Sajjan Kumar 1984 Sikh Riots Case की सबसे मजबूत कड़ी एक चिट्ठी नहीं, एक गवाही थी। अमृतसर की रहने वाली जगदीश कौर की वही गवाही, जिसने पूर्व कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को 1984 के सिख विरोधी दंगों के एक मामले में पहली बार दोषी ठहराकर जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। 80 साल की उम्र में दिल्ली की तिहाड़ जेल में उम्रकैद काटते हुए सज्जन कुमार की मौत हो चुकी है।
लेकिन जिनके घर उजड़े, उनका दर्द आज भी वहीं खड़ा है। जगदीश कौर उन्हीं में से एक हैं।
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’17 दिसंबर 2018: जब फैसला पलट गया’
दिल्ली हाईकोर्ट ने 17 दिसंबर, 2018 को निचली अदालत का वह फैसला पलट दिया था, जिसमें सज्जन कुमार को बरी कर दिया गया था। आरोप हल्के नहीं थे।
सज्जन कुमार पर जगदीश कौर के पति, उनके 18 साल के बेटे और तीन चचेरे भाइयों की हत्या का आरोप था। यही मामला आगे चलकर ‘दिल्ली पालम कॉलोनी राज नगर हत्याकांड’ के नाम से मशहूर हुआ।
देखा जाए तो इस केस ने सिर्फ एक नेता को नहीं घेरा : इसने उस कत्लेआम में दिल्ली पुलिस की भूमिका को भी सबके सामने नंगा कर दिया।
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‘8 करोड़, प्लॉट और विदेश: फिर भी झुकी नहीं’
जगदीश कौर बताती हैं कि इंसाफ की यह लड़ाई बेहद दर्दनाक और असहनीय थी। सिस्टम ने उन्हें तोड़ने की अनगिनत कोशिशें कीं।
केस वापस लेने के बदले उन्हें जो पेशकश हुई, वह किसी को भी डगमगा सकती थी।
| क्या पेशकश हुई | ब्योरा |
|---|---|
| नकद | 8 करोड़ रुपये |
| संपत्ति | एक प्लॉट |
| सुविधा | विदेश में बसाने का इंतजाम |
| जगदीश कौर का जवाब | “मैं एक सरदारनी हूं और मैं किसी से नहीं डरती” |
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि उन्होंने बच्चों को पालने के लिए छोटे-मोटे काम किए, मगर अपनी अणख और इंसाफ की लड़ाई कभी नहीं छोड़ी।
‘2 नवंबर 1984: पुलिस चौकी में सुना वो ऐलान’
हाईकोर्ट के फैसले में दर्ज है कि 2 नवंबर 1984 को सुबह 9 बजे जगदीश कौर शिकायत दर्ज करवाने पुलिस चौकी पहुंचीं। वहां एक जनसभा चल रही थी।
उस सभा में स्थानीय सांसद सज्जन कुमार भी मौजूद था। जगदीश कौर ने उसे यह ऐलान करते सुना : “सिख साला एक नहीं बचना चाहिए, जो हिंदू भाई उनको शरण देता है, उसका घर भी जला दो और उनको भी मारो।”
और बस यहीं से शुरू हुई असली दहशत। उन्होंने पुलिस चौकी के इंचार्ज अधिकारी को दंगाइयों से यह पूछते सुना : “कितने मुरगे भून दिए?”
‘जब इंसानियत से भरोसा उठ गया’
अदालत के फैसले में साफ लिखा है कि इसी मोड़ पर जगदीश कौर का इंसानियत से भरोसा उठ गया था। समझने वाली बात है : जिस चौकी में वह सुरक्षा मांगने गई थीं, वहीं उन्हें मौत का हिसाब मजाक की तरह गिना जा रहा था।
आज उनकी आंखों में सालों के संघर्ष की थकावट साफ दिखती है। मगर सुकून इस बात का है कि उनका गुनहगार अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में जेल में अकेला और टूटा हुआ मरा।
‘इस गवाही ने क्या बदला’
अगर गौर करें, तो इस पूरे मामले की सबसे बड़ी सीख यही है कि दस्तावेज गुम हो जाते हैं, गवाहियां नहीं। एक आम औरत की जुबान ने वह काम कर दिखाया, जो सालों तक फाइलों में अटका रहा।
आम आदमी के लिए इसका मतलब सीधा है : लालच और डर के बीच अगर एक गवाह टिक जाए, तो सबसे ताकतवर आरोपी भी सलाखों तक पहुंच सकता है।
‘जानें पूरा मामला’
1984 के सिख विरोधी दंगों में जिन परिवारों के घर उजड़े, उनमें से एक जगदीश कौर का परिवार भी था। उनके पति, 18 वर्षीय बेटे और तीन चचेरे भाइयों की हत्या का आरोप सज्जन कुमार पर लगा। निचली अदालत ने उन्हें बरी कर दिया था, लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने 17 दिसंबर 2018 को वह फैसला पलटा और मामला ‘दिल्ली पालम कॉलोनी राज नगर हत्याकांड’ के नाम से इतिहास में दर्ज हो गया।
‘मुख्य बातें (Key Points)’
- अमृतसर की जगदीश कौर की गवाही ने सज्जन कुमार को पहली बार दंगा मामले में दोषी ठहराया।
- 17 दिसंबर 2018 को दिल्ली हाईकोर्ट ने बरी करने का फैसला पलटा।
- केस वापस लेने के बदले 8 करोड़ रुपये, प्लॉट और विदेश में बसाने का लालच दिया गया था।
- 80 वर्षीय सज्जन कुमार की तिहाड़ जेल में उम्रकैद काटते हुए मौत हो चुकी है।













