Iran Israel War अचानक शुरू नहीं हुई। यह दशकों पुरानी उस रस्साकशी का नतीजा है, जिसमें एक तरफ अमेरिका और इजराइल हैं जो मिडिल ईस्ट पर अपना दबदबा बनाए रखना चाहते हैं, और दूसरी तरफ ईरान है जिसने अपनी संप्रभुता बचाने के लिए हर विदेशी ताकत को चुनौती दी। वर्ल्ड वॉर II के बाद जब विश्व व्यवस्था ब्रिटेन से अमेरिका की तरफ ट्रांसफर हुई, तो मिडिल ईस्ट के ज्यादातर देश जैसे कुवैत, यूएई, इराक और सऊदी अरब अमेरिकी सुरक्षा छत्र का हिस्सा बन गए। लेकिन ईरान ने बिल्कुल अलग रास्ता चुना, और यहीं से इस खूनी टकराव की बुनियाद पड़ी जो आज पूरी दुनिया को हिला रही है।
1979 की इस्लामिक क्रांति: जहां से बदल गई पूरी तस्वीर
1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई और अयातुल्लाह खोमेनी सत्ता में आए। उन्होंने दुनिया के सामने साफ कर दिया कि ईरान अपने प्राकृतिक संसाधनों पर किसी विदेशी ताकत का कंट्रोल बर्दाश्त नहीं करेगा। यह बात अमेरिका को बिल्कुल मंजूर नहीं थी, क्योंकि तेल से भरपूर खाड़ी क्षेत्र पर अपना वर्चस्व बनाए रखना अमेरिका की विदेश नीति का सबसे अहम स्तंभ था।
ईरान ने अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए अपनी सैन्य ताकत और न्यूक्लियर प्रोग्राम पर काम शुरू किया। ईरान का कहना हमेशा रहा कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। लेकिन इजराइल इस क्षेत्र का इकलौता ऐसा देश है जिसके पास न्यूक्लियर हथियार हैं, और वह किसी भी कीमत पर नहीं चाहता कि उसका कोई पड़ोसी परमाणु ताकत बने।
इजराइल के लिए पूरे गल्फ रीजन में न्यूक्लियर बैलेंस बनाए रखना अपने अस्तित्व का सवाल है। अगर ईरान परमाणु शक्ति बन जाता, तो यह संतुलन पूरी तरह टूट जाता। यही वह बिंदु है, जहां से ईरान और इजराइल के बीच एक अघोषित युद्ध दशकों पहले शुरू हो गया था, जो अब खुले मैदान में आ चुका है।
मोसाद का खतरनाक खेल: ट्रैफिक कैमरों से लेकर खामनेई तक
Iran Israel War की सबसे चौंकाने वाली कड़ी इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद की वह जासूसी है, जिसने ईरान के सबसे शक्तिशाली नेता को निशाना बनाया। मोसाद ने सालों तक ईरान के ट्रैफिक कैमरों को हैक करके सुप्रीम लीडर अली खामनेई और दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों की हर गतिविधि पर नजर रखी।
विडंबना देखिए कि ये वही कैमरे थे, जिन्हें ईरान की सरकार अपने ही नागरिकों की निगरानी के लिए इस्तेमाल करती थी। लेकिन इजराइल ने इन्हें कई साल पहले ही हैक कर लिया था। मोसाद के एजेंट्स ने इन कैमरों से यह पता लगाया कि कौन अधिकारी कब आता-जाता है, बॉडीगार्ड्स गाड़ियां कहां पार्क करते हैं और सबका रोजमर्रा का रूटीन क्या है।
यह सारा डाटा खुफिया सिस्टम और एल्गोरिदम में डालकर एक “पैटर्न ऑफ लाइफ” तैयार किया गया। बड़े पैमाने पर डाटा एनालिसिस का इस्तेमाल हुआ। जब इजराइल की इंटेलिजेंस एजेंसियों को जानकारी मिली कि ईरान के एक कंपाउंड में टॉप अधिकारी मीटिंग के लिए इकट्ठा होने वाले हैं, तो इसी इंटेलिजेंस के आधार पर हमला किया गया। अली खामनेई की लोकेशन का पता चलते ही कुछ ही सेकंड में इजराइल ने कई हमले किए और इन्हीं हमलों में खामनेई की मौत हो गई।
श्रीलंका के पास ईरानी युद्धपोत तबाह: 87 नौसैनिकों की मौत
Iran Israel War का एक और खतरनाक अध्याय समुद्र में लिखा गया। हाल ही में एक अमेरिकी पनडुब्बी ने श्रीलंका के दक्षिणी तट के पास ईरानी नौसेना के युद्धपोत IRIS Dena पर MK-48 हैवीवेट टॉरपीडो से हमला करके उसे डुबो दिया। इस धमाके में ईरानी नौसेना के कम से कम 87 नौसैनिकों की मौत हो गई।
यह युद्धपोत 18 से 25 फरवरी के बीच बे ऑफ बंगाल में भारत के साथ संयुक्त नौसैनिक अभ्यास करके वापस लौट रहा था, जिसमें लगभग 180 लोग सवार थे। पेंटागन ने इस हमले का वीडियो भी जारी किया है। हमले के बाद श्रीलंकाई नौसेना ने रेस्क्यू ऑपरेशन चलाकर 32 लोगों की जान बचाई।
यह घटना उस समय हुई जब अमेरिका और इजराइल लगातार ईरान पर एयर स्ट्राइक्स कर रहे हैं और तेहरान के सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को तबाह करने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि उनका मकसद ईरान की सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व को पूरी तरह बेअसर करना है।
ईरान ने उड़ाया अमेरिका का सबसे एडवांस रडार सिस्टम
लेकिन ईरान भी चुप बैठने वाला नहीं है। सुप्रीम लीडर अली खामनेई की मौत के बाद ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) ने ऐलान किया है कि मिडिल ईस्ट में मिसाइल और ड्रोन हमले जारी रहेंगे। और ईरान ने इसे साबित भी कर दिया।
ईरान ने अमेरिका के गल्फ रीजन में तैनात सबसे एडवांस AN/FPS-132 रडार सिस्टम को तबाह कर दिया है, जिसे अमेरिका ने करोड़ों डॉलर खर्च करके डेवलप किया था। इस रडार को 2013 में कतर के अल उदेड एरिया में तैनात किया गया था। मिडिल ईस्ट में यह रडार अमेरिकी डिफेंस नेटवर्क की “आंख और कान” माना जाता था, जो THAAD और दूसरे डिफेंस सिस्टम्स को ट्रैकिंग डाटा मुहैया कराता था।
