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The News Air - Breaking News - E-20 Green Fuels में खेती यूरिया की अवैध वाणिज्यिक Use का बड़ा खुलासा

E-20 Green Fuels में खेती यूरिया की अवैध वाणिज्यिक Use का बड़ा खुलासा

हरियाणा के सिरसा में 200 करोड़ रुपये की लागत वाली ईथेनॉल फैक्ट्री में सब्सिडी वाली कृषि यूरिया के दुरुपयोग का मामला उजागर, 763 बैग बरामद और FIR दर्ज।

Ajay Kumar by Ajay Kumar
गुरूवार, 9 जुलाई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, पंजाब
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E-20 Green Fuels
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Agricultural Urea Misuse का एक चौंकाने वाला मामला हरियाणा के सिरसा जिले से सामने आया है। पिंड पन्नीवाला रुलदू में स्थित करीब दो सौ करोड़ रुपये की लागत वाली ‘E-20 Green Fuels Private Limited‘ फैक्ट्री में खेती के लिए इस्तेमाल की जाने वाली यूरिया के कथित वाणिज्यिक उपयोग का बड़ा मामला सामने आया है। देखा जाए तो यह फैक्ट्री भारत सरकार की पेट्रोलियम कंपनियों को इथेनॉल की सप्लाई करती है, जो इसे और भी गंभीर बनाता है।

कृषि विभाग हरियाणा की जांच के बाद, सदर थाना पुलिस ने E-20 फैक्ट्री और दिल्ली की सप्लायर फर्म ‘शुभम इंटरनेशनल’ (बुरारी) के खिलाफ धोखाधड़ी, जरूरी वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) और फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है।

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763 बैग यूरिया बरामद, 757 संदिग्ध

कृषि विभाग की जांच टीम ने फैक्ट्री के स्टोर रूम से यूरिया के कुल 763 बैग बरामद किए हैं। इनमें से ‘एग्रीकल्चर ग्रेड’ (खेती योग्य) वाले इंडियन पोटाश लिमिटेड के 6 पीले बैग (45 किलो) मिले हैं। बाकी बचे 757 बैग (50 किलो) भी पूरी तरह से शक के घेरे में हैं, क्योंकि उन पर से बैच नंबर, निर्माण की तिथि और निर्माता कंपनी जैसी जरूरी जानकारी गायब थी।

समझने वाली बात यह है कि विभाग ने जांच के लिए संदिग्ध खाद के 10 सैंपल भी भरे हैं। यह सैंपल यह तय करेंगे कि वास्तव में इन बैगों में कृषि यूरिया थी या टेक्निकल ग्रेड यूरिया।

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कागजों में हेराफेरी: ऑर्गेनिक कंपोस्ट बनाम टेक्निकल यूरिया

दोष है कि फैक्ट्री में वाणिज्यिक काम के लिए किसानों को मिलने वाली सस्ती और सब्सिडी वाली कृषि यूरिया का इस्तेमाल किया जा रहा था। बिना पहचान वाले 757 बैग मिलने के कारण खरीद और सप्लाई से जुड़े कागजात भी सवालों के घेरे में आ गए हैं।

FIR के मुताबिक, फैक्ट्री के खरीद आदेश (Purchase Order) में माल का असली नाम छिपाने के लिए ‘ऑर्गेनिक कंपोस्ट’ (जैविक खाद) लिखा गया था, जबकि सप्लायर के बिलों में उसी माल को ‘टेक्निकल ग्रेड यूरिया’ दर्शाया गया है। दिलचस्प बात यह है कि इस नामकरण में बदलाव से पूरे खरीद रिकॉर्ड पर बड़ा शक पैदा हो गया है।

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शिकायत से शुरू हुई जांच

यह मामला भारतीय किसान एकता (BKE) के प्रदेश अध्यक्ष लखविंदर सिंह औलख की शिकायत के बाद सामने आया। सिरसा के डिप्टी डायरेक्टर (कृषि विभाग) द्वारा गठित जांच कमेटी में उप-मंडल कृषि अधिकारी अमित शर्मा, सहायक पौध सुरक्षा अधिकारी विजेंद्र पाल, गुण नियंत्रण निरीक्षक अमित कुमार और किसान नेता शामिल थे।

जांच के दौरान कृषि अधिकारियों को यूरिया के बैगों से नीम की ‘महक’ आई। ध्यान देने वाली बात यह है कि सरकार खेती के लिए सब्सिडी वाली यूरिया की कालाबाजारी रोकने के लिए उस पर नीम तेल की कोटिंग (Neem Coating) करती है। इस महक के कारण अधिकारियों का शक और पक्का हो गया कि बाकी बैगों में भी कृषि यूरिया ही छुपाई गई है।

