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The News Air - Breaking News - India US Trade Deal: क्या Russia oil छोड़ना पड़ेगा भारत को?

India US Trade Deal: क्या Russia oil छोड़ना पड़ेगा भारत को?

ट्रंप के Executive Order में साफ लिखा - भारत रूस से तेल नहीं खरीदेगा, तीन अमेरिकी अधिकारी करेंगे निगरानी, मोदी सरकार देगी जवाब या भागेगी?

The News Air Team by The News Air Team
सोमवार, 9 फ़रवरी 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, अंतरराष्ट्रीय, बिज़नेस, सियासत
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India US Trade Deal
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India US Trade Deal Russia Oil Import: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई व्यापार डील को लेकर देश में सियासी घमासान मच गया है। ट्रंप ने अपने कार्यकारी आदेश में स्पष्ट रूप से लिखा है कि भारत ने रूस से तेल नहीं खरीदने का वादा किया है और अमेरिका के तीन अधिकारी इस बात पर नजर रखेंगे कि भारत इस वादे को निभाए। लेकिन मोदी सरकार के मंत्री इस सवाल का सीधा जवाब देने से बच रहे हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर कह रहे हैं कि वाणिज्य मंत्री से पूछो, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल कह रहे हैं कि यह तो विदेश मंत्रालय का मामला है, जबकि पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी तो बिल्कुल ही नदारद हैं।

कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने इस डील को “शर्म का दस्तावेज” करार देते हुए कहा है कि यह कोई डील नहीं बल्कि सरेंडर है। उन्होंने सवाल किया कि अमेरिका कौन होता है यह तय करने वाला कि भारत किससे तेल खरीदेगा और किससे नहीं?

ट्रंप के आदेश में क्या लिखा है?

ट्रंप ने अपने कार्यकारी आदेश (Executive Order) में बकायदा लिखा है कि कॉमर्स सेक्रेटरी हावर्ड लटनिक, ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट और स्टेट सेक्रेटरी मार्को रूबियो मिलकर इस बात पर नजर रखेंगे कि भारत ने रूस से तेल खरीदना शुरू तो नहीं किया। अगर सेक्रेटरी ऑफ कॉमर्स हावर्ड लटनिक को पता चलता है कि भारत ने रूस से सीधे या किसी और के जरिए तेल का आयात शुरू कर दिया है तो वे मार्को रूबियो से सलाह मशवरा कर ट्रंप को बताएंगे कि भारत के बारे में क्या एक्शन लेना चाहिए।

आदेश में यह भी लिखा है कि क्या भारत से आयात होने वाली चीजों पर फिर से 25% का टैरिफ लगा देना चाहिए। यानी अगर भारत रूस से तेल खरीदता है तो पूरी डील ही खतरे में पड़ सकती है।

मंत्री एक-दूसरे पर टाल रहे जवाब

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत ने रूस से तेल नहीं खरीदने का वादा किया है? लेकिन इस सीधे सवाल का जवाब कोई नहीं दे रहा। विदेश मंत्री जयशंकर से पूछा जाता है तो वे वाणिज्य मंत्रालय की तरफ इशारा करते हैं। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से पूछा जाता है तो वे कहते हैं कि यह विदेश मंत्रालय का मामला (MEA) है।

पवन खेड़ा ने तंज कसते हुए कहा कि तीनों लोग भारत की जनता के साथ बैडमिंटन खेल रहे हैं, जनता को शटल कॉक बना दिया है। विदेश मंत्री इधर से शटल कॉक मारते हैं कि उधर गया, वाणिज्य मंत्री से पूछो। वाणिज्य मंत्री उधर से शटल कॉक को मारते हैं कि विदेश मंत्री से पूछो।

सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी का नाम किसी ने नहीं लिया। जबकि यह सीधे-सीधे उनके मंत्रालय का मामला है। ट्रंप ने यह नहीं लिखा कि भारत की तेल कंपनियां नहीं खरीदेंगी, बल्कि लिखा है कि भारत नहीं खरीदेगा। तो फिर मंत्रियों को सरकार की तरफ से जवाब देना चाहिए।

डील के मुख्य बिंदु क्या हैं?

