Bihar Groundwater Arsenic का संकट फिल्मी कहानी जैसा लगता है, पर यह हकीकत है। बिहार के कुल 38 जिलों में से 31 जिलों के भूजल में आर्सेनिक की मौजूदगी दर्ज की गई है। यानी करीब 75 प्रतिशत जिले इसकी चपेट में हैं। चर्चा में यह भी आया है कि पानी में यूरेनियम तक मिला है।
इनमें से 22 जिले ऐसे हैं जहां के 87 ब्लॉक गंभीर संकट में बताए गए हैं। ये जिले बिहार के सबसे घनी आबादी वाले जिलों में गिने जाते हैं। इसलिए सवाल सिर्फ पानी का नहीं, लाखों लोगों की सेहत का है।
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‘एक नज़र में: आंकड़ों की पूरी तस्वीर’
| बिंदु | जानकारी |
|---|---|
| बिहार के कुल जिले | 38 |
| आर्सेनिक से प्रभावित जिले | 31 (करीब 75%) |
| गंभीर संकट वाले जिले | 22 |
| इन जिलों में गंभीर संकट वाले ब्लॉक | 87 |
| WHO की सुरक्षित सीमा | पानी में करीब 10 माइक्रोग्राम तक |
| बक्सर में स्थिति | सुरक्षित सीमा से 100 गुना से ज्यादा, 1900 के आसपास |
‘फैक्ट्री का कचरा नहीं, हिमालय से आई मुसीबत’
आम धारणा है कि ऐसा प्रदूषण किसी उद्योग के छोड़े कचरे से होता है। यह धारणा गलत है। इस संकट का सीधा रिश्ता गंगा और हिमालय से है। यह एक प्राकृतिक घटना है, जिसमें एक बड़ा योगदान हमारे चलाए हैंडपंपों का है।
हिमालय बहुत विशाल पर्वत श्रृंखला है। ध्रुवों के बाद सबसे ज्यादा हिमनद यहीं हैं, इसीलिए इसे दुनिया का तीसरा ध्रुव कहा जाता है। यहां से आने वाली नदियां अपने साथ भारी मात्रा में अवसाद (सेडिमेंट) बहा लाती हैं। इस अवसाद में आयरन होता है, और आयरन के यौगिकों के साथ बंधा हुआ आर्सेनिक छिपा रहता है।
यानी आर्सेनिक नदी के सहारे हिमालय से चलकर बिहार की जमीन तक पहुंचता है। अगर गौर करें तो ये मामला गंगा और उसकी सहायक नदियों के आसपास के गांव-शहरों में ज्यादा दिखता है।
‘आयरन से आर्सेनिक कैसे छूटता है’
समय के साथ वहां जैविक क्रियाएं होती हैं और जमीन के भीतर की नमी धीरे-धीरे हटती है। जैसे-जैसे पानी हटता है, आयरन का रासायनिक ढांचा टूटने लगता है। तब आयरन के साथ बंधा आर्सेनिक अलग होकर पानी में घुलने लगता है।
यह आर्सेनिक सतह से लेकर करीब 50 से 60 मीटर की गहराई तक मिलता है। यानी यह बहुत गहराई में नहीं, सतह के पास वाले अवसाद में पाया जाता है।
‘उथले हैंडपंप ने बढ़ाई मुश्किल’
हाथ से चलने वाले हैंडपंप आमतौर पर 20 से 60 मीटर तक ही गहरे होते हैं। शुरुआत में इनके पानी में आर्सेनिक नहीं होता। पर आबादी ज्यादा है, पानी की जरूरत ज्यादा है, और बरसों तक पानी निकलता रहता है। ऐसे में आसपास का पानी रिसकर आता है और उसमें आर्सेनिक ज्यादा घुलने लगता है।
दिलचस्प बात यह है कि आर्सेनिक हर जगह मौजूद है। फर्क इस बात से पड़ता है कि कहां कितना ज्यादा पानी निकाला जा रहा है। और जो हैंडपंप 70 मीटर से ज्यादा गहरे हैं, उनमें संदूषण 70 से 80 प्रतिशत तक कम पाया गया है।
‘गंगा किनारे की पूरी पट्टी असर में’
अगर बिहार में पश्चिम से पूरब की ओर चलें तो एक पूरी पट्टी दिखती है, और यह वही है जहां से गंगा गुजरती है। सबसे खतरनाक हालत बक्सर में बताई गई है, जहां संदूषण सुरक्षित सीमा से सौ गुना से ज्यादा है।
इसके आगे भोजपुर का इलाका है। फिर राजधानी पटना, वैशाली, भागलपुर और समस्तीपुर का क्षेत्र आता है। इन सब इलाकों के भूजल में यह संदूषण देखने को मिलता है।
‘शरीर पर असर: उल्टी-दस्त से कैंसर तक’
आर्सेनिक का असर एक साधारण-सी बीमारी से शुरू होता है, यानी उल्टी-दस्त से। फिर हथेली, छाती, पैर और पीठ पर बड़े-बड़े काले धब्बे बनने लगते हैं। इसका अंत त्वचा के भयंकर कैंसर तक पहुंच सकता है।
हालात और बिगड़ें तो शरीर के भीतरी अंग फेल हो सकते हैं। लिवर और फेफड़ों का कैंसर भी देखने को मिलता है। आर्सेनिक को संयुक्त राष्ट्र और WHO ने एक अहम कार्सिनोजेन (कैंसर पैदा करने वाला तत्व) घोषित किया है।
