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The News Air - Breaking News - ED Raid Controversy: ममता ने खुद छापे वाली जगह पहुंचकर मचाया तहलका, सुप्रीम कोर्ट सख्त

ED Raid Controversy: ममता ने खुद छापे वाली जगह पहुंचकर मचाया तहलका, सुप्रीम कोर्ट सख्त

केंद्रीय एजेंसी और राज्य सरकार की टक्कर पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा- दखल नहीं दिया तो देश में फैल जाएगी अराजकता

The News Air Team by The News Air Team
गुरूवार, 15 जनवरी 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, सियासत
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ED Raid Controversy
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ED Raid Controversy: पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरे देश की राजनीति में हलचल मचा दी है। बात है प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की छापेमारी की, जिसमें खुद राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पुलिस फोर्स लेकर उस जगह पहुंच गईं जहां केंद्रीय एजेंसी के अधिकारी छापा मार रहे थे। यह टकराव इतना बढ़ा कि मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि अगर हम दखल नहीं देंगे तो इस देश में अराजकता फैल जाएगी।

यह सब हुआ 8 जनवरी 2025 को जब ईडी ने कोलकाता में आईपैक (I-PAC) के 10 ठिकानों पर छापेमारी की। आईपैक वही संस्था है जो पहले चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर से जुड़ी रही है और अब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के लिए चुनावी रणनीति बनाती है। ईडी का कहना है कि 2742 करोड़ रुपये के कोयला घोटाले की जांच में पता चला कि हवाला के जरिए करीब 20 करोड़ रुपये कैश आईपैक को भेजे गए।

मुख्यमंत्री ने खुद संभाला मोर्चा

जब ईडी के अधिकारी अपना काम कर रहे थे, तभी कुछ ऐसा हुआ जो भारतीय राजनीति में पहले कभी नहीं देखा गया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद पूरी पुलिस फोर्स के साथ छापे वाली जगह पर पहुंच गईं। इसके बाद जो हुआ वह केंद्र और राज्य के बीच एक बड़े टकराव में बदल गया। राज्य पुलिस ने ईडी के अधिकारियों को घेर लिया और उनके खिलाफ एफआईआर तक दर्ज कर दी।

ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में शिकायत करते हुए बताया कि मुख्यमंत्री के आने के बाद कुछ भी जब्त नहीं हो पाया। एजेंसी का कहना है कि ममता बनर्जी सिर्फ एक iPhone लेकर गईं। दूसरी तरफ बंगाल सरकार का कहना है कि मुख्यमंत्री ने छापे में कोई दखल नहीं दिया और वे सिर्फ राज्य के अधिकारों की रक्षा के लिए वहां गई थीं।

सुप्रीम कोर्ट में गरमागरम बहस

यह मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने सुनवाई की। एक तरफ सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ईडी का पक्ष रख रहे थे, तो दूसरी तरफ वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल बंगाल सरकार की दलीलें पेश कर रहे थे।

कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया कि इस कोयला घोटाले में आखिरी बयान फरवरी 2024 में दर्ज हुआ था। उसके बाद 11 महीने तक ईडी ने कुछ नहीं किया। फिर अचानक चुनाव से ठीक पहले कार्रवाई क्यों हुई? पश्चिम बंगाल में अप्रैल में विधानसभा चुनाव होने हैं और आईपैक के पास पार्टी की बहुत सारी जानकारियां हैं।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हल्के-फुल्के अंदाज में पूछा कि चुनाव तो इलेक्शन कमीशन कराता है, आईपैक नहीं। और अगर चुनाव के दौरान मनी लॉन्ड्रिंग होती है तो इसमें ईडी की क्या गलती है?

