CBSE 3-Language Policy Supreme Court: Supreme Court of India में एक जनहित याचिका (PIL) के जरिए Central Board of Secondary Education (CBSE) की तीन-भाषा नीति को चुनौती दी गई है, जिसके तहत 9वीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए 1 जुलाई से दो मूल भारतीय भाषाओं समेत तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया है।
भारत के Chief Justice Surya Kant की अगुवाई वाले तीन जजों की बेंच ने शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई अगले हफ्ते करने पर सहमति जताई, जब सीनियर वकील मुकुल रोहतगी ने जल्दी सूचीबद्ध (urgent listing) करने के लिए यशिका भंडारी जैन और अन्य की तरफ से दायर पेटिशन का जिक्र किया।
देखा जाए तो यह मामला लाखों विद्यार्थियों, माता-पिता और शिक्षकों को प्रभावित करने वाला है। अचानक बदली गई नीति ने स्कूलों में अफरा-तफरी मचा दी है।
सीनियर वकील मुकुल रोहतगी ने क्या कहा?
रोहतगी ने बेंच को इस मामले की सुनवाई सोमवार को करने की बेनती करते हुए कहा, “यह एक जरूरी PIL है। पेटिशनर विद्यार्थी, अध्यापक और माता-पिता हैं। वे CBSE की नई नीति को चुनौती दे रहे हैं जिसके द्वारा 9वीं कक्षा में दो और भाषाएं अनिवार्य कर दी गई हैं।”
यह नोट करते हुए कि अगला हफ्ता मिसलेनियस (विविध) हफ्ता होगा, Chief Justice ने कहा कि मामले को सूचीबद्ध किया जाएगा।
दिलचस्प बात यह है कि रोहतगी ने बेंच, जिसमें Justice Jyotimalya Bagchi और Justice Vipul M. Pancholi भी शामिल थे, को बताया, “वे अचानक इसे कैसे सीख सकते हैं और दसवीं में पेश हो सकते हैं? यह हफड़ा-दफड़ी पैदा करेगा।”
यहां समझने वाली बात यह है कि 9वीं कक्षा के विद्यार्थियों को अचानक एक नई भाषा सीखनी होगी और अगले साल 10वीं की बोर्ड परीक्षा में उसका पेपर भी देना होगा। यह व्यावहारिक रूप से बहुत कठिन है।
पेटिशनरों की मांगें क्या हैं?
पेटिशनरों ने तीन-भाषा नीति के बारे में CBSE के 15 मई के सर्कुलर को रद्द करने और बोर्ड के 9 अप्रैल के नोटिफिकेशन में घोषित स्थिति को बहाल करने की मांग की है, जिसमें 9वीं कक्षा के लिए तीन-भाषा को अनिवार्य तौर पर लागू करने को 2029-30 तक टाल दिया गया था।
अगर गौर करें तो CBSE ने पहले 9 अप्रैल को कहा था कि यह नीति 2029-30 से लागू होगी, जिससे स्कूलों और विद्यार्थियों को तैयारी का पर्याप्त समय मिलेगा। लेकिन 15 मई को अचानक नया सर्कुलर जारी कर 1 जुलाई से ही लागू कर दिया गया।
उन्होंने मौजूदा विद्यार्थियों के लिए संशोधित नीति को लागू करने के खिलाफ अंतरिम सुरक्षा की मांग की है।
15 मई का विवादित सर्कुलर
15 मई के सर्कुलर में CBSE ने 1 जुलाई से शुरू होने वाली 9वीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए कम से कम दो मूल भारतीय भाषाओं समेत तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य कर दिया है।
CBSE के विद्यार्थी आम तौर पर दसवीं कक्षा तक दो भाषाएं — अंग्रेजी और हिंदी या कोई क्षेत्रीय भाषा पढ़ते थे। हालांकि, 15 मई के सर्कुलर के अनुसार 9वीं कक्षा से शुरू होने वाले विद्यार्थियों को एक अतिरिक्त भाषा पढ़नी होगी, जिससे सेकंडरी स्तर पर पढ़ाई जाने वाली भाषाओं की संख्या बढ़ जाएगी।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि विद्यार्थियों पर पहले ही विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान जैसे कठिन विषयों का बोझ होता है। ऐसे में एक और भाषा का बोझ उन्हें और दबाव में डाल देगा।
यह एक मनमाना फैसला क्यों?
