहौर की विरासत है। लाहौर उस समय सिख साम्राज्य की राजधानी था और ट्रीटी ऑफ लाहौर के जरिए ही अंग्रेज़ कोहिनूर लेकर गए थे, इसलिए यह हीरा पाकिस्तान को मिलना चाहिए।
पाकिस्तान की मांग देखकर तालिबान भी इसमें कूद पड़ा। तालिबान का कहना था कि कोहिनूर दुर्रानी साम्राज्य का भी हिस्सा रहा है, इसलिए अफगानिस्तान का इस पर अधिकार बनता है। इसके साथ ही ईरान ने भी अपना दावा ठोक दिया कि कोहिनूर उन्हें मिलना चाहिए। लेकिन ब्रिटेन ने सभी देशों की मांग को एक ही वाक्य में खारिज कर दिया: “कोहिनूर कानूनी रूप से (लीगली) ब्रिटेन को मिला है, इसलिए किसी का इस पर कोई हक नहीं बनता।”
1998 में 50 सांसदों ने मिलकर ब्रिटेन को भेजी याचिका
Kohinoor Diamond Return India की मुहिम को सबसे बड़ा धक्का 1997-98 में मिला। मशहूर पत्रकार और राज्यसभा सांसद कुलदीप नायर ने 1998 में अपने साथ 50 सांसदों (एमपी) को जोड़कर एक याचिका (पिटीशन) पर हस्ताक्षर कराए और ब्रिटिश सरकार से अपील की कि कोहिनूर औपनिवेशिक लूट (कोलोनियल लूट) का प्रतीक है और इसे जल्द से जल्द भारत को वापस कर दिया जाना चाहिए।
इस पिटीशन पर हस्ताक्षर करने वालों में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी शामिल थे। इस मुद्दे पर काफी हंगामा हुआ और मीडिया में खूब चर्चा हुई। तत्कालीन विदेश मंत्री (एक्सटर्नल अफेयर्स मिनिस्टर) जसवंत सिंह ने जनभावना (पब्लिक सेंटीमेंट) को देखते हुए कह तो दिया कि कोहिनूर वापस लाया जाएगा, लेकिन बात वहीं की वहीं अटक गई। कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
2002 में क्वीन मदर की मौत के बाद फिर उठी आवाज़
2002 में जब क्वीन एलिज़ाबेथ की माता (क्वीन मदर) का निधन हुआ, तो उनके ताबूत (कॉफिन) पर वह ताज (क्राउन) रखा गया जिसमें कोहिनूर हीरा जड़ा हुआ था। यह पूरा समारोह भारत में भी लाइव टेलीकास्ट हो रहा था। भारत की आम जनता ने जब अपना हीरा ब्रिटिश ताज पर चमकते देखा, तो कोहिनूर वापसी की मांग फिर से जोरदार तरीके से उठने लगी।
सिख समुदाय विशेष रूप से नाराज़ हुआ क्योंकि कोहिनूर लंबे समय तक सिख साम्राज्य की विरासत रहा था। उनकी मांग थी कि कोहिनूर को वापस लाकर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में रखा जाना चाहिए। इसी समय जगन्नाथ पुरी मंदिर के अधिकारियों ने भी कोहिनूर पर अपना दावा ठोका। उनका तर्क था कि महाराजा रणजीत सिंह की अंतिम इच्छा थी कि कोहिनूर जगन्नाथ पुरी मंदिर में जाना चाहिए। इस दौरान अखबारों में रोज़ाना कोहिनूर को लेकर खबरें छप रही थीं और अदालतों में एक के बाद एक जनहित याचिकाएं (पीआईएल) दायर होने लगीं।
2016 में सरकार का यू-टर्न: पहले कहा ‘अपनी मर्ज़ी से दिया’, फिर पलटी
Kohinoor Diamond Return India के इतिहास में 2016 का साल सबसे विवादास्पद रहा। “ऑल इंडिया ह्यूमन राइट्स एंड सोशल जस्टिस फ्रंट” नामक एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर करके सरकार से मांग की कि वह कोहिनूर वापस लाने के लिए कोई कदम उठाए।
