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The News Air - Breaking News - ISRO Privatization: क्या सच में निजीकरण हो रहा है? 5000 कर्मचारियों ने उठाए सवाल

ISRO Privatization: क्या सच में निजीकरण हो रहा है? 5000 कर्मचारियों ने उठाए सवाल

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के हजारों कर्मचारियों ने चेयरमैन से मांगा स्पष्टीकरण, जॉब सिक्योरिटी और संगठन के भविष्य को लेकर गहरी चिंता

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
मंगलवार, 8 सितम्बर 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, नौकरी, राष्ट्रीय
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ISRO Privatization
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ISRO Privatization: देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम में अचानक हलचल मच गई है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के 5000 से अधिक कर्मचारियों ने चेयरमैन वी नारायणन को एक पत्र लिखकर संगठन के भविष्य और निजीकरण की योजनाओं पर स्पष्टीकरण मांगा है। यह कदम तब उठाया गया है जब अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है।

नौ अलग-अलग ISRO केंद्रों से जुड़े कर्मचारी संगठनों ने यह पत्र लिखा है। उनका मुख्य सवाल यह है कि क्या ISRO का पारंपरिक मॉडल बदलने जा रहा है? क्या रॉकेट निर्माण, सैटेलाइट उत्पादन और लॉन्च सेवाएं अब पूरी तरह निजी हाथों में चली जाएंगी?

🔍 यह भी पढ़ें- Nepal Flash Floods: ISRO की सैटेलाइट तस्वीरों से खुला हादसे का राज, 175 की मौत

In-Space चेयरमैन की टिप्पणी से बढ़ी बेचैनी

दरअसल, चिंता की शुरुआत तब हुई जब In-Space (Indian National Space Promotion and Authorization Centre) के चेयरमैन पवन गोयनका ने हाल ही में कहा कि ISRO भविष्य में केवल लॉन्च व्हीकल तक सीमित नहीं रहेगा। उनके मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग और उत्पादन का काम धीरे-धीरे निजी क्षेत्र और पब्लिक सेक्टर यूनिट्स (PSUs) के हाथों में जाएगा।

इस बयान ने कर्मचारियों के बीच सवाल खड़े कर दिए। अगर निजी कंपनियां ही रॉकेट बनाएंगी, सैटेलाइट तैयार करेंगी और लॉन्च सेवाएं देंगी, तो ISRO के इंजीनियरों, तकनीशियनों और मैन्युफैक्चरिंग सुविधाओं का क्या होगा? क्या उनकी नौकरियां खतरे में हैं?

🔍 यह भी पढ़ें- ISRO Scientists Migration: इसरो से 100+ वैज्ञानिकों का पलायन, Space Privatization खतरा या मौका?

ISRO ने किया स्पष्ट इनकार, कहा – निजीकरण बेबुनियाद

हालांकि, ISRO ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए निजीकरण के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया। संगठन ने कहा कि यह “बेबुनियाद” (baseless) बात है कि ISRO को पूरी तरह निजी हाथों में सौंपा जा रहा है।

देखा जाए तो, यहां तीन अलग-अलग पहलू हैं जिन्हें समझना जरूरी है:

पहला – ISRO खुद का पूर्ण निजीकरण – यह बिल्कुल नहीं हो रहा। संगठन सरकारी नियंत्रण में ही रहेगा।

दूसरा – अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी – यह तेजी से बढ़ रही है और आगे भी बढ़ेगी। Skyroot Aerospace जैसी कंपनियों ने पहले ही इतिहास रच दिया है। 2024 में Skyroot ने ‘Vikram-1’ रॉकेट से भारत की पहली निजी कंपनी बनकर सैटेलाइट को कक्षा में स्थापित किया था।

तीसरा – ISRO की भूमिका में बदलाव – यही सबसे संवेदनशील मुद्दा है। अब तक ISRO रिसर्च, विकास, मैन्युफैक्चरिंग, एकीकरण और लॉन्च सब कुछ खुद करता था। लेकिन अब धीरे-धीरे संगठन की दिशा बदल रही है।

💡 यह भी पढ़ें- UNESCO लिस्ट में कैसे शामिल हुई दिवाली? जानिए इस विश्व प्रसिद्ध त्योहार की मान्यता के ‘गुप्त नियम’

ISRO का नया रोल: रिसर्च और स्ट्रेटेजिक मिशन पर फोकस

सरकार की योजना के मुताबिक, ISRO अब मुख्य रूप से इन कामों पर ध्यान देगा:

  • उन्नत अनुसंधान और विकास (Advanced R&D)
  • फ्रंटियर टेक्नोलॉजी पर काम
  • रणनीतिक मिशन जैसे मंगल मिशन, चंद्र मिशन
  • गगनयान जैसे मानव अंतरिक्ष यान कार्यक्रम
  • पुनः प्रयोज्य रॉकेट (Reusable Launch Vehicles) का विकास
  • निजी क्षेत्र की निगरानी और मार्गदर्शन