इस डील के तहत अमेरिका ने भारत पर टैरिफ 25% से घटाकर 18% कर दिया है। पहले अतिरिक्त 25% की सजा भी थी जो रूस से तेल खरीदने के कारण लगाई गई थी, वह भी हटा दी गई है। लेकिन बदले में भारत ने क्या दिया?

साझा घोषणा पत्र में लिखा है कि यह एक अंतरिम डील के लिए फ्रेमवर्क है (framework for an interim agreement)। पूर्ण डील अभी नहीं हुई है। भारत ने वादा किया है कि अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर का सामान खरीदेगा। लेकिन अमेरिका ने कोई ऐसी गारंटी नहीं दी कि वह भारत से कितना माल खरीदेगा।

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पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इसे असमान डील बताया है। उन्होंने कहा कि यह फ्रेमवर्क अमेरिका के पाले में झुका हुआ है और असमानता साफ दिखाई दे रही है। भारत अमेरिका के सभी इंडस्ट्रियल उत्पादों और बहुत से खाद्य उत्पादों पर टैरिफ हटाएगा या कम करेगा, लेकिन बदले में अमेरिका अंतरिम समझौते के सफलतापूर्वक पूरे हो जाने पर ही 18% टैरिफ लगाएगा।

किसानों पर क्या होगा असर?

साझा बयान में लिखा है कि भारत अमेरिका से आने वाले खेती से जुड़े “व्यापक उत्पादों” (broad agricultural products) से टैरिफ हटाएगा। इससे पहले भारत अमेरिका से आने वाले कृषि उत्पादों पर 14% से अधिक का टैरिफ लगाता था, लेकिन अब यह जीरो हो जाएगा।

इसका सीधा मतलब है कि भारत में जो किसान सोयाबीन, सेब, बादाम, अखरोट के कारोबार से जुड़े हैं, वे सब प्रभावित होंगे। अमेरिका का सामान बिना टैरिफ के भारत आएगा तो भारतीय किसानों को मुकाबला करना मुश्किल होगा।

विदेश मंत्री जयशंकर ने अक्टूबर 2025 में ही कहा था कि “हमारी रेड लाइन मूल रूप से हमारे किसानों और छोटे उत्पादकों के हित को लेकर है। हम इस मुद्दे पर समझौता नहीं कर सकते।” लेकिन अब लगता है कि वह रेड लाइन कहीं खो गई है।

रूस से तेल क्यों जरूरी था?

2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तब पश्चिमी देशों ने रूसी तेल पर प्रतिबंध लगा दिए। इसके बाद रूसी तेल सस्ता मिलने लगा। भारत ने इसका फायदा उठाया और अपना आयात बिल कम किया। युद्ध से पहले भारत अपने कुल तेल आयात का केवल 2.5% रूस से खरीदता था, लेकिन बाद में यह 33-36% तक पहुंच गया।

रूसी तेल अन्य तेल की तुलना में लगभग $11-16 प्रति बैरल सस्ता मिलता था। भारत हर दिन लगभग 1.5 मिलियन बैरल रूसी तेल खरीदता था। इससे भारत का आयात खर्च काफी कम हो गया था।

लेकिन अब अगर भारत अमेरिकी या वेनेजुएला का तेल खरीदेगा तो वह महंगा पड़ेगा। फ्रेट कॉस्ट भी ज्यादा होगी क्योंकि रूस भारत के करीब है जबकि अमेरिका और वेनेजुएला दूर हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे रिफाइनिंग मार्जिन घटेगा और अंततः आम आदमी को महंगा पेट्रोल-डीजल मिलेगा।

रूस ने क्या कहा?

डील की घोषणा के अगले ही दिन रूस की सरकार के प्रवक्ता डिमित्री पेस्कोव ने कहा कि उन्हें दिल्ली ने आधिकारिक रूप से नहीं बताया कि भारत तेल लेना बंद करने वाला है। उन्होंने कहा, “हम भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय रिश्तों का आदर करते हैं, लेकिन हमारे लिए भारत और रूस के बीच की रणनीतिक पार्टनरशिप भी कम महत्वपूर्ण नहीं।”

रूस के उप प्रधानमंत्री अलेक्जेंडर नोवाक ने कहा कि “हम केवल सार्वजनिक बयान देख रहे हैं। हम देखेंगे कि स्थिति कैसे विकसित होती है।”

