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The News Air - Breaking News - Hospital Bill Markup Scam: ₹2,700 की दवा ₹27,000 में, Supreme Court ने कहा ‘दिन दहाड़े डकैती’

Hospital Bill Markup Scam: ₹2,700 की दवा ₹27,000 में, Supreme Court ने कहा ‘दिन दहाड़े डकैती’

कैंसर के इंजेक्शन पर 900% तक का मार्जिन, सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों की फार्मेसी मोनोपोली पर उठाए सवाल

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
सोमवार, 5 अक्टूबर 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, काम की बातें, राष्ट्रीय
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Hospital drug markup scam
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Hospital Drug Pricing Scam: आईसीयू की सीढ़ियों पर खड़े परिजनों से कहा जाता है: ₹27,000 डिपॉजिट कीजिए, कैंसर का इंजेक्शन तुरंत चाहिए। और उस पल आप क्या करेंगे? पूछेंगे कि बाहर के मेडिकल स्टोर में यह कितने का मिलेगा? नहीं। आप बस पैसे देंगे और भगवान से प्रार्थना करेंगे कि आपके मरीज का इलाज न रुके। लेकिन क्या आपको पता है कि जिस इंजेक्शन की असली खरीद कीमत महज ₹2,700 है, उस पर ₹27,000 की एमआरपी क्यों छपी होती है? यानी 10 गुना मार्जिन! सुप्रीम कोर्ट ने इसे दिन दहाड़े डकैती कहा है। यह सिर्फ महंगाई नहीं—यह एक सिस्टम है जो आपकी सबसे कमजोर घड़ी में आपकी जेब खाली करता है।

🔍 यह भी पढ़ें- Salman Khan Hospital Outburst: पापराजी पर भड़के सलमान, पाकिस्तानी एक्ट्रेस माहिरा खान ने ‘यार सल्लू’ कहकर दिया रिएक्शन

सुप्रीम कोर्ट में उड़े होश: ₹24,300 का अंतर किसकी जेब में?

29 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में जब यह उदाहरण सुनाया गया, तो जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच स्तब्ध रह गई। उन्होंने कहा: It is a broad daylight dacoity (यह दिन दहाड़े डकैती है)। यह मामला एडवोकेट किशन चंद जैन और बाल शल्य चिकित्सक डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने आया, जो जेनेरिक मेडिसिन, मेडिकल डिवाइसेस और कैंसर की लाइफ सेविंग दवाओं पर वसूले जा रहे मोटे मार्जिन से जुड़ा है।

देखा जाए तो, कोर्ट ने केंद्र सरकार की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सीधा सवाल पूछा: ₹24,000 के इस अंतर का पैसा किसकी जेब में जा रहा है? क्या दवा बनाने वाली कंपनी कमा रही है या कोई और?

जवाब चौंकाने वाला था। सॉलिसिटर जनरल ने साफ कहा: यह मुनाफा बड़ी दवा कंपनियां नहीं, बल्कि निजी अस्पताल काट रहे हैं।

विवरणराशि/जानकारी
दवा की असली खरीद कीमत₹2,700
पैकेट पर छपी एमआरपी₹27,000
मरीज से वसूला गया अतिरिक्त₹24,300
अस्पताल का संभावित मार्जिन900% तक
कोर्ट की टिप्पणी“दिन दहाड़े डकैती”
खेल कैसे काम करता है—अस्पताल और दवा कंपनी का गठजोड़

समझने वाली बात यह है कि यह केवल लालच नहीं, बल्कि एक सुनियोजित तंत्र है। दवा कंपनी एक इंजेक्शन बनाती है, जिसकी लागत और उचित मुनाफा मिलाकर ₹2,700 में बेचने को तैयार है। लेकिन अस्पताल दवा कंपनी से कहता है: अगर हमारी फार्मेसी में आपकी दवा बिकवानी है, तो पैकेट पर ₹27,000 की एमआरपी छापिए।

क्यों? क्योंकि अस्पताल बड़ी मात्रा में दवा खरीदता है, तो कंपनी उसे भारी डिस्काउंट देती है—कभी 50%, कभी 80%। लेकिन जब मरीज बिलिंग काउंटर पर जाता है, तो अस्पताल उससे पूरी एमआरपी वसूलता है। यानी अस्पताल का शुद्ध मुनाफा 900% तक हो सकता है।

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अगर गौर करें तो यह सिर्फ व्यापार नहीं—यह भावनात्मक ब्लैकमेल है।

