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The News Air - NEWS-TICKER - तीन अदालतों से जमानत रद्द होने के बाद भी मुलज़िम गिरफ्तार नहीं: High Court ने DGP को भेजा नोटिस

तीन अदालतों से जमानत रद्द होने के बाद भी मुलज़िम गिरफ्तार नहीं: High Court ने DGP को भेजा नोटिस

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा - डेढ़ साल में भी गिरफ्तारी नहीं, जांच की गंभीरता पर सवाल, मुलज़िम पर 50 हजार जुर्माना

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
सोमवार, 29 जून 2026
in NEWS-TICKER, पंजाब
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DGP
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High Court DGP Notice Arrest : पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने एक ऐसे मामले में सख्त टिप्पणियां की हैं जो न्याय व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जस्टिस दीपक गुप्ता ने एक ऐसे आरोपी की दूसरी अग्रिम जमानत याचिका को खारिज करते हुए 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है जिसकी अग्रिम जमानत सेशन कोर्ट, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तीनों ने खारिज कर दी थी। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि नवंबर 2024 से अब तक मुलज़िम गिरफ्तार ही नहीं हुआ।

देखा जाए तो यह केवल एक कानूनी मामला नहीं है। यह न्यायिक आदेशों की अवमानना, पुलिस की जवाबदेही और अपराधिक न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास का प्रश्न है।

🔍 यह भी पढ़ें- Atta Satta Practice Rajasthan High Court: बेटियों की अदला-बदली पर बड़ा फैसला, तलाक को मंजूरी

मामला क्या है? समझिए पूरी कहानी

समझने वाली बात यह है कि यह मामला 30 नवंबर 2024 को विजिलेंस ब्यूरो के आर्थिक अपराध विंग, लुधियाना में दर्ज FIR से संबंधित है। आरोपी के खिलाफ धोखाधड़ी सहित भारतीय दंड संहिता की धाराएं 384, 420, 465, 467, 468 और 120-B के तहत मामला दर्ज किया गया था।

आरोपों का स्वरूप:

धाराअपराध
384धमकी देकर जबरन वसूली
420धोखाधड़ी और बेईमानी से संपत्ति हड़पना
465, 467, 468जालसाजी संबंधी अपराध
120-Bआपराधिक षड्यंत्र

यह कोई साधारण मामला नहीं है। यह संगठित आर्थिक अपराध का मामला है।

तीनों अदालतों ने खारिज की जमानत – फिर भी गिरफ्तारी नहीं!

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि आरोपी ने लगातार अग्रिम जमानत की कोशिश की:

पहली अग्रिम जमानत याचिका:

  • 16 दिसंबर 2024 को सेशन कोर्ट ने खारिज की

पहली बार हाई कोर्ट में:

  • 16 जनवरी 2025 को पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने खारिज की

सुप्रीम कोर्ट में विशेष याचिका:

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  • 28 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने भी खारिज की

FIR रद्द करने की याचिका:

  • आरोपी ने FIR रद्द करने के लिए याचिका दायर की
  • 30 जनवरी 2026 को खुद ही वापस ले ली

दूसरी अग्रिम जमानत याचिका:

  • फिर से हाई कोर्ट गया
  • जस्टिस दीपक गुप्ता ने 50 हजार रुपये जुर्माने के साथ खारिज की

दिलचस्प बात यह है कि नवंबर 2024 से लेकर जून 2026 तक – यानी डेढ़ साल से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन मुलज़िम अभी तक गिरफ्तार नहीं हुआ!

हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी – “यह गंभीर मामला है”

समझने की जरूरत यह है कि जस्टिस दीपक गुप्ता ने बेहद सख्त शब्दों में टिप्पणी की:

अदालत का कहना:

“सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि तीन अदालतों द्वारा अग्रिम जमानत खारिज होने के बावजूद मुलज़िम अभी भी जांच एजेंसी की गिरफ्त से बाहर है।”

अदालत के सवाल:

  1. नवंबर 2024 से डेढ़ साल से अधिक समय बीत चुका है
  2. अगर जांच के लिए गिरफ्तारी जरूरी थी, तो अब तक क्यों नहीं हुई?
  3. यह स्थिति जांच के तरीके और पुलिस की कार्यगुजारी पर गंभीर सवाल खड़े करती है
DGP को जांच के आदेश – जवाबदेही तय करो

