Gurmeet Ram Rahim Parole पर मंगलवार को एक बार फिर सुनारिया जिला जेल से बाहर आ गया है। डेरा सच्चा सौदा के मुखी को इस बार 30 दिनों की पैरोल दी गई है। बलात्कार मामले में अगस्त 2017 में विशेष CBI न्यायालय द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद से यह 16वीं बार है जब उन्हें पैरोल या फरलो पर रिहा किया गया है। यह लगातार रिहाई न्याय व्यवस्था और पैरोल नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
विवरण के अनुसार, गुरमीत राम रहीम मंगलवार सुबह करीब 6:35 बजे सख्त पुलिस सुरक्षा प्रबंधों के बीच एक SUV में जेल से बाहर निकले। इससे पहले जनवरी 2026 में भी उन्हें 40 दिनों की पैरोल दी गई थी।
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एक नजर में राम रहीम का मामला
देखा जाए तो यह मामला केवल एक व्यक्ति की रिहाई का नहीं, बल्कि पूरी न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता का है। गुरमीत राम रहीम को अपनी दो महिला शिष्याओं के साथ बलात्कार के मामले में 20 साल की सजा सुनाई गई थी। 2017 में पंचकूला की विशेष CBI अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया था।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| दोषसिद्धि का वर्ष | अगस्त 2017 |
| अदालत | विशेष CBI कोर्ट, पंचकूला |
| आरोप | दो महिला शिष्याओं से बलात्कार |
| सजा | 20 साल कारावास |
| वर्तमान जेल | सुनारिया जिला जेल, हरियाणा |
| कुल पैरोल/फरलो | 16 बार (2017 से) |
| नवीनतम पैरोल अवधि | 30 दिन |
| पिछली पैरोल | जनवरी 2026 (40 दिन) |
16 बार की रिहाई पर उठते सवाल
अगर गौर करें, तो 2017 से अब तक 16 बार पैरोल या फरलो मिलना कोई सामान्य बात नहीं है। सवाल उठता है कि जिस व्यक्ति को गंभीर अपराध में 20 साल की सजा सुनाई गई हो, उसे इतनी बार जेल के बाहर क्यों जाने दिया जा रहा है?
और बस यहीं से शुरू हुई विवाद की असली कहानी… महिला अधिकार संगठनों और पीड़ितों के वकीलों ने बार-बार इस पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह न्याय व्यवस्था का मजाक है और पीड़ितों के साथ धोखा है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि पैरोल की इतनी बार मंजूरी के पीछे क्या कारण हैं? क्या यह सिर्फ कानूनी प्रक्रिया का पालन है या फिर कोई राजनीतिक या सामाजिक दबाव भी काम कर रहा है?
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पैरोल और फरलो में क्या अंतर है
समझने वाली बात यह है कि पैरोल और फरलो दोनों अलग-अलग हैं। पैरोल आमतौर पर किसी आपातकालीन पारिवारिक कारण, गंभीर बीमारी या अन्य विशेष परिस्थितियों में दी जाती है। वहीं फरलो एक नियमित छुट्टी होती है जो लंबी सजा काट रहे कैदियों को समाज से जुड़े रहने के लिए दी जाती है।
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि राम रहीम के मामले में पैरोल की मंजूरी इतनी बार और इतनी लंबी अवधि के लिए दी गई है कि यह सामान्य प्रक्रिया से हटकर लगती है।
2017 का फैसला और उसके बाद की हिंसा
जब अगस्त 2017 में CBI कोर्ट ने गुरमीत राम रहीम को दोषी करार दिया था, तो हरियाणा और पंजाब में भारी हिंसा भड़क गई थी। डेरा समर्थकों ने सड़कों पर उपद्रव मचाया, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और कई लोगों की जान गई थी।
उस समय सुरक्षा बलों को बड़ी संख्या में तैनात करना पड़ा था। पंचकूला, सिरसा और आसपास के इलाकों में कर्फ्यू लगाना पड़ा था। चिंता का विषय यह भी है कि हर बार जब राम रहीम को पैरोल मिलती है, तो सुरक्षा व्यवस्था पर भारी खर्च आता है।
पीड़ितों और महिला संगठनों की आपत्ति
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह बार-बार की रिहाई पीड़ितों के लिए मानसिक यातना है। जिन महिलाओं ने हिम्मत जुटाकर अदालत में गवाही दी थी, उनके लिए यह देखना कि अपराधी बार-बार जेल से बाहर आ रहा है, बेहद दुखदायी है।
एक महिला संगठन की प्रतिनिधि ने कहा, “यह न्याय का मजाक है। अगर सजा सुनाई गई है तो उसे पूरी होनी चाहिए। पैरोल के नाम पर हर बार रिहा करना गलत संदेश देता है।”
राहत की बात तो यह होनी चाहिए थी कि न्याय मिलने के बाद पीड़ितों को शांति मिले, लेकिन हकीकत इसके उलट है।
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राजनीतिक कनेक्शन पर सवाल