प्रशासन की सख्ती के आगे झुका फैक्ट्री प्रबंधन

कृषि अधिकारियों के मुताबिक छापेमारी के दौरान फैक्ट्री प्रबंधन ने कंपनी की नीति का हवाला देते हुए बाहरी मजदूरों को अंदर आने से रोकने की कोशिश की और कहा कि मजदूरों का बीमा होना जरूरी है। पर अधिकारियों ने सख्त रुख अपनाते हुए पुलिस की मौजूदगी में सरकारी स्तर पर मजदूर बुलाकर सारा संदिग्ध माल बाहर निकलवाया और उसे सील कर दिया।

थाना सदर के मुखिया अनिल कुमार ने बताया कि कृषि विभाग की शिकायत पर मुकदमा दर्ज करके आगे की जांच शुरू कर दी गई है।

7.5 गुना मुनाफे का खेल: रेटों में बड़ा फर्क

कृषि विभाग की जांच में सामने आया है कि फैक्ट्री में इथेनॉल के उत्पादन के दौरान मशीनों को ठंडा रखने (Cooling System) के लिए रोजाना करीब 10 से 12 बैग, यानी 500 से 600 किलो यूरिया की जरूरत पड़ती है।

यूरिया का प्रकारकीमत प्रति बैग (₹)उपयोग
कृषि यूरिया (सब्सिडी वाली)266.50किसानों के लिए
टेक्निकल ग्रेड यूरिया2,000फैक्ट्रियों के लिए
मुनाफे का अनुपात7.5 गुनाअवैध लाभ

दोनों के रेटों में मौजूद करीब 7.5 गुना का यह बड़ा फर्क ही इस गैर-कानूनी खेल का मुख्य कारण माना जा रहा है। हैरान करने वाली बात यह है कि एक दिन में ही 10-12 बैग के इस्तेमाल से महीने में लाखों रुपये की बचत हो सकती है।

सारा काम पारदर्शी, दोष झूठे: हैरी ग्रोवर (CEO)

दूसरी ओर ‘E-20 Green Fuels’ के CEO हैरी ग्रोवर ने फोन पर बातचीत के दौरान बताया कि वह इस समय विदेश में हैं। यह एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है और फैक्ट्री का सारा काम पूरी पारदर्शिता के साथ किया जाता है। इतने बड़े स्तर के उद्योग में छोटे स्तर पर खाद आदि के जरिए पैसे बचाने की कोई वजह नहीं बनती। फैक्ट्री पर लगाए गए सारे दोष बेबुनियाद और झूठे हैं।

केंद्रीय एजेंसी से जांच की मांग

भारतीय किसान एकता (BKE) के प्रदेश अध्यक्ष लखविंदर सिंह औलख ने कहा कि सब्सिडी वाली यूरिया के औद्योगिक उपयोग के कारण असली हकदार किसानों को खाद मिलने में भारी दिक्कत आ रही है और सरकारी खजाने की सब्सिडी का खुलेआम दुरुपयोग हो रहा है। उन्होंने मांग की कि कई सूबों में फैले इस यूरिया खाद घपले की बारीकी से जांच किसी केंद्रीय जांच एजेंसी (जैसे CBI) से करवाई जाए।

मुख्य बातें (Key Points)
  • सिरसा में E-20 Green Fuels फैक्ट्री से 763 बैग यूरिया बरामद, 757 संदिग्ध
  • कृषि यूरिया (₹266.50) और टेक्निकल यूरिया (₹2000) में 7.5 गुना का फर्क
  • खरीद आदेश में ‘ऑर्गेनिक कंपोस्ट’, लेकिन बिल में ‘टेक्निकल यूरिया’ दर्शाया गया
  • Essential Commodities Act और Fertilizer Control Order के तहत FIR दर्ज
  • BKE ने केंद्रीय जांच एजेंसी से जांच की मांग की
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: कृषि यूरिया और टेक्निकल यूरिया में क्या अंतर है?

उत्तर: कृषि यूरिया सरकारी सब्सिडी के साथ किसानों को ₹266.50 प्रति बैग मिलती है और इस पर नीम कोटिंग होती है। टेक्निकल ग्रेड यूरिया फैक्ट्रियों में इस्तेमाल होती है और इसकी कीमत ₹2000 प्रति बैग है।

प्रश्न 2: E-20 Green Fuels फैक्ट्री क्या बनाती है?

उत्तर: यह 200 करोड़ रुपये की लागत वाली फैक्ट्री भारत सरकार की पेट्रोलियम कंपनियों को इथेनॉल की सप्लाई करती है।

प्रश्न 3: इस घोटाले में कितना मुनाफा हो रहा था?

उत्तर: कृषि यूरिया और टेक्निकल यूरिया की कीमत में 7.5 गुना का अंतर है। रोजाना 10-12 बैग के इस्तेमाल से महीने में लाखों रुपये की अवैध बचत हो सकती थी।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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