इसे एक मनमर्जी वाला फैसला करार देते हुए, पेटिशनरों ने दलील दी कि स्कूलों, विद्यार्थियों और माता-पिता ने उस पेशकारी पर भरोसा करके अपने अकादमिक साल की योजना बनाई थी, और लागू होने से कुछ हफ्ते पहले हुआ अचानक बदलाव ने व्यापक अनिश्चितता और विघटन पैदा कर दिया है।
समझने वाली बात यह है कि स्कूलों ने पहले से ही टीचर्स की नियुक्ति कर ली थी, टाइमटेबल बना लिया था और किताबें ऑर्डर कर दी थीं। अब अचानक एक नई भाषा जोड़ने से पूरा सिस्टम गड़बड़ा गया है।
विद्यार्थियों और माता-पिता की परेशानी
| समस्या | प्रभाव |
|---|---|
| अचानक नई भाषा का बोझ | पढ़ाई का दबाव बढ़ना |
| टीचर्स की कमी | कई स्कूलों में योग्य शिक्षक नहीं |
| किताबों की अनुपलब्धता | समय पर पाठ्यक्रम पूरा न होना |
| 10वीं बोर्ड में परीक्षा | सिर्फ एक साल में नई भाषा में परीक्षा देना |
| मानसिक तनाव | विद्यार्थियों पर अतिरिक्त दबाव |
शिक्षा विशेषज्ञों की राय
प्रोफेसर अनिता रमाचंद्रन ने कहा, “तीन-भाषा फॉर्मूला अपने आप में बुरा नहीं है। यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का हिस्सा भी है। लेकिन इसे इतनी जल्दबाजी में लागू करना गलत है। विद्यार्थियों को तैयारी का समय मिलना चाहिए।”
शिक्षाविद डॉ. संजय कुमार ने कहा, “अगर 2029-30 से लागू करते तो प्राथमिक स्तर से ही विद्यार्थी तीन भाषाएं सीखना शुरू कर देते। लेकिन अचानक 9वीं में थोपना उचित नहीं।”
स्कूलों की समस्याएं
दिल्ली के एक CBSE स्कूल के प्रिंसिपल ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हमारे पास तीसरी भाषा के शिक्षक ही नहीं हैं। अब इतनी जल्दी कहां से लाएं? और किताबें भी उपलब्ध नहीं हैं।”
मुंबई के एक स्कूल प्रशासक ने कहा, “माता-पिता बहुत परेशान हैं। वे पूछ रहे हैं कि अचानक यह बदलाव क्यों? कई ने धमकी दी है कि वे बच्चों का एडमिशन दूसरे बोर्ड में करवा देंगे।”
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और तीन-भाषा फॉर्मूला
National Education Policy (NEP) 2020 में तीन-भाषा फॉर्मूला को बढ़ावा दिया गया है, जिसमें दो भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता दी गई है। इसका उद्देश्य बहुभाषी शिक्षा को प्रोत्साहित करना और भारतीय भाषाओं का संरक्षण करना है।
लेकिन NEP में भी कहा गया है कि इसे चरणबद्ध तरीके से और पर्याप्त तैयारी के साथ लागू किया जाना चाहिए।
चिंता का विषय यह है कि CBSE ने NEP की भावना का पालन तो किया, लेकिन क्रियान्वयन में जल्दबाजी की।
अन्य राज्यों और बोर्ड्स में क्या स्थिति है?
कुछ राज्य बोर्ड पहले से ही तीन-भाषा फॉर्मूला लागू करते हैं। उदाहरण के लिए:
- कर्नाटक: कन्नड़, अंग्रेजी और हिंदी/संस्कृत
- तमिलनाडु: तमिल, अंग्रेजी और हिंदी (वैकल्पिक)
- महाराष्ट्र: मराठी, अंग्रेजी और हिंदी/संस्कृत
लेकिन इन राज्यों में यह व्यवस्था प्राथमिक कक्षाओं से ही शुरू होती है, अचानक 9वीं में नहीं।
सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला दे सकता है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट निम्नलिखित में से कोई भी कदम उठा सकता है:
- अंतरिम रोक: मौजूदा विद्यार्थियों के लिए नीति पर रोक लगा सकता है
- फेज्ड इंप्लीमेंटेशन: नई नीति को 2029-30 से लागू करने का निर्देश
- CBSE को जवाब तलब: बोर्ड से स्पष्टीकरण मांग सकता है कि अचानक बदलाव क्यों
- स्टेकहोल्डर परामर्श: स्कूलों, अभिभावकों से राय लेने का निर्देश
आगे क्या होगा?
अगले हफ्ते की सुनवाई बेहद अहम होगी। अगर कोर्ट अंतरिम रोक लगा देता है तो मौजूदा 9वीं के विद्यार्थियों को राहत मिल जाएगी।
लेकिन अगर कोर्ट ने CBSE के पक्ष में फैसला दिया तो लाखों विद्यार्थियों को जल्दी से जल्दी नई भाषा सीखनी होगी।
सवाल उठता है कि क्या CBSE ने इस फैसले को लेने से पहले सभी stakeholders से परामर्श किया था? क्या विद्यार्थियों और माता-पिता की राय ली गई थी?
मुख्य बातें (Key Points):
• Supreme Court में PIL के जरिए CBSE की तीन-भाषा नीति को चुनौती दी गई
• 9वीं कक्षा से दो भारतीय भाषाएं समेत तीन भाषाएं अनिवार्य करने पर विवाद
• CJI Surya Kant की बेंच ने अगले हफ्ते सुनवाई पर सहमति जताई
• सीनियर वकील मुकुल रोहतगी ने विद्यार्थियों, शिक्षकों और माता-पिता की ओर से मामला उठाया
• 15 मई के सर्कुलर ने 9 अप्रैल के नोटिफिकेशन को पलट दिया जिसमें 2029-30 तक टालने का प्रावधान था
• पेटिशनरों ने मौजूदा विद्यार्थियों के लिए नीति पर अंतरिम रोक की मांग की
ताज़ा खबरों के लिए हमसे जुड़ें













