Panjab University Punjabi Signboard विवाद ने मंगलवार को एक बेहद सकारात्मक मोड़ ले लिया। चंडीगढ़ में 9 जून को सामने आई जानकारी के मुताबिक, आम आदमी पार्टी (AAP) के सांसद मालविंदर सिंह कंग की कड़ी आपत्ति और दखल के बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन ने अपनी गलती सुधार ली है। और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी… जब कंग ने इस मुद्दे को सीधे देश के उपराष्ट्रपति और पंजाब यूनिवर्सिटी के चांसलर सीपी राधाकृष्णन के सामने उठाया। एक आम पंजाबी के लिए अपनी मातृभाषा का सम्मान सबसे ऊपर होता है, और यह कदम उसी भावना को सुकून देने वाला है।
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‘साइनबोर्ड विवाद में कब क्या हुआ’
समझने वाली बात यह है कि यह पूरा मामला सिर्फ एक बोर्ड का नहीं, बल्कि पहचान का था। अगर हम घटनाक्रम पर नज़र डालें, तो तस्वीर बिल्कुल साफ हो जाती है:
| घटनाक्रम (Events) | मुख्य बिंदु (Key Highlights) |
| शुरुआती विवाद | कैंपस के साइनबोर्ड और नेमप्लेट से पंजाबी (गुरुमुखी) को हटा दिया गया था। |
| सांसद का एतराज़ | कंग ने इसे पंजाब के इतिहास और संस्कृति का अपमान बताया। |
| शीर्ष स्तर पर शिकायत | उपराष्ट्रपति और पीयू चांसलर सीपी राधाकृष्णन से तुरंत दखल की मांग की। |
| प्रशासन का फैसला | वाइस-चांसलर ने ऑफिशियल लेटर भेजकर बोर्ड दोबारा लगाने की पुष्टि की। |
‘मातृभाषा की वापसी और सम्मान की जीत’
देखा जाए तो पंजाब के नाम से चलने वाले किसी भी संस्थान में अगर पंजाबी को ही दरकिनार कर दिया जाए, तो यह हैरान करने वाली बात है। मालविंदर कंग ने इसी बात को गहराई से समझा और एक मजबूत आवाज़ उठाई। दिलचस्प बात यह है कि उनके एक्शन का असर इतना तेज हुआ कि यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर ने खुद एक ऑफिशियल लेटर भेजकर बताया कि पंजाबी साइनबोर्ड बनाने का काम शुरू हो गया है और इसके ऑर्डर भी दिए जा चुके हैं। यह सिर्फ एक राजनीतिक जीत नहीं है, बल्कि यह उन सभी लोगों के लिए उम्मीद की किरण है जो अपनी सांस्कृतिक विरासत से प्यार करते हैं।
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‘संस्कृति को बचाने की असली जंग’
अगर गौर करें तो इस पूरे फैसले से एक बड़ा संदेश निकलता है। इसका सीधा मतलब है कि पंजाब के वजूद को कोई भी संस्थान नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। सांसद कंग ने भी स्पष्ट किया कि पंजाबी महज़ संवाद का जरिया नहीं है; यह हमारी कलेक्टिव आइडेंटिटी (सामूहिक पहचान) है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पंजाब से जुड़ी हर संस्था में हमारी मातृभाषा को उसका हक मिलना ही चाहिए। उन्होंने इस त्वरित कार्रवाई के लिए उपराष्ट्रपति और यूनिवर्सिटी प्रशासन की खुले दिल से तारीफ भी की।
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‘जानें पूरा मामला’
पिछले कुछ समय से चंडीगढ़ स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी कैंपस में लगे पुराने साइनबोर्डों और नेमप्लेटों को बदला जा रहा था, और इस प्रक्रिया में पंजाबी (गुरुमुखी) भाषा को हटा दिया गया था। इस कदम से पंजाब के छात्रों और भाषा प्रेमियों में भारी रोष था। सांसद मालविंदर सिंह कंग ने इस विषय की गंभीरता को भांपते हुए इसे पंजाब की विरासत का सीधा अपमान बताया और उच्च स्तर पर मामला उठाया, जिसके बाद प्रशासन को अपना फैसला पलटना पड़ा और गुरुमुखी को उसका वाजिब स्थान दोबारा मिल गया।
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‘मुख्य बातें (Key Points)’
पंजाब यूनिवर्सिटी कैंपस में साइनबोर्ड से पंजाबी हटाने पर भारी विवाद हुआ था।
सांसद मालविंदर सिंह कंग ने उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन से दखल देने की अपील की थी।
वाइस-चांसलर ने लेटर जारी कर पंजाबी बोर्ड दोबारा लगाने का आदेश दे दिया है।
कंग ने इसे पंजाब की सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक पहचान की बड़ी जीत बताया है।