अगर गौर करें तो डेरा सच्चा सौदा का राजनीतिक प्रभाव कोई छिपी बात नहीं है। हरियाणा और पंजाब में चुनावों के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों ने डेरा के समर्थन की कोशिश की है। डेरा के लाखों अनुयायी हैं और उनके वोट किसी भी चुनाव में निर्णायक साबित हो सकते हैं।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि राम रहीम को बार-बार पैरोल देने के पीछे राजनीतिक दबाव भी हो सकता है। हालांकि इसका कोई ठोस सबूत नहीं है, लेकिन समय-समय पर ऐसी अटकलें लगती रही हैं।
उम्मीद की किरण तभी दिखेगी जब न्याय व्यवस्था पूरी तरह से राजनीतिक दखल से मुक्त होकर काम करे।
कानूनी प्रक्रिया क्या कहती है
दिलचस्प बात यह है कि पैरोल देने के लिए जेल नियमों में स्पष्ट प्रावधान हैं। लेकिन इन नियमों की व्याख्या और उनका पालन कैसे किया जाए, यह जेल प्रशासन और संबंधित राज्य सरकार पर निर्भर करता है।
आमतौर पर गंभीर अपराधों में सजा काट रहे कैदियों को पैरोल देने से पहले कई बातों पर विचार किया जाता है – जैसे कैदी का व्यवहार, जेल में बिताया गया समय, पैरोल का कारण और सुरक्षा संबंधी चिंताएं।
लेकिन राम रहीम के मामले में यह सभी मानदंड कितने सख्ती से लागू किए जा रहे हैं, यह सवाल बना हुआ है।
सुनारिया जेल से सुरक्षा के बीच रवानगी
मंगलवार सुबह जब गुरमीत राम रहीम सुनारिया जेल से बाहर निकले, तो सख्त सुरक्षा इंतजाम किए गए थे। पुलिस और अर्धसैनिक बलों की भारी तैनाती की गई थी। उन्हें एक SUV में बैठाकर ले जाया गया।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि हर बार जब राम रहीम को पैरोल मिलती है, तो सुरक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। यह खर्च आखिरकार जनता के टैक्स से ही आता है।
अन्य मामले भी लंबित हैं
समझने वाली बात यह भी है कि राम रहीम के खिलाफ केवल बलात्कार का ही मामला नहीं है। उन पर पत्रकार राम चंदर छत्रपति की हत्या के मामले में भी आरोप हैं। इसके अलावा डेरा प्रबंधक रणजीत सिंह की हत्या के मामले में भी वह आरोपी हैं।
कई मामले अभी भी अदालतों में लंबित हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब कोई व्यक्ति इतने गंभीर आरोपों का सामना कर रहा हो, तो क्या उसे इतनी आसानी से पैरोल मिलनी चाहिए?
समाज पर क्या असर होता है
जब किसी दोषी को बार-बार पैरोल मिलती है, तो इसका समाज पर भी असर पड़ता है। यह संदेश जाता है कि अगर आप प्रभावशाली हैं या आपके पास बड़ी संख्या में समर्थक हैं, तो कानून आपके लिए लचीला हो सकता है।
यह खासकर उन पीड़ितों के लिए दुखदायी है जो न्याय की उम्मीद में अदालतों का दरवाजा खटखटाते हैं। अगर दोषी सजा काटने के बजाय बार-बार बाहर आता रहे, तो न्याय का मतलब ही खो जाता है।
अगले 30 दिन में क्या होगा
अब गुरमीत राम रहीम को 30 दिनों की पैरोल मिली है। इस दौरान वह अपने आश्रम या निर्धारित स्थान पर रहेंगे। पैरोल की शर्तों के अनुसार, उन्हें किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग नहीं लेना है और किसी भी तरह की भाषण या सभा नहीं करनी है।
लेकिन अतीत में ऐसा देखा गया है कि पैरोल के दौरान भी उनके समर्थक बड़ी संख्या में उनसे मिलने पहुंचते हैं। यह भी चिंता का विषय है क्योंकि यह सुरक्षा और कानून व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है।
जानें पूरा मामला
Gurmeet Ram Rahim Parole का यह मामला केवल एक व्यक्ति की रिहाई का नहीं, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था, पैरोल नीति और कानून के समान लागू होने का मामला है। जब आम अपराधियों को पैरोल मिलने में कठिनाई होती है, तो प्रभावशाली लोगों को इतनी बार रिहाई क्यों मिल जाती है?
यह सवाल तब तक जीवित रहेगा जब तक पैरोल प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं आती। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि वह दिखना भी चाहिए।
मुख्य बातें (Key Points)
- गुरमीत राम रहीम को 30 दिनों की पैरोल मिली, मंगलवार सुबह 6:35 बजे सुनारिया जेल से रिहा हुए।
- अगस्त 2017 में दोषसिद्धि के बाद से यह 16वीं बार है जब उन्हें पैरोल/फरलो पर रिहा किया गया।
- बलात्कार मामले में 20 साल की सजा सुनाई गई थी, पंचकूला की विशेष CBI अदालत ने दोषी करार दिया था।
- बार-बार की रिहाई पर महिला संगठनों, पीड़ितों और कानूनी विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं, न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर असर पड़ रहा है।