वहीं, निजी क्षेत्र संभालेगा:

  • रॉकेट का नियमित उत्पादन (PSLV, GSLV, SSLV)
  • सैटेलाइट निर्माण
  • व्यावसायीकरण (Commercialization)
  • लॉन्च सेवाएं

समझने वाली बात यह है कि यह मॉडल काफी हद तक अमेरिका के NASA जैसा है। वहां भी SpaceX और दूसरी निजी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक सामान और अंतरिक्ष यात्रियों को ले जाती हैं, जबकि NASA गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण पर काम करता है।

संस्थामुख्य जिम्मेदारी
ISROअनुसंधान, उन्नत तकनीक, रणनीतिक मिशन
IN-SPACeनिजी कंपनियों को अनुमति और प्रोत्साहन
NSILव्यावसायिक सेवाएं, लॉन्च की बिक्री
Private Sectorमैन्युफैक्चरिंग, उत्पादन, नियमित लॉन्च
कर्मचारियों की चिंता: नौकरियां और विशेषज्ञता का सवाल

हैरान करने वाली बात यह है कि आंकड़े भी कर्मचारियों की चिंताओं को सही साबित करते दिख रहे हैं। देखिए कैसे ISRO की कार्यबल घट रहा है:

वर्षकुल स्वीकृत पदकार्यरत कर्मचारीरिक्तियां% भरे हुए
2019-2020,00017,2222,81785.9%
2025-2620,00014,6375,63272%

छह साल में 2,585 कर्मचारियों की कमी हो गई है। रिक्तियां दोगुनी हो गई हैं।

अगर गौर करें, तो कर्मचारियों का डर यह है कि अगर मैन्युफैक्चरिंग और लॉन्च का काम निजी क्षेत्र संभाल लेगा, तो उनकी जरूरत कम हो जाएगी। मान लीजिए अभी किसी प्रोजेक्ट पर 1000 इंजीनियर काम करते हैं, लेकिन अगर वह काम बाहर चला जाए तो शायद केवल 200 की ही जरूरत रहे।

विशेषज्ञता खोने का खतरा: रूस का उदाहरण

दिलचस्प बात यह है कि कर्मचारियों की चिंता सिर्फ नौकरी की नहीं है। उनका एक और बड़ा सवाल है – तकनीकी विशेषज्ञता का क्षरण।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि जब आप कोई काम लगातार नहीं करते, तो धीरे-धीरे उसमें महारत कम होने लगती है। सिद्धांत (theory) में जानना एक बात है, लेकिन व्यावहारिक अनुभव (hands-on experience) बिल्कुल अलग चीज है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण रूस है। याद कीजिए जब भारत का चंद्रयान-3 चांद पर उतरने वाला था, तब रूस भी अपना लूना-25 मिशन भेज रहा था। कभी अंतरिक्ष में सबसे आगे रहने वाला USSR (सोवियत संघ) जब दशकों बाद चंद्र मिशन भेज रहा था, तो उसका लैंडर क्रैश हो गया।

क्यों? क्योंकि इतने सालों तक उन्होंने यह काम नहीं किया था, तकनीकी विशेषज्ञता कहीं खो गई थी।

यही चिंता ISRO के कर्मचारियों को भी सता रही है।

दूसरा पहलू: निजी क्षेत्र में नौकरियों का विस्फोट

हालांकि, इस पूरे मुद्दे का एक उज्ज्वल पक्ष भी है। जहां ISRO में नौकरियां शायद कम हो रही हैं, वहीं निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में रोजगार के अवसर तेजी से बढ़ रहे हैं।

देखिए कैसे बदल रही है तस्वीर:

पैरामीटर201420252030 (अनुमानित)
Space-tech Startups1440800+
निजी निवेश$6 मिलियन$618 मिलियन$2+ बिलियन
Space Economy–$9.6 बिलियन$40-45 बिलियन

राहत की बात यह है कि अनुमान के मुताबिक भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में अगले कुछ वर्षों में लगभग 2 लाख नई नौकरियां पैदा हो सकती हैं।

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Skyroot Aerospace का ही उदाहरण लीजिए। Vikram-1 की सफलता के बाद उन्हें तुरंत $871 मिलियन की फंडिंग मिली। ऐसी कंपनियां बड़े पैमाने पर इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और तकनीशियनों को रोजगार देंगी।

सरकार का तर्क: प्रतिभा का सही उपयोग

सरकार का मानना है कि ISRO के उच्च कुशल वैज्ञानिकों को रूटीन उत्पादन और मैन्युफैक्चरिंग में क्यों लगाया जाए? उन्हें तो नई-नई तकनीक विकसित करनी चाहिए, मंगल-शुक्र पर मिशन भेजने की तैयारी करनी चाहिए, पुनः प्रयोज्य रॉकेट बनाने चाहिए।

और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी। 2020 के बाद से सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र में बड़े सुधार किए हैं:

IN-SPACe की स्थापना की गई जो निजी कंपनियों को मंजूरी देती है।

NSIL (NewSpace India Limited) ने व्यावसायिक लॉन्च सेवाएं शुरू कीं।

PSLV, GSLV और SSLV की तकनीक निजी क्षेत्र को हस्तांतरित की गई।

आगे क्या होगा?