दिलचस्प बात यह है कि अक्टूबर 2025 में राष्ट्रपति पुतिन ने कहा था, “मेरा विश्वास कीजिए, भारत जैसे देश के लोग अपने राजनीतिक नेतृत्व के फैसलों को गौर से देख रहे हैं। वे किसी के सामने अपमानित होना बर्दाश्त नहीं करेंगे।” लेकिन अब पुतिन भी चुप हैं।

चीन को हो रहा फायदा

सुहासिनी हैदर (द हिंदू की पत्रकार) ने लिखा है कि भारत के रूस से तेल खरीदना कम करने का फायदा चीन को हो रहा है। जैक प्रेली (तेल व्यापार विशेषज्ञ) के अनुसार, रूस ने भारत की जगह चीन को रिकॉर्ड स्तर पर तेल देना शुरू कर दिया है। जनवरी 2025 की तुलना में जनवरी 2026 में 44% का उछाल आया है।

चीन को पहले सऊदी अरब सबसे अधिक तेल की सप्लाई करता था, अब रूस ने वह जगह ले ली है। यानी भारत ने अमेरिका के दबाव में रूस से तेल खरीदना कम किया तो तेल के बैरल गायब नहीं हुए, बल्कि चीन चले गए। इसका मतलब फायदा चीन को हो रहा है और घाटा भारत को।

एक तरह से ट्रंप ने भारत पर दबाव डालकर चीन का फायदा करा दिया है। लेकिन मोदी सरकार इस पर भी चुप है।

स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी कहां गई?

फरवरी 2024 में म्यूनिक सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में जब जयशंकर से पूछा गया कि क्या आप अपने अलायंस को पिक एंड चूज़ करते हैं? क्या आप जब चाहे जो करते हैं? तो जयशंकर ने जवाब दिया था, “तब तो आपको मेरी तारीफ करनी चाहिए। अगर मैं इतना स्मार्ट हूं कि मेरे पास मल्टीपल ऑप्शंस हैं तो आपको मेरी प्रशंसा करनी चाहिए।”

तब हॉल में तालियां बजी थीं। लेकिन आज वही जयशंकर चुप हैं। उनकी वह स्मार्टनेस कहां चली गई? क्या विदेश मंत्री अब भी कह सकते हैं कि भारत ने देश हित में रूस से तेल ना लेने का फैसला किया है? क्या विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता कह सकते हैं कि भारत ने अपनी आजादी से यह फैसला लिया है?

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा है कि “2022 में भारत को तेल और गैस की खरीदी में बदलाव नहीं करना चाहिए था, और जब ऐसा कर लिया तब उसे निभाने का माद्दा रखना चाहिए। यही स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी है।” लेकिन अब उस स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी की बात भारत नहीं कर रहा।

डील या सरेंडर?

पवन खेड़ा ने कहा, “डील क्या होती है? डील वो होती है जो टेबल पर आमने-सामने बैठकर नेगोशिएट की जाती है। कनपट्टी पर बंदूक रखकर, कोई सीडी दिखाकर, ब्लैकमेल करके जो होता है वह डील नहीं होती, वह सरेंडर होता है। नाम नरेंद्र, काम सरेंडर।”

उन्होंने यह भी कहा कि “यह जो ट्रंपिंग-डंपिंग की डील है, अमेरिका का डंपिंग ग्राउंड भारत बन गया है। यह नरेंद्र मोदी की नाक के नीचे हुआ, नरेंद्र मोदी की सहमति से हुआ, नरेंद्र मोदी के सरेंडर की वजह से हुआ।”

कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया है कि यह डील किसी एपस्टीन फाइल से जुड़े दबाव के कारण हुई हो सकती है। पवन खेड़ा ने कहा कि डील की घोषणा के बाद एपस्टीन फाइल्स से करीब 60 डॉक्यूमेंट्स गायब हो गए हैं। 6 फरवरी तक 484 पन्नों पर दस्तावेज मिलते थे, अब 478 पन्ने दिखाई देते हैं।

प्रधानमंत्री क्यों चुप हैं?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पर क्यों नहीं बोल रहे? 2 फरवरी को डील की पहली सूचना भारत में अमेरिका के राजदूत ने दी, फिर राष्ट्रपति ट्रंप ने दी, और उसके कुछ देर बाद प्रधानमंत्री मोदी का ट्वीट आया। लोकसभा में उनका भाषण नहीं हुआ क्योंकि सामने राहुल गांधी होंगे जो सवाल पूछ देते।

