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The News Air - Breaking News - Bihar Election : ‘मेहनती BJP’ का नैरेटिव या ‘Vote Chori’ पर पर्दा डालने का खेल?

Bihar Election : ‘मेहनती BJP’ का नैरेटिव या ‘Vote Chori’ पर पर्दा डालने का खेल?

बिहार के नतीजों पर 'गोदी मीडिया' के विश्लेषण पर उठे गंभीर सवाल; पैसे के खेल, चुनाव आयोग की भूमिका और 'वोट चोरी' के आरोपों को 'मेहनत की थ्योरी' से दबाने की कोशिश।

The News Air Team by The News Air Team
सोमवार, 17 नवम्बर 2025
in Breaking News, NEWS-TICKER, बिहार, राष्ट्रीय, सियासत, स्पेशल स्टोरी
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Bihar Election Analysis Media Critique Vote Theft Allegations
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Bihar Election Analysis Media Critique Vote Theft Allegations : बिहार चुनाव के नतीजे आने के बाद, गोदी मीडिया में “मेहनत, मेहनत और मेहनत” का एक नैरेटिव गढ़ा जा रहा है। इस नैरेटिव के जरिए यह स्थापित करने की कोशिश हो रही है कि भाजपा ने यह चुनाव केवल मेहनत के दम पर जीता है। लेकिन इस ‘मेहनत की थ्योरी’ पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि यह महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली में उठे ‘वोट चोरी’ के सवालों को दबाने और फर्जी बताने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

यह विश्लेषण हो रहा है या स्पिन देने की कोशिश? सवाल है कि अगर भाजपा की मेहनत का ऐसा ही रिजल्ट आना था, तो गोदी मीडिया को यह तब क्यों नहीं दिखा जब भाजपा मेहनत कर रही थी? रिजल्ट आने के बाद ही उन्हें केवल भाजपा की मेहनत क्यों दिखाई देने लगी?

‘मंत्रियों की ‘मेहनत’ का सच’

भाजपा के नेताओं की मेहनत पर चर्चा हो रही है। धर्मेंद्र प्रधान की मेहनत की तारीफ हो रही है, लेकिन वह शिक्षा मंत्री भी हैं। उनकी मेहनत से शिक्षा और यूनिवर्सिटी का बिहार और देश भर में क्या हाल है, उस मेहनत की भी बात क्यों नहीं होती? भूपेंद्र यादव की मेहनत की बात हो रही है, लेकिन वह पर्यावरण मंत्री भी हैं; उस मंत्रालय में उनकी मेहनत का क्या नतीजा है, वह भी तो दिखाना चाहिए।

ऐसा तो होगा नहीं कि यह दोनों मंत्री केवल चुनाव में मेहनत करते हैं और मंत्रालय में नहीं। यह सवाल उठ रहा है कि क्या विश्लेषण करने वाले अपनी कमियों को छिपाने के लिए “भाजपा की मेहनत” की थ्योरी लेकर आए हैं?

‘दिल्ली ब्लास्ट और प्रदूषण पर चुप्पी’

यह विश्लेषण ऐसे समय में हो रहा है जब दिल्ली की हवा में जहर है, लेकिन मीडिया ने प्रदूषण को कब मुद्दा बनाया? दिल्ली में आतंकी धमाका हुआ, दो दिनों तक प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई, पाकिस्तान का नाम तक गायब हो गया। हमले के छह दिन बाद एनआईए इसे ‘आत्मघाती आतंकी हमला’ कहती है, लेकिन पाकिस्तान या किसी संगठन का नाम नहीं लेती।

जब दिल्ली में हुए धमाके की रिपोर्टिंग में इतने झोल हैं, तो क्या आप यकीन कर सकते हैं कि बिहार में सब कुछ ठीक हुआ?

‘क्या ‘वोट चोरी’ मुद्दा नहीं था?’

