Akali Dal Unity: पंजाब की राजनीति में एकता की एक नई पुकार उठी है। सूबे की आगामी विधानसभा चुनावों से पहले शिरोमणी अकाली दल के विभिन्न गुटों को एकजुट करने की कोशिशें तेज हो गई हैं। इसी कड़ी में सिकंदर सिंह मलूका ने सभी पंथक धड़ों को आपसी मतभेद भुलाकर एकजुट होने का सार्वजनिक आह्वान किया है।
देखा जाए तो, यह पहल ऐसे समय आई है जब शिरोमणी अकाली दल (पुनर्सुरजीत) के सीनियर नेता गुरप्रताप सिंह वडाला ने सुखबीर सिंह बादल की अगुवाई वाले मुख्य अकाली दल और अमृतपाल सिंह के वारिस पंजाब दे के साथ बातचीत की पुष्टि की है।
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BJP के साथ सीट शेयरिंग में अटकन, एकता जरूरी
मलूका ने अपने बयान में कहा कि पारंपरिक और क्षेत्रीय सिख समूहों में फैली धड़ेबंदी और आंतरिक फूट के कारण पंजाब में उनका सामूहिक राजनीतिक और धार्मिक प्रभाव कमजोर हो रहा है।
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर पंथक धड़ें अलग-अलग होकर चुनाव मैदान में उतरीं, तो इससे वोटों की बंटवारे होगी। और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी – विरोधी पार्टियों को सीधा फायदा मिलेगा।
सूत्रों के अनुसार, मलूका एकता पर इसलिए भी जोर दे रहे हैं क्योंकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ सीटों की बंटवारे को लेकर सुखबीर बादल की अगुवाई वाले अकाली दल के लिए बातचीत करना मुश्किल हो रहा है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि गठबंधन के हालात में अकाली दल बड़े भाई की भूमिका निभाने का मौका गंवाता नजर आ रहा है।
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वडाला ने बताया – बादल को छोड़ना होगा अध्यक्ष पद
इससे पहले वडाला ने स्वीकार किया था कि सुखबीर बादल की अगुवाई वाले अकाली दल और अमृतपाल सिंह की अगुवाई वाले अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के साथ समझौते के लिए बातचीत जारी है।
दिलचस्प बात यह है कि वडाला ने साफ कहा: “कुछ नेताओं को अपने निजी हित छोड़कर सिख पंथ की चढ़दी कला के लिए काम करना होगा। हमने पहले भी सुखबीर बादल को कहा था और अब भी दोहराते हैं कि उन्हें पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ना होगा, ताकि पंथ द्वारा चुना गया कोई नया नेता पार्टी चला सके।”
अगर गौर करें, तो वडाला की शर्त बेहद कड़ी है। उन्होंने आगे कहा कि चुनाव के बाद अगर सभी धड़ें सहमत हों तो बादल मुख्यमंत्री के उम्मीदवार बन सकते हैं।
समझने वाली बात है कि वारिस पंजाब दे को भी उन्होंने कहा है कि वे चुनाव के बाद ही मुख्यमंत्री पद का दावा करें, जबकि वे पहले चेहरा घोषित करना चाहते थे।
| गुट | नेता | प्रमुख शर्त |
|---|---|---|
| शिरोमणी अकाली दल | सुखबीर सिंह बादल | अध्यक्ष पद छोड़ें |
| अकाली दल (वारिस पंजाब दे) | अमृतपाल सिंह | CM चेहरा बाद में घोषित करें |
| अकाली दल (पुनर्सुरजीत) | गुरप्रताप सिंह वडाला | सभी का सामूहिक नेतृत्व |
मलूका की वापसी का इतिहास
जिक्रयोग है कि शिरोमणी अकाली दल ने साल 2024 में मलूका को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में बाहर निकाल दिया था। लेकिन जून 2025 में उनकी फिर से पार्टी में वापसी करवाई गई।
2024 की लोकसभा चुनावों में पार्टी की करारी हार के बाद मलूका समेत कई नेताओं ने सुखबीर बादल के खिलाफ बगावत करते हुए उनसे अध्यक्ष पद से इस्तीफे की मांग की थी।
पंजाब की 13 लोकसभा सीटों में से अकाली दल सिर्फ एक सीट ही जीत सकी थी। बठिंडा से हरसिमरत कौर बादल (सुखबीर बादल की पत्नी और पूर्व केंद्रीय मंत्री) की जीत ही एकमात्र सांत्वना थी।
आगे की चुनौतियां और संभावनाएं
राहत की बात यह है कि कम से कम बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया है। लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं:
पहली समस्या: सुखबीर बादल क्या अध्यक्ष पद छोड़ने को तैयार होंगे?
दूसरी समस्या: BJP के साथ गठबंधन में सीटों का बंटवारा कैसे होगा?
तीसरी समस्या: अमृतपाल सिंह जेल में हैं, उनकी पार्टी के साथ समन्वय कैसे होगा?
चौथी समस्या: क्या सभी गुट वाकई अपने अहं को छोड़कर एक मंच पर आ सकेंगे?
इससे साफ होता है कि अकाली राजनीति में आने वाले महीने बेहद अहम होंगे। अगर एकता हो गई तो पंजाब की राजनीति में बड़ा बदलाव आ सकता है। लेकिन अगर धड़ेबंदी बनी रही तो 2027 का चुनाव अकाली दल के लिए और भी बुरा साबित हो सकता है।
मुख्य बातें (Key Points)
• सिकंदर सिंह मलूका ने सभी पंथक धड़ों से एकजुट होने की अपील की, वोट बंटवारे का खतरा बताया
• गुरप्रताप सिंह वडाला ने सुखबीर बादल से अध्यक्ष पद छोड़ने की शर्त रखी, तभी एकता संभव
• 2024 लोकसभा में 13 में से सिर्फ 1 सीट जीतने के बाद अकाली दल में उथल-पुथल
• BJP के साथ सीट शेयरिंग में मुश्किलें, अकाली दल ‘बड़े भाई’ की भूमिका खोता नजर आ रहा
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