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The News Air - Breaking News - IRIS Dena Attack India Response: हिंद महासागर में अमेरिका ने ईरानी जंगी जहाज डुबोया, भारत चुप क्यों?

IRIS Dena Attack India Response: हिंद महासागर में अमेरिका ने ईरानी जंगी जहाज डुबोया, भारत चुप क्यों?

मिलान 2026 नौसैनिक अभ्यास से लौट रहे ईरानी युद्धपोत IRIS Dena को अमेरिकी पनडुब्बी ने टॉरपीडो से डुबोया, 87 सैनिक मारे गए, भारत ने कोई प्रतिक्रिया तक नहीं दी

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
रविवार, 8 मार्च 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, अंतरराष्ट्रीय, बिज़नेस, राष्ट्रीय
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IRIS Dena Attack India Response
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IRIS Dena Attack India Response: हिंद महासागर में 4 मार्च की सुबह एक ऐसी घटना घटी जिसने भारत की विदेश नीति, उसके “हिंद महासागर के संरक्षक” होने के दावे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी, तीनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। श्रीलंका के गॉल शहर से करीब 40 नॉटिकल मील दूर, अमेरिकी नौसेना की एक पनडुब्बी ने ईरानी युद्धपोत IRIS Dena पर MK-48 टॉरपीडो से हमला कर दिया। कुछ ही सेकंड में यह जहाज डूब गया। 87 ईरानी सैनिक मारे गए और 32 को श्रीलंकाई नौसेना ने बचाया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यही जहाज सिर्फ दो हफ्ते पहले भारतीय नौसेना के मिलान 2026 नौसैनिक अभ्यास में शामिल होकर लौट रहा था और भारत ने इस हमले पर कोई प्रतिक्रिया तक नहीं दी।


“दोस्ती के पुल” से मौत के समंदर तक: सिर्फ दो हफ्ते की कहानी

IRIS Dena Attack India Response को समझने के लिए इस जहाज की कहानी जानना जरूरी है। 17 फरवरी को भारतीय नौसेना की ईस्टर्न नेवल कमांड ने इस ईरानी युद्धपोत का विशाखापट्टनम में भव्य स्वागत किया था। “Bridges of Friendship” और “United Through Oceans” जैसे हैशटैग के साथ ट्वीट किया गया था। ईरानी सैनिकों ने विशाखापट्टनम में भारतीय नौसेना के साथ परेड में मार्च किया।

सिर्फ दो हफ्ते पहले ये सैनिक विशाखापट्टनम में भारतीय नौसैनिकों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे। और दो हफ्ते बाद इन्हीं में से 87 सैनिकों के शव समुद्र में तैर रहे थे। भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने कहा कि प्रोटोकॉल के अनुसार यह जहाज कोई गोला-बारूद नहीं ले जा रहा था, यह पूरी तरह निहत्था था। उन्होंने कहा कि अमेरिका और इजराइल से इस बारे में सवाल पूछे जाने चाहिए।


भारत ने क्या किया? कुछ नहीं

IRIS Dena Attack India Response की सबसे शर्मनाक बात यह रही कि जब IRIS Dena से डिस्ट्रेस कॉल आया तो श्रीलंकाई सेना ने बचाव अभियान चलाया, लेकिन भारत ने कुछ नहीं किया। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के आधिकारिक अकाउंट से ट्वीट किया गया कि “यह हमारा मामला नहीं है।”

ईरान के भारत में राजदूत मोहम्मद फतहाली ने कहा कि भारत ने ईरान को एक संदेश तक नहीं भेजा, कोई संवाद ही नहीं हुआ। यह उस देश का रवैया है जो खुद को हिंद महासागर क्षेत्र का “नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर” और “फर्स्ट रिस्पॉन्डर” बताता है। प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय नौसेना को “हिंद महासागर का संरक्षक” कहा था, लेकिन जब उसी महासागर में भारत के साथ संयुक्त अभ्यास से लौट रहे जहाज पर बिना उकसावे के हमला हुआ, तो भारत ने चुप्पी साध ली।

सवाल यह है कि अगर भारत की अनुमति के बिना हिंद महासागर में संयुक्त अभ्यास से लौटने वाले जहाजों पर हमला हो सकता है, तो श्रीलंका जैसे छोटे देशों के लिए भारत खुद को सुरक्षा भागीदार कैसे पेश करेगा?


