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The News Air - Breaking News - ISRO Scientists Quit: 100+ वैज्ञानिकों ने छोड़ी नौकरी, गगनयान खतरे में!

ISRO Scientists Quit: 100+ वैज्ञानिकों ने छोड़ी नौकरी, गगनयान खतरे में!

भारत की अंतरिक्ष एजेंसी से बड़े पैमाने पर साइंटिस्ट्स का पलायन जारी, सरकार ने एग्जिट पॉलिसी में किया बड़ा बदलाव, प्राइवेट सेक्टर का आकर्षण बना सबसे बड़ा कारण।

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
शुक्रवार, 17 जुलाई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, नौकरी
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ISRO Scientists Quit
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ISRO Scientists Quit – भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) इन दिनों एक गंभीर संकट से गुजर रहा है। हाल के महीनों में 100 से अधिक वरिष्ठ वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने संगठन छोड़ दिया है या फिर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली है। देखा जाए तो यह सिर्फ संख्या का खेल नहीं, बल्कि भारत के सबसे महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष मिशनों के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है।

इस बड़े पैमाने पर हो रहे इस्तीफों को देखते हुए भारत सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस ने अपनी आंतरिक नीतियों में बदलाव किया है। अब ग्रुप ए के वैज्ञानिक और तकनीकी कर्मचारी जो महत्वपूर्ण मिशनों पर काम कर रहे हैं, वे अपने केंद्र निदेशक से सीधे इस्तीफे की मंजूरी नहीं ले सकते। अब हर रिजाइनेशन या अर्ली रिटायरमेंट के लिए डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस की मंजूरी अनिवार्य कर दी गई है।

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कौन से इसरो सेंटर्स से छोड़ रहे हैं वैज्ञानिक?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ज्यादातर वैज्ञानिक और इंजीनियर यू आर राव सैटेलाइट सेंटर (URSC) और विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) तिरुवनंतपुरम से इस्तीफा दे रहे हैं। ये दोनों केंद्र भारत के रॉकेट निर्माण और सैटेलाइट डिज़ाइनिंग के लिए रीढ़ की हड्डी माने जाते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि जो लोग जा रहे हैं, वे कोई सामान्य कर्मचारी नहीं हैं। ये मिशन डायरेक्टर्स, प्रोपल्शन स्पेशलिस्ट्स, सिस्टम इंजीनियर्स, नेविगेशन एक्सपर्ट्स और टेस्टिंग स्पेशलिस्ट्स हैं – यानी वे लोग जिनके अनुभव और विशेषज्ञता के बिना गगनयान, चंद्रयान-4 जैसे बड़े मिशन अधूरे रह सकते हैं।

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संख्या नहीं, गुणवत्ता का है सवाल

अगर गौर करें तो इसरो में हजारों की संख्या में कर्मचारी काम करते हैं। 100 लोगों का जाना बहुत बड़ा नहीं लग सकता। लेकिन यहां असली मुद्दा संख्या का नहीं, बल्कि उस अनुभव और संस्थागत स्मृति (Institutional Memory) का है जो इन वरिष्ठ वैज्ञानिकों के साथ चली जाती है।

समझने वाली बात यह है कि अगर कोई इंजीनियर 20 साल से क्रायोजेनिक इंजन पर काम कर रहा है, तो उसके पास ऐसा अनुभव होता है जो किसी किताब में नहीं लिखा जा सकता। वह जानता है कि कौन सा डिज़ाइन काम करेगा, कौन सी फेलियर से क्या सीखा गया, टेस्टिंग में कौन सी समस्याएं आती हैं। यह नॉलेज डॉक्यूमेंट्स में नहीं, बल्कि लोगों के दिमाग में होती है।

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गगनयान मिशन पर मंडराया संकट

गगनयान मिशन – भारत का पहला मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन – इस टैलेंट एक्सोडस से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है। यह मिशन भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पहली बार भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को Low Earth Orbit में भेजा जाएगा।

और यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि मानव जीवन दांव पर है। इसलिए ह्यूमन-रेटेड लॉन्च व्हीकल की जरूरत होती है जो सामान्य रॉकेट से कहीं ज्यादा सुरक्षित हो। इसमें इमरजेंसी अबॉर्ट सिस्टम, क्रू एस्केप सिस्टम, फॉल्ट डिटेक्शन, लाइफ सपोर्ट सिस्टम (ऑक्सीजन, तापमान, दबाव नियंत्रण), रिकवरी सिस्टम (कैप्सूल री-एंट्री, पैराशूट डिप्लॉयमेंट, समुद्र में लैंडिंग) जैसी जटिल तकनीकों की जरूरत होती है।

अगर इन तकनीकों के एक्सपर्ट्स ही नहीं रहेंगे, तो मिशन की सफलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

वैज्ञानिक क्यों छोड़ रहे हैं इसरो?

यहां सवाल उठता है कि आखिर इसरो जैसी प्रतिष्ठित संस्था को लोग क्यों छोड़ रहे हैं? इसके कई कारण हैं:

1. प्राइवेट स्पेस सेक्टर का उभार:

भारत में पिछले कुछ वर्षों में प्राइवेट स्पेस कंपनियों का तेजी से विकास हुआ है। स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉसमॉस, पिक्सल, ध्रुव स्पेस जैसी कंपनियां बड़े निवेश के साथ बाजार में उतरी हैं। ये कंपनियां इसरो के वैज्ञानिकों को कई गुना ज्यादा सैलरी, स्टॉक ऑप्शन्स, तेज़ डिसीजन मेकिंग और उद्यमशीलता की आजादी दे रही हैं।

2. वेतन का असंतोष:

हालांकि सरकारी नौकरी में जॉब सिक्योरिटी और पेंशन जैसी सुविधाएं हैं, लेकिन डायरेक्ट सैलरी के मामले में प्राइवेट सेक्टर कहीं आगे है। PhD और दशकों के अनुभव के बाद भी कई वैज्ञानिकों को लगता है कि उनके योगदान के हिसाब से वेतन कम है।

3. करियर प्रोग्रेशन की धीमी गति:

कई प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों को लगता है कि सरकारी संस्थानों में प्रमोशन की प्रक्रिया बहुत धीमी है। वहीं, प्राइवेट कंपनियां तेजी से जिम्मेदारियां और पद देती हैं।

4. नौकरशाही के जाल:

किसी भी प्रोजेक्ट को मंजूरी मिलने में कई स्तरों से गुजरना पड़ता है – डायरेक्टर, जॉइंट डायरेक्टर, सेक्रेटरी… कई बार इस वजह से काम में देरी होती है। प्राइवेट कंपनियों में फैसले जल्दी होते हैं।

5. वर्क प्रेशर:

गगनयान जैसे मेजर मिशन्स में सालों की तैयारी, टाइट डेडलाइन और पब्लिक एक्सपेक्टेशन का दबाव रहता है। कोई भी फेलियर सालों तक याद रखी जाती है, जो मानसिक दबाव बढ़ाती है।

सरकार ने क्या कदम उठाया?

सरकार को महसूस हुआ कि अगर महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स से अचानक वैज्ञानिक निकलते रहे, तो राष्ट्रीय मिशनों पर भारी असर पड़ेगा। इसलिए डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस ने अपने आंतरिक ज्ञापन में बदलाव किया है।

पुरानी व्यवस्था: केंद्र के डायरेक्टर किसी भी कर्मचारी के इस्तीफे या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को मंजूरी दे सकते थे।

नई व्यवस्था: अब क्रिटिकल मिशन्स से जुड़े ग्रुप ए के साइंटिफिक और टेक्निकल पर्सनल के रिजाइनेशन के लिए सीधे डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस की मंजूरी अनिवार्य है।

यह बदलाव 2020 में दिए गए रिलैक्सेशन को वापस लेने जैसा है, जब सेंटर्स को ज्यादा पॉवर दी गई थी।

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क्या यह वैज्ञानिकों की स्वतंत्रता का उल्लंघन है?