मामला कई दिनों तक कोर्ट में चला और सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार ने जो बयान दिया उसने पूरे देश को चौंका दिया। उन्होंने कहा कि “कोहिनूर न तो चोरी हुआ है, न ही जबरदस्ती अंग्रेज़ इसे लेकर गए। यह अपनी मर्ज़ी से दिया गया था, इसलिए भारत इस पर दावा नहीं कर सकता। अगर हम ऐसा दावा करेंगे तो कल को कोई दूसरा देश भी हमसे किसी चीज़ का दावा कर देगा।”
जैसे ही यह खबर बाहर आई, जनभावना सरकार के खिलाफ उबलने लगी। मीडिया में तीखी आलोचना हुई। जब बात बहुत ज्यादा बढ़ गई तो सरकार ने अपना रुख पूरी तरह पलट दिया और कहा कि “कोहिनूर भारत का ही है, लेकिन इसे कानूनी रूप से (लीगली) वापस लाने में चुनौतियां आ रही हैं। हम इसके लिए जो भी ज़रूरी कदम हैं, वो उठाएंगे।”
कानूनी अड़चनें: क्यों कोहिनूर वापस लाना इतना मुश्किल है
Kohinoor Diamond Return India की राह में कई गंभीर कानूनी अड़चनें हैं। भारत का “प्राचीन वस्तु एवं कला खजाना अधिनियम” (Antiquities and Art Treasures Act) 1972 सरकार को अपनी मूल्यवान ऐतिहासिक संपत्तियों पर दावा करने का अधिकार तो देता है, लेकिन यह कानून सिर्फ 1972 के बाद की वस्तुओं पर लागू होता है। कोहिनूर 1849 में ब्रिटेन गया था, इसलिए इस कानून का इस्तेमाल कोहिनूर वापसी के लिए नहीं किया जा सकता।
दूसरी उम्मीद यूनेस्को कन्वेंशन से थी। भारत और ब्रिटेन दोनों ने यूनेस्को कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके आर्टिकल 7 के तहत एक देश दूसरे देश पर कानूनी कार्रवाई करके अपनी सांस्कृतिक धरोहर वापस ले सकता है। लेकिन यह प्रावधान भी 1970 के बाद की वस्तुओं पर ही लागू होता है।
इसके अलावा यूनेस्को कन्वेंशन के आर्टिकल 1 के तहत यह देखा जाता है कि कोई सांस्कृतिक धरोहर मूल रूप से (ओरिजिनली) किस देश से निकली है। लेकिन यहां भी पेंच फंस जाता है क्योंकि समय के साथ देशों की सीमाएं, राज्य और शासन सब बदल चुके हैं। पहले अकेला भारत था, फिर पाकिस्तान बना। कोहिनूर भारत, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान हर जगह घूम चुका है। ऐसे में “असली मालिक” कौन है, यह साबित करना ही सबसे बड़ी कानूनी चुनौती है।
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने भी कोहिनूर से जुड़ी जनहित याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि “हम किसी बाहरी देश के लिए आदेश पारित करके कोहिनूर वापस नहीं मंगा सकते।”
भारत के सबसे मजबूत तर्क: जबरदस्ती लिया गया, अपनी मर्ज़ी से नहीं दिया
Kohinoor Diamond Return India के पक्ष में भारत ने कई बार अपने तर्क बेहद मजबूती से रखे हैं। भारत का सबसे प्रमुख तर्क यह है कि जब कोहिनूर अंग्रेज़ों को दिया गया तब महाराजा दलीप सिंह बहुत छोटी उम्र के थे। अंग्रेज़ों ने उनकी माता को नज़रबंद (हाउस अरेस्ट) कर दिया और खुद उनके संरक्षक (गार्डियन) बनकर ट्रीटी ऑफ लाहौर के आर्टिकल 3 के तहत कोहिनूर पर कानूनी दस्तखत करवा लिए। एक नाबालिग बच्चे से जबरदस्ती या छल से कराए गए दस्तखत को “अपनी मर्ज़ी से दिया” कैसे कहा जा सकता है?