ईरान-अमेरिका-इजराइल युद्ध: कितना फैल चुका है संघर्ष

अब बात करते हैं उस बड़े युद्ध की जिसके बीच यह घटना हुई। ईरान की राजधानी तेहरान समेत सभी प्रमुख शहरों पर हमले हो चुके हैं। अमेरिकी सेना ने ईरान में 2,000 से ज्यादा ठिकानों पर बमबारी की है और ईरान का लगभग हर हिस्सा प्रभावित हुआ है। अमेरिका-इजराइल के हमलों में ईरान में 1,000 से ज्यादा लोग मारे गए हैं।

दूसरी तरफ ईरान भी पीछे नहीं हट रहा। उसने 9 देशों में अमेरिका के 27 सैन्य अड्डों पर मिसाइलें दागी हैं। हालांकि ज्यादातर हमले इंटरसेप्ट कर लिए गए, लेकिन बहरीन में अमेरिकी पांचवें बेड़े के मुख्यालय में धुआं उठा, जो मध्य पूर्व में अमेरिकी नौसैनिक अभियानों का केंद्र है। कुवैत में तीन अमेरिकी लड़ाकू विमान दुर्घटनाग्रस्त हुए। सऊदी अरब की राजधानी रियाद में अमेरिकी दूतावास पर दो ड्रोन टकराए। ईरानी हमलों में कम से कम छह अमेरिकी सैनिक मारे गए। इजराइल के तेल अवीव में 40 से ज्यादा इमारतें क्षतिग्रस्त हुईं। खाड़ी देशों पर ईरानी हमलों में 9 लोगों की मौत हुई।


सुप्रीम लीडर की मौत के बाद भी ईरान ने हार नहीं मानी

अमेरिका और इजराइल को उम्मीद थी कि सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान जल्दी हार मान लेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके उलट यह युद्ध नए क्षेत्रों में फैल रहा है। लेबनान का हिज़्बुल्लाह ईरान के सहयोगी के रूप में इस युद्ध में शामिल हो गया है।

सबसे खतरनाक बात यह हुई कि ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया है और धमकी दी है कि कोई भी जहाज इस जलडमरूमध्य से गुजरा तो उसे आग लगा दी जाएगी। दुनिया की कुल तेल खपत का 20% इसी रास्ते से गुजरता है। भारत के लिए यह किसी बुरे सपने से कम नहीं है।


मोदी की इजराइल यात्रा और 48 घंटे बाद ईरान पर हमला: क्या है कनेक्शन?

IRIS Dena Attack India Response के साथ जो बड़ा सवाल उठ रहा है वह प्रधानमंत्री मोदी की इजराइल यात्रा की टाइमिंग से जुड़ा है। मोदी 25 से 26 फरवरी तक इजराइल में थे। उन्होंने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ डिनर किया, इजराइली संसद नेसेट में भाषण दिया, भारत-इजराइल संबंधों को “विशेष रणनीतिक साझेदारी” में अपग्रेड किया और इजराइल को “फादरलैंड” तक कहा।

मोदी की इजराइल यात्रा के महज 48 घंटे बाद इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर संयुक्त हमला कर दिया। इजराइली रक्षा अधिकारियों ने रॉयटर्स को बताया कि यह हमला हफ्तों पहले से प्लान किया गया था। इजराइल के दूत ने कहा कि “ऑपरेशनल अवसर प्रधानमंत्री मोदी के जाने के बाद ही आया।” यह बयान कई सवाल खड़े करता है कि उस बैठक में क्या हुआ था।


ईरान पर हमले पर चुप, ईरान के हमलों की कड़ी निंदा: दोहरा रवैया

इसके बाद से प्रधानमंत्री मोदी का रुख पूरी तरह इजराइल के पक्ष में दिखा है। जब ईरान ने खाड़ी देशों पर हमले किए, तो मोदी ने ट्वीट कर “कड़ी निंदा” की, एक के बाद एक ट्वीट किए। लेकिन जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमला किया, जिसमें स्कूली बच्चों समेत 100 गुना ज्यादा लोग मारे गए, तो मोदी प्रशासन की तरफ से कोई बयान नहीं आया।

इसके बाद नेतन्याहू ने सार्वजनिक रूप से मोदी को धन्यवाद दिया “इजराइल के साथ खड़े होने के लिए।” यह वह बयान है जिसने भारत की तटस्थ विदेश नीति की धज्जियां उड़ा दीं।


नेहरू से मनमोहन तक: जब भारत की आवाज में दम था

IRIS Dena Attack India Response के संदर्भ में स्वतंत्र भारत के हर प्रधानमंत्री ने रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखी। जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह तक, सबने सिद्धांतों पर आधारित स्टैंड लिया।