इस रडार की रेंज लगभग 5000 किलोमीटर थी और यह लॉन्ग रेंज मिसाइलों और ड्रोन को ट्रैक करने के लिए बनाया गया था। ईरान ने इसे तबाह करने के लिए 65 मिसाइलें और 12 ड्रोन दागे। इनमें से ज्यादातर को अमेरिकी डिफेंस सिस्टम ने हवा में ही मार गिराया, लेकिन दो मिसाइलें अपने निशाने पर लगीं और इस करोड़ों डॉलर के सिस्टम को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया।
ईरान के हमले सिर्फ अल उदेड एयरबेस तक सीमित नहीं रहे, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया में फैले और कई अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। यह बात साबित करती है कि ईरान की सैन्य क्षमता को कम आंकना अमेरिका और इजराइल की सबसे बड़ी गलती साबित हो रही है।
Strait of Hormuz बंद: दुनिया की तेल आपूर्ति पर मंडराया खतरा
Iran Israel War का सबसे खतरनाक पहलू स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज का बंद होना है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल रोजाना इसी रूट से गुजरता है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल शिपिंग रूट्स में से एक है।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज 33 से 50 किलोमीटर चौड़ा एक संकरा समुद्री मार्ग है, जो ईरान और ओमान के बीच स्थित है और पर्शियन गल्फ को अरब सागर से जोड़ता है। सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत, कतर और खुद ईरान अपना तेल इसी रूट के जरिए वैश्विक बाजारों में पहुंचाते हैं।
ईरान ने चेतावनी दी है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज अब बंद है। वहां से गुजरने की कोशिश करने वाले किसी भी जहाज पर हमला किया जाएगा। साथ ही तेल पाइपलाइनों पर भी हमले की धमकी दी गई है। ईरान ने यह भी साफ कर दिया है कि अगर अमेरिका, इजराइल या यूरोप के जहाजों का पता चलता है, तो उन पर हमला किया जाएगा।
इसकी वजह से तेल की कीमतों में तेजी से उछाल आया है। अगर यह रूट इसी तरह बंद रहा, तो वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा रुक सकता है। भारत और चीन जैसे बड़े तेल आयातक देशों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। भारत अपनी कुल तेल जरूरत का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है, और इस जलमार्ग का बंद होना सीधे तौर पर देश की ऊर्जा सुरक्षा और आम नागरिकों की जेब पर असर डालेगा।
सिर्फ देशों की नहीं, ताकत, तेल और नियंत्रण की लड़ाई
Iran Israel War को सिर्फ दो देशों की लड़ाई मानना सबसे बड़ी भूल होगी। यह दरअसल पावर, ऑयल और कंट्रोल की लड़ाई है, जिसमें पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था दांव पर लगी है। एक तरफ अमेरिका और इजराइल मिडिल ईस्ट पर अपना वर्चस्व कायम रखना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ ईरान अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय ताकत को बचाने के लिए हर कीमत चुकाने को तैयार है।
अमेरिका और इजराइल ने ईरान की सैन्य नेतृत्व को खत्म करने, न्यूक्लियर ठिकानों को तबाह करने और नौसैनिक ताकत को कमजोर करने की पूरी कोशिश की। लेकिन ईरान ने भी अमेरिका के सबसे एडवांस रडार सिस्टम को उड़ाकर, मिसाइलों और ड्रोन से जवाबी हमले करके और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को बंद करके यह साबित कर दिया कि वह किसी के आगे झुकने को तैयार नहीं है।
यह जंग अब सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रही। श्रीलंका के पास ईरानी युद्धपोत का डुबोया जाना, कतर में रडार तबाह होना और हॉर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना इस बात का सबूत है कि यह संघर्ष अब वैश्विक स्तर पर फैल चुका है। आने वाले दिनों में तेल की बढ़ती कीमतें, आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट और भू-राजनीतिक अस्थिरता पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकती है।
मुख्य बातें (Key Points)
- Iran Israel War की जड़ें 1979 की इस्लामिक क्रांति में हैं, जब ईरान ने अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देते हुए अपनी संप्रभुता का रास्ता चुना
- मोसाद ने ईरान के ट्रैफिक कैमरे हैक कर सुप्रीम लीडर अली खामनेई की गतिविधियों पर सालों नजर रखी, जिसके आधार पर हमला कर उनकी हत्या कर दी गई
- अमेरिकी पनडुब्बी ने श्रीलंका के पास ईरानी युद्धपोत IRIS Dena को डुबोया, 87 नौसैनिक मारे गए; ईरान ने जवाब में कतर में अमेरिका का सबसे एडवांस AN/FPS-132 रडार सिस्टम तबाह किया
- ईरान ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद करने की घोषणा की, जहां से दुनिया का 20% तेल गुजरता है; भारत और चीन जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर सीधा असर पड़ रहा है