चिंता का विषय गर्भवती महिलाओं के लिए भी है। लंबे समय तक ऐसा पानी पीने से समय से पहले प्रसव की आशंका काफी बढ़ जाती है। बच्चे का मानसिक और शारीरिक विकास बाधित हो सकता है और गर्भपात की संभावना भी रहती है।
‘कहानियां जो आंकड़ों से ज्यादा बोलती हैं’
यूट्यूब पर ऐसे कई मामले मिलते हैं। एक महिला के पति की कैंसर से मौत हुई। फिर देवर घर चला रहा था, उसकी भी उसी वजह से मौत हो गई। वह महिला पहले गर्भपात झेल चुकी थी और अब अकेले जिंदगी चलाने की जद्दोजहद में है।
एक दूसरे मामले में पड़ोस में मौत के बाद भी पूरा गांव उसी हैंडपंप से पानी पीने को मजबूर है। वजह सीधी है। आसपास साफ पानी का कोई दूसरा स्रोत नहीं है, और दूर जाकर पानी लाना मुमकिन नहीं।
‘थाली तक पहुंचता है असर’
समझने वाली बात है कि संकट सिर्फ पीने के पानी तक सीमित नहीं है। यही पानी खेतों की सिंचाई में भी इस्तेमाल होता है। इससे फसलों में भी आर्सेनिक पहुंचता है।
इसका मतलब है कि अगर कोई सीधे यह पानी न भी पिए, तब भी लंबे समय में वह फसल के रास्ते शरीर तक पहुंच सकता है। इससे साफ होता है कि समस्या पानी की टंकी से खेत और थाली तक फैली है।
‘सरकार के कदम और उनकी अड़चनें’
सरकार ने तीन बातों पर ध्यान देना शुरू किया है। पहला, हैंडपंपों और जलभृतों (एक्विफायर) को गहरा करना, ताकि आर्सेनिक का असर घटे। दूसरा, सतही जल (नदी-तालाब का पानी) का इस्तेमाल बढ़ाना। तीसरा, हर घर नल योजना, जिसमें पाइपलाइन से पानी पहुंचाकर हैंडपंप पर निर्भरता कम करने की कोशिश है।
पर राह आसान नहीं है। नदी का पानी घर-घर पहुंचाना, तालाब-झील-बावड़ियां बनाना और जलाशय खड़े करना कागज पर जितना सरल लगता है, उतना है नहीं। हर घर नल योजना में भी कई खामियां हैं: कहीं घर में नल है तो पानी नहीं, और कहीं पानी है तो हर घर में नल नहीं। इसकी वजह संसाधनों की कमी और ज्यादा आबादी बताई गई है।
‘बिहार से पंजाब-हरियाणा तक: एक ही कड़ी’
देखा जाए तो भूजल का संदूषण हर जगह एक ही वजह से नहीं होता। बिहार में बड़ी वजह प्राकृतिक है, पर वहां भी उद्योग ही अकेला कारण नहीं माना जा सकता। यह भी समझना होगा कि किसी इलाके में संदूषण गहराई के हिसाब से बदलता है।
पंजाब-हरियाणा में तस्वीर दूसरी है। वहां उर्वरक, कीटनाशकों के इस्तेमाल से मिट्टी की लवणता बढ़ी है, फसलों में इनकी मात्रा बढ़ी है और कैंसर के मामले भी दिखते हैं। ये दोनों समस्याएं अलग-अलग कारणों से पैदा हुई हैं, पर साथ-साथ चल रही हैं।
‘आम लोगों के लिए क्या मायने’
इसका मतलब है कि जिन गांवों में उथले हैंडपंप ही सहारा हैं, वहां जोखिम सबसे ज्यादा है। गहरे हैंडपंप संदूषण को 70 से 80 प्रतिशत तक घटा सकते हैं, पर इसके लिए 70 मीटर से ज्यादा की गहराई चाहिए। जब तक पाइपलाइन का पानी हर घर तक नहीं पहुंचता, यह फर्क लोगों की सेहत तय करेगा।
‘क्या है पृष्ठभूमि’
बिहार में गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे बसे इलाकों के भूजल में आर्सेनिक मिला है। हिमालय से नदियों के बहाए अवसाद में आयरन के साथ आर्सेनिक छिपा रहता है, और ज्यादा पानी निकालने से वह घुलने लगता है। इसके असर में कैंसर से लेकर गर्भपात तक के मामले बताए जाते हैं, और सरकार हैंडपंप गहरे करने, सतही जल बढ़ाने और हर घर नल योजना पर काम कर रही है।
‘मुख्य बातें (Key Points)’
- बिहार के 38 में से 31 जिलों के भूजल में आर्सेनिक है, 22 जिलों के 87 ब्लॉक गंभीर संकट में हैं।
- बक्सर में आर्सेनिक WHO की सुरक्षित सीमा से सौ गुना से ज्यादा बताया गया है।
- कारण उद्योग नहीं, हिमालय से बहकर आया अवसाद है, जिसे उथले हैंडपंपों से ज्यादा पानी निकालने ने और खतरनाक बनाया।
- सरकार हैंडपंप गहरे करने, सतही जल और हर घर नल योजना पर काम कर रही है, पर कई खामियां बाकी हैं।