“मेहनत” की इस थ्योरी के जरिए महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली में उठे “वोट चोरी” के सवालों को कुचला जा रहा है। महाराष्ट्र में भी यही हुआ था। अचानक अफवाहें उड़ीं कि कांग्रेस-शिवसेना ‘ओवर कॉन्फिडेंस’ का शिकार हो गईं। लेकिन बाद में क्या निकला? “वोट चोरी”।

इस “वोट चोरी” की पड़ताल इन एंकरों ने नहीं की। जो मेहनत मीडिया को करनी चाहिए थी, वह विपक्ष के नेता कर रहे थे। राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि यह मामला कितना जटिल है और चुनाव आयोग कैसे दस्तावेज नहीं देता।

‘12,000 बूथों का रहस्य’

आरोप गंभीर थे। महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव के बाद वोटर लिस्ट में 1 करोड़ नए वोटर जोड़े गए। विपक्ष का वोट उतना ही रहा, लेकिन सारे नए वोट भाजपा गठबंधन के खाते में चले गए।

महाराष्ट्र में 1 लाख बूथों में से 12,000 बूथ ऐसे निकले (ज्यादातर उन 85 सीटों पर जहां भाजपा लोकसभा में हारी थी) जहां शाम 5 बजे के बाद वोटिंग में अचानक उछाल आया। 88,000 बूथों पर 5 बजे के बाद वोट नहीं बढ़े, पर इन 12,000 पर बढ़ गए।

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जब सीसीटीवी फुटेज मांगा गया, तो नियम बदल दिए गए या कह दिया गया कि फुटेज अब उपलब्ध नहीं है।

‘चुनाव आयोग की ‘पक्षपाती’ भूमिका’

किसी भी चुनाव में दो ही रेफरी होते हैं: एक चुनाव आयोग और एक मीडिया। और दोनों की भूमिका पर गंभीर सवाल हैं।

बिहार में चुनाव आयोग ने ₹10,000 बांटने की अनुमति (मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना) कैसे दी? यह पैसा चुनाव की घोषणा के ठीक पहले बांटा गया।

यही चुनाव आयोग विपक्ष के राज्यों में पुरानी चल रही योजनाओं को भी आचार संहिता का उल्लंघन बताकर रोक देता रहा है।

  • 2004 में तमिलनाडु में जयललिता की किसानों को दी जा रही सहायता राशि पर रोक लगी।

  • 2011 में डीएमके सरकार की 5 साल पुरानी फ्री टीवी सेट योजना पर रोक लगी।

  • 2023 में तेलंगाना में ‘रायथू बंधु’ योजना पर रोक लगी।

  • 2019 में ओडिशा में ‘कालिया योजना’ पर रोक लगी, जबकि केंद्र की ‘किसान सम्मान निधि’ चलती रही।

जब चुनाव में “लेवल प्लेइंग फील्ड” (बराबरी का मैदान) ही नहीं थी, तो विपक्ष को हारना ही था।

‘पैसे का खेल और संसाधन’

इस “मेहनत” की थ्योरी में पैसे की कोई बात नहीं है। जन स्वराज के नेता पवन वर्मा ने आरोप लगाया कि वर्ल्ड बैंक के 21,000 करोड़ जो किसी और प्रोजेक्ट के लिए आए थे, उनमें से 14,000 करोड़ आचार संहिता लगने के 1 घंटे पहले महिलाओं के खाते में दे दिए गए।

बिहार जैसा राज्य, जो ₹4 लाख करोड़ से अधिक के कर्जे में डूबा है, उसके पास चुनाव के आसपास बांटने के लिए ₹30,000 करोड़ कहां से आ गए?

संसाधनों में भी कोई बराबरी नहीं है। एनडीए के नेताओं ने 1600 घंटे हेलिकॉप्टर उड़ाए (₹34 करोड़ खर्च), जबकि महागठबंधन ने ₹11 करोड़ खर्च किए। फेसबुक पर भाजपा ने ₹3.5 करोड़ खर्च किए, कांग्रेस ने ₹7 लाख और आरजेडी ने ₹5.25 लाख। इस गैर-बराबरी को छिपाकर सिर्फ “मेहनत” की बात की जा रही है।

‘SIR की धांधली को कैसे भूलें?’

कहा जा रहा है कि SIR (मतदाता सूची) कोई मुद्दा नहीं था। लेकिन यह एक खुली धांधली थी जिसे विपक्ष ने पकड़ा।

  • 22 वोटर आईडी पर ब्राजील की एक मॉडल की तस्वीर लगी थी।

  • एक ही महिला की फोटो 100 अलग-अलग वोटर कार्ड पर थी।

  • ऐसे 5,20,000 डुप्लीकेट वोटर बताए गए।

  • 19 लाख “थोक वोटर” पाए गए, यानी एक ही पते पर 20 से 500 वोटर पंजीकृत थे।

  • यूपी के वोटर का नाम हरियाणा की लिस्ट में मिला।

जो लोग जिंदा थे, उनके नाम कट रहे थे और इसे लेकर विपक्ष सुप्रीम कोर्ट तक गया।

‘विपक्ष की भी अपनी गलतियां’

यह सही है कि विपक्ष बुरी तरह हारा है। कांग्रेस को 60 सीटें लेकर भी अपनी स्थिति का जवाब देना चाहिए। तेजस्वी यादव को भी बताना चाहिए कि उनके नेता कहां थे।

लेकिन 5 नवंबर को राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस, जिसमें उन्होंने वोट चोरी का खुलासा किया, एक तरह से यह इशारा था कि जब तक यह सिस्टम ठीक नहीं होता, इन चुनावों का कोई मतलब नहीं रह गया है।

विपक्ष की यह भी गलती है कि उसने जमीन पर हो रही धांधली (जैसे जीविका दीदी का इस्तेमाल या पैसे बांटना) को समाजवादी पार्टी की तरह अपने सोशल मीडिया हैंडल से उजागर क्यों नहीं किया।

‘हार-जीत से बड़ा सवाल’

विश्लेषणों का पैटर्न यह दिखा रहा है कि “मेहनत” के नाम पर मीडिया और चुनाव आयोग को बरी किया जा रहा है। अगर सिर्फ चुनाव जीत जाने से कोई मुद्दा खत्म हो जाता है, तब तो आप पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ही खारिज कर रहे हैं।

अगर भाजपा मेहनत के दम पर ही जीत रही थी, तो उसे 43 ऐसे उम्मीदवारों को टिकट क्यों देने पड़े जिन पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं?

यह भी नहीं बताया जा रहा कि एआईएमआईएम ने 5 सीटें कैसे जीतीं? क्या सिर्फ भाजपा ने ही मेहनत की? जेडीयू, एलजेपी और ‘हम’ पार्टी के उम्मीदवार भी तो भर-भर कर जीते हैं। उनकी मेहनत की चर्चा क्यों नहीं हो रही? या उनका काम ₹10,000 और जीविका दीदियों ने कर दिया?

‘मुख्य बातें (Key Points)’
  • बिहार चुनाव के बाद मीडिया में “मेहनती बीजेपी” का नैरेटिव गढ़ा जा रहा है, जो ‘वोट चोरी’ के सवालों पर पर्दा डालने की कोशिश है।

  • विश्लेषणों में बीजेपी के पैसे, संसाधनों की गैर-बराबरी और चुनाव आयोग की ‘पक्षपाती’ भूमिका को नजरअंदाज किया जा रहा है।

  • चुनाव आयोग ने बिहार में ₹10,000 बांटने की इजाजत दी, जबकि विपक्ष शासित राज्यों में पुरानी योजनाएं भी रोक दी थीं।

  • महाराष्ट्र और हरियाणा में ‘वोट चोरी’ के गंभीर आरोप (जैसे 12,000 बूथों पर 5 बजे के बाद वोट बढ़ना) आज भी अनसुलझे हैं।

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Source: अभिनव कुशवाह
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