भारत यह भी कहता रहा है कि कोहिनूर सिर्फ एक हीरा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत (कल्चरल हेरिटेज) है। यह भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। आर्कियोलॉजिकल सर्वे के प्रमाण साफ बताते हैं कि कोहिनूर मूल रूप से भारत के गोलकुंडा क्षेत्र में पाया गया था और सबसे लंबे समय तक भारतीय शासकों के पास ही रहा। ब्रिटिशर्स ने भारत को उपनिवेश (कोलोनाइज) बनाकर अपनी सत्ता के दुरुपयोग से कोहिनूर अपने देश ले गए।
ब्रिटेन का जवाब: लीगली हमारा है, वापस दिया तो म्यूज़ियम खाली हो जाएंगे
ब्रिटेन इन सारे तर्कों का एक ही जवाब देता रहा है कि ट्रीटी ऑफ लाहौर के तहत कोहिनूर कानूनी रूप से अधिग्रहित (एक्वायर) किया गया था। 150 से ज्यादा सालों से यह ब्रिटिश ताज (क्राउन) का हिस्सा है। ब्रिटिश अधिकारी यह भी कहते हैं कि अगर कोहिनूर वापस दे दिया तो दुनिया भर के म्यूज़ियम खाली हो जाएंगे, क्योंकि फिर तो हर देश किसी न किसी म्यूज़ियम या कलाकृति पर दावा करके वापस मांगने लगेगा।
ब्रिटेन एक और सवाल भी उठाता है: “अगर हम कोहिनूर दे भी दें, तो दें किसको? भारत, पाकिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान: सब दावा कर रहे हैं। असली मालिक कौन है?” यह तर्क कानूनी रूप से भले ही मजबूत लगे, लेकिन नैतिक रूप से यह औपनिवेशिक लूट को वैध ठहराने जैसा है। एक ऐसा देश जिसने दुनिया के दर्जनों देशों को गुलाम बनाकर उनका खजाना लूटा, वो आज “कानूनी अधिग्रहण” का तर्क देकर उसी लूट को अपने पास रखने की दलील दे रहा है।
कोहिनूर का ‘अभिशाप’: क्वीन की मौत से लेकर किंग चार्ल्स के कैंसर तक
Kohinoor Diamond Return India की बहस में कोहिनूर के “अभिशाप” (कर्स) का किस्सा भी अक्सर चर्चा में आता है। माना जाता है कि कोहिनूर जिस भी पुरुष शासक के पास गया, उसका पतन हुआ। 8 सितंबर 2022 को जब क्वीन एलिज़ाबेथ द्वितीय का निधन हुआ और उसके बाद किंग चार्ल्स III राजा बने, तो तकनीकी रूप से कोहिनूर की मालिकाना हक एक पुरुष के पास आ गई। 2024 में किंग चार्ल्स को कैंसर हो गया, जिसके बाद कोहिनूर के अभिशाप और काले जादू (ब्लैक मैजिक) के किस्से फिर से चर्चा में आ गए।
लोग अक्सर यह उदाहरण देते हैं कि कोहिनूर के ब्रिटेन पहुंचने से पहले ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन एशिया, अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तक आते थे। लोग कहते थे कि “ब्रिटिश साम्राज्य में कभी सूरज नहीं ढलता।” लेकिन आज ब्रिटेन एक छोटा सा द्वीप राष्ट्र (आइलैंड नेशन) बनकर रह गया है। कई लेखक आज भी लिखते हैं कि यह कोहिनूर के अभिशाप की वजह से हुआ।
आज भी जारी है आम जनता की मांग
भले ही कानूनी रास्ते में तमाम अड़चनें हैं, भले ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाएं खारिज कर दी हों, लेकिन Kohinoor Diamond Return India की मांग आज भी भारत की आम जनता के दिल में ज़िंदा है। लोगों का मानना है कि कोहिनूर भारत की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है और सरकार को हर संभव कोशिश करनी चाहिए कि यह हीरा अपनी मातृभूमि वापस लौटे। यह सिर्फ एक हीरे की कहानी नहीं है, बल्कि सैकड़ों सालों की औपनिवेशिक लूट का प्रतीक है, जिसका दर्द आज भी हर भारतीय महसूस करता है।
मुख्य बातें (Key Points)
- Kohinoor Diamond Return India की मांग 1947 से जारी है, 1998 में डॉ. मनमोहन सिंह समेत 50 सांसदों ने ब्रिटेन को याचिका भेजी थी।
- ब्रिटेन का तर्क है कि कोहिनूर ट्रीटी ऑफ लाहौर (1849) के तहत कानूनी रूप से मिला, लेकिन भारत कहता है कि नाबालिग दलीप सिंह से छल और दबाव में दस्तखत कराए गए।
- भारत, पाकिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और तालिबान सब कोहिनूर पर दावा कर चुके हैं, ब्रिटेन ने सबकी मांग खारिज की।
- कानूनी रूप से Antiquities Act 1972 और UNESCO Convention 1970 दोनों कोहिनूर पर लागू नहीं होते क्योंकि कोहिनूर इन कानूनों से पहले ब्रिटेन गया था, सुप्रीम कोर्ट ने भी PIL खारिज की।