इस नीति को लेकर बहस भी है।

सरकार का तर्क: राष्ट्रीय मिशनों में निरंतरता जरूरी है। अगर कोई एक्सपर्ट अचानक चला गया तो मिशन फेल हो सकता है। यह देश का मामला है।

आलोचकों का तर्क: संविधान में किसी को भी कहीं भी काम करने की आजादी है। वैज्ञानिकों को बेहतर सैलरी, ऑटोनॉमी और करियर ग्रोथ नहीं दे रहे, फिर भी उन्हें रोकना चाहते हैं – यह सही नहीं।

ग्लोबल तुलना: NASA भी झेल चुका है यह संकट

यह समस्या केवल इसरो या भारत की नहीं है। NASA को भी इसी तरह के संकट का सामना करना पड़ा था जब SpaceX ने बाजार में कदम रखा। एलन मस्क ने NASA के कई वैज्ञानिकों को मोटी सैलरी देकर अपनी कंपनी में शामिल किया था। भारत भी इसी ट्रांजिशन फेज से गुजर रहा है।

सिर्फ इसरो नहीं, पूरे देश की समस्या

देखा जाए तो यह मुद्दा बहुत बड़ा है। भारत में सेमीकंडक्टर रिसर्च, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिफेंस टेक्नोलॉजी, बायोटेक – हर क्षेत्र में यही समस्या दिख रही है। साइंटिस्ट्स को रिटेन करना आसान नहीं है। ब्रेन ड्रेन और ब्रेन सर्कुलेशन का चैलेंज लगातार बढ़ रहा है।

यहां कोशिश यह होनी चाहिए कि वैज्ञानिकों की मूवमेंट को रोकने के बजाय, उनके योगदान को देश के हित में सुनिश्चित किया जाए – चाहे वे प्राइवेट सेक्टर में हों या सरकारी संस्थान में।

क्या सुधार हो सकते हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए:

  • बेहतर वेतनमान: विशेष वैज्ञानिक भत्ते, मिशन-आधारित प्रोत्साहन और परफॉर्मेंस रिवॉर्ड दिए जाएं।
  • तेज़ प्रमोशन: जिन्होंने बेहतरीन काम किया है, उन्हें जल्दी प्रमोशन मिले।
  • ऑटोनॉमी: वैज्ञानिकों को अपने काम में स्वतंत्रता मिले।
  • इंडस्ट्री पार्टनरशिप: प्राइवेट सेक्टर के साथ जॉइंट मिशन्स हों।
  • नॉलेज ट्रांसफर मैकेनिज्म: वैज्ञानिकों के अनुभव और ज्ञान को बेहतर तरीके से डॉक्यूमेंट किया जाए।
मुख्य बातें (Key Points)
  • इसरो से 100 से अधिक वरिष्ठ वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने इस्तीफा दिया है
  • सरकार ने एग्जिट पॉलिसी सख्त की, अब डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस की मंजूरी अनिवार्य
  • गगनयान और चंद्रयान जैसे मिशन खतरे में आ सकते हैं
  • प्राइवेट स्पेस कंपनियां ज्यादा सैलरी और आजादी दे रही हैं
  • यह समस्या केवल इसरो की नहीं, बल्कि पूरे देश के साइंटिफिक इकोसिस्टम की है
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: इसरो से कितने वैज्ञानिकों ने इस्तीफा दिया है?

रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में 100 से अधिक वरिष्ठ वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने इसरो छोड़ा है या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली है। ज्यादातर यू आर राव सैटेलाइट सेंटर और विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर से हैं।

प्रश्न 2: गगनयान मिशन पर क्या असर पड़ेगा?

गगनयान भारत का पहला मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन है जिसमें मानव जीवन दांव पर है। वरिष्ठ वैज्ञानिकों के जाने से ह्यूमन-रेटेड लॉन्च व्हीकल, लाइफ सपोर्ट सिस्टम और सेफ्टी मैकेनिज्म जैसी जटिल तकनीकों में देरी हो सकती है।

प्रश्न 3: सरकार ने इसरो की एग्जिट पॉलिसी में क्या बदलाव किया?

अब ग्रुप ए के साइंटिफिक और टेक्निकल पर्सनल जो महत्वपूर्ण मिशनों पर काम कर रहे हैं, वे अपने केंद्र से सीधे इस्तीफे की मंजूरी नहीं ले सकते। उन्हें डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस की मंजूरी लेनी अनिवार्य कर दी गई है।

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अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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