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The News Air - Breaking News - ‘Entry Ban करवा देंगे Supreme Court में’: CJI Suryakant ने Frivolous Petition पर याचिकाकर्ता को लगाई फटकार

‘Entry Ban करवा देंगे Supreme Court में’: CJI Suryakant ने Frivolous Petition पर याचिकाकर्ता को लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को Chief Justice of India Suryakant ने एक याचिकाकर्ता Pinakapani Mohanty को गलत याचिका दाखिल करने पर जमकर फटकार लगाई और सुप्रीम कोर्ट में entry ban करने की चेतावनी दी। पहले भी CJI कई बार ऐसी याचिकाओं पर नाराजगी जता चुके हैं।

The News Air Team by The News Air Team
सोमवार, 20 अप्रैल 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय
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CJI Suryakant
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CJI Suryakant Angry Supreme Court: सोमवार को Supreme Court of India में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जो frivolous litigation की समस्या को उजागर करता है। Chief Justice of India (CJI) Suryakant ने एक याचिकाकर्ता को इतनी सख्ती से फटकार लगाई कि उसे सुप्रीम कोर्ट में entry ban करने की चेतावनी तक दे दी।

देखा जाए तो यह कोई पहली बार नहीं था जब CJI Suryakant ने गलत तरीके से दाखिल की गई याचिकाओं पर नाराजगी जताई हो। पिछले कुछ महीनों में उन्होंने कई बार ऐसी petitions पर सख्त रुख अपनाया है और advocates को भी हिदायत दी है कि वे अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से लें।

सोमवार को Pinakapani Mohanty नाम का एक याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। उनकी याचिका देखकर bench ने तुरंत नाराजगी जाहिर की। CJI ने पूछा, “आपने पहले भी ऐसी ही याचिका दाखिल की थी?” Mohanty ने जवाब दिया, “इस बार अलग है। मैंने थोड़ा सा…”

‘किसने Draft किया है?’ – CJI का सीधा सवाल

याचिकाकर्ता के जवाब से संतुष्ट नहीं होकर, CJI ने सीधा सवाल किया, “इसे किसने draft किया है?” Mohanty ने जवाब में “Mukherjee Sir” का नाम लिया।

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यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि CJI ने तुरंत गंभीर चेतावनी जारी कर दी। उन्होंने याचिकाकर्ता से कहा, “Entry ban करवा देंगे तुम्हारा Supreme Court में अब। पहले भी यही याचिका खारिज कर चुके हैं।”

हैरान करने वाली बात यह है कि यह एक repeat petition थी। यानी same या similar petition पहले भी file की गई थी और reject हो चुकी थी। फिर भी yachiकाकर्ता ने थोड़े बदलाव के साथ फिर से try किया।

‘Famous होने के लिए करते हैं ऐसे काम’

CJI ने आगे टिप्पणी करते हुए कहा, “हमें लगता है कि याचिकाकर्ता मशहूर होने के लिए इस तरह के काम करते हैं। इन तथ्यों से जुड़े मामलों का फैसला अदालत या न्यायिक स्तर पर नहीं किया जा सकता।”

समझने वाली बात यह है कि CJI ने एक बड़ी समस्या की ओर इशारा किया – कुछ लोग publicity या media attention पाने के लिए Supreme Court में frivolous petitions file करते हैं। ऐसी याचिकाएं court के precious time को waste करती हैं और genuine cases की hearing delay होती है।

यह दर्शाता है कि judiciary को ऐसे vexatious litigants से निपटने में कठिनाई होती है जो बार-बार baseless petitions लेकर आते हैं।

10 अप्रैल को जाति जनगणना याचिका पर भी नाराजगी

यह पहली बार नहीं था। 10 अप्रैल को Supreme Court में caste census से जुड़ी एक याचिका दाखिल हुई थी। उस समय भी CJI ने याचिका की भाषा पर गंभीर सवाल उठाए थे।

उन्होंने कहा था, “इस petition में जिस भाषा का इस्तेमाल हुआ है, उसे आपने कहां से सीखा है? ये बदतमीजी की भाषा कहां से लेकर आते हैं आप लोग? कैसे याचिका लिखते हैं आप लोग।”

अगर गौर करें तो यह बेहद कड़ी टिप्पणी थी। CJI ने साफ शब्दों में “बदतमीजी की भाषा” (language of rudeness) का इस्तेमाल किया। यह दर्शाता है कि कुछ petitions में ऐसी inappropriate या disrespectful language use की जाती है जो court की dignity के खिलाफ है।

Legal drafting में respectful और formal language होनी चाहिए। Intemperate या provocative language का use करना contempt of court भी हो सकता है।

AI के इस्तेमाल पर भी दी थी चेतावनी

शुक्रवार को CJI ने Artificial Intelligence (AI) के इस्तेमाल को लेकर Advocates on Record (AORs) को भी हिदायत दी थी। उन्होंने AORs को याद दिलाया कि वे न केवल bar के members हैं बल्कि court के औपचारिक “officers” भी हैं।

CJI ने कहा कि AORs पर judiciary की बड़ी जिम्मेदारी है, जिस पर काफी भरोसा किया जाता है। उन्होंने AORs को चेताया कि काम AI की मदद से या outsource करने के बजाय खुद ही करें।

दिलचस्प बात यह है कि technology के इस युग में भी CJI ने emphasize किया कि legal work में human expertise और personal attention की कोई substitute नहीं है।

‘Filing को Regular Process न समझें’