1979 में जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर आक्रमण किया, तो इंदिरा गांधी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वे इसकी सराहना नहीं कर सकतीं, जबकि सोवियत संघ भारत का सहयोगी था। 2003 में जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया, तो वाजपेयी ने अमेरिका की 20,000 सैनिक भेजने की मांग ठुकरा दी और इराक युद्ध की सर्वसम्मति से निंदा की। 2011 में जब अमेरिका ने लीबिया पर हमला किया, तो मनमोहन सिंह ने संयुक्त राष्ट्र में भाषण देकर पश्चिमी देशों की स्पष्ट निंदा की। उनके भाषण पर हॉल में तालियां गूंज उठीं।

लेकिन अब हेडलाइन यह बन रही हैं कि “मोदी की ईरान पर चुप्पी ने मध्य पूर्व में भारत की आवाज खो दी।” अमेरिका में एक न्यूज एंकर ने कहा कि इजराइल भारत को निचोड़ना चाहता है और मोदी ने व्यावहारिक रूप से इजराइल के सामने समर्पण कर दिया है।


तेल संकट: भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा हमला

यह युद्ध सिर्फ विदेश नीति का मामला नहीं है, यह सीधे आपकी जेब पर असर डालने वाला है। रूस भारत का सबसे पुराना सहयोगी रहा है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर मोदी प्रशासन ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया। अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से मध्य पूर्व से तेल आयात भी बुरी तरह प्रभावित होगा। भारत अपनी तेल जरूरतों का 55% मध्य पूर्व से आयात करता है। यानी दोनों तरफ से सप्लाई बाधित हो गई है।

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सबसे चिंताजनक बात यह है कि भारत के पास चीन जैसा रणनीतिक तेल भंडार भी नहीं है। फरवरी में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि भारत के पास 74 दिनों का तेल भंडार है, लेकिन अब मोदी प्रशासन का दावा है कि सिर्फ 25 दिनों का भंडार बचा है। दोनों में से कौन सा बयान सच है, यह स्पष्ट नहीं है। इसी बीच LPG सिलेंडर की कीमत ₹60 बढ़ा दी गई है।


“भारत को अनुमति दी गई”: जब अमेरिका ने संप्रभुता को चुनौती दी

IRIS Dena Attack India Response से भी ज्यादा अपमानजनक वह बयान था जिसमें अमेरिका ने कहा कि भारत को 30 दिनों के लिए रूस से तेल खरीदने की “अनुमति” दी गई है। अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि “भारतीय बहुत अच्छे एक्टर्स रहे हैं। हमने उनसे रूस का प्रतिबंधित तेल खरीदना बंद करने को कहा, उन्होंने किया। वे इसकी जगह अमेरिकी तेल लेंगे, लेकिन अस्थायी कमी को पूरा करने के लिए हमने उन्हें रूसी तेल स्वीकार करने की अनुमति दी है।”

अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी ने भी कहा कि यह अल्पकालिक उपाय है और उम्मीद है कि इसके बाद भारत अमेरिका से ज्यादा तेल खरीदेगा। एक संप्रभु, स्वतंत्र देश को किसी तीसरे देश से तेल खरीदने के लिए अमेरिका की “अनुमति” लेनी पड़े, इससे ज्यादा अपमानजनक बात क्या हो सकती है।

राहुल गांधी ने संसद में कहा: “अब अमेरिका तय करेगा कि हम किससे तेल खरीदें? वे तय करेंगे? हमारे प्रधानमंत्री तय नहीं करेंगे?”


स्पेन का साहस बनाम भारत की चुप्पी

स्पेन अमेरिका का सहयोगी है, NATO का सदस्य है, लेकिन स्पेनिश प्रधानमंत्री खुलकर अमेरिका के खिलाफ बोल रहे हैं और उन्होंने अमेरिका को अपने सैन्य अड्डों का इस्तेमाल करने से मना कर दिया है। दूसरी तरफ भारत, जो हमेशा से तटस्थ राष्ट्र रहा है, जिसने हमेशा नैतिक आधार पर स्टैंड लिया, वह आज अमेरिका के सामने बोलने का साहस तक नहीं दिखा पा रहा है।

ट्रंप ने बार-बार कहा कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रोका। उन्होंने भारत को “डेड इकॉनमी” कहा। अमेरिका ने भारतीयों को जंजीरों में बांधकर डिपोर्ट किया। अमेरिकी डिप्टी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट ने कहा कि अमेरिका कभी भारत को वह फायदा नहीं देगा जो चीन को मिला, और अमेरिका ऐसी व्यापार डील कभी नहीं होने देगा जो भारत को एक सच्चा प्रतिद्वंद्वी बनने में मदद करे।


