How News Agency & Media Works : देश की लगभग हर बड़ी खबर, चाहे वो टीवी पर चले या अखबार में छपे, असल में चंद बड़ी न्यूज़ एजेंसियों से होकर गुज़रती है। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI), यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया (UNI) और एशियन न्यूज़ इंटरनेशनल (ANI) जैसी एजेंसियां खबरें इकट्ठा करती हैं और उन्हें अखबारों व चैनलों को बेचती हैं। यहां तक कि DD News जैसे सरकारी चैनल भी इन्हीं से खबरें लेते हैं।
देखा जाए तो यह पूरा सिस्टम एक बड़ी मशीन की तरह है। और बस यहीं से शुरू होती है असली कहानी: कि आखिर एक खबर आपके हाथ तक पहुंचती कैसे है, और इसमें पैसा कहां और कैसे घूमता है।
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‘इतना बड़ा है न्यूज़ एजेंसी का जाल’
न्यूज़ एजेंसी का ढांचा बेहद विशाल होता है। इनके ऑफिस और रिपोर्टर पूरी दुनिया में फैले होते हैं। दिलचस्प बात यह है कि PTI की तो अपनी खुद की सेटेलाइट तक है।
अगर गौर करें तो The Hindu, NDTV, Times of India और Indian Express जैसे बड़े नाम भी PTI के सब्सक्राइबर हैं। मतलब साफ है: सरकार से लेकर बड़े-बड़े अखबार और टीवी चैनल, सब इन एजेंसियों से खबरें खरीदते हैं।
यही वजह है कि आप अक्सर सुनते होंगे: “एजेंसी के हवाले से खबर आ रही है।” वो खबर इन्हीं एजेंसियों की होती है। जैसे किसी पेज पर साइड में “PTI” लिखा दिखे, तो समझ जाइए कि खबर वहीं से ली गई है। ANI का माइक तो आपने हर न्यूज़ फुटेज में देखा ही होगा : यानी ANI फुटेज लेकर टीवी चैनलों को बेच देता है। पिछले एक साल से PTI भी अब वीडियो फुटेज देने लगा है।
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‘जनता के दिमाग पर कैसे होता है कंट्रोल’
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि अगर किसी को पूरे देश की राय (Opinion) को कंट्रोल करना है, तो उसे न्यूज़ एजेंसी, अखबार और टीवी चैनल : तीनों पर पकड़ बनानी होगी।
समझने वाली बात है कि आम जनता खुद मौके पर जाकर तो जानकारी कंफर्म करती नहीं। जो इन तीनों के ज़रिए बताया जाता है, वही सच मान लिया जाता है। मान लीजिए ये तीनों मिलकर लगातार खबर देने लगें कि “अगले क्वार्टर में इंडिया सुपर पावर बन जाएगा,” तो आप अलग-अलग विभागों में RTI डालकर डेटा कंफर्म नहीं करते : आप मान लेते हैं।
यही ताकत न्यूज़ मीडिया को किसी भी देश की सबसे अहम चीज़ बनाती है। इसीलिए इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ (Fourth Pillar of Democracy) कहा जाता है। असल में सरकार का सबसे बड़ा विपक्ष भी मीडिया ही होता है।
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‘जंग से पहले तैयार होता है मीडिया’
हैरान करने वाली बात यह है कि दुनिया भर की सरकारें जब युद्ध (War) पर जाती हैं, तो सैनिकों से पहले न्यूज़ मीडिया को तैयार करती हैं। मकसद यह कि लोगों को समझाया जा सके कि यह जंग देश के लिए कितनी ज़रूरी है।
इससे साफ होता है कि मीडिया सिर्फ खबर देने का ज़रिया नहीं, बल्कि सोच गढ़ने का सबसे बड़ा हथियार है।
‘₹5 के अखबार का पूरा हिसाब-किताब’
अब असली सवाल उठता है: इन अखबारों और चैनलों की मजबूरी क्या है कि चाहकर भी ये पूरा सच नहीं दिखा पाते? इसे समझने के लिए Times of India का गणित देखिए, जो भारत का सबसे बड़ा और दुनिया का सबसे ज़्यादा बिकने वाला अंग्रेज़ी अखबार है।
टाइम्स ऑफ इंडिया का एक अखबार करीब 48 पेज का होता है और बिकता है सिर्फ ₹5 में। अब इस ₹5 का पूरा हिसाब एक नज़र में देखिए:
| खर्च का मद | कितना खर्च (₹5 के अखबार पर) |
|---|---|
| डिस्ट्रीब्यूटर और ट्रांसपोर्ट (40%) | ₹2 |
| प्रिंटिंग (48 पेज × 25 पैसे प्रति पेज) | ₹12 |
| न्यूज़ एजेंसी + स्टाफ कॉस्ट | ₹3 |
| कुल लागत | ₹17 |