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि हाई कोर्ट ने केवल टिप्पणी तक सीमित नहीं रहे। पंजाब के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (DGP) को सीधे निर्देश दिए गए:

DGP को दिए गए निर्देश:

  1. इस मामले की जांच करें – क्यों गिरफ्तारी नहीं हुई?
  2. देरी के कारणों का पता लगाएं – कौन जिम्मेदार है?
  3. उचित सुधारात्मक कदम उठाएं – कानून के अनुसार कार्रवाई करें
  4. न्यायिक आदेशों की पालना सुनिश्चित करें
  5. आपराधिक न्याय प्रणाली में लोगों का विश्वास बनाए रखें

समझने की जरूरत यह है कि यह सिर्फ एक मामले का मुद्दा नहीं है। यह पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न है।

आरोपी का तर्क और अदालत का जवाब

अगर गौर करें तो आरोपी ने दलील दी कि:

आरोपी का तर्क:

  • “अब जांच पूरी हो चुकी है”
  • “चार्जशीट अदालत में पेश हो गई है”
  • “इसलिए अग्रिम जमानत पर पुनर्विचार किया जाए”

हाई कोर्ट का स्पष्ट जवाब:

“लगातार अग्रिम जमानत याचिकाएं तभी सुनी जा सकती हैं जब पहले के आदेश के बाद हालात में कोई असल और महत्वपूर्ण परिवर्तन आया हो।”

अदालत का विश्लेषण:

  • सिर्फ जांच पूरी हो जाना या चार्जशीट पेश हो जाना नया हालात नहीं है
  • यह तो मामले की स्वाभाविक प्रक्रिया है
  • अगर यह तर्क मान लिया जाए, तो बार-बार जमानत याचिकाओं का रास्ता खुल जाएगा
  • यह कानूनी सिद्धांतों को निरर्थक बना देगा
50 हजार रुपये जुर्माना – कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग की सजा

दिलचस्प बात यह है कि अदालत ने केवल याचिका खारिज नहीं की, बल्कि 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।

जुर्माने का आदेश:

  • 50,000 रुपये जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण, लुधियाना में जमा करने होंगे
  • दो सप्ताह के भीतर जमा करना अनिवार्य
  • अगर जमा नहीं किया तो प्राधिकरण कानूनी वसूली कर सकता है

जुर्माने का कारण:

अदालत ने कहा:

“बिना किसी नए या ठोस आधार के लगातार अग्रिम जमानत याचिकाएं दायर करना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।”

अदालत की चिंताएं:

  1. ऐसी याचिकाएं अदालतों का कीमती समय बर्बाद करती हैं
  2. न्यायिक अनुशासन प्रभावित होता है
  3. पहले दिए गए आदेशों की अंतिमता के सिद्धांत का उल्लंघन होता है
लगातार जमानत याचिकाएं – कब मान्य होती हैं?

समझने वाली बात यह है कि हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दूसरी या तीसरी जमानत याचिका केवल विशेष परिस्थितियों में सुनी जा सकती है:

जब मान्य होती है:

  • नए साक्ष्य मिलें जो पहले उपलब्ध नहीं थे
  • कानून में बदलाव हो जाए
  • स्वास्थ्य में गंभीर गिरावट (जीवन-मृत्यु की स्थिति)
  • पारिवारिक आपातकाल (जैसे एकमात्र कमाने वाला, आश्रित बच्चे)
  • जांच में अनुचित देरी (वर्षों तक चार्जशीट न बनना)

जब मान्य नहीं होती:

  • केवल जांच पूरी होना
  • चार्जशीट दाखिल होना
  • यही तर्क दोहराना
  • बस “परेशानी” का हवाला देना
पुलिस जांच पर सवाल – क्या है असली मुद्दा?