आप बाहर से क्यों नहीं खरीद सकते?—डर और दबाव का सिंडिकेट

अब सवाल यह आता है: अगर बाहर के मेडिकल स्टोर से वही दवा ₹3,000 या ₹4,000 में मिल रही है, तो मरीज बाहर क्यों नहीं खरीद लेता? और यहीं से शुरू होता है सहानुभूति और डर का खेल।

सुप्रीम कोर्ट में इस बात का खास जिक्र हुआ कि बड़े कॉरपोरेट अस्पताल मरीज के परिजनों पर दबाव बनाते हैं: अगर आपको हमारी इन-हाउस फार्मेसी से दवा खरीदनी ही होगी। अगर आप बाहर से लाएंगे, तो हम उस दवा की क्वालिटी और मरीज के रिएक्शन की कोई गारंटी नहीं लेंगे।

कल्पना कीजिए: आईसीयू के बाहर बैठा एक बेटा, जिसकी मां अंदर जिंदगी और मौत से जूझ रही है। क्या वह ₹24,000 बचाने के लिए डॉक्टर से बहस करेगा? बिल्कुल नहीं। वह हाथ जोड़कर ₹27,000 विदड्रॉ करेगा और दे देगा। यही है इनइलास्टिक डिमांड (अत्यधिक लोचहीन मांग) और एसिमेट्रिक इंफॉर्मेशन (सूचना की असमानता)।

डॉक्टर और अस्पताल को पता है कि दवा में क्या साल्ट है और उसकी असली कीमत क्या है। मरीज को कुछ भी नहीं पता। मरीज केवल एक भरोसे पर टिका होता है। और जब उस भरोसे का व्यापारीकरण हो जाता है, तो यह निसंदेह दिन दहाड़े डकैती बन जाता है।

महंगी दवाइयां और बीमारी का बोझ—आत्महत्याओं में 45% की बढ़ोतरी

दिलचस्प बात यह है कि बीमारी सिर्फ मरीज को नहीं तोड़ती। यह पूरे परिवार को दीमक की तरह चाट जाती है। Down To Earth की हालिया रिपोर्ट ने NCRB के आंकड़ों का एक डरावना विश्लेषण प्रस्तुत किया है: भारत में बीमारी के कारण दर्ज आत्महत्याओं की संख्या में 2015 से 2024 के बीच 45% की वृद्धि हुई है। अकेले 2024 में 3,000 से अधिक लोगों ने बीमारी और आर्थिक-मानसिक बोझ से तंग आकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली।

हां, यह सच है कि महंगी दवा ही हर आत्महत्या की वजह नहीं है। सुसाइड के पीछे कई जटिल सामाजिक और मानसिक कारण हो सकते हैं। लेकिन जरा सोचिए: जब कैंसर या किडनी फेलियर का मरीज हर महीने अपने परिवार को कर्ज में डूबते देखता है, जब एक पिता अपनी बेटी की कॉलेज की फीस रोककर अपने इलाज का बिल भरता है, तो उस मरीज के अंदर एक आत्मग्लानी (guilt) भर जाती है कि मैं इस परिवार पर बोझ बन गया हूं।

स्वास्थ्य सेवा का मकसद मरीज को राहत देना होता है। लेकिन यह अनियंत्रित बाजार व्यवस्था उसे गिल्ट और डिप्रेशन की तरफ धकेलने लगती है।

क्या भारत में दवाओं की कीमतों पर सरकारी नियंत्रण नहीं है?

भारत में NPPA (National Pharmaceutical Pricing Authority) है, और DPCO 2013 के अंतर्गत अत्यंत आवश्यक दवाओं की कीमतें तय की जाती हैं। लेकिन इसमें एक बहुत बड़ा चोर दरवाजा (लूपहोल) है।

पहला: NPPA मार्केट बेस्ड प्राइसिंग अपनाता है—यानी टॉप ब्रांड्स की औसत कीमत निकालकर उस पर 16% रिटेलर का मार्जिन जोड़ता है। लेकिन अगर अस्पताल बड़े सौदेबाजी करके वही दवा 50% या 80% के डिस्काउंट पर खरीद ले, तब भी मरीज से NPPA द्वारा तय की गई अधिकतम सीमा (एमआरपी) ही वसूलता है। परिणाम: सरकारी कैपिंग के बावजूद भी अस्पताल का मुनाफा कम नहीं होता।

दूसरा: ट्रेड मार्जिन कैपिंग की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह मामला उठा कि क्या अस्पतालों और वितरकों के ट्रेड मार्जिन पर एक निश्चित कैप—जैसे 16% का फ्लैट मार्जिन—नहीं लगाया जा सकता?