CJI ने कहा, “Filing को एक नियमित प्रक्रिया न समझें। प्रत्येक brief को ध्यानपूर्वक पढ़ें।” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि AOR की भूमिका एक “महत्वपूर्ण मील का पत्थर” (critical milestone) है जो वादियों (litigants) और Supreme Court के बीच प्राथमिक जिम्मेदारी बिंदु (primary responsibility point) होने का भार उठाती है।

समझने वाली बात यह है कि AORs को केवल mechanical filing करने वाले नहीं समझा जाना चाहिए। उन्हें हर petition को carefully scrutinize करना चाहिए यह सुनिश्चित करने के लिए कि वह maintainable है, properly drafted है, और genuine legal issues raise करती है।

Legal Process के Highest Standards सुनिश्चित करें

कानूनी प्रक्रिया के उच्चतम मानक (highest standards) सुनिश्चित करने पर जोर देते हुए CJI ने कहा कि advocates को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि:

  • याचिकाएं ठीक से तैयार की गई हों (properly drafted)
  • तथ्यों का सावधानीपूर्वक सत्यापन किया गया हो (facts carefully verified)
  • कानूनी आधार ठोस बने रहें (legal grounds remain solid)

यह guidelines बेहद महत्वपूर्ण हैं। अगर advocates इन standards को follow करें तो frivolous litigation काफी हद तक reduce हो सकती है।

Frivolous Litigation: एक गंभीर समस्या

Frivolous litigation या vexatious litigation भारतीय judicial system की एक बड़ी समस्या है। Lakhs of cases पहले से ही pending हैं Supreme Court और High Courts में। ऐसे में baseless petitions court के time को और waste करती हैं।

कुछ लोग publicity के लिए, कुछ harassment के लिए, तो कुछ बिना proper legal advice लिए ही court में पहुंच जाते हैं। यह genuine litigants के लिए न्याय में देरी का कारण बनता है।

CJI Suryakant का सख्त रुख इस समस्या को address करने का एक तरीका है। Entry ban जैसी warnings से लोग दो बार सोचेंगे before filing baseless petitions.

Contempt of Court और Costs

Supreme Court के पास frivolous petitions के लिए exemplary costs लगाने की शक्ति है। Court ने past में कई cases में lakhs of rupees की costs impose की हैं।

इसके अलावा, अगर petition में court की dignity को hurt करने वाली language है तो contempt of court proceedings भी हो सकती हैं।

CJI की warnings clearly signal भेज रही हैं कि court अब ऐसी petitions को tolerate नहीं करेगी।

AORs की जिम्मेदारी

Advocates on Record (AORs) Supreme Court में एक special category of advocates हैं जिन्हें Supreme Court में independently practice करने का right है। वे petitions file कर सकते हैं और court के officers माने जाते हैं।

इस special status के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है। AORs को यह ensure करना चाहिए कि जो petitions वे file कर रहे हैं वे legally sound हैं।

CJI ने यही message दिया है – AORs को अपनी responsibility seriously लेनी होगी। AI या junior advocates पर blindly depend करने के बजाय, उन्हें personally हर brief को review करना चाहिए।

Technology और Legal Profession

AI का जिक्र करना भी महत्वपूर्ण है। आजकल कई law firms और advocates AI tools use कर रहे हैं legal research, drafting, और document review के लिए।

यह per se गलत नहीं है। Technology legal profession को efficient बना सकती है। लेकिन CJI का point यह है कि AI को completely rely नहीं किया जा सकता। Human judgment और expertise essential हैं।

AI-generated drafts में errors हो सकती हैं, वे case-specific nuances को miss कर सकते हैं, या inappropriate content generate कर सकते हैं। इसलिए advocate की personal oversight जरूरी है।

क्या है आगे का रास्ता?

सवाल उठता है कि क्या CJI की ये warnings और strictness frivolous litigation को reduce करेंगी? Short term में definitely एक deterrent effect होगा। लोग सोचेंगे before filing baseless petitions.

लेकिन long-term solution के लिए systemic changes चाहिए:

  • Better legal awareness among public
  • Stricter screening of petitions at filing stage
  • Exemplary costs को और बढ़ाना
  • Vexatious litigants की list maintain करना
  • AORs के लिए continuing legal education programs

इसके साथ ही, genuine litigants को legal aid और proper guidance मिलनी चाहिए ताकि वे properly drafted petitions file कर सकें।

मुख्य बातें (Key Points)
  • CJI Suryakant ने सोमवार को Pinakapani Mohanty नाम के याचिकाकर्ता को फटकार लगाई।
  • Supreme Court में entry ban करने की चेतावनी दी क्योंकि वही petition पहले भी खारिज हो चुकी थी।
  • CJI ने कहा कि लोग famous होने के लिए ऐसी petitions file करते हैं।
  • 10 अप्रैल को caste census याचिका की “बदतमीजी की भाषा” पर भी नाराजगी जताई थी।
  • शुक्रवार को AORs को AI के इस्तेमाल और outsourcing पर चेतावनी दी थी।
  • AORs को याद दिलाया कि वे court के “officers” हैं और उन पर बड़ी जिम्मेदारी है।
  • Filing को regular process न समझें, हर brief को ध्यान से पढ़ें।
  • Petitions properly drafted हों, facts verified हों, और legal grounds solid हों।
  • Frivolous litigation judicial system की एक बड़ी समस्या है।
  • Technology helpful है लेकिन human judgment की कोई substitute नहीं।

 

 

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