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि अदालत का मुख्य सरोकार पुलिस की कार्यप्रणाली से है:

हाई कोर्ट के सवाल:

  1. गिरफ्तारी जरूरी थी या नहीं?
    • अगर जरूरी थी तो डेढ़ साल में क्यों नहीं हुई?
    • अगर जरूरी नहीं थी तो तीन अदालतों ने जमानत क्यों खारिज की?
  2. मुलज़िम कहां है?
    • क्या वह फरार है?
    • क्या उसे संरक्षण मिल रहा है?
    • क्या पुलिस गंभीर नहीं है?
  3. जांच की गुणवत्ता:
    • क्या जांच सही तरीके से हुई?
    • क्या साक्ष्य मजबूत हैं?
    • क्या चार्जशीट ठोस आधार पर है?
ऐसे मामले पहले भी आए हैं – व्यवस्थागत समस्या

समझने की जरूरत यह है कि यह कोई अनोखा मामला नहीं है। ऐसे कई उदाहरण हैं जहां:

समान परिस्थितियां:

  • प्रभावशाली आरोपी लंबे समय तक गिरफ्तारी से बचते रहे
  • कानूनी दांवपेच से जांच को लटकाया गया
  • पुलिस की “गैर-गंभीरता” देखी गई
  • न्यायिक आदेशों की प्रभावी अनुपालना नहीं हुई

हाल के उदाहरण:

  • राजनेताओं के रिश्तेदारों के मामले
  • बड़े व्यापारियों के वित्तीय धोखाधड़ी मामले
  • जमीन-संपत्ति घोटाले
DGP की जांच – क्या कदम उठाए जा सकते हैं?

दिलचस्प बात यह है कि DGP के पास कई विकल्प हैं:

संभावित कार्रवाई:

  1. तत्काल गिरफ्तारी:
    • अगर मुलज़िम का पता है तो तुरंत गिरफ्तार करना
    • अगर फरार है तो लुक आउट नोटिस जारी करना
  2. विभागीय जांच:
    • जांच अधिकारियों की जांच करना
    • क्या जानबूझकर देरी की गई?
    • क्या बाहरी दबाव था?
  3. अनुशासनात्मक कार्रवाई:
    • लापरवाही के दोषी अधिकारियों के खिलाफ कदम
    • निलंबन, चार्जशीट, दंड
  4. प्रक्रिया सुधार:
    • ऐसे मामलों की मॉनिटरिंग व्यवस्था
    • न्यायालय आदेशों की समय पर अनुपालना सुनिश्चित करना
न्यायिक अनुशासन का सिद्धांत – क्यों जरूरी है?

समझने वाली बात यह है कि अदालत का यह कदम न्यायिक अनुशासन बनाए रखने के लिए जरूरी है:

क्यों महत्वपूर्ण है:

  1. न्यायिक समय का मूल्य:
    • अदालतें पहले से ही बोझ से दबी हैं
    • बार-बार एक ही याचिका पर सुनवाई न्यायिक संसाधनों की बर्बादी है
  2. आदेशों की अंतिमता:
    • अगर हर आदेश को बार-बार चुनौती दी जा सके तो कानूनी निश्चितता खत्म हो जाएगी
    • यह व्यवस्था को अराजकता की ओर ले जाएगा
  3. मुकदमेबाजी के दुरुपयोग पर रोक:
    • धनी और प्रभावशाली लोग कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग कर सकते हैं
    • यह गरीब और कमजोर के साथ अन्याय है
  4. जनता का विश्वास:
    • अगर सिस्टम में लूपहोल हैं तो लोगों का विश्वास डगमगाता है
आम आदमी के लिए क्या संदेश?

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह फैसला कई संदेश देता है:

सकारात्मक पहलू:

  • न्यायपालिका सतर्क है
  • कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग पर रोक लगाई जा रही है
  • पुलिस को जवाबदेह ठहराया जा रहा है

चिंताजनक पहलू:

  • डेढ़ साल में गिरफ्तारी नहीं होना गंभीर है
  • क्या प्रभावशाली लोगों के लिए अलग नियम हैं?
  • क्या आम आदमी को भी यही सहूलियत मिलती?

मुख्य बातें (Key Points)

  • पंजाब-हरियाणा HC ने सख्त टिप्पणी – तीन अदालतों से जमानत रद्द होने के बाद भी गिरफ्तारी नहीं
  • नवंबर 2024 से डेढ़ साल बीते, विजिलेंस ब्यूरो धोखाधड़ी मामले में आरोपी फरार
  • जस्टिस दीपक गुप्ता ने 50 हजार रुपये जुर्माना लगाया
  • DGP को जांच और सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश
  • हाई कोर्ट ने कहा – यह पुलिस कार्यप्रणाली और न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल
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अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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