कोर्ट ने दिया बड़ा आदेश

सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अहम फैसले सुनाए। पहला, बंगाल सरकार को नोटिस जारी किया और दो हफ्ते में जवाब मांगा। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने केंद्रीय एजेंसी पर जो आरोप लगाए हैं वे बहुत गंभीर हैं और इनका जवाब देना होगा।

दूसरा, ईडी को बड़ी राहत मिली। कोर्ट ने ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज तीनों एफआईआर पर स्टे लगा दिया। इसका मतलब है कि फिलहाल इन अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं होगी।

तीसरा, कोर्ट ने बंगाल सरकार से साफ कहा कि वह ईडी के काम में दखल न दे।

हाई कोर्ट पर भी उठे सवाल

ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में एक और गंभीर बात कही। एजेंसी ने बताया कि 14 जनवरी को जब कोलकाता हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई हो रही थी तो वहां का माहौल जंतर-मंतर जैसा हो गया था। सुनवाई के दौरान बार-बार माइक बंद हो रहा था और कोर्ट में भीड़ इकट्ठा करने के लिए बसों और गाड़ियों का इंतजाम किया गया था।

हालात इतने बिगड़ गए कि एक्टिंग चीफ जस्टिस को आदेश देना पड़ा कि वकीलों के अलावा किसी को भी अंदर आने की इजाजत नहीं होगी। ईडी ने कहा कि अब वे हाई कोर्ट नहीं जाएंगे और चाहते हैं कि सीबीआई इस मामले की जांच करे ताकि पूरा मामला राज्य से बाहर ट्रांसफर हो सके।

झारखंड में भी वही कहानी

यह टकराव सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं रहा। झारखंड की राजधानी रांची में भी कुछ ऐसा ही हुआ। वहां पेयजल और स्वच्छता विभाग में 20 करोड़ के घोटाले की जांच ईडी कर रही थी। इस मामले में एक व्यक्ति संतोष कुमार को गिरफ्तार किया गया था और वे 18 महीने जेल में रहे।

जेल से निकलने के बाद जब उन्हें फिर से ईडी के दफ्तर बुलाया गया तो शिकायत आई कि उनके साथ मारपीट हुई। इसके बाद झारखंड पुलिस सक्रिय हो गई और उसने ईडी के दफ्तर को घेर लिया। बीजेपी नेता बाबूलाल मरांडी ने खुले तौर पर कहा कि यह बंगाल नहीं है, यह झारखंड है।

रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने इस पूरे मामले को प्लांटेड स्टोरी बताया। उनका कहना था कि संतोष कुमार बिना किसी समन के खुद ईडी दफ्तर गए और फिर खुद ही अपना माथा फोड़ लिया ताकि ईडी पर आरोप लगाया जा सके। उन्होंने कहा कि यह संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ एक साजिश है।

पांच साल के छापों का हैरान करने वाला आंकड़ा

अगर आंकड़ों की बात करें तो नवंबर 2020 से जनवरी 2026 के बीच यानी पांच साल में ईडी ने पूरे देश में 573 से ज्यादा छापे मारे। इनमें से लगभग 250 छापे सीधे तौर पर राजनीतिक दलों और नेताओं से जुड़े थे।

लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इतने सारे छापों में से सिर्फ दो जगहों पर ही गिरफ्तारी की नौबत आई। वह भी सजा नहीं हुई, बस गिरफ्तारी हुई। इससे सवाल उठता है कि आखिर इन छापों का मकसद क्या है? क्या जांच है या सिर्फ डराना-धमकाना?

चुनाव वाले राज्यों में छापों की बारिश

जिन राज्यों में हाल ही में चुनाव हुए, वहां छापों की संख्या देखने लायक है। हरियाणा में सबसे ज्यादा 280 छापे पड़े। महाराष्ट्र में 113 छापे मारे गए। झारखंड में 74 और दिल्ली में 27 छापे पड़े।

कर्नाटक की बात करें तो वहां चुनाव प्रक्रिया के छह महीने के अंदर 76 छापे मारे गए। तमिलनाडु में भी चुनाव के समय 16 बड़े छापे और 53 छोटे छापे पड़े। बड़े छापे का मतलब है जो सीधे राजनीतिक नेताओं या पार्टियों से जुड़े हों।