यानी जो अखबार ₹5 में बिक रहा है, वो असल में अखबार को ₹17 का पड़ता है।
‘फिर बाकी का पैसा आता कहां से’
तो क्या अखबार वाले ये घाटा अपनी जेब से भरते हैं? जी नहीं। बाकी का सारा पैसा एडवर्टाइजमेंट (Advertisement) से पूरा होता है। मोटे तौर पर समझें तो अखबार को अगर ज़िंदा रहना है, तो विज्ञापन ही उसके लिए सब कुछ बन जाता है।
अब आप कहेंगे : ₹17 लगते हैं तो अखबार ₹20 में बेच दो, प्रॉफिट भी बन जाएगा। मगर ऐसा हो नहीं सकता। टाइम्स ऑफ इंडिया ने जनवरी 2022 से जून 2022 तक रोज़ाना 16 लाख अखबार घर-घर भेजे। अगर वो दाम बढ़ा दें, तो सर्कुलेशन गिर जाएगा, भारी नुकसान होगा और एडवर्टाइजर भी मुंह मोड़ लेंगे।
एक The Hindu ही है जो ₹10 में बिकता है, और वो भी इसलिए क्योंकि उसकी एक वफादार ऑडियंस है : UPSC की तैयारी करने वाले इसे खूब पढ़ते हैं। बाकी सारे अखबार कम दाम में ही बिकते हैं। जब सबसे बड़ा खिलाड़ी ही सस्ता बेच रहा है, तो बाकियों की भी मजबूरी हो जाती है, वरना उन्हें कोई खरीदेगा ही नहीं।
‘गरीब क्यों कट जाता है खबरों से’
यहां चिंता का विषय यह है कि एडवर्टाइजर उसी अखबार को पसंद करता है जिसकी ऑडियंस की खरीदने की ताकत (Purchasing Power) ज़्यादा हो। माना जाता है कि अंग्रेज़ी पढ़ने-बोलने वालों की परचेसिंग पावर ज़्यादा होती है, इसलिए अंग्रेज़ी अखबारों के विज्ञापन भी महंगे होते हैं।
नतीजा? चाहे हिंदी अखबार हो या अंग्रेज़ी, खबरें उसी वर्ग (Privileged Audience) के हिसाब से परोसी जाती हैं जो अखबार खरीद सकता है। एक गरीब मज़दूर, किसान या पिछड़े इलाके के इंसान के लिए तो ₹5 भी बहुत महंगे होते हैं।
इसीलिए अखबार एक ऐसा प्रोडक्ट बन जाता है जिसके ग्राहक गरीब नहीं, बल्कि संपन्न लोग हैं। यही वजह है कि बॉलीवुड, स्पोर्ट्स, सेलिब्रिटी गॉसिप और बिज़नेस लीडर्स की खबरें छाई रहती हैं। और देश का बड़ा गरीब तबका खबरों से पूरी तरह कट जाता है। मुंबई, दिल्ली या बैंगलोर में 1 घंटे की बारिश पर घंटों कवरेज चलती है, मगर कोई छोटा गांव पूरा डूब जाए तो उसे कोई नहीं पूछता।
‘सबसे बड़ा अखबार, फिर भी मुनाफा कम’
राहत की उम्मीद यहीं टूटती है। देश का सबसे बड़ा अखबार होने के बावजूद टाइम्स ऑफ इंडिया का 2018 का रेवेन्यू करीब ₹10,000 करोड़ था, जबकि प्रॉफिट सिर्फ ₹681 करोड़।
इतने बड़े अखबार के लिहाज़ से यह मुनाफा बेहद कम है। हालत यह है कि भारत के सबसे बड़े अखबार से ज़्यादा तो एक बल्ब बनाने वाली कंपनी कमा लेती है।
और यही सबसे खतरनाक स्थिति है। जो कंपनी देश के बड़े तबके की सोच बना रही है, अगर वही ढंग से मुनाफा नहीं कमा पा रही, तो उसे कंट्रोल करना छोटे-मोटे नेताओं और कारोबारियों के लिए भी बहुत आसान हो जाता है।
‘जानें पूरा मामला’
यह पूरी पड़ताल भारत के मीडिया के उस आर्थिक ढांचे को सामने रखती है, जो आम पाठक की नज़रों से अक्सर छिपा रहता है। न्यूज़ एजेंसियां खबरों का सबसे बड़ा स्रोत हैं, अखबार उन्हें खरीदते हैं, और अखबार की कमाई का असली ज़रिया विज्ञापन है। इसी विज्ञापन-आधारित मॉडल की वजह से खबरें उसी वर्ग की ओर झुक जाती हैं जिसकी जेब भारी है। आम आदमी के जीवन पर इसका सीधा असर यह है कि उसे मिलने वाली खबर अक्सर उसकी ज़रूरत से नहीं, बल्कि बाज़ार की मांग से तय होती है।
मुख्य बातें (Key Points)
- न्यूज़ एजेंसियां (PTI, UNI, ANI) खबरें इकट्ठा कर अखबारों, टीवी चैनलों और सरकारी मीडिया को बेचती हैं।
- ₹5 में बिकने वाला टाइम्स ऑफ इंडिया का अखबार असल में अखबार को ₹17 का पड़ता है : बाकी पैसा विज्ञापन से आता है।
- एडवर्टाइजर ऐसी ऑडियंस को तरजीह देते हैं जिनकी खरीदने की ताकत ज़्यादा हो, जिससे गरीब तबका खबरों से कट जाता है।
- देश का सबसे बड़ा अखबार होने के बावजूद टाइम्स ऑफ इंडिया का 2018 का मुनाफा सिर्फ ₹681 करोड़ था।