सवाल उठता है कि क्या भारत का यह कदम सही है?

एक ओर, अमेरिका में यह मॉडल बेहद सफल साबित हुआ है। SpaceX ने तो NASA से भी कम लागत में बेहतर सेवाएं देना शुरू कर दिया है। निजी भागीदारी से प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, लागत घटती है और नवाचार को गति मिलती है।

दूसरी ओर, कर्मचारियों की चिंताएं भी वाजिब हैं। उन्हें स्पष्ट आश्वासन चाहिए कि उनका भविष्य सुरक्षित है और ISRO की मुख्य क्षमताएं बरकरार रहेंगी।

चिंता का विषय यह भी है कि अगर सब कुछ निजी हाथों में चला गया और कभी राष्ट्रीय आपात स्थिति आई, तो क्या ISRO अपने बलबूते पर काम कर पाएगा?

संतुलन की जरूरत

समझने वाली बात है कि यहां किसी एक पक्ष को पूरी तरह सही या गलत नहीं कहा जा सकता। जरूरत है एक संतुलित दृष्टिकोण की:

  • ISRO को अपनी मुख्य क्षमताएं बरकरार रखनी चाहिए
  • निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना भी जरूरी है
  • कर्मचारियों को स्किल अपग्रेडेशन के अवसर मिलने चाहिए
  • पारदर्शिता और संवाद जरूरी है

उम्मीद की किरण यह है कि ISRO प्रबंधन ने कहा है कि वे कर्मचारियों की चिंताओं पर गंभीरता से विचार करेंगे।

निष्कर्ष: बदलाव अवश्यंभावी है

इससे साफ होता है कि भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। यह बदलाव चुनौतीपूर्ण है, लेकिन जरूरी भी। अगले दशक में भारत का अंतरिक्ष उद्योग 40-45 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इस अवसर को हाथ से जाने नहीं देना चाहिए।

बस यह सुनिश्चित करना होगा कि इस प्रक्रिया में ISRO की ताकत कमजोर न हो और कर्मचारियों के हितों की रक्षा हो।


मुख्य बातें (Key Points)

• ISRO के 5000+ कर्मचारियों ने चेयरमैन से निजीकरण पर स्पष्टीकरण मांगा है

• 2019-20 में 17,222 कर्मचारी थे जो घटकर 2025-26 में 14,637 रह गए – छह साल का निचला स्तर

• ISRO ने पूर्ण निजीकरण के दावों को ‘बेबुनियाद’ बताया, लेकिन भूमिका में बदलाव स्वीकार किया

• अंतरिक्ष स्टार्टअप्स 2014 में 1 से बढ़कर 2025 में 440 हो गए, 2030 तक 2 लाख नई नौकरियां संभव


FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या ISRO पूरी तरह से निजी कंपनी बन जाएगा?

नहीं, ISRO का पूर्ण निजीकरण नहीं हो रहा। संगठन सरकारी नियंत्रण में रहेगा, लेकिन इसकी भूमिका बदल रही है। अब ISRO मुख्य रूप से अनुसंधान और रणनीतिक मिशनों पर फोकस करेगा, जबकि नियमित उत्पादन का काम निजी क्षेत्र संभालेगा।

प्रश्न 2: ISRO के कर्मचारियों की संख्या क्यों घट रही है?

2019-20 में ISRO में 17,222 कर्मचारी थे जो 2025-26 में घटकर 14,637 रह गए हैं। रिक्तियां 2,817 से बढ़कर 5,632 हो गई हैं। यह कमी कर्मचारियों के बीच चिंता का कारण बनी है क्योंकि मैन्युफैक्चरिंग का काम निजी क्षेत्र को जा रहा है।

प्रश्न 3: भारत में अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी कैसे बढ़ रही है?

भारत में space-tech startups 2014 में सिर्फ 1 थे जो 2025 में 440 से अधिक हो गए हैं। Skyroot Aerospace ने 2024 में भारत की पहली निजी कंपनी बनकर Vikram-1 से सैटेलाइट लॉन्च किया। अनुमान है कि 2030 तक भारत की space economy $40-45 बिलियन तक पहुंच जाएगी और 2 लाख नई नौकरियां सृजित होंगी।

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अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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