11 राज्यों ने दिखाई अपनी ताकत

यह केंद्र और राज्य का टकराव नया नहीं है। 2021, 2022 और 2023 में 11 गैर-बीजेपी शासित राज्यों ने सीबीआई को अपने राज्य में घुसने की इजाजत वापस ले ली। ममता बनर्जी ने तो खुले तौर पर कहा था कि सीबीआई अधिकारियों को बंगाल में एंट्री नहीं मिलेगी।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि ईडी की भूमिका देखिए – छापे मारती है, हाथ कुछ नहीं आता और फिर धमका कर चली जाती है। यह सब कुछ सिर्फ राजनीतिक लाइन पर चलता दिखता है।

टीएमसी नेता ने रखी अपनी बात

तृणमूल कांग्रेस के नेता कल्याण बनर्जी ने इस पूरे मामले पर बहुत सीधी बात कही। उन्होंने कहा कि जब भी किसी गैर-बीजेपी राज्य में चुनाव होने वाले होते हैं, तब केंद्रीय एजेंसियां राजनीतिक दलों के मामलों में दखल देती हैं। यह सही नहीं है।

लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अगर केंद्रीय एजेंसी अपना काम करे और राज्य की एजेंसी उसमें दखल दे, तो यह भी गलत है। उनका कहना था कि सहकारी संघवाद यानी Cooperative Federalism बनाए रखना सिर्फ राज्य की जिम्मेदारी नहीं है, केंद्र सरकार की भी उतनी ही जिम्मेदारी है।

दिल्ली पर भी असर

दिल्ली का जिक्र भी जरूरी है क्योंकि यहां भी ऐसी ही स्थिति रही। जब दिल्ली में गैर-बीजेपी सरकार थी, तब के मुख्यमंत्री, उनके डिप्टी सीएम और कई मंत्री ईडी के निशाने पर रहे। उन पर आरोप लगे, छापे पड़े, कुछ जेल भी गए। लेकिन आज की तारीख में वे जेल में नहीं हैं। उन पर लगे मुकदमों का क्या हुआ, यह सवाल अब भी बाकी है।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की कहानी भी ऐसी ही है। उन पर भी खाद्य घोटाले, कोयला घोटाले और जमीन से जुड़े मामलों में केस हुए। उन्हें जेल जाना पड़ा और मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। लेकिन जब वे जेल से बाहर आए तो वे केस ठंडे बस्ते में चले गए। ईडी न तो अदालत में सबूत पेश कर पाई न ही उन्हें दोषी साबित कर पाई।

क्या है असली मुद्दा?

इस पूरे विवाद में असली मुद्दा यह है कि क्या केंद्रीय एजेंसियां राजनीतिक हथियार बन गई हैं? अगर ईडी सच में जांच कर रही है तो फिर इतने छापों के बाद सजा क्यों नहीं हो रही? और अगर राज्य सरकारें सच में गलत हैं तो फिर वे केंद्रीय एजेंसियों का विरोध क्यों कर रही हैं?

एक तरफ केंद्र सरकार का कहना है कि कानून का राज होना चाहिए और ईडी अपना काम कर रही है। दूसरी तरफ गैर-बीजेपी राज्यों का कहना है कि ये सब चुनाव से पहले उन्हें परेशान करने के लिए हो रहा है।

आम आदमी पर क्या असर?

जब केंद्र और राज्य की एजेंसियां आपस में भिड़ती हैं तो इसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ता है। कानून-व्यवस्था कमजोर होती है। सरकारी मशीनरी राजनीति में उलझ जाती है। विकास के काम रुक जाते हैं।

अगर हर राज्य केंद्रीय एजेंसियों को रोकने लगे या केंद्र हर गैर-बीजेपी राज्य पर छापे मारता रहे, तो देश का संघीय ढांचा कमजोर होगा। यह सवाल अब सुप्रीम कोर्ट के सामने है और आने वाले दिनों में इसका जवाब मिलना जरूरी है।

आगे क्या होगा?