5 फरवरी को राज्यसभा में भी प्रधानमंत्री ने डील के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर कुछ खास नहीं कहा। अगर यह डील स्वाभिमान, सम्मान और स्वायत्तता के आधार पर हुई होती तो प्रधानमंत्री राज्यसभा में गरज रहे होते, लेकिन उस दिन उनके भाषण में गरज के साथ छींटे ही पड़े।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद प्रधानमंत्री मोदी विजय यात्रा पर निकल गए थे, पटना पहुंच गए थे। लेकिन जल्दी ही यात्रा बंद हो गई क्योंकि ट्रंप ने बोलना शुरू कर दिया। अब तो रूस की धमकी की बात ट्रंप ने अपने आदेश में लिख दी है, लेकिन प्रधानमंत्री फिर भी चुप हैं। वे विजय यात्रा पर नहीं, बल्कि मलेशिया की यात्रा पर निकल गए।

दिसंबर में क्या हुआ था?

दिलचस्प बात यह है कि दिसंबर 2025 में प्रधानमंत्री मोदी खुद एयरपोर्ट चले गए थे पुतिन का स्वागत करने। तब कहा जाने लगा था कि भारत अमेरिका पर निर्भर नहीं रहा, रूस ही उसका पुराना पक्का दोस्त है। पुतिन को कार में बिठाकर प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप को लाल आंखें दिखा दी थीं।

पीआईबी (सरकार की तरफ से जारी सूचना) में 4 दिसंबर को लिखा गया कि “भारत और रूस के बीच गहरे और सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंध हैं जो भारत की स्वतंत्रता से पहले के हैं। यह रूस के व्यापारी अफानासी निकितिन की 15वीं शताब्दी की यात्राओं से जुड़े हैं।”

लेकिन फ्लैशबैक में यह वीडियो क्या भारत की कूटनीतिक स्वायत्तता का वीडियो लगता है? लगता है भारत ने इस वीडियो से अब दूरी बना ली है। इस वीडियो को डंप कर दिया है। जिन रिश्तों की दुहाई दी गई, उन रिश्तों के खातिर क्या भारत रूस के साथ खड़ा हो सका?

जानें पूरा मामला

यह पूरा मामला 2022 से शुरू हुआ जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया। तब अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाए। भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदना शुरू किया। 2025 में ट्रंप ने भारत पर 25% टैरिफ लगाया और रूस से तेल खरीदने के लिए अतिरिक्त 25% की सजा भी लगाई।

महीनों की बातचीत के बाद 2 फरवरी 2026 को यह डील हुई। ट्रंप ने टैरिफ 18% कर दिया लेकिन शर्त रखी कि भारत रूस से तेल नहीं खरीदेगा। 6 फरवरी को ट्रंप ने कार्यकारी आदेश जारी किया जिसमें लिखा है कि भारत ने रूस से तेल नहीं खरीदने का वादा किया है और अमेरिका के तीन अधिकारी इस पर नजर रखेंगे।

लेकिन भारत सरकार ने आज तक साफ नहीं किया कि उसने यह वादा किया है या नहीं। विदेश मंत्री, वाणिज्य मंत्री और पेट्रोलियम मंत्री तीनों ही इस सवाल का सीधा जवाब नहीं दे रहे हैं।


मुख्य बातें (Key Points)

• ट्रंप ने अपने कार्यकारी आदेश में लिखा है कि भारत रूस से तेल नहीं खरीदेगा और तीन अमेरिकी अधिकारी इस पर निगरानी रखेंगे

• मोदी सरकार के तीन मंत्री – विदेश, वाणिज्य और पेट्रोलियम – एक-दूसरे पर जवाब टाल रहे हैं और साफ नहीं बता रहे कि भारत ने यह वादा किया है या नहीं

• इस डील में भारत ने 500 बिलियन डॉलर का सामान खरीदने का वादा किया है लेकिन अमेरिका ने कोई ऐसी गारंटी नहीं दी

• भारतीय किसानों पर असर पड़ेगा क्योंकि अमेरिकी कृषि उत्पादों पर टैरिफ जीरो हो जाएगा

• रूसी तेल छोड़ने से भारत का फायदा चीन को हो रहा है, रूस अब चीन को रिकॉर्ड तेल भेज रहा है

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