इसका एक सफल उदाहरण 2019 में देखा गया था, जब सरकार ने 42 गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं के ट्रेड मार्जिन को 30% कैप कर दिया था। तब लगभग 526 ब्रांड की एमआरपी में 91% की भारी गिरावट दर्ज हुई थी। यानी अगर नीयत हो और सरकार चाहे, तो कीमतें रातोंरात नीचे आ सकती हैं।

क्या किया जाना चाहिए—तीन जरूरी कदम

पहला: पारदर्शी बिलिंग (Transparent Billing)। अस्पताल की बिल में दवा का वास्तविक खरीद मूल्य, उस पर अस्पताल का सर्विस चार्ज और अन्य मेडिकल केयर का खर्च बिल्कुल अलग और स्पष्ट दिखाई देना चाहिए।

दूसरा: राइट टू चूज़ (Right to Choose)। मरीज को यह कानूनी अधिकार होना चाहिए कि यदि बाहर पंजीकृत मेडिकल स्टोर वही जेनेरिक या ब्रांडेड मेडिसिन सस्ता दे रहा है, तो वह बाहर से खरीद सके। अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी की अनिवार्यता पर सख्त कानूनी रोक लगाई जानी चाहिए।

तीसरा: रेशनल मार्जिन स्ट्रक्चर (Rational Margin Structure)। दवा जितनी महंगी हो, उसका मार्जिन प्रतिशत उतना ही कम होना चाहिए। अगर ₹100 की दवा पर 16% मार्जिन सही है, तो ₹25,000 के इंजेक्शन पर 16% का मार्जिन (₹4,000) निश्चित तौर पर अनुचित वसूली माना जाएगा।

12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई

आगामी 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई होनी है। केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करना है। अस्पतालों को चलना चाहिए, डॉक्टरों को उनकी विशेषज्ञता का सही मुआवजा भी मिलना चाहिए, मेडिकल रिसर्च में भी पैसा लगना चाहिए। लेकिन किसी की लाचारी, किसी के बहते हुए आंसू और किसी के गिरवी रखी हुई वसीयत की कीमत का कमाया हुआ मुनाफा किसी भी नजरिए से व्यापार नहीं माना जाता।

अस्पताल के काउंटर पर खड़ा व्यक्ति सिर्फ ग्राहक नहीं होता। वह किसी का बेटा, किसी का पिता और किसी की मां होते हैं। यह मुद्दा सिर्फ कानूनी नहीं—नैतिक और मानवीय भी है।


मुख्य बातें (Key Points)
  • सुप्रीम कोर्ट ने ₹2,700 की दवा पर ₹27,000 की एमआरपी को दिन दहाड़े डकैती कहा।
  • सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि यह मुनाफा दवा कंपनियां नहीं, बल्कि निजी अस्पताल काट रहे हैं।
  • अस्पताल इन-हाउस फार्मेसी अनिवार्यता और भावनात्मक दबाव से मरीजों को मजबूर करते हैं।
  • 2015-2024 के बीच बीमारी से जुड़ी आत्महत्याओं में 45% की वृद्धि (NCRB डेटा)।

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1. सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों की दवा मार्कअप को डकैती क्यों कहा?

क्योंकि ₹2,700 में खरीदी गई दवा पर ₹27,000 की एमआरपी छपी होती है और मरीज से पूरी एमआरपी वसूली जाती है, जबकि असली मुनाफा अस्पताल काटते हैं—900% तक।

Q2. क्या मरीज बाहर से दवा नहीं खरीद सकता?

सैद्धांतिक रूप से हां, लेकिन अस्पताल भावनात्मक दबाव बनाते हैं कि बाहर की दवा की क्वालिटी की गारंटी नहीं ली जाएगी, जिससे परिजन डर कर अस्पताल की फार्मेसी से ही खरीदते हैं।

Q3. सरकार दवाओं की कीमत पर क्या नियंत्रण रखती है?

NPPA और DPCO 2013 के तहत जरूरी दवाओं की कीमतें तय होती हैं, लेकिन ट्रेड मार्जिन पर सख्त कैपिंग नहीं है, जिससे अस्पताल भारी मार्जिन वसूलते हैं।

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अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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