पश्चिम बंगाल में अप्रैल में विधानसभा चुनाव होने हैं। मार्च तक नोटिफिकेशन आ जाएगा। बस डेढ़-दो महीने का वक्त बचा है। इसी दौरान ईडी सक्रिय है, सीबीआई का जिक्र हो रहा है और आयकर विभाग भी अपना काम कर रहा है।

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सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार को दो हफ्ते का समय दिया है। इस जवाब के बाद आगे की दिशा तय होगी। लेकिन एक बात साफ है – यह टकराव जल्दी खत्म होने वाला नहीं है।

‘जानें पूरा मामला’

यह कोयला घोटाला नवंबर 2020 से जांच में है। सीबीआई ने 27 नवंबर 2020 को पहली एफआईआर दर्ज की थी। ईडी ने अगले ही दिन से यानी 28 नवंबर 2020 से जांच शुरू की। आईपैक के डायरेक्टर प्रदीप जैन के घर और ऑफिस पर छापे पड़े। ईडी का दावा है कि कोयले का भुगतान कैश में होता था और जब समन भेजा गया तो कोई जवाब नहीं आया। इसी बीच आईपैक ने 2021 में तृणमूल कांग्रेस के साथ चुनावी रणनीति का कॉन्ट्रैक्ट किया। अब इस संस्था के पास पार्टी की कई अहम जानकारियां हैं जो चुनाव में काम आती हैं।


मुख्य बातें (Key Points)
  • सुप्रीम कोर्ट सख्त: बंगाल सरकार को नोटिस जारी, दो हफ्ते में मांगा जवाब
  • ईडी को राहत: अधिकारियों के खिलाफ दर्ज तीनों एफआईआर पर स्टे लगा
  • अभूतपूर्व घटना: ममता बनर्जी खुद पुलिस फोर्स लेकर छापे वाली जगह पहुंचीं
  • हैरान करने वाला आंकड़ा: पांच साल में 573 छापे, सिर्फ दो जगह गिरफ्तारी
  • झारखंड में भी बवाल: राज्य पुलिस ने ईडी के दफ्तर को घेरा

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: आईपैक (I-PAC) क्या है और इस पर ईडी का छापा क्यों पड़ा?

आईपैक एक राजनीतिक रणनीति बनाने वाली संस्था है जो पहले प्रशांत किशोर से जुड़ी थी। ईडी ने 2742 करोड़ के कोयला घोटाले की जांच में पाया कि हवाला के जरिए करीब 20 करोड़ रुपये आईपैक को भेजे गए। इसी आरोप में छापा मारा गया।

प्रश्न 2: सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क्या फैसला दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर रोक लगा दी। साथ ही बंगाल सरकार को दो हफ्ते में जवाब देने का नोटिस जारी किया। कोर्ट ने कहा कि अगर दखल नहीं दिया तो अराजकता फैल जाएगी।

प्रश्न 3: ममता बनर्जी छापे वाली जगह क्यों गईं?

जब ईडी आईपैक के दफ्तर पर छापा मार रही थी, तब ममता बनर्जी राज्य पुलिस के साथ वहां पहुंचीं। बंगाल सरकार का कहना है कि यह राज्य के अधिकारों की रक्षा के लिए था। ईडी इसे जांच में बाधा मानती है।

प्रश्न 4: कितने राज्यों ने सीबीआई को अपने यहां आने से रोका है?

2021 से 2023 के बीच 11 गैर-बीजेपी शासित राज्यों ने सीबीआई को अपने राज्य में प्रवेश की सामान्य अनुमति वापस ले ली।

प्रश्न 5: इस विवाद का आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?

जब केंद्र और राज्य की एजेंसियां आपस में टकराती हैं तो कानून-व्यवस्था कमजोर होती है। सरकारी मशीनरी राजनीति में उलझ जाती है और विकास के काम प्रभावित होते हैं।

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