Arvind Kejriwal Justice Swarnkanta Sharma: नई दिल्ली में सोमवार, 27 अप्रैल 2026 को एक ऐसा फैसला सामने आया जिसने देश की राजनीतिक और न्यायिक गलियारों में हलचल मचा दी। अरविंद केजरीवाल ने साफ़ शब्दों में ऐलान कर दिया कि वो अब जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में न तो खुद पेश होंगे और न ही कोई वकील के जरिए अपनी पैरवी करवाएंगे। यह फैसला उन्होंने तथाकथित शराब घोटाला केस में लिया है, जिसमें उन्हें निचली अदालत ने 27 फरवरी को पूरी तरह बरी कर दिया था।
देखा जाए तो यह कोई आम फैसला नहीं है। यह एक चुनी हुई सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री का वो कदम है जो गांधी जी के सत्याग्रह के सिद्धांतों पर आधारित है। केजरीवाल ने अपने इस फैसले को जस्टिस शर्मा को एक पत्र लिखकर औपचारिक रूप से सूचित भी कर दिया है।
न्याय की उम्मीद क्यों टूटी?
अरविंद केजरीवाल ने अपने बयान में दो बड़े कारण गिनाए जिनकी वजह से उन्हें लगता है कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के सामने उन्हें न्याय नहीं मिल सकता। पहला कारण विचारधारा का है। केजरीवाल ने कहा कि आरएसएस की जिस विचारधारा वाली सरकार ने झूठे आरोप लगाकर मुझे जेल भेजा, जस्टिस शर्मा खुद स्वीकार कर चुकी हैं कि वो उस विचारधारा से जुड़े संगठन अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के मंचों पर कई बार जा चुकी हैं।
दिलचस्प बात यह है कि आम आदमी पार्टी और केजरीवाल खुद को इस विचारधारा का घोर विरोधी मानते हैं। ऐसे में उनके मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि क्या ऐसी स्थिति में निष्पक्ष सुनवाई हो पाएगी?
हितों का टकराव: जब जज के बच्चे सरकारी पैनल में हों
दूसरा कारण और भी गंभीर है। केजरीवाल ने बताया कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के दोनों बच्चे केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में काम करते हैं। और यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि कोर्ट में केजरीवाल के विपक्ष में खड़े सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ही तय करते हैं कि इन बच्चों को कितने और कौन से केस मिलेंगे।
आंकड़े चौंकाने वाले हैं। भारत सरकार के पैनल में करीब 700 वकील हैं, लेकिन जस्टिस शर्मा के बेटे सबसे ज्यादा केस पाने वाले वकीलों में से एक हैं। 2023 से 2025 के बीच उन्हें लगभग 5,904 केस मिले, जिससे करोड़ों रुपए की फीस बनी।
समझने वाली बात यह है कि जब किसी जज के बच्चों की कमाई और भविष्य सामने खड़े वकील पर निर्भर हो, तो क्या वो जज उस वकील के खिलाफ निष्पक्ष फैसला दे पाएगी? केजरीवाल ने यही सवाल उठाया है।
27 फरवरी को मिली थी पूरी बरी
अगर गौर करें तो इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि काफी नाटकीय रही है। केजरीवाल को तथाकथित शराब घोटाले में गिरफ्तार किया गया था। उन्हें कई महीने जेल में रहना पड़ा। लेकिन 27 फरवरी 2026 को निचली अदालत ने उन्हें पूरी तरह से निर्दोष करार दे दिया।
अदालत ने साफ कहा कि केजरीवाल ने कोई भ्रष्टाचार नहीं किया है। यही नहीं, कोर्ट ने सीबीआई की जांच पर ही सवाल खड़े कर दिए और जांच अधिकारी के खिलाफ एक्शन लेने के आदेश भी दिए।
लेकिन सच का रास्ता आसान कहां होता है? सीबीआई ने तुरंत इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दे दी और यह केस जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के सामने पहुंच गया। और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी।
पहले भी छह बार फैसला हो चुका विपरीत
आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने एक और चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने बताया कि यह वही जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा हैं जिन्होंने आबकारी नीति के मामले में छह बार आप के खिलाफ फैसला दिया था और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उन फैसलों को पलट दिया था।
इतना ही नहीं, संजय सिंह ने यह भी बताया कि जब आप के नेता सत्येंद्र जैन के मामले में निचली अदालत में सुनवाई चल रही थी, तब ईडी ने जस्टिस शर्मा के पास पहुंचकर कहा कि उन्हें उस जज पर भरोसा नहीं है। और जस्टिस शर्मा ने वो जज ही बदल दिया।
आरएसएस के कार्यक्रम में प्रमोशन का जिक्र
राहत की बात या चिंता का विषय? यह तय करना मुश्किल है जब संजय सिंह ने बताया कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने खुद आरएसएस के कार्यक्रम में जाकर कहा था कि “जब-जब मैं आपके कार्यक्रम में आती हूं, मेरा प्रमोशन हो जाता है।”
संजय सिंह ने कहा कि संघ वो है जिसने भाजपा को जन्म दिया। भाजपा वो है जिसने मोदी और अमित शाह को जन्म दिया। और मोदी-अमित शाह वे हैं जिन्होंने केजरीवाल और आप के नेताओं पर फर्जी मुकदमे बनवाए। तो ऐसे जज से न्याय की क्या उम्मीद की जाए?
गांधीवादी सत्याग्रह का रास्ता क्यों?
केजरीवाल ने अपने बयान में विस्तार से समझाया कि उन्होंने यह रास्ता क्यों चुना। उन्होंने कहा कि बापू ने सिखाया था कि जब किसी अन्याय का सामना हो तो पहला कदम विरोध नहीं, बल्कि बातचीत होना चाहिए। अपनी बात पूरी विनम्रता के साथ रखनी चाहिए और सुधार का मौका देना चाहिए।
केजरीवाल ने बताया कि उन्होंने भी यही किया। पूरी विनम्रता के साथ जस्टिस शर्मा से अनुरोध किया कि वो हितों के टकराव को देखते हुए इस केस से खुद को अलग कर लें। केजरीवाल ने कहा कि मेरा केस हाई कोर्ट के किसी भी अन्य जज द्वारा सुन लिया जाए, मुझे कोई आपत्ति नहीं।
लेकिन जस्टिस शर्मा ने उनकी प्रार्थना अस्वीकार कर दी और फैसला दिया कि वो खुद ही यह केस सुनेंगी। और इसी फैसले के बाद केजरीवाल ने सत्याग्रह का रास्ता अपनाने का फैसला किया।
न्यायपालिका पर भरोसा बरकरार: केजरीवाल
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि केजरीवाल ने बार-बार साफ किया कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है और वो इसका पूरा सम्मान करते हैं। उन्होंने कहा कि जब मेरे खिलाफ झूठी साजिशें हुईं तो इसी न्यायपालिका ने मुझे न्याय दिया था। इसी ने मुझे बेल दी थी और इसी ने मुझे बरी किया है।
पिछले 75 वर्षों में जब-जब देश पर संकट आया, भारत की न्यायपालिका ने देश को बचाया और नागरिकों के हितों की रक्षा की है। केजरीवाल ने यह भी कहा कि उन्हें जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा या उनके परिवार से कोई व्यक्तिगत आपत्ति नहीं है।
केजरीवाल ने स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में कभी जस्टिस शर्मा के सामने उनका कोई अन्य केस लगता है जिसमें भाजपा, केंद्र सरकार या तुषार मेहता नहीं हैं, तो वो जरूर उनके सामने पेश होंगे।
न्याय केवल होना नहीं, होता हुआ दिखना भी चाहिए
केजरीवाल ने न्याय के उस बुनियादी सिद्धांत को दोहराया जो कानून की किताबों में सबसे पहले पढ़ाया जाता है – “Justice should not only be done but should manifestly and undoubtedly be seen to be done” यानी न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए।
इसी सिद्धांत को आधार बनाकर उन्होंने कहा कि जब आम लोगों को ही यह शक हो कि क्या न्याय मिलेगा, तो फिर न्याय प्रणाली पर लोगों का भरोसा कैसे बना रहेगा?
आप नेताओं ने किया फैसले का समर्थन
आम आदमी पार्टी के दिल्ली प्रदेश संयोजक सौरभ भारद्वाज ने इसे बेहद साहसी फैसला बताया। उन्होंने कहा कि हमेशा लीक से हटकर चलने वाले केजरीवाल का यह निर्णय न्यायिक व्यवस्था और लोकतंत्र को मजबूत करने में सहायक सिद्ध होगा।
पार्टी की वरिष्ठ नेता और दिल्ली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आतिशी ने कहा कि जब एक आम इंसान को लगे कि उसे न्याय ही नहीं मिलेगा, तो उसके पास क्या विकल्प बचता है? तभी वो सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलने का फैसला करता है।
आतिशी ने जोड़ा कि आज बात सिर्फ अरविंद केजरीवाल की नहीं, बल्कि यह हर उस नागरिक की भावना है जिसकी न्याय की उम्मीद टूट रही है।
कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल करने की छूट
केजरीवाल ने साफ कर दिया कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा जो भी फैसला सुनाएंगी, उस पर समय आने पर उनके जो भी कानूनी अधिकार हैं – जैसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देना – वो सभी कदम लेने के लिए वो पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि वो जस्टिस शर्मा के खुद को मामले से अलग न करने के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन यह पूरा मामला बेहद नाजुक और संवेदनशील है, इसलिए कानून, न्यायपालिका के सम्मान और लोगों के न्याय व्यवस्था पर भरोसे को ध्यान में रखते हुए एक-एक कदम उठाना है।
आखिर मकसद क्या है?
केजरीवाल ने अपने बयान के अंत में स्पष्ट किया कि वो यह कदम अहंकार या किसी विद्रोह या विरोध की भावना से नहीं उठा रहे। उनका मकसद देश की कानून प्रणाली को चुनौती देना नहीं है और न ही न्याय व्यवस्था का अपमान करना है।
उन्होंने कहा कि इसी केस में मैंने हर स्टेज पर हर अदालत में अपना पूरा सहयोग दिया है। मैं न्यायपालिका का बहुत सम्मान करता हूं। इसी न्यायपालिका की वजह से आज मैं आजाद घूम रहा हूं।
केजरीवाल का सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद है – देश की न्याय व्यवस्था पर लोगों के भरोसे को और मजबूत करना और लोगों में अटूट विश्वास भरना कि जरूरत पड़ने पर हमारे देश की न्याय व्यवस्था से उन्हें न्याय जरूर मिलेगा।
मुख्य प्रवक्ता ने उठाए सवाल
आम आदमी पार्टी के मुख्य प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि अगर सामने खड़ा वकील जज साहिबा के बच्चों की कमाई तय कर रहा हो, तो क्या जज साहिबा उस वकील के खिलाफ फैसला कर पाएंगी?
प्रियंका कक्कड़ ने कहा कि जब झूठे मुकदमे में फंसाया गया, तब न्यायपालिका ने न्याय दिया। दोषमुक्त भी इसी न्यायपालिका ने किया। जब भी देश संकट में था, न्यायपालिका ने संविधान की रक्षा की।
लेकिन उन्होंने जोड़ा कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में न्याय के सबसे बड़े सिद्धांत का पालन होते नहीं दिख रहा। केजरीवाल बड़ा वकील खड़ा करके यह मुकदमा लड़ सकते थे, यह आसान था। पर उन्होंने बापू के दिखाए रास्ते को चुना – सत्य का, पारदर्शिता का और व्यवस्था पर भरोसे का।
क्या होगा आगे?
सवाल उठता है कि अब क्या होगा? केजरीवाल ने साफ कर दिया है कि वो और उनका कोई वकील जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में पेश नहीं होगा। ऐसे में जस्टिस शर्मा जो भी फैसला सुनाएंगी, उसके खिलाफ केजरीवाल सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं।
यह पूरा मामला अब केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं रह गया है। यह एक बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक सवाल बन गया है कि क्या हितों के टकराव की स्थिति में न्याय निष्पक्ष हो सकता है?
केजरीवाल का यह कदम भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय खोल सकता है। गांधीवादी सत्याग्रह के इस रास्ते को अपनाकर उन्होंने एक ऐसी मिसाल पेश की है जो आने वाले समय में न्याय प्रणाली और राजनीति दोनों पर गहरा असर डाल सकती है।
मुख्य बातें (Key Points)
• अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में पेश न होने और कोई दलील न रखने का फैसला किया, इसे गांधीवादी सत्याग्रह बताया
• केजरीवाल ने हितों के टकराव का मुद्दा उठाया – जस्टिस शर्मा के दोनों बच्चे केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में हैं और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता उन्हें केस देते हैं
• जस्टिस शर्मा के बेटे को 2023-2025 के बीच 5,904 केस मिले, जिससे करोड़ों रुपए की फीस बनी, जबकि सरकारी पैनल में कुल 700 वकील हैं
• केजरीवाल ने कहा कि जस्टिस शर्मा आरएसएस की अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों में जाती रही हैं, जबकि आप इस विचारधारा की घोर विरोधी है
• आप के सभी वरिष्ठ नेताओं – संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज, आतिशी, संजीव झा और प्रियंका कक्कड़ ने इस फैसले का समर्थन किया और इसे साहसिक कदम बताया













