Punjab Vigilance Bureau : पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब के सबका उद्योग मंत्री सुंदर शाम अरोड़ा के खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार के मामले में नए सिरे से जांच करवाने की मांग को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
अरोड़ा ने पहले भ्रष्टाचार रोकू कानून के तहत दर्ज एफआईआर, चालान और डिस्चार्ज अर्जी रद्द करने वाले हुक्म को चुनौती दी थी। लेकिन बाद में उनके वकील ने अपनी मांग को सिर्फ किसी स्वतंत्र एजेंसी से नए सिरे से जांच करवाने तक ही सीमित रखा।
देखा जाए तो यह फैसला भ्रष्टाचार के मामलों में जांच की निष्पक्षता और पुनर्जांच की शर्तों पर एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करता है।
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कोर्ट ने क्या कहा
जस्टिस त्रिभुवन दहिया के बेंच ने स्पष्ट किया कि जांच को सिर्फ इस आधार पर पक्षपाती नहीं माना जा सकता कि यह शिकायतकर्ता के अधीन काम करने वाले किसी जूनियर अधिकारी द्वारा की गई थी।
हाई कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस फैसले में की गई टिप्पणियां सिर्फ इस पेटिशन के निपटारे के लिए हैं और इसका हेठली अदालत में चल रहे मुकदमे पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि अदालत ने जांच प्रक्रिया की पवित्रता को बनाए रखते हुए भी व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया है।
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50 लाख रुपए के साथ रंगे हाथों गिरफ्तार
सुनवाई के दौरान बेंच के सामने यह तथ्य आया कि सबका मंत्री को 15 अक्टूबर 2022 को गवाहों की मौजूदगी में 50 लाख रुपए की नकदी सहित रंगे हाथों काबू किया गया था।
इस दौरान मुल्जिम की गाड़ी, मोबाइल फोन और पार्किंग की सीसीटीवी फुटेज भी कब्जे में ली गई थी। यह Punjab Vigilance Bureau की एक बड़ी कार्रवाई थी जिसमें ठोस सबूत जुटाए गए थे।
अगर गौर करें तो यह महज एक सामान्य शिकायत पर नहीं बल्कि ठोस जानकारी के आधार पर की गई कार्रवाई थी।
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अरोड़ा के वकील की दलीलें
हालांकि, अरोड़ा के वकील ने जांच की खामियां गिनाते हुए कहा कि:
- जांच अधिकारी ने मुल्जिम और शिकायतकर्ता के बीच हुई बातचीत रिकॉर्ड नहीं की
- कोई आजाद गवाह शामिल नहीं किया गया
- जूनियर अधिकारी द्वारा सीनियर की शिकायत पर जांच से पक्षपात की आशंका
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि विजिलेंस ब्यूरो के एक AIG (असिस्टेंट इंस्पेक्टर जनरल) की शिकायत पर चीफ डायरेक्टर ने यह मामला विजिलेंस के एक DSP (डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस) को जांच के लिए सौंपा था।
अरोड़ा के वकील ने दलील दी कि जूनियर अधिकारी अपने सीनियर के पक्ष में पूर्वाग्रह रख सकता है, इसलिए जांच निर्पक्ष होना संभव नहीं था।
अदालत ने दलीलें क्यों खारिज कीं
अदालत ने सबका मंत्री की दलीलों को रद्द करते हुए कहा कि एक बार जब अदालत द्वारा अपराध का नोटिस (कॉग्नीजेंस) ले लिया जाता है, तो सिर्फ जांच की किसी कथित खामी के आधार पर दुबारा जांच के हुक्म नहीं दिए जा सकते।
यह तभी संभव है जब यह साबित हो कि इससे न्याय का घाण (मिसकैरेज ऑफ जस्टिस) हुआ है।
दिलचस्प बात यह है कि अदालत ने कहा कि मौके से बरामद हुई नकदी और गवाहों के बयानों को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि यह कार्रवाई किसी बदलाखोरी की भावना से की गई है।
ट्रायल कोर्ट का काम क्या होगा
बेंच ने स्पष्ट किया कि कानून के मुताबिक किसी अधिकारी को अपने सीनियर की शिकायत पर जांच करने से नहीं रोका गया है। जांच अधिकारी पर निजी पक्षपात का कोई दोष न होने के कारण नई जांच की मांग बेबुनियाद है।
अदालत ने अखीर में कहा कि यह ट्रायल कोर्ट (हेठली अदालत) का काम है कि वह यह तै करे कि जांच में रह गई खामियों के बावजूद मुल्जिम के खिलाफ लगे दोष बिना किसी शक के साबित होते हैं या नहीं।
समझने वाली बात है कि अदालत ने जांच और ट्रायल के बीच स्पष्ट अंतर रखा है। जांच में छोटी-मोटी खामियां होने से ट्रायल रद्द नहीं हो सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पेटिशन मोहाली के विजिलेंस ब्यूरो (फ्लाइंग स्क्वाड-1) थाने में 15 अक्टूबर 2022 को दर्ज एफआईआर और 29 अगस्त 2023 को मोहाली की विशेष अदालत द्वारा अरोड़ा की डिस्चार्ज अर्जी खारिज करने के हुक्मों के खिलाफ पाई गई थी।
| तारीख | घटना |
|---|---|
| 15 अक्टूबर 2022 | 50 लाख रुपए के साथ रंगे हाथों गिरफ्तार |
| 15 अक्टूबर 2022 | विजिलेंस में FIR दर्ज |
| 29 अगस्त 2023 | विशेष अदालत ने डिस्चार्ज अर्जी खारिज की |
| बुधवार (हालिया) | हाई कोर्ट ने नई जांच की मांग खारिज की |
मुख्य बातें (Key Points):
- हाई कोर्ट ने सुंदर शाम अरोड़ा की नई जांच की मांग पूरी तरह खारिज की
- 50 लाख रुपए के साथ रंगे हाथों गिरफ्तार किए गए थे
- जूनियर द्वारा सीनियर की शिकायत पर जांच से पक्षपात साबित नहीं: कोर्ट
- ट्रायल कोर्ट ही तय करेगी खामियों के बावजूद दोष साबित होते हैं या नहीं













