Bihar Bus Service Diwali Chhath — दिवाली और छठ महापर्व पर बिहार आने की तैयारी कर रहे लाखों प्रवासियों को तगड़ा झटका लगा है। बिहार राज्य पथ परिवहन निगम (BSRTC) की अनुबंधित इंटरस्टेट बसों का परिचालन इस बार ठप पड़ गया है। वजह है सरकारी अनुदान का बंद होना, जिसके चलते निजी बस संचालकों ने टेंडर में रुचि ही नहीं दिखाई।
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त्योहारों का सीजन सिर पर है और घर जाने की बेताबी चरम पर। मगर इस बार बिहार राज्य पथ परिवहन निगम की वो जीवनरेखा कट गई है, जो पिछले साल दिल्ली-यूपी से हजारों लोगों को घर पहुंचाती थी। देखा जाए तो पिछले साल मुजफ्फरपुर समेत विभिन्न रूटों पर करीब 40 एसी स्लीपर बसें दौड़ी थीं। इस बार पहिया थम गया है। और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी यात्रियों की मजबूरी की।
निगम ने टेंडर निकाला, तारीखें तय कीं, मगर एक भी निजी ऑपरेटर आगे नहीं आया। अगर गौर करें तो इसकी एक ही वजह है — अनुदान का खात्मा। पिछले साल सरकार प्रति किलोमीटर अनुदान देती थी, जिससे लंबी दूरी पर एसी बसें चलाना फायदे का सौदा था। इस बार वो सहारा छीन लिया गया। नतीजा? निजी संचालकों ने साफ कह दिया: “घाटे में बस नहीं दौड़ाएंगे।”
निगम के पास खुद का बेड़ा नाकाफी, डीलक्स बसों से काम चलाने की मजबूरी
यहां ध्यान देने वाली बात है कि निगम के अपने बेड़े में लंबी दूरी के लिए पर्याप्त एसी या स्लीपर बसें हैं ही नहीं। डीलक्स बसें हैं, मगर दिल्ली से बिहार जैसी 1000 किमी से ज्यादा की दूरी पर उन्हें चलाना निगम के लिए घाटे का सौदा है। कई बार तो ईंधन का खर्च निकालना भारी पड़ता है।
समझने वाली बात है कि जब सरकारी तंत्र ही हाथ खड़े कर दे, तो आम आदमी कहां जाए? ट्रेनों में कंफर्म टिकट मिल नहीं रहा। तत्काल की मारामारी अलग। अब एकमात्र सहारा निजी बसें बचती हैं। और यहीं से शुरू होता है मनमाने किराए का खेल।
बैरिया-एनएच 28 पर शुरू हुई लूट, क्षमता से ज्यादा बुकिंग
रिपोर्ट्स के मुताबिक मुजफ्फरपुर के बैरिया और दरभंगा मोड़ के पास हर दिन दर्जनों निजी बसें सवारी भर रही हैं। अभी भीड़ कम है, मगर ऑनलाइन बुकिंग फुल चल रही है। दिलचस्प बात यह है कि कुछ संचालक क्षमता से ज्यादा टिकट काट रहे हैं। यानी सफर के वक्त धक्का-मुक्की तय है।
क्षेत्रीय प्रबंधक विवेकानंद मिश्रा का कहना है कि टेंडर मुख्यालय स्तर का है, फैसला वहीं से होगा। यानी फिलहाल यात्री मुख्यालय के फैसले के मोहताज हैं। चिंता का विषय यह है कि फैसला कब आएगा? त्योहार तो तारीख पर ही आएंगे।
आम आदमी पर असर: जेब कटेगी, परेशानी बढ़ेगी
इसका सीधा असर उस मजदूर, छात्र या नौकरीपेशा पर पड़ेगा जिसकी जेब ट्रेन के प्रीमियम तत्काल या फ्लाइट का खर्च नहीं उठा सकती। राहत की बात बस इतनी है कि निगम अधिकारी “इंतजार करें” कह रहे हैं। मगर इंतजार की भी एक सीमा होती है।
मुख्य बातें (Key Points)
- अनुदान बंद: सरकारी अनुदान खत्म होने से निजी ऑपरेटर्स ने इंटरस्टेट रूट्स पर बसें चलाने से इनकार किया।
- 40 बसें गायब: पिछले साल मुजफ्फरपुर रूट पर चलीं 40 एसी स्लीपर बसें इस बार नहीं चलेंगी।
- निजी बसों की मनमानी: अनुपलब्धता का फायदा उठाकर निजी संचालक वसूल रहे मनमाना किराया, क्षमता से ज्यादा बुकिंग।
- निगम बेबस: BSRTC के पास खुद की पर्याप्त एसी/स्लीपर बसें नहीं, डीलक्स बसें चलाना आर्थिक रूप से अव्यवहारिक।
- यात्री फंसे: ट्रेन में टिकट न मिलने पर बस ही एकमात्र विकल्प, अब उस पर भी संकट।