CIA का पुराना प्लेबुक: ईरान में भी दोहराया जा सकता है इराक-सीरिया वाला खेल

ट्रंप प्रशासन और CIA ईरान में इस्लामिक शासन को गिराने के लिए एक और खतरनाक खेल खेल रहे हैं। वे ईरान के विद्रोही कुर्द समूहों के साथ डील करने की कोशिश कर रहे हैं। योजना है कि इन समूहों को हथियार देकर विद्रोह कराया जाए और सरकार गिराई जाए। यही वही प्लेबुक है जो CIA ने इराक और सीरिया में इस्तेमाल की थी।

अमेरिका अलग-अलग गुटों को हथियार देता है, फिर उन्हें आपस में लड़वाता है, जिससे गृहयुद्ध छिड़ जाता है। इसी तरीके से ISIS का जन्म और विस्तार इराक और सीरिया में हुआ था। अगर यही ईरान में दोहराया गया तो इसकी कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ेगी। इस युद्ध के जल्दी खत्म होने के कोई संकेत नहीं हैं और हर बीतता दिन इसकी भारी कीमत वसूल रहा है।


आम भारतीय पर क्या असर पड़ेगा

यह संकट हर भारतीय की जेब पर सीधा असर डालने वाला है। मध्य पूर्व से 55% तेल आयात बाधित होने और रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी पाबंदी के कारण भारत में पेट्रोल, डीजल और LPG की कीमतें बढ़ सकती हैं। 25 दिनों के तेल भंडार का दावा अगर सच है तो यह गंभीर ऊर्जा संकट की ओर इशारा करता है। महंगाई का सीधा बोझ उस आम आदमी पर पड़ेगा जो पहले से बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है। भारत की विदेश नीति में जो बदलाव आ रहा है, उसका आर्थिक और कूटनीतिक दोनों मोर्चों पर असर पड़ रहा है।


मुख्य बातें (Key Points)
  • IRIS Dena हमला: भारतीय नौसेना के मिलान 2026 अभ्यास से लौट रहे ईरानी युद्धपोत IRIS Dena को अमेरिकी पनडुब्बी ने हिंद महासागर में डुबोया, 87 सैनिक मारे गए, भारत ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, श्रीलंका ने बचाव किया।
  • दोहरा रवैया: मोदी ने ईरान के हमलों की “कड़ी निंदा” की लेकिन अमेरिका-इजराइल द्वारा ईरान पर 2,000+ ठिकानों पर बमबारी और 1,000+ मौतों पर चुप रहे, नेतन्याहू ने मोदी को “इजराइल के साथ खड़े होने” के लिए धन्यवाद दिया।
  • ऊर्जा संकट: अमेरिका के आदेश पर रूस से तेल खरीद बंद, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से मध्य पूर्व से 55% तेल आयात प्रभावित, सिर्फ 25 दिनों का तेल भंडार बचा होने का दावा, LPG ₹60 महंगा हुआ।
  • संप्रभुता पर सवाल: अमेरिका ने भारत को रूस से 30 दिन तेल खरीदने की “अनुमति” दी, स्पेन जैसा NATO सदस्य अमेरिका के खिलाफ बोल रहा है लेकिन भारत चुप है।

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सवाल 1: IRIS Dena ईरानी युद्धपोत को कब और कहां डुबोया गया?

4 मार्च 2026 की सुबह श्रीलंका के गॉल शहर से करीब 40 नॉटिकल मील दूर हिंद महासागर में अमेरिकी नौसेना की पनडुब्बी ने MK-48 टॉरपीडो से IRIS Dena पर हमला किया। यह जहाज भारतीय नौसेना के मिलान 2026 अभ्यास में शामिल होकर ईरान लौट रहा था। 87 ईरानी सैनिक मारे गए और 32 को श्रीलंकाई नौसेना ने बचाया।

सवाल 2: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से भारत पर क्या असर पड़ेगा?

भारत अपनी तेल जरूरतों का 55% मध्य पूर्व से आयात करता है और दुनिया की कुल तेल खपत का 20% स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरता है। इसके बंद होने और रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी पाबंदी से भारत में पेट्रोल-डीजल-LPG महंगा हो सकता है और गंभीर ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है।

सवाल 3: भारत ने IRIS Dena हमले पर चुप्पी क्यों साधी?

भारत सरकार ने इस हमले पर कोई आधिकारिक बयान या निंदा नहीं की। ईरान के भारत में राजदूत ने कहा कि भारत ने कोई संदेश तक नहीं भेजा। विपक्ष का आरोप है कि मोदी प्रशासन अमेरिका और इजराइल के दबाव में है, जबकि पहले के प्रधानमंत्रियों ने सहयोगी देशों के खिलाफ भी सिद्धांतों पर आधारित स्टैंड लिया